अवन्ती खण्ड · अध्याय 105
कंथडेश्वर की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.105.1)
श्रीहर उवाच। चतुस्त्रिंशत्तमं विद्धि देवं वै कंथडेश्वरम्। यस्य दर्शनमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते
śrīhara uvāca| catustriṁśattamaṁ viddhi devaṁ vai kaṁthaḍeśvaram| yasya darśanamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate
श्री हर ने कहा — हे देवी! चौंतीसवें देव कंथडेश्वर को जानो, जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.105.2)
वितस्तायास्तटे रम्ये ब्राह्मणो निवसन्पुरा। बभूव पांडवोनाम दरिद्रेणातिपीडितः
vitastāyāstaṭe ramye brāhmaṇo nivasanpurā| babhūva pāṁḍavonāma daridreṇātipīḍitaḥ
वितस्ता नदी के रम्य तट पर पूर्वकाल में पांडव नामक एक ब्राह्मण निवास करता था, जो दरिद्रता से अत्यंत पीड़ित था।
श्लोक 3 (skanda.5.105.3)
ज्ञातिभिश्च परित्यक्तो दुष्टया भार्यया तथा। कंथाप्येका स्थिता यस्य सर्वस्वप्रेमधारिणी
jñātibhiśca parityakto duṣṭayā bhāryayā tathā| kaṁthāpyekā sthitā yasya sarvasvapremadhāriṇī
वह अपने ज्ञातिजनों तथा दुष्ट पत्नी द्वारा भी त्याग दिया गया था; उसके पास केवल एक ही कंथा (गुदड़ी) थी, जिसे वह अपने सर्वस्व के समान प्रेमपूर्वक धारण करता था।
श्लोक 4 (skanda.5.105.4)
तेनाहं सुतकामेन तोषितो गिरिगह्वरे। मयाप्युक्तं विशालाक्षि पुत्रस्तव भविष्यति
tenāhaṁ sutakāmena toṣito girigahvare| mayāpyuktaṁ viśālākṣi putrastava bhaviṣyati
पुत्र की कामना से युक्त उस ब्राह्मण से मैं पर्वत की गुफा में प्रसन्न हुआ; हे विशालाक्षि! मैंने भी कहा — 'तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा।'
श्लोक 5 (skanda.5.105.5)
तस्य पुत्रः समुत्पन्नः कंथामध्यादयो निजः। शीतोष्णवारिणी कंथा तस्य पुत्रस्य साऽभवत्
tasya putraḥ samutpannaḥ kaṁthāmadhyādayo nijaḥ| śītoṣṇavāriṇī kaṁthā tasya putrasya sā'bhavat
उसका पुत्र मानो उसी कंथा के भीतर से उत्पन्न हुआ; और उस पुत्र के लिए वह कंथा शीत तथा उष्ण जल देने वाली बन गई।
श्लोक 6 (skanda.5.105.6)
स च लब्धः प्रसादेन मदीयेन वरानने। रुद्रेण च वरो दत्तः कंथाया भविता पुनः
sa ca labdhaḥ prasādena madīyena varānane| rudreṇa ca varo dattaḥ kaṁthāyā bhavitā punaḥ
हे वरानने! वह मेरी कृपा से प्राप्त हुआ, तथा रुद्र द्वारा यह वर भी दिया गया कि कंथा से पुनः ऐसा ही वरदान प्राप्त होगा।
श्लोक 7 (skanda.5.105.7)
अथ षष्ठे गते वर्षे मौंजीबंधमचिंतयत्। तदामंत्र्य मुनीन्सर्वान्प्रसाद्य च पुनः पुनः। नमस्कृत्य ऋषीन्सर्वान्पूजयामास भक्तितः
atha ṣaṣṭhe gate varṣe mauṁjībaṁdhamaciṁtayat| tadāmaṁtrya munīnsarvānprasādya ca punaḥ punaḥ| namaskṛtya ṛṣīnsarvānpūjayāmāsa bhaktitaḥ
