अवन्ती खण्ड · अध्याय 11
विद्याधरतीर्थ-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.11.1)
अथातः संप्रवक्ष्यामि तीर्थं विद्याधरस्य तु। तत्र स्नात्वा शुचिर्भूत्वा विद्याधरपतिर्भवेत्
athātaḥ saṁpravakṣyāmi tīrthaṁ vidyādharasya tu| tatra snātvā śucirbhūtvā vidyādharapatirbhavet
अब इसके पश्चात् मैं विद्याधर के तीर्थ को कहूँगा; वहाँ स्नान कर शुद्ध होकर मनुष्य विद्याधरपति बन जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.11.2)
व्यास उवाच। कथं तीर्थमिदं क्षेत्रे जातमत्र महामुने। प्रसादाद्ब्रूहि मे ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि सांप्रतम्
vyāsa uvāca| kathaṁ tīrthamidaṁ kṣetre jātamatra mahāmune| prasādādbrūhi me brahmañchrotumicchāmi sāṁpratam
व्यास ने कहा—हे महामुने, यह तीर्थ इस क्षेत्र में किस प्रकार उत्पन्न हुआ? हे ब्रह्मन्, कृपा करके मुझे बताइए; मैं अभी सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 3 (skanda.5.11.3)
सनत्कुमार उवाच। विद्याधरपतिः कश्चिदासीद्रूपधरः पुरा। ग्रथिता पारिजातस्य माला तेन मनोरमा
sanatkumāra uvāca| vidyādharapatiḥ kaścidāsīdrūpadharaḥ purā| grathitā pārijātasya mālā tena manoramā
सनत्कुमार ने कहा—पूर्वकाल में कोई रूपधारी विद्याधरपति था; उसने पारिजात की एक मनोहर माला गूँथी थी।
श्लोक 4 (skanda.5.11.4)
गृहीत्वा च स तां मालां गतो वासववेश्मनि। नृत्यंती वासवस्याग्रे दृष्टा तेन च मेनका
gṛhītvā ca sa tāṁ mālāṁ gato vāsavaveśmani| nṛtyaṁtī vāsavasyāgre dṛṣṭā tena ca menakā
उस माला को लेकर वह वासव के भवन में गया; वहाँ उसने वासव के समक्ष नृत्य करती मेनका को देखा।
श्लोक 5 (skanda.5.11.5)
दत्ता तस्यै तदा तेन सा माला नृत्यमाश्रितः। सा मेनकास्तुताऽस्थाने मालया मोहिता भवत्
dattā tasyai tadā tena sā mālā nṛtyamāśritaḥ| sā menakāstutā'sthāne mālayā mohitā bhavat
उसने तब नृत्य में तल्लीन उस मेनका को वह माला दे दी; अनुचित अवसर पर सम्मानित होने से मेनका उस माला से मोहित हो गई।
श्लोक 6 (skanda.5.11.6)
कोपाविष्टेन शक्रेण शप्तो विद्याधरस्तदा। पृथिव्यां गच्छ पापिष्ठ नृत्यभंगस्त्वया कृतः
kopāviṣṭena śakreṇa śapto vidyādharastadā| pṛthivyāṁ gaccha pāpiṣṭha nṛtyabhaṁgastvayā kṛtaḥ
क्रोधाविष्ट शक्र ने तब विद्याधर को शाप दिया—'हे पापिष्ठ, पृथ्वी पर चला जा; तूने नृत्य में भंग डाला है।'
श्लोक 7 (skanda.5.11.7)
विद्याधरपदं त्यक्त्वा मम शापाच्च सांप्रतम्। एवमुक्तस्तु शक्रेण वाक्यं विद्याधरोऽब्रवीत
vidyādharapadaṁ tyaktvā mama śāpācca sāṁpratam| evamuktastu śakreṇa vākyaṁ vidyādharo'bravīta
'मेरे शाप से अब तू विद्याधर-पद त्याग दे।' शक्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर विद्याधर ने यह वचन कहा।
श्लोक 8 (skanda.5.11.8)
अजानता मया नाथ अपराधः कृतोऽधुना। अनुग्रहमतो देव कुरु मे त्वं प्रसादतः
ajānatā mayā nātha aparādhaḥ kṛto'dhunā| anugrahamato deva kuru me tvaṁ prasādataḥ
'हे नाथ, यह अपराध मुझसे अनजाने में हो गया है; इसलिए हे देव, मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।'
श्लोक 9 (skanda.5.11.9)
एवमुक्तः स शक्रो वै विद्याधरमुवाच ह। गच्छावंतीं त्वमद्यैव यत्रास्ते गांगटी गुहा
evamuktaḥ sa śakro vai vidyādharamuvāca ha| gacchāvaṁtīṁ tvamadyaiva yatrāste gāṁgaṭī guhā
इस प्रकार कहे जाने पर शक्र ने विद्याधर से कहा—'तू आज ही अवन्ती जा, जहाँ गांगटी गुफा है।'
श्लोक 10 (skanda.5.11.10)
तस्याश्चोत्तरभागे तु विद्यते तीर्थमुत्तमम्। ख्यातं तत्त्रिषु लोकेषु नाम्ना विद्याधरं शुभम्
tasyāścottarabhāge tu vidyate tīrthamuttamam| khyātaṁ tattriṣu lokeṣu nāmnā vidyādharaṁ śubham
'उसके उत्तर भाग में एक श्रेष्ठ तीर्थ है, जो तीनों लोकों में विद्याधर नाम से विख्यात है।'
श्लोक 11 (skanda.5.11.11)
भक्त्या तत्र कृते स्नाने विद्याधरपतिर्भवेत्। अतस्त्वमपि तत्रैव कुरु स्नानं प्रयत्नतः
bhaktyā tatra kṛte snāne vidyādharapatirbhavet| atastvamapi tatraiva kuru snānaṁ prayatnataḥ
'वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य विद्याधरपति बन जाता है; इसलिए तू भी वहीं यत्नपूर्वक स्नान कर।'
श्लोक 12 (skanda.5.11.12)
एवमुक्तः स शक्रेण आगतोऽवंतिमंडले। स्नानं कृत्वा च तेनैव तीर्थे तस्मिन्मनोरमे
evamuktaḥ sa śakreṇa āgato'vaṁtimaṁḍale| snānaṁ kṛtvā ca tenaiva tīrthe tasminmanorame
शक्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वह अवन्तीमण्डल में आया; और उस मनोहर तीर्थ में स्नान करके...
श्लोक 13 (skanda.5.11.13)
प्रभावात्तस्य तीर्थस्य पुनः प्राप्तं पदं स्वकम्। एवं व्यास समाख्यातं तीर्थं विद्याधरं शुभम्
prabhāvāttasya