अवन्ती खण्ड · अध्याय 106
इन्द्रेश्वर माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.106.1)
श्रीमहादेव उवाच। पञ्चत्रिंशत्तमं देवि इन्द्रेश्वरमनुत्तमम्। महासिद्धिप्रदं देवि ब्रह्महत्याविनाशनम्॥
śrīmahādeva uvāca| pañcatriṁśattamaṁ devi indreśvaramanuttamam| mahāsiddhipradaṁ devi brahmahatyāvināśanam||
श्री महादेव ने कहा—हे देवि, पैंतीसवाँ लिंग अनुपम इन्द्रेश्वर है, जो महान् सिद्धि प्रदान करने वाला और ब्रह्महत्या के पाप का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.5.106.2)
आसीत्प्रजापतिस्त्वष्टा तस्य पुत्रः कुशध्वजः। स्वकर्मनिरतो दान्तो वासवेन निपातितः॥
āsītprajāpatistvaṣṭā tasya putraḥ kuśadhvajaḥ| svakarmanirato dānto vāsavena nipātitaḥ||
त्वष्टा नामक एक प्रजापति थे; उनका पुत्र कुशध्वज था, जो अपने कर्म में तत्पर और जितेन्द्रिय था, किन्तु वासव (इन्द्र) द्वारा मार डाला गया।
श्लोक 3 (skanda.5.106.3)
तस्य पुत्रं हतं श्रुत्वा त्वष्टा क्रुद्धः प्रजापतिः। अवलुच्य जटामेकामिदं वचनमब्रवीत्॥
tasya putraṁ hataṁ śrutvā tvaṣṭā kruddhaḥ prajāpatiḥ| avalucya jaṭāmekāmidaṁ vacanamabravīt||
अपने पुत्र के मारे जाने का समाचार सुनकर प्रजापति त्वष्टा अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे; अपनी एक जटा उखाड़कर उन्होंने यह वचन कहा।
श्लोक 4 (skanda.5.106.4)
अद्य पश्यन्तु मे वीर्यं त्रयो लोकाः सदेवताः। स च पश्यतु दुर्बुद्धिर्ब्रह्महा पाकशासनः॥
adya paśyantu me vīryaṁ trayo lokāḥ sadevatāḥ| sa ca paśyatu durbuddhirbrahmahā pākaśāsanaḥ||
आज तीनों लोक देवताओं सहित मेरा पराक्रम देखें, और वह दुर्बुद्धि ब्रह्महत्यारा पाकशासन (इन्द्र) भी देखे,
श्लोक 5 (skanda.5.106.5)
स्वकर्मनिरतो येन मत्सुतो विनिपातितः। इत्युक्त्वा कोपरक्ताक्षो जटामग्नौ जुहाव ताम्॥
svakarmanirato yena matsuto vinipātitaḥ| ityuktvā koparaktākṣo jaṭāmagnau juhāva tām||
जिसने मेरे स्वकर्मरत पुत्र को मार डाला। ऐसा कहकर क्रोध से लाल नेत्रों वाले त्वष्टा ने उस जटा को अग्नि में हवन कर दिया।
श्लोक 6 (skanda.5.106.6)
ततो वृत्रः समुत्तस्थौ ज्वालामालासमाकुलः। महाकायो महादंष्ट्रो भिन्नाञ्जनचयप्रभः॥
tato vṛtraḥ samuttasthau jvālāmālāsamākulaḥ| mahākāyo mahādaṁṣṭro bhinnāñjanacayaprabhaḥ||
तब वृत्र उत्पन्न हुआ, जो ज्वालाओं की माला से घिरा हुआ, विशाल शरीर वाला, बड़ी-बड़ी दाढ़ों वाला और टूटे हुए अंजन के ढेर के समान कान्तिमान् था।
श्लोक 7 (skanda.5.106.7)
इन्द्रशत्रुरमेयात्मा त्वष्टुस्तेजोऽभिबृंहितः। अहन्यहनि सोऽवर्द्धदिषुपातं महाबलम्॥
indraśatrurameyātmā tvaṣṭustejo'bhibṛṁhitaḥ| ahanyahani so'varddhadiṣupātaṁ mahābalam||