फिर जब छठा वर्ष बीत गया, तब उसने मौंजीबंधन (उपनयन) के विषय में विचार किया; तब समस्त मुनियों को आमंत्रित कर, बार-बार उन्हें प्रसन्न कर, सभी ऋषियों को प्रणाम कर उसने भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की।
श्लोक 8 (skanda.5.105.8)
फलैर्वित्तानुसारेण मौंजी तस्याप्यबंधत। तेऽप्युक्ता मुनयः सर्वे प्रसाद्य च पुनःपुन
phalairvittānusāreṇa mauṁjī tasyāpyabaṁdhata| te'pyuktā munayaḥ sarve prasādya ca punaḥpuna
अपनी शक्ति के अनुसार फल आदि देकर उस पुत्र का भी मौंजीबंधन संपन्न हुआ। उन सभी मुनियों को बार-बार प्रसन्न करके उनसे कहा गया —
श्लोक 9 (skanda.5.105.9)
दीयतामाशिषो ह्यस्मै पुत्राय मुनिसत्तमाः। मम पुत्रस्य पुत्रोऽयं दीर्घायुर्जायतां चिरम्
dīyatāmāśiṣo hyasmai putrāya munisattamāḥ| mama putrasya putro'yaṁ dīrghāyurjāyatāṁ ciram
'हे मुनिश्रेष्ठो! इस पुत्र को आशीर्वाद दीजिए — मेरे पुत्र का यह पुत्र दीर्घकाल तक दीर्घायु हो।'
श्लोक 10 (skanda.5.105.10)
तूष्णींभूयः स्थिताः सर्वे तच्छ्रुत्वा नोत्तरं ददुः। यदा ते नोत्तरं प्रोचुस्तदा मुनिवरः स्वयम्। ध्यानेन चिंतयामास नूनमल्पायुषं सुतम्
tūṣṇīṁbhūyaḥ sthitāḥ sarve tacchrutvā nottaraṁ daduḥ| yadā te nottaraṁ procustadā munivaraḥ svayam| dhyānena ciṁtayāmāsa nūnamalpāyuṣaṁ sutam
यह सुनकर सभी मौन होकर बैठे रहे, कोई उत्तर न दिया। जब उन्होंने कोई उत्तर न दिया, तब स्वयं श्रेष्ठ मुनि ने ध्यान से विचार किया — 'निश्चय ही यह पुत्र अल्पायु है।'
श्लोक 11 (skanda.5.105.11)
इति ज्ञात्वा तु संमोहमगमत्सहसा मुनिः। विललाप स दुःखार्त्तः सुतस्नेहेन दुःखितः
iti jñātvā tu saṁmohamagamatsahasā muniḥ| vilalāpa sa duḥkhārttaḥ sutasnehena duḥkhitaḥ
यह जानकर वह मुनि सहसा मोहग्रस्त हो गया; पुत्रस्नेह के कारण दुःखित होकर वह दुःखार्त होकर विलाप करने लगा।
श्लोक 12 (skanda.5.105.12)
वाडव उवाच। दत्तः स्वयं महेशेन ममाल्पायुः कथं सुतः। रुद्रेण च वरो दत्तः प्रसन्नेन पुरा मम
vāḍava uvāca| dattaḥ svayaṁ maheśena mamālpāyuḥ kathaṁ sutaḥ| rudreṇa ca varo dattaḥ prasannena purā mama
उस ब्राह्मण ने कहा — 'स्वयं महेश द्वारा दिया गया मेरा पुत्र अल्पायु कैसे हो सकता है? पूर्वकाल में प्रसन्न होकर रुद्र ने मुझे यह वर दिया था —'
श्लोक 13 (skanda.5.105.13)
मत्तुल्यवीर्यः पुत्रस्ते कंथामध्याद्भ विष्यति। जातं च दत्त्वा ह्यल्पायुं मिथ्या त्र्यक्षस्य तद्वचः
mattulyavīryaḥ putraste kaṁthāmadhyādbha viṣyati| jātaṁ ca dattvā hyalpāyuṁ mithyā tryakṣasya tadvacaḥ
'मेरे समान पराक्रमी पुत्र तुम्हें उसी कंथा के भीतर से प्राप्त होगा — अब यदि जन्म देकर उसे अल्पायु ही दे दिया, तो त्रिनेत्र का वह वचन मिथ्या ही ठहरता है।'
श्लोक 14 (skanda.5.105.14)
