Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 104

आनंदेश्वर की महिमा

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105

श्लोक 1 (skanda.5.104.1)

श्रीहर उवाच। त्रयस्त्रिंशत्तमं देवमानंदेश्वरमीश्वरम्। विद्धि पापहरं पुण्यं सर्वसंपत्करं सदा

śrīhara uvāca| trayastriṁśattamaṁ devamānaṁdeśvaramīśvaram| viddhi pāpaharaṁ puṇyaṁ sarvasaṁpatkaraṁ sadā

श्री हर ने कहा — हे देवी! तैंतीसवें देव आनंदेश्वर ईश्वर को जानो, जो सदा पापनाशक, पुण्यरूप तथा सर्वसंपत्तिदायक हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.104.2)

पुरा राथंतरे कल्पे बभूव पृथिवीपतिः। अनमित्र इति ख्यातः सार्वभौमो महीतले

purā rāthaṁtare kalpe babhūva pṛthivīpatiḥ| anamitra iti khyātaḥ sārvabhaumo mahītale

पूर्वकाल में रथंतर कल्प में अनमित्र नामक एक राजा हुए, जो पृथ्वीतल पर सार्वभौम सम्राट् के रूप में विख्यात थे।

श्लोक 3 (skanda.5.104.3)

धर्मात्मा महात्मा च पराक्रमधनो नृपः। अतीत्य सर्वभूतानि बभौ भानुरिवाव्ययः

dharmātmā mahātmā ca parākramadhano nṛpaḥ| atītya sarvabhūtāni babhau bhānurivāvyayaḥ

वह धर्मात्मा, महात्मा तथा पराक्रम को ही धन मानने वाला राजा समस्त प्राणियों से बढ़कर, अविनाशी सूर्य के समान देदीप्यमान था।

श्लोक 4 (skanda.5.104.4)

समः शत्रौ च पुत्रे च मित्रे च परधर्म्मवित्। गिरिभद्रा गिरेः पुत्री तेनोढा वरवर्णिनी

samaḥ śatrau ca putre ca mitre ca paradharmmavit| giribhadrā gireḥ putrī tenoḍhā varavarṇinī

शत्रु, पुत्र तथा मित्र में समान भाव रखने वाला, दूसरों के धर्म को जानने वाला वह राजा — उसने पर्वतराज की सुंदर पुत्री गिरिभद्रा से विवाह किया।

श्लोक 5 (skanda.5.104.5)

अतीव वल्लभा सा च प्राणेभ्योऽपि गरीयसी। आनंद इति पुत्रोऽभूत्तस्य ज्ञानरतः सुधीः

atīva vallabhā sā ca prāṇebhyo'pi garīyasī| ānaṁda iti putro'bhūttasya jñānarataḥ sudhīḥ

वह उसे अत्यंत प्रिय थी, प्राणों से भी अधिक। उनका आनंद नामक पुत्र हुआ, जो ज्ञानप्रिय तथा सुबुद्धि था।

श्लोक 6 (skanda.5.104.6)

जातमात्रो निजोत्संगे स्थिरमुल्लाप्य वै पुनः। परिष्वजति हार्देन उल्लापयति पुनःपुनः

jātamātro nijotsaṁge sthiramullāpya vai punaḥ| pariṣvajati hārdena ullāpayati punaḥpunaḥ

जन्म लेते ही, अपनी गोद में स्थिर रखकर बार-बार दुलारते हुए माता उसे प्रेमपूर्वक बार-बार आलिंगन करती थी।

श्लोक 7 (skanda.5.104.7)

स जातिस्मरणो जातो मातुरुत्संगमास्थितः। जहास च तदा माता संक्षुब्धा वाक्यमव्रवीत्

sa jātismaraṇo jāto māturutsaṁgamāsthitaḥ| jahāsa ca tadā mātā saṁkṣubdhā vākyamavravīt

जातिस्मर होकर उत्पन्न वह बालक माता की गोद में बैठा हुआ हँस पड़ा; और तब क्षुब्ध होकर माता ने कहा —

श्लोक 8 (skanda.5.104.8)

भीतास्मि किमिदं वत्स हासो यद्वदने तव। अकालबोधः संजातः किंस्वित्पश्यसि शोभनम्

bhītāsmi kimidaṁ vatsa hāso yadvadane tava| akālabodhaḥ saṁjātaḥ kiṁsvitpaśyasi śobhanam

'मुझे भय हो रहा है, हे वत्स! तुम्हारे मुख पर यह हँसी कैसी? क्या तुम्हें कोई असामयिक बोध हुआ है? तुम क्या शुभ देख रहे हो?'