इन्द्र का शत्रु, अपरिमेय आत्मा वाला, त्वष्टा के तेज से बढ़ा हुआ वह महाबली प्रतिदिन बाणों की वृष्टि के समान बढ़ने लगा।
श्लोक 8 (skanda.5.106.8)
वधाय चात्मनो दृष्ट्वा वृत्रं शक्रो महासुरम्। चिन्तयामास सहसा किं कृतं सुकृतं भवेत्॥
vadhāya cātmano dṛṣṭvā vṛtraṁ śakro mahāsuram| cintayāmāsa sahasā kiṁ kṛtaṁ sukṛtaṁ bhavet||
अपने वध के लिए उद्यत उस महान् असुर वृत्र को देखकर शक्र सहसा सोचने लगे कि क्या शुभ कार्य किया जाए।
श्लोक 9 (skanda.5.106.9)
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तो वृत्रो बलवतां वरः। ददर्श वासवं तत्र देवैः सार्द्धं वरानने॥
etasminnantare prāpto vṛtro balavatāṁ varaḥ| dadarśa vāsavaṁ tatra devaiḥ sārddhaṁ varānane||
इसी बीच बलवानों में श्रेष्ठ वृत्र वहाँ आ पहुँचा और हे वरानने, उसने देवताओं के साथ वासव को वहाँ देखा।
श्लोक 10 (skanda.5.106.10)
दैत्यो वृत्रो महाकायश्चक्रे संग्राममुल्बणम्। नानाशस्त्रास्त्रसंक्षोभं भटसंघट्टसंकटम्॥
daityo vṛtro mahākāyaścakre saṁgrāmamulbaṇam| nānāśastrāstrasaṁkṣobhaṁ bhaṭasaṁghaṭṭasaṁkaṭam||
विशालकाय दैत्य वृत्र ने भीषण संग्राम छेड़ दिया, जो नाना शस्त्रास्त्रों से क्षुब्ध और योद्धाओं के परस्पर संघर्ष से संकटपूर्ण था।
श्लोक 11 (skanda.5.106.11)
छिन्नभिन्नतनुत्राणक्रोधरक्तधरातलम्। लूनाननाब्जप्रकरं करपल्लवदुर्गमम्॥
chinnabhinnatanutrāṇakrodharaktadharātalam| lūnānanābjaprakaraṁ karapallavadurgamam||
उस युद्धभूमि में कवच छिन्न-भिन्न होकर क्रोधवश रक्त से पृथ्वी लाल हो गई थी, कटे हुए मुखकमलों का ढेर लगा था और कोमल हाथों के ढेर से मार्ग दुर्गम हो गया था।
श्लोक 12 (skanda.5.106.12)
कबन्धसंघघटनं घटितामरसैनिकम्। विकीर्णाभरणस्फीतस्फुरद्योधाङ्गभूषणम्॥
kabandhasaṁghaghaṭanaṁ ghaṭitāmarasainikam| vikīrṇābharaṇasphītasphuradyodhāṅgabhūṣaṇam||
वहाँ कबन्धों (धड़ों) के समूह इकट्ठे थे, देवताओं की सेना वहाँ जुटी थी, और योद्धाओं के बिखरे हुए आभूषणों से वह भूमि सुशोभित हो रही थी।
श्लोक 13 (skanda.5.106.13)
कल्लोलरुधिरोद्गारपाटलीकृतदिङ्मुखम्। तस्मिन्रणे महाभीमे देवान्भित्त्वा सगुह्यकान्॥
kallolarudhirodgārapāṭalīkṛtadiṅmukham| tasminraṇe mahābhīme devānbhittvā saguhyakān||
रक्त की उमड़ती हुई लहरों से दिशाएँ लाल हो गई थीं। उस अत्यन्त भयंकर युद्ध में गुह्यकों सहित देवताओं को छिन्न-भिन्न करके,
श्लोक 14 (skanda.5.106.14)
वासवं बन्धयित्वा तु स्वर्गलोकं जगाम ह। राज्यं चकार निःशङ्को निस्सपत्नं वरानने॥
vāsavaṁ bandhayitvā tu svargalokaṁ jagāma ha| rājyaṁ cakāra niḥśaṅko nissapatnaṁ varānane||
वृत्र ने वासव को बाँधकर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया और हे वरानने, निःशंक होकर निष्कण्टक राज्य करने लगा।
श्लोक 15 (skanda.5.106.15)
ततस्तु बद्धे देवेन्द्रे बृहस्पतिरुदारधीः। आजगाम तमुद्देशं यत्र बद्धः शतक्रतुः॥
tatastu baddhe devendre bṛhaspatirudāradhīḥ| ājagāma tamuddeśaṁ yatra baddhaḥ śatakratuḥ||
इन्द्र के बंदी बन जाने पर उदार बुद्धि वाले बृहस्पति उस स्थान पर आए जहाँ शतक्रतु बंधे हुए थे।
श्लोक 16 (skanda.5.106.16)
दृष्ट्वा तथाविधं शक्रमाशीर्भिरभिनन्द्य च। बन्धनान्मोचयित्वा तु प्रोवाचेदं वचस्तदा॥
dṛṣṭvā tathāvidhaṁ śakramāśīrbhirabhinandya ca| bandhanānmocayitvā tu provācedaṁ vacastadā||
उस अवस्था में शक्र को देखकर आशीर्वाद से उनका अभिनन्दन करते हुए और बंधन से मुक्त करते हुए बृहस्पति ने तब यह वचन कहा।
श्लोक 17 (skanda.5.106.17)
अनुकूलो न कालोऽयं सुरेशस्य तवाधुना। उद्योगः सुमहान्दृष्टः संघातश्च सुरद्विषाम्। दृष्टा हि प्रवराः सर्वे मया तत्र महासुराः॥
anukūlo na kālo'yaṁ sureśasya tavādhunā| udyogaḥ sumahāndṛṣṭaḥ saṁghātaśca suradviṣām| dṛṣṭā hi pravarāḥ sarve mayā tatra mahāsurāḥ||
हे सुरेश्वर, यह समय अभी तुम्हारे अनुकूल नहीं है; मैंने वहाँ देवशत्रुओं का बहुत बड़ा उद्योग और जमावड़ा देखा है — मैंने वहाँ सभी श्रेष्ठ महासुरों को देखा है।
श्लोक 18 (skanda.5.106.18)
एकैकोऽपि विजेतुं त्वां शक्तः स्यादिति मे मतिः। न तादृक्संगमः शक्र कदाचित्सुरविद्विषाम्। दृष्टो वापि श्रुतो वापि यादृशो ह्यवलोकितः॥
ekaiko'pi vijetuṁ tvāṁ śaktaḥ syāditi me matiḥ| na tādṛksaṁgamaḥ śakra kadācitsuravidviṣām| dṛṣṭo vāpi śruto vāpi yādṛśo hyavalokitaḥ||
मेरा मत है कि हे शक्र, उनमें से एक-एक भी अकेला तुम्हें जीतने में समर्थ है; देवशत्रुओं का ऐसा जमावड़ा जैसा मैंने अभी देखा है, न कभी देखा गया है और न सुना गया है।
श्लोक 19 (skanda.5.106.19)
बृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रः संभ्रममागमत्। ध्यात्वा मुहूर्त्तं प्रोवाच बृहद्बुद्धे बृहस्पते॥
bṛhaspativacaḥ śrutvā śakraḥ saṁbhramamāgamat| dhyātvā muhūrttaṁ provāca bṛhadbuddhe bṛhaspate||
बृहस्पति के वचन सुनकर शक्र व्याकुल हो उठे; क्षणभर विचार करके बोले—हे महाबुद्धिमान् बृहस्पते,
श्लोक 20 (skanda.5.106.20)
किमत्र प्रतिकर्त्तव्यं वद तावद्बृहस्पते। बहवो बलवन्तश्च दानवाः स्वल्पकैर्दिनैः। मत्सकाशं समेष्यन्ति स च वृत्रो महाबलः॥
kimatra pratikarttavyaṁ vada tāvadbṛhaspate| bahavo balavantaśca dānavāḥ svalpakairdinaiḥ| matsakāśaṁ sameṣyanti sa ca vṛtro mahābalaḥ||
'हे बृहस्पते, अब क्या करना चाहिए, यह बताइए। बहुत से बलवान् दानव और वह महाबली वृत्र भी थोड़े ही दिनों में मुझ पर चढ़ आएँगे।'
श्लोक 21 (skanda.5.106.21)
इति शक्रवचः श्रुत्वा बृहस्पतिरुवाच तम्। उपायः क्रियतां तूर्णं गच्छ शक्र ममाज्ञया॥
iti śakravacaḥ śrutvā bṛhaspatiruvāca tam| upāyaḥ kriyatāṁ tūrṇaṁ gaccha śakra mamājñayā||
शक्र के इस वचन को सुनकर बृहस्पति ने उनसे कहा—'शीघ्र ही उपाय करो; हे शक्र, मेरी आज्ञा से जाओ,
श्लोक 22 (skanda.5.106.22)
महाकालवने रम्ये खण्डेश्वरस्य दक्षिणे। सर्वसंपत्करं लिंगं विद्यते तत्र वासव॥
mahākālavane ramye khaṇḍeśvarasya dakṣiṇe| sarvasaṁpatkaraṁ liṁgaṁ vidyate tatra vāsava||
'रमणीय महाकालवन में, खण्डेश्वर के दक्षिण भाग में, हे वासव, वहाँ सर्व सम्पत्ति देने वाला लिंग विद्यमान है।'
श्लोक 23 (skanda.5.106.23)
तदाराधय यत्नेन तत्ते कामं प्रदास्यति। बृहस्पतिवचः श्रुत्वा शक्रः शीघ्रतरं गतः॥
tadārādhaya yatnena tatte kāmaṁ pradāsyati| bṛhaspativacaḥ śrutvā śakraḥ śīghrataraṁ gataḥ||
'प्रयत्नपूर्वक उसकी आराधना करो; वह तुम्हारी कामना पूर्ण करेगा।' बृहस्पति के वचन सुनकर शक्र अत्यन्त शीघ्रता से वहाँ गए।
श्लोक 24 (skanda.5.106.24)
महाकालवने देवि दृष्ट्वा लिंगमनुत्तमम्। स्तुतिं चकार सहसा भक्तिनम्रात्मकन्धरः॥
mahākālavane devi dṛṣṭvā liṁgamanuttamam| stutiṁ cakāra sahasā bhaktinamrātmakandharaḥ||
हे देवि, महाकालवन में उस अनुपम लिंग को देखकर शक्र ने भक्ति से नत ग्रीवा होकर तत्काल स्तुति की।
श्लोक 25 (skanda.5.106.25)
नमो देवाधिदेवाय शंकराय वृषाय च। काम्याय बहुरूपाय व्यालयज्ञोपवीतिने। वरेण्याय नमो नित्यं नमस्ते सर्वकामद॥
namo devādhidevāya śaṁkarāya vṛṣāya ca| kāmyāya bahurūpāya vyālayajñopavītine| vareṇyāya namo nityaṁ namaste sarvakāmada||
'देवाधिदेव को, शंकर को, वृषभध्वज को नमस्कार है; कमनीय, बहुरूप तथा सर्प को यज्ञोपवीत रूप में धारण करने वाले को नमस्कार है; वरणीय को नित्य नमस्कार है — हे सर्वकामद, तुम्हें नमस्कार है।'
श्लोक 26 (skanda.5.106.26)
आद्यः प्रजासृष्टिकरस्त्वमेव कालः प्रजाः संहरसि त्वमेव। अपांपतिर्भूतपतिस्त्वमेव धनेश्वरस्त्वं दहनस्त्वमेव॥
ādyaḥ prajāsṛṣṭikarastvameva kālaḥ prajāḥ saṁharasi tvameva| apāṁpatirbhūtapatistvameva dhaneśvarastvaṁ dahanastvameva||
'तुम ही आदि प्रजा-सृष्टिकर्ता हो, तुम ही काल बनकर प्रजाओं का संहार करते हो; तुम ही जलों के स्वामी हो, भूतों के स्वामी हो; तुम धनेश्वर हो, तुम ही अग्नि हो।'
श्लोक 27 (skanda.5.106.27)
चन्द्रश्च सूर्यः पवनस्त्वमेव धाता विधाता परमः पुराणः। जलाशयस्त्वं वरुणस्त्वमेव शैलोत्तमस्त्वं भुजगेश्वरश्च। डिण्डिर्महाकालवृषस्त्वमेव विनायको गुह्यवरस्त्वमेव॥
candraśca sūryaḥ pavanastvameva dhātā vidhātā paramaḥ purāṇaḥ| jalāśayastvaṁ varuṇastvameva śailottamastvaṁ bhujageśvaraśca| ḍiṇḍirmahākālavṛṣastvameva vināyako guhyavarastvameva||
'तुम ही चन्द्रमा और सूर्य और वायु हो; तुम ही धाता, विधाता, परम और पुरातन हो। तुम ही समुद्र हो, तुम ही वरुण हो; तुम श्रेष्ठ पर्वत हो और भुजंगेश्वर (नागों के स्वामी) हो; तुम ही डिण्डि, महाकाल और वृषभ हो; तुम ही विनायक और गुह्यवर हो।'
श्लोक 28 (skanda.5.106.28)
इतीरितां स्तुतिं श्रुत्वा लिंगेनोक्तः शतक्रतुः। गच्छ शक्र ममादेशान्मत्तेजोबृंहितो रणे। हनिष्यसि न संदेहो वृत्रं रिपुविदारण॥
itīritāṁ stutiṁ śrutvā liṁgenoktaḥ śatakratuḥ| gaccha śakra mamādeśānmattejobṛṁhito raṇe| haniṣyasi na saṁdeho vṛtraṁ ripuvidāraṇa||
इस प्रकार की गई स्तुति को सुनकर उस लिंग ने शतक्रतु से कहा—'हे शक्र, मेरी आज्ञा से जाओ; मेरे तेज से बलशाली होकर, हे शत्रुविदारण, तुम युद्ध में निःसंदेह वृत्र का वध करोगे।'
श्लोक 29 (skanda.5.106.29)
तस्य लिंगस्य माहात्म्यादपां फेनेन पार्वति। जघान समरे वृत्रं पश्यतां त्रिदशद्विषाम्॥
tasya liṁgasya māhātmyādapāṁ phenena pārvati| jaghāna samare vṛtraṁ paśyatāṁ tridaśadviṣām||
हे पार्वती, उस लिंग के माहात्म्य से इन्द्र ने जल के फेन से युद्ध में वृत्र का वध किया, वह भी देवशत्रुओं के देखते-देखते।
श्लोक 30 (skanda.5.106.30)
निहत्य दानवान्पश्चाल्लीलया रणकर्कशः। उवाचेन्द्रस्तदा देवान्हतो वृत्रो महारणे॥
nihatya dānavānpaścāllīlayā raṇakarkaśaḥ| uvācendrastadā devānhato vṛtro mahāraṇe||
तत्पश्चात् रणकठोर इन्द्र ने लीलापूर्वक दानवों का संहार करके देवताओं से कहा—'महासमर में वृत्र मारा गया;
श्लोक 31 (skanda.5.106.31)
त्रैलोक्याध्यक्षतां प्राप्ता भवन्तो मत्पराक्रमात्। एवमुक्तास्तु शक्रेण ते देवा विस्मयान्विताः॥
trailokyādhyakṣatāṁ prāptā bhavanto matparākramāt| evamuktāstu śakreṇa te devā vismayānvitāḥ||
'मेरे पराक्रम से तुम सबने पुनः त्रिलोक का आधिपत्य प्राप्त कर लिया है।' इस प्रकार शक्र द्वारा कहे जाने पर वे देवता आश्चर्यचकित हो उठे,
श्लोक 32 (skanda.5.106.32)
अस्य देवस्य माहात्म्याद्धतो वृत्रो महासुरः। शरीरे च स्थिताः पापा दर्शनात्संक्षयं गताः॥
asya devasya māhātmyāddhato vṛtro mahāsuraḥ| śarīre ca sthitāḥ pāpā darśanātsaṁkṣayaṁ gatāḥ||
क्योंकि इस देवता के माहात्म्य से ही महासुर वृत्र मारा गया था, और शरीर में स्थित पाप भी उसके दर्शनमात्र से नष्ट हो गए थे।
श्लोक 33 (skanda.5.106.33)
इन्द्रेणाराधितो यस्माद्देवदेवो महेश्वरः। तस्मादिन्द्रेश्वरो नाम ख्यातो भुवि भविष्यति॥
indreṇārādhito yasmāddevadevo maheśvaraḥ| tasmādindreśvaro nāma khyāto bhuvi bhaviṣyati||
चूँकि इन्द्र ने देवाधिदेव महेश्वर की आराधना की, इसलिए वे पृथ्वी पर इन्द्रेश्वर नाम से विख्यात होंगे।
श्लोक 34 (skanda.5.106.34)
दर्शनादस्य लिंगस्य पुरीमिन्द्रस्य शोभनाम्। पापिनोऽपि गमिष्यन्ति सर्वपातकवर्जिताः॥
darśanādasya liṁgasya purīmindrasya śobhanām| pāpino'pi gamiṣyanti sarvapātakavarjitāḥ||
इस लिंग के दर्शनमात्र से पापी भी सब पापों से रहित होकर इन्द्र की शोभनीय पुरी को जाएँगे।
श्लोक 35 (skanda.5.106.35)
यः पश्यति नरो नित्यं श्रीइन्द्रेश्वरसंज्ञकम्। स मुक्तः पातकैः सर्वैर्दिवि मोदिष्यते चिरम्॥
yaḥ paśyati naro nityaṁ śrīindreśvarasaṁjñakam| sa muktaḥ pātakaiḥ sarvairdivi modiṣyate ciram||
जो मनुष्य श्री इन्द्रेश्वर नामक लिंग का नित्य दर्शन करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में चिरकाल तक आनन्द भोगता है।
श्लोक 36 (skanda.5.106.36)
इन्द्रेणाराधितं लिंगं भक्त्या यः पूजयिष्यति। स याति वै परं स्थानं दिव्यकल्पचतुष्टयम्॥
indreṇārādhitaṁ liṁgaṁ bhaktyā yaḥ pūjayiṣyati| sa yāti vai paraṁ sthānaṁ divyakalpacatuṣṭayam||
जो इन्द्र द्वारा आराधित इस लिंग की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह निश्चय ही चार दिव्य कल्पों तक परम स्थान को प्राप्त होता है।
श्लोक 37 (skanda.5.106.37)
येन चेन्द्रेश्वरो देवो भक्त्या सम्यक्प्रपूजितः। तेन विष्णुप्रभृतयो वयं सर्वे सवासवाः। मुनयो लोकपालाश्च पूजिताः स्युर्न संशयः॥
yena cendreśvaro devo bhaktyā samyakprapūjitaḥ| tena viṣṇuprabhṛtayo vayaṁ sarve savāsavāḥ| munayo lokapālāśca pūjitāḥ syurna saṁśayaḥ||
जिस किसी ने भक्तिपूर्वक भलीभाँति इन्द्रेश्वर देव की पूजा की, उसने विष्णु आदि हम सबकी, वासव सहित, मुनियों और लोकपालों की भी पूजा कर ली — इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 38 (skanda.5.106.38)
इत्युक्तः स सुरैः शक्रो वैकुण्ठाद्यैः समन्ततः। तैरेव सहितो देवो जगामाथ त्रिविष्टपम्॥
ityuktaḥ sa suraiḥ śakro vaikuṇṭhādyaiḥ samantataḥ| taireva sahito devo jagāmātha triviṣṭapam||
इस प्रकार चारों ओर से वैकुण्ठ (विष्णु) आदि देवताओं द्वारा कहे जाने पर देवराज शक्र उन्हीं के साथ त्रिविष्टप (स्वर्ग) को चले गए।
श्लोक 39 (skanda.5.106.39)
इन्द्रेश्वरस्य देवस्य प्रभावः कथितस्त्वयम्। मार्कण्डेयेश्वरं देवं शृणु पार्वति सांप्रतम्॥
indreśvarasya devasya prabhāvaḥ kathitastvayam| mārkaṇḍeyeśvaraṁ devaṁ śṛṇu pārvati sāṁpratam||
यह देव इन्द्रेश्वर का प्रभाव तुम्हें बताया गया। अब हे पार्वती, मार्कण्डेयेश्वर देव के विषय में सुनो।