पितरं दुःखितं दृष्ट्वा तूष्णींभूतो मुनिस्तदा। स बालः सहसा वाक्यं बभाषे हर्षवर्द्धनम्
pitaraṁ duḥkhitaṁ dṛṣṭvā tūṣṇīṁbhūto munistadā| sa bālaḥ sahasā vākyaṁ babhāṣe harṣavarddhanam
पिता को दुःखी तथा मुनि को मौन देखकर, वह बालक सहसा हर्षवर्धक वचन बोल उठा —
श्लोक 15 (skanda.5.105.15)
त्यजत भयमिदानीं यन्ममार्थे विषण्णा विनिहतनिजयत्नं प्रेतराजं करोमि। शृणुत मम गिरं भोः सेश्वरा लोकपालाः पितृपतिविजयार्थं सत्प्रतिज्ञा ममैषा
tyajata bhayamidānīṁ yanmamārthe viṣaṇṇā vinihatanijayatnaṁ pretarājaṁ karomi| śṛṇuta mama giraṁ bhoḥ seśvarā lokapālāḥ pitṛpativijayārthaṁ satpratijñā mamaiṣā
'अब भय त्याग दीजिए, जो मेरे लिए आप सब विषण्ण हैं — मैं प्रेतराज के अपने ही प्रयत्न को विफल कर दूँगा। हे ईश्वर सहित लोकपालो! मेरी यह बात सुनिए — पितृपति (यम) को जीतने के लिए यह मेरी सच्ची प्रतिज्ञा है।'
श्लोक 16 (skanda.5.105.16)
अतिविषमतपोभिः शंकरं तोषयित्वा स्वपितुरपि च भक्त्या हन्मि मृत्योर्जयाशाम्। किमतिशयविषाद व्याकुलास्तात सर्वे सपदि पितृपतिं तं स्वे वशे स्थापयामि
ativiṣamatapobhiḥ śaṁkaraṁ toṣayitvā svapiturapi ca bhaktyā hanmi mṛtyorjayāśām| kimatiśayaviṣāda vyākulāstāta sarve sapadi pitṛpatiṁ taṁ sve vaśe sthāpayāmi
'अत्यंत कठोर तप से शंकर को प्रसन्न कर तथा अपने पिता के प्रति भक्ति से भी मैं मृत्यु की विजय की आशा को नष्ट कर दूँगा। हे तात! आप सब इतने अत्यधिक विषाद से क्यों व्याकुल हैं? मैं शीघ्र ही उस पितृपति को अपने वश में कर लूँगा।'
श्लोक 17 (skanda.5.105.17)
प्रयामि रुद्रं शरणं महेश्वरं देवं वरं चाप्युमयाऽविहीनम्। शृण्वंतु सर्वे मुनयः समंतान्न मादृशे मृत्युपराभवोस्ति
prayāmi rudraṁ śaraṇaṁ maheśvaraṁ devaṁ varaṁ cāpyumayā'vihīnam| śṛṇvaṁtu sarve munayaḥ samaṁtānna mādṛśe mṛtyuparābhavosti
'मैं महेश्वर, परम देव, उमा से सदा अभिन्न रुद्र की शरण में जाता हूँ। हे समस्त मुनियो! सुनिए — मुझ जैसे के लिए मृत्यु से कोई पराभव नहीं है।'
श्लोक 18 (skanda.5.105.18)
तपोभिरुग्रैः शितिकंठपादौ प्रसाद्य मृत्युं न चिराद्विनेष्ये। कंथाजवाक्यामृतलोलनेत्राः संजातरोमां चलसत्स्वदेहाः
tapobhirugraiḥ śitikaṁṭhapādau prasādya mṛtyuṁ na cirādvineṣye| kaṁthājavākyāmṛtalolanetrāḥ saṁjātaromāṁ calasatsvadehāḥ
'उग्र तप से नीलकंठ के चरणों को प्रसन्न कर मैं शीघ्र ही मृत्यु को जीत लूँगा।' कंथाजात उस बालक की अमृततुल्य वाणी सुनकर, नेत्र चंचल हो गए, रोमांच हो आया, उनके शरीर काँपने लगे,
श्लोक 19 (skanda.5.105.19)
पप्रच्छुरेनं मुनयः शिशुं तं जानासि रुद्रं परमं कथं त्वम्। वयं चिरं कालमुपासमानास्तपोभिरुग्रैर्व्रतसंचयैश्च
papracchurenaṁ munayaḥ śiśuṁ taṁ jānāsi rudraṁ paramaṁ kathaṁ tvam| vayaṁ ciraṁ kālamupāsamānāstapobhirugrairvratasaṁcayaiśca