श्लोक 9 (skanda.5.104.9)

इत्युक्तो मातरं प्राह सर्वोऽपि स्वार्थमीहते। मां नेतुमिच्छति पुरो मार्जारी किं न पश्यसि। अंतर्धानगता चेयं द्वितीया जातहारिणी

ityukto mātaraṁ prāha sarvo'pi svārthamīhate| māṁ netumicchati puro mārjārī kiṁ na paśyasi| aṁtardhānagatā ceyaṁ dvitīyā jātahāriṇī

ऐसा कहे जाने पर उसने माता से कहा — 'सभी अपने ही स्वार्थ की कामना करते हैं। क्या तुम सामने खड़ी उस बिल्ली को नहीं देखतीं, जो मुझे ले जाना चाहती है? यह वही दूसरी जातहारिणी है, जो अंतर्धान हो गई।'

श्लोक 10 (skanda.5.104.10)

पुत्रप्रीत्या च मातस्त्वमतः स्वार्थं समीहसे। उल्लाप्योल्लाप्य बहुशः परिष्वजसि मां बत

putraprītyā ca mātastvamataḥ svārthaṁ samīhase| ullāpyollāpya bahuśaḥ pariṣvajasi māṁ bata

'हे माता! पुत्रप्रेम के कारण तुम भी अपना ही स्वार्थ चाहती हो — बार-बार दुलारते हुए तुम मुझे आलिंगन करती हो, ऐसा ही है।'

श्लोक 11 (skanda.5.104.11)

उद्भूते बालके स्नेहात्संभ्रमात्स्त्रीजनोऽप्ययम्। ततोयमागतो हासः शृणु चाप्यत्र कारणम्

udbhūte bālake snehātsaṁbhramātstrījano'pyayam| tatoyamāgato hāsaḥ śṛṇu cāpyatra kāraṇam

'बालक के उत्पन्न होने पर स्नेह और उत्साह से स्त्रीजन भी ऐसा ही करता है — यह हँसी उसी कारण से आई है, कारण सुनो।'

श्लोक 12 (skanda.5.104.12)

स्वार्थे प्रसक्ता मार्जारी लोलुपा मामवेक्षते। तथांतर्द्धानगा चेयं द्वितीया जातहारिणी

svārthe prasaktā mārjārī lolupā māmavekṣate| tathāṁtarddhānagā ceyaṁ dvitīyā jātahāriṇī

'स्वार्थ में लगी लोलुप बिल्ली मुझे देख रही है; और यह भी वही दूसरी जातहारिणी है, जो अंतर्धान हो गई।'

श्लोक 13 (skanda.5.104.13)

त्वं तु क्रमेणोपभोग्यं मत्तः फलमभीप्ससि। न मां जानासि कोऽप्येवं न वै चोपकृतं मया

tvaṁ tu krameṇopabhogyaṁ mattaḥ phalamabhīpsasi| na māṁ jānāsi ko'pyevaṁ na vai copakṛtaṁ mayā

'किंतु तुम भी क्रमशः मुझसे भोगने योग्य फल की कामना करती हो — तुम मुझे कोई भी सच्चे रूप में नहीं जानती, और न मैंने अभी तक तुम्हारा कोई उपकार किया है।'

श्लोक 14 (skanda.5.104.14)

संगतिर्नाति बालानां पंचसप्तदिनात्मकम्। तथापि स्निह्यसि प्रीत्या परिष्व जसि संततम्

saṁgatirnāti bālānāṁ paṁcasaptadinātmakam| tathāpi snihyasi prītyā pariṣva jasi saṁtatam

'बालकों का संग पाँच-सात दिन से अधिक नहीं टिकता, फिर भी तुम प्रेम से स्नेह करती हो, निरंतर आलिंगन करती हो।'

श्लोक 15 (skanda.5.104.15)

ततेति वत्स भो भद्र इत्यलीकं ब्रवीषि माम्। पुत्रस्य वचनं श्रुत्वा क्रुद्धा माताऽब्रवीदिदम्

tateti vatsa bho bhadra ityalīkaṁ bravīṣi mām| putrasya vacanaṁ śrutvā kruddhā mātā'bravīdidam