मुनियों ने उस शिशु से पूछा — 'तुम परम रुद्र को कैसे जानते हो? हम स्वयं दीर्घकाल से उग्र तप और अनेक व्रतों द्वारा उनकी उपासना करते हुए भी,'
श्लोक 20 (skanda.5.105.20)
तथापि विद्मो न वयं महेशं ज्ञातस्त्वयासौ कथमर्भकेण। ईहामहे तं किल पुत्र सम्यक्छ्रोतुं प्रहर्षाद्भुतजातरोमाः
tathāpi vidmo na vayaṁ maheśaṁ jñātastvayāsau kathamarbhakeṇa| īhāmahe taṁ kila putra samyakchrotuṁ praharṣādbhutajātaromāḥ
'फिर भी महेश को नहीं जान सके — फिर तुमने, एक बालक होकर, उन्हें कैसे जान लिया? हे पुत्र! हम अत्यंत हर्ष और रोमांच से युक्त होकर यह भली-भाँति सुनना चाहते हैं —'
श्लोक 21 (skanda.5.105.21)
ज्ञातस्त्वया कुत्र कथं महेशो महेश्वरो वै भुवनैकनाथः
jñātastvayā kutra kathaṁ maheśo maheśvaro vai bhuvanaikanāthaḥ
'तुमने कहाँ और कैसे उन भुवनैकनाथ महेश्वर, महेश को जाना है?'
श्लोक 22 (skanda.5.105.22)
इति तेषां वचः श्रुत्वा मुनीनां भावितात्मनाम्। स बालः कथयामास वृत्तांतं पर्वतात्मजे
iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā munīnāṁ bhāvitātmanām| sa bālaḥ kathayāmāsa vṛttāṁtaṁ parvatātmaje
भावितात्मा उन मुनियों का यह वचन सुनकर, हे पर्वतात्मजे! उस बालक ने वृत्तांत कह सुनाया —
श्लोक 23 (skanda.5.105.23)
ममात्र क्रीडतः सिद्धः सिद्धिदः समुपागतः। विज्ञायाल्पायुषं मां तु वात्सल्यादब्रवीदिदम्
mamātra krīḍataḥ siddhaḥ siddhidaḥ samupāgataḥ| vijñāyālpāyuṣaṁ māṁ tu vātsalyādabravīdidam
'यहाँ खेलते हुए मेरे पास सिद्धि देने वाले एक सिद्ध पुरुष आए; मुझे अल्पायु जानकर उन्होंने वात्सल्यवश यह कहा —'
श्लोक 24 (skanda.5.105.24)
गच्छ पुत्र ममादेशान्महाकालवनोत्तमे। दक्षिणे चास्ति यल्लिंगमानंदेश्वरलिंगतः
gaccha putra mamādeśānmahākālavanottame| dakṣiṇe cāsti yalliṁgamānaṁdeśvaraliṁgataḥ
'हे पुत्र! मेरी आज्ञा से महाकालवन के उत्तम स्थान में जाओ; वहाँ आनंदेश्वर लिंग के दक्षिण में जो लिंग है,'
श्लोक 25 (skanda.5.105.25)
तमाराधय शीघ्रं त्वं चिरजीवी भविष्यसि। तस्योपदेशदानेन ज्ञातं सम्यङ्महेश्वरात्
tamārādhaya śīghraṁ tvaṁ cirajīvī bhaviṣyasi| tasyopadeśadānena jñātaṁ samyaṅmaheśvarāt
'उसकी शीघ्र आराधना करो, तुम दीर्घजीवी हो जाओगे।' उनके उपदेश से ही मुझे महेश्वर का भली-भाँति ज्ञान हुआ है।
श्लोक 26 (skanda.5.105.26)
नान्यो देवोस्ति लोकेषु सत्यं सत्यं मुनीश्वराः। तस्मादद्यैव यास्यामि महाकालवने शुभे
nānyo devosti lokeṣu satyaṁ satyaṁ munīśvarāḥ| tasmādadyaiva yāsyāmi mahākālavane śubhe
'लोकों में उनसे भिन्न कोई देव नहीं है — यह सत्य है, परम सत्य है, हे मुनीश्वरो! इसलिए मैं आज ही शुभ महाकालवन को जाऊँगा।'
श्लोक 27 (skanda.5.105.27)
लिंगमाराधयिष्यामि विषादस्त्यज्यतामिह। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तेन सार्द्धं महर्षयः
liṁgamārādhayiṣyāmi viṣādastyajyatāmiha| tasya tadvacanaṁ śrutvā tena sārddhaṁ maharṣayaḥ
'मैं उस लिंग की आराधना करूँगा; यहाँ का विषाद त्याग दिया जाए।' उसका यह वचन सुनकर वे महर्षिगण उसके साथ,
श्लोक 28 (skanda.5.105.28)
पिता च विस्मितो देवि सर्व एव समागताः। देवमाराधयामास बालः कालजिघांसया
pitā ca vismito devi sarva eva samāgatāḥ| devamārādhayāmāsa bālaḥ kālajighāṁsayā
तथा हे देवी! विस्मित पिता भी, सब मिलकर वहाँ गए; और उस बालक ने मृत्यु (काल) पर विजय की कामना से देव की आराधना की।
श्लोक 29 (skanda.5.105.29)
लिंगमध्यात्ततो वाणी निःसृता पर्वतात्मजे। अहो तुष्टोस्मि ते वत्स कं कामं प्रददाम्यहम्
liṁgamadhyāttato vāṇī niḥsṛtā parvatātmaje| aho tuṣṭosmi te vatsa kaṁ kāmaṁ pradadāmyaham
हे पर्वतात्मजे! तब लिंग के मध्य से वाणी निकली — 'अहो! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, हे वत्स! मैं तुम्हें कौन-सी कामना प्रदान करूँ?'
श्लोक 30 (skanda.5.105.30)
बाल उवाच। यदि तुष्टोऽसि मे देव ये त्वां पश्यंति शंकर। पापकंथाविनिर्मुक्तास्ते संतु चिरजीविनः
bāla uvāca| yadi tuṣṭo'si me deva ye tvāṁ paśyaṁti śaṁkara| pāpakaṁthāvinirmuktāste saṁtu cirajīvinaḥ
बालक ने कहा — 'यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे देव, हे शंकर! तो जो भी आपका दर्शन करें, वे पापरूपी कंथा (बोझ) से मुक्त होकर दीर्घजीवी हों।'
श्लोक 31 (skanda.5.105.31)
बालस्य भाषितं श्रुत्वा लिंगे नोक्तं यशस्विनि। ये च मां पूजयिष्यंति श्रद्धया परया युताः। ते भविष्यंति सततं जरामरणवर्जिताः
bālasya bhāṣitaṁ śrutvā liṁge noktaṁ yaśasvini| ye ca māṁ pūjayiṣyaṁti śraddhayā parayā yutāḥ| te bhaviṣyaṁti satataṁ jarāmaraṇavarjitāḥ
हे यशस्विनी! बालक की यह बात सुनकर लिंग में से कहा गया — 'जो भी परम श्रद्धायुक्त होकर मेरी पूजा करेंगे, वे सदा जरा-मृत्यु से रहित हो जाएँगे।'
श्लोक 32 (skanda.5.105.32)
लप्स्यंते परमान्कामान्भविष्यंति गणोत्तम। पूज्याः सर्वेषु लोकेषु सर्वालंकारभूषिताः
lapsyaṁte paramānkāmānbhaviṣyaṁti gaṇottama| pūjyāḥ sarveṣu lokeṣu sarvālaṁkārabhūṣitāḥ
'हे गणश्रेष्ठ! वे परम कामनाओं को प्राप्त करेंगे, समस्त लोकों में पूज्य होंगे, तथा सभी अलंकारों से विभूषित होंगे।'
श्लोक 33 (skanda.5.105.33)
एवं लब्धवरः कंथः प्रांजलिः समुपस्थितः। लिंगेनोक्तः प्रसन्नेन भूयो वरय सुव्रत
evaṁ labdhavaraḥ kaṁthaḥ prāṁjaliḥ samupasthitaḥ| liṁgenoktaḥ prasannena bhūyo varaya suvrata
इस प्रकार वरदान प्राप्त कर कंथ (वह बालक) हाथ जोड़कर सामने खड़ा हुआ; तब प्रसन्न लिंग ने उससे कहा — 'हे सुव्रत! और भी कोई वर माँग लो।'
श्लोक 34 (skanda.5.105.34)
वरो वै दुर्लभो लोके देवदानवगुह्यकैः। मयावतारितो यस्मान्नास्त्यदेयं तवाधुना
varo vai durlabho loke devadānavaguhyakaiḥ| mayāvatārito yasmānnāstyadeyaṁ tavādhunā
'यह वर तो देव, दानव और गुह्यकों के लिए भी लोक में दुर्लभ है — किंतु चूँकि मैंने स्वयं यहाँ अवतार लिया है, इसलिए अब तुम्हारे लिए कुछ भी अदेय नहीं है।'
श्लोक 35 (skanda.5.105.35)
बालेनोक्तो महादेव यदि देयो वरः पुनः। मन्नाम्ना देव ते ख्यातिर्भूयात्त्रिभुवने भुवि
bālenokto mahādeva yadi deyo varaḥ punaḥ| mannāmnā deva te khyātirbhūyāttribhuvane bhuvi
बालक ने कहा — 'हे महादेव! यदि पुनः कोई वर देना ही है, तो हे देव! मेरे ही नाम से पृथ्वी पर, तीनों लोकों में आपकी ख्याति हो।'
श्लोक 36 (skanda.5.105.36)
एवमस्त्विति लिंगेन प्रोक्तं तुष्टेन पार्वति। तदाप्रभृति देवेशो विख्यातः कंथडेश्वरः। यस्य दर्शनमात्रेण चिरायुर्जायते नरः
evamastviti liṁgena proktaṁ tuṣṭena pārvati| tadāprabhṛti deveśo vikhyātaḥ kaṁthaḍeśvaraḥ| yasya darśanamātreṇa cirāyurjāyate naraḥ
हे पार्वती! प्रसन्न होकर लिंग ने कहा — 'ऐसा ही हो।' तभी से यह देवेश 'कंथडेश्वर' के नाम से विख्यात हुए — जिनके दर्शनमात्र से मनुष्य दीर्घायु होता है।
श्लोक 37 (skanda.5.105.37)
यः समीक्षति तल्लिंगं कंथडेश्वरमीश्वरम्
yaḥ samīkṣati talliṁgaṁ kaṁthaḍeśvaramīśvaram
जो उस लिंग, ईश्वर कंथडेश्वर का दर्शन करता है,
श्लोक 38 (skanda.5.105.38)
पापकंथाविनिर्मुक्तो मुक्तिं यास्यति गौरि सः। पुण्यं यशस्यं गेयं तल्लिंगं पापप्रणाशनम्। पुनाति पातकान्सर्वान्मम नामानुकीर्तनात्
pāpakaṁthāvinirmukto muktiṁ yāsyati gauri saḥ| puṇyaṁ yaśasyaṁ geyaṁ talliṁgaṁ pāpapraṇāśanam| punāti pātakānsarvānmama nāmānukīrtanāt
हे गौरि! वह पापरूपी कंथा से मुक्त होकर मुक्ति को प्राप्त होता है। वह पुण्य, यशस्वी, गान करने योग्य लिंग पाप का नाश करने वाला है; मेरे नाम के कीर्तन मात्र से वह समस्त पापों को पवित्र कर देता है।
श्लोक 39 (skanda.5.105.39)
तेऽधन्याः पुरुषा लोके तेषां जन्म निरर्थकम्। यैर्न दृष्टो महाकाले देवोऽसौ कंथडेश्वरः
te'dhanyāḥ puruṣā loke teṣāṁ janma nirarthakam| yairna dṛṣṭo mahākāle devo'sau kaṁthaḍeśvaraḥ
संसार में वे मनुष्य अभागे हैं, उनका जन्म व्यर्थ है, जिन्होंने महाकाल में उस कंथडेश्वर देव का दर्शन नहीं किया।
श्लोक 40 (skanda.5.105.40)
एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। कंथडेश्वरदेवस्य इन्द्रेश्वरमथो शृणु
eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| kaṁthaḍeśvaradevasya indreśvaramatho śṛṇu
हे देवी! तुम्हें कंथडेश्वर देव का यह पापनाशक प्रभाव बताया गया; अब इंद्रेश्वर के विषय में सुनो।