'हे वत्स, हे भद्र आदि कहकर तुम मुझसे झूठ कहती हो।' पुत्र का यह वचन सुनकर क्रुद्ध माता ने यह कहा —

श्लोक 16 (skanda.5.104.16)

नाहं त्वामुपकारार्थं वत्स प्रीत्या परिष्वजे। स्वार्थो मया परित्यक्तो यस्त्वत्तो मे भविष्यति

nāhaṁ tvāmupakārārthaṁ vatsa prītyā pariṣvaje| svārtho mayā parityakto yastvatto me bhaviṣyati

'हे वत्स! मैं किसी उपकार की आशा से प्रेमपूर्वक तुम्हारा आलिंगन नहीं करती; मैंने वह स्वार्थ त्याग दिया है, जो तुमसे मुझे प्राप्त होगा।'

श्लोक 17 (skanda.5.104.17)

इत्युक्त्वा सा तमुत्सृज्य निष्क्रांता सूतिकागृहात्। जहार तत्परित्यक्तं सा तदा जातहारिणी

ityuktvā sā tamutsṛjya niṣkrāṁtā sūtikāgṛhāt| jahāra tatparityaktaṁ sā tadā jātahāriṇī

ऐसा कहकर वह उसे छोड़कर सूतिकागृह से बाहर निकल गई; और तब उस त्यक्त बालक को उस जातहारिणी ने हर लिया।

श्लोक 18 (skanda.5.104.18)

सा हृत्वा तं तदा बालं पूर्वजातिस्मरं प्रिये। हैमिन्याः शयने न्यस्यद्विक्रांतस्य महीभृतः

sā hṛtvā taṁ tadā bālaṁ pūrvajātismaraṁ priye| haiminyāḥ śayane nyasyadvikrāṁtasya mahībhṛtaḥ

हे प्रिये! उस पूर्वजन्मस्मरण करने वाले बालक को हरकर उसने विक्रांत नामक पराक्रमी राजा की पत्नी हैमिनी की शय्या पर रख दिया।

श्लोक 19 (skanda.5.104.19)

मत्वा स्वकीयं पुत्रं तु विक्रांतेन महीभृता। कृतं वै नामकरणमानंद इति विश्रुतम्

matvā svakīyaṁ putraṁ tu vikrāṁtena mahībhṛtā| kṛtaṁ vai nāmakaraṇamānaṁda iti viśrutam

उसे अपना ही पुत्र मानकर राजा विक्रांत ने उसका नामकरण किया, और वह आनंद नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 20 (skanda.5.104.20)

विक्रांतस्य सुतो नीतो बोधस्य च द्विजन्मनः। चैत्रनामा कृतस्तेन संस्कृतो वेदमंत्रकैः

vikrāṁtasya suto nīto bodhasya ca dvijanmanaḥ| caitranāmā kṛtastena saṁskṛto vedamaṁtrakaiḥ

विक्रांत के अपने पुत्र को ले जाकर बोध नामक द्विज को दे दिया गया; उसका नाम चैत्र रखा गया, तथा उसका वैदिक मंत्रों से संस्कार किया गया।

श्लोक 21 (skanda.5.104.21)

तृतीयं भक्षयामास बोधपुत्रं निशाचरी। जातिस्मरोऽप्यथानंदः कृतोपनयनस्तदा

tṛtīyaṁ bhakṣayāmāsa bodhaputraṁ niśācarī| jātismaro'pyathānaṁdaḥ kṛtopanayanastadā

उस राक्षसी ने तीसरे बालक — बोध के पुत्र — को खा लिया। जातिस्मर आनंद का तब उपनयन संस्कार हुआ।

श्लोक 22 (skanda.5.104.22)

गुरुणा समनुज्ञातं क्रियतामभिवादनम्। जनन्याः प्रागुपस्थानमित्युक्तो वाक्यमब्रवीत्

guruṇā samanujñātaṁ kriyatāmabhivādanam| jananyāḥ prāgupasthānamityukto vākyamabravīt

गुरु की आज्ञा से 'अभिवादन करो, पहले माता के पास जाओ' — ऐसा कहे जाने पर उसने यह वचन कहा —

श्लोक 23 (skanda.5.104.23)

वंद्या मे कतमा माता जनित्री पालिनी च वा। आनंदस्य वचः श्रुत्वा गुरुर्वचनमब्रवीत्

vaṁdyā me katamā mātā janitrī pālinī ca vā| ānaṁdasya vacaḥ śrutvā gururvacanamabravīt

'मुझे किस माता की वंदना करनी चाहिए — जन्मदात्री की या पालनकर्त्री की?' आनंद का यह वचन सुनकर गुरु ने कहा —

श्लोक 24 (skanda.5.104.24)

नन्वियं ते महाभाग जनित्री जनकात्मजा। विक्रांतस्याग्रमहिषी हैमिनीनाम नामतः

nanviyaṁ te mahābhāga janitrī janakātmajā| vikrāṁtasyāgramahiṣī haiminīnāma nāmataḥ

'हे महाभाग! निश्चय ही यह तुम्हारी जन्मदात्री है, राजपुत्री, विक्रांत की पटरानी, हैमिनी नाम वाली।'

श्लोक 25 (skanda.5.104.25)

आनंद उवाच। चैत्रस्य प्रसवित्रीयं चैत्रोऽयं द्विजवेश्मनि। संस्कृतो ब्राह्मणैर्मंत्रैर्गिरिभद्रासुतस्त्वहम्

ānaṁda uvāca| caitrasya prasavitrīyaṁ caitro'yaṁ dvijaveśmani| saṁskṛto brāhmaṇairmaṁtrairgiribhadrāsutastvaham

आनंद ने कहा — 'यह तो चैत्र की जननी है, और यह चैत्र द्विज के घर में ब्राह्मणों के मंत्रों से संस्कारित हुआ है; किंतु मैं तो गिरिभद्रा का पुत्र हूँ।'

श्लोक 26 (skanda.5.104.26)

गुरुराह ततः कस्त्वं चैत्रः को वा त्वयोच्यते। ततः स कथयामास पूर्ववृत्तांतमादितः

gururāha tataḥ kastvaṁ caitraḥ ko vā tvayocyate| tataḥ sa kathayāmāsa pūrvavṛttāṁtamāditaḥ

गुरु ने कहा — 'तो तुम कौन हो, और यह चैत्र कौन कहा जाता है?' तब उसने आदि से सारा पूर्ववृत्तांत कह सुनाया।

श्लोक 27 (skanda.5.104.27)

।। गुरुरुवाच ।।। अतीव गहनं वत्स संकटं महदागतम्। न वेद्मि किंचिन्मोहेन भ्रमंति मम बुद्धयः

|| gururuvāca ||| atīva gahanaṁ vatsa saṁkaṭaṁ mahadāgatam| na vedmi kiṁcinmohena bhramaṁti mama buddhayaḥ

गुरु ने कहा — 'हे वत्स! यह अत्यंत गहन तथा महान् संकट है; मैं कुछ नहीं जानता, मोह से मेरी बुद्धि भी भ्रमित हो रही है।'

श्लोक 28 (skanda.5.104.28)

आनंद उवाच। मोहस्यावसरः कोऽत्र जगत्येवं व्यवस्थितः। कः कस्य पुत्रो विप्रर्षे को वा कस्य न बांधवः

ānaṁda uvāca| mohasyāvasaraḥ ko'tra jagatyevaṁ vyavasthitaḥ| kaḥ kasya putro viprarṣe ko vā kasya na bāṁdhavaḥ

आनंद ने कहा — 'हे विप्रर्षे! संसार तो इस प्रकार ही स्थित है, यहाँ मोह का अवसर ही कहाँ? कौन किसका पुत्र है, अथवा कौन किसका बांधव नहीं है?'

श्लोक 29 (skanda.5.104.29)

अतः संसारता हंति संसारं प्राणिनामिह। महामोहहतं चेतश्चित्रमत्र कथं गुरो

ataḥ saṁsāratā haṁti saṁsāraṁ prāṇināmiha| mahāmohahataṁ cetaścitramatra kathaṁ guro

'इसीलिए यह संसार-भाव ही यहाँ प्राणियों के संसार को नष्ट कर देता है; हे गुरो! यह आश्चर्य ही है कि यहाँ चित्त इतने महामोह से ग्रस्त हो जाता है।'

श्लोक 30 (skanda.5.104.30)

ब्रह्मपुत्रस्य दुष्टस्य दुःसहस्य सुता भुवि। जातहारिणिकानाम परिवर्त्तयते सुतान्

brahmaputrasya duṣṭasya duḥsahasya sutā bhuvi| jātahāriṇikānāma parivarttayate sutān

'ब्रह्मपुत्र की उस दुष्ट, दुःसह पुत्री का नाम जातहारिणी है, जो पृथ्वी पर पुत्रों को बदल देती है।'

श्लोक 31 (skanda.5.104.31)

मातृद्वयं मया प्राप्तमस्मिन्नेव हि जन्मनि। मातृद्वयमथो प्राप्तं जातिं संस्मरता सता

mātṛdvayaṁ mayā prāptamasminneva hi janmani| mātṛdvayamatho prāptaṁ jātiṁ saṁsmaratā satā

'मुझे इसी जन्म में दो माताएँ प्राप्त हुईं; जाति (पूर्वजन्म) का स्मरण करते हुए मुझ सज्जन को यह दो माताओं की प्राप्ति हुई है।'

श्लोक 32 (skanda.5.104.32)

सोऽहं तपः करिष्यामि चैत्र आनीयतामिति। ततः सुविस्मितो राजा सभार्यः सह बंधुभिः

so'haṁ tapaḥ kariṣyāmi caitra ānīyatāmiti| tataḥ suvismito rājā sabhāryaḥ saha baṁdhubhiḥ

'अतः मैं तप करूँगा; चैत्र को यहाँ लाया जाए।' तब अत्यंत विस्मित राजा अपनी पत्नी तथा बंधुजनों सहित,

श्लोक 33 (skanda.5.104.33)

तस्मान्निवर्त्त्य ममता मनुमेने च तं प्रति। चैत्रमानीय तनयं राज्ययोग्यं चकार सः

tasmānnivarttya mamatā manumene ca taṁ prati| caitramānīya tanayaṁ rājyayogyaṁ cakāra saḥ

उसके प्रति ममता को हटाकर उस सत्य को स्वीकार करते हुए, चैत्र को लाकर उसे राज्य के योग्य पुत्र बनाया।

श्लोक 34 (skanda.5.104.34)

सन्मान्य ब्राह्मणं येन पुत्रबुद्ध्या स पालितः। सोऽप्यानंदस्तपस्तेपे महाकालवने शुभे

sanmānya brāhmaṇaṁ yena putrabuddhyā sa pālitaḥ| so'pyānaṁdastapastepe mahākālavane śubhe

जिस ब्राह्मण ने उसे पुत्रबुद्धि से पाला था, उसका सम्मान करके — और आनंद ने भी शुभ महाकालवन में तपस्या की।

श्लोक 35 (skanda.5.104.35)

इंद्रेश्वरस्य देवस्य पश्चिमे लिंगमुत्तमम्। भक्त्या ह्याराधयामास तपसा दुष्करेण तु

iṁdreśvarasya devasya paścime liṁgamuttamam| bhaktyā hyārādhayāmāsa tapasā duṣkareṇa tu

इंद्रेश्वर देव के लिंग के पश्चिम में एक उत्तम लिंग था; उसकी उसने भक्तिपूर्वक तथा दुष्कर तप से आराधना की।

श्लोक 36 (skanda.5.104.36)

तपस्यंतं ततस्तं तु देवः प्राह शुचिस्मिते। किमर्थं तप्यसे वत्स तपस्तीव्रं ब्रवीमि ते

tapasyaṁtaṁ tatastaṁ tu devaḥ prāha śucismite| kimarthaṁ tapyase vatsa tapastīvraṁ bravīmi te

तप करते हुए उस आनंद से तब देव ने कहा, हे शुचिस्मिते! — 'हे वत्स! तुम किसलिए इतना तीव्र तप कर रहे हो? मैं तुम्हें बताता हूँ —

श्लोक 37 (skanda.5.104.37)

मनुना भवता भाव्यं षष्ठेन व्रज तत्कुरु। अलं ते तपसा तस्मिंस्ततो मुक्तिमवाप्स्यसि

manunā bhavatā bhāvyaṁ ṣaṣṭhena vraja tatkuru| alaṁ te tapasā tasmiṁstato muktimavāpsyasi

तुम्हें छठे मनु के रूप में होना है, जाओ और वही कर्तव्य पूर्ण करो; इस तप से अब पर्याप्त है, इससे तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी।'

श्लोक 38 (skanda.5.104.38)

इत्युक्तो देवदेवेन तथेत्याह महामतिः। बभूव स मनुर्देवि ब्रह्मतुल्यो महायशाः

ityukto devadevena tathetyāha mahāmatiḥ| babhūva sa manurdevi brahmatulyo mahāyaśāḥ

देवदेव द्वारा ऐसा कहे जाने पर उस महामति ने 'तथास्तु' कहा। हे देवी! वह ब्रह्मा के समान महायशस्वी मनु हुआ।

श्लोक 39 (skanda.5.104.39)

पुत्रानुत्पादयामास लिंगस्यास्य समर्चनात्। कृतं नाम तदा देवैरानंदेश्वरमुत्तमम्

putrānutpādayāmāsa liṁgasyāsya samarcanāt| kṛtaṁ nāma tadā devairānaṁdeśvaramuttamam

इस लिंग की पूजा से उसने पुत्रों को उत्पन्न किया; तब देवताओं ने इसका नाम आनंदेश्वर रखा।

श्लोक 40 (skanda.5.104.40)

आनंदेन यतः प्राप्ता सिद्धिर्देवि सुदुर्ल्लभा। अतो नाम सुविख्यातमानंदेश्वरमीक्ष्यताम्

ānaṁdena yataḥ prāptā siddhirdevi sudurllabhā| ato nāma suvikhyātamānaṁdeśvaramīkṣyatām

चूँकि आनंद ने इसके द्वारा अत्यंत दुर्लभ सिद्धि प्राप्त की, हे देवी! इसीलिए इसका सुविख्यात नाम आनंदेश्वर देखा जाए।

श्लोक 41 (skanda.5.104.41)

ये पश्यंति विशालाक्षि आनंदेश्वरमीश्वरम्। ते पुत्रपौत्रसंपन्ना भविष्यंति महीतले

ye paśyaṁti viśālākṣi ānaṁdeśvaramīśvaram| te putrapautrasaṁpannā bhaviṣyaṁti mahītale

हे विशालाक्षि! जो लोग आनंदेश्वर ईश्वर का दर्शन करते हैं, वे पृथ्वी पर पुत्र-पौत्रों से संपन्न होंगे।

श्लोक 42 (skanda.5.104.42)

येषां क्षीणं नृणां पापं कोटिजन्मशतोद्भवम्। तेषां भवति सा भक्तिरानंदेश्वरदर्शनात्

yeṣāṁ kṣīṇaṁ nṛṇāṁ pāpaṁ koṭijanmaśatodbhavam| teṣāṁ bhavati sā bhaktirānaṁdeśvaradarśanāt

जिन मनुष्यों का सैकड़ों करोड़ जन्मों का पाप क्षीण हो चुका होता है, उन्हीं को आनंदेश्वर के दर्शन से वह भक्ति प्राप्त होती है।

श्लोक 43 (skanda.5.104.43)

तदैव पुरुषो मुक्तो जन्ममृत्युजरादिभिः। यदा पश्यति देवेशमानंदेश्वरसंज्ञकम्

tadaiva puruṣo mukto janmamṛtyujarādibhiḥ| yadā paśyati deveśamānaṁdeśvarasaṁjñakam

जब मनुष्य देवेश आनंदेश्वर नामक देव का दर्शन करता है, उसी क्षण वह जन्म, मृत्यु, जरा आदि से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 44 (skanda.5.104.44)

मयोक्तं मुक्तिदं नृणामानन्देश्वरदर्शनम्। स्वर्गापवर्गदं देवमानंदं लिंगमुत्तमम्। अत्र देवैर्विशालाक्षि पूजितं लिंगमुत्तमम्

mayoktaṁ muktidaṁ nṛṇāmānandeśvaradarśanam| svargāpavargadaṁ devamānaṁdaṁ liṁgamuttamam| atra devairviśālākṣi pūjitaṁ liṁgamuttamam

मैंने कहा है कि आनंदेश्वर का दर्शन मनुष्यों को मुक्तिदायक है; यह स्वर्ग और अपवर्ग (मोक्ष) दोनों देने वाला आनंद नामक उत्तम लिंग है। हे विशालाक्षि! यहाँ देवताओं द्वारा भी यह उत्तम लिंग पूजित हुआ है।

श्लोक 45 (skanda.5.104.45)

एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। आनंदेश्वरदेवस्य शृणु त्वं कंथडेश्वरम्

eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| ānaṁdeśvaradevasya śṛṇu tvaṁ kaṁthaḍeśvaram

हे देवी! तुम्हें आनंदेश्वर देव का यह पापनाशक प्रभाव बताया गया; अब कंथडेश्वर के विषय में सुनो।

अध्याय 103अध्याय-सूचीअध्याय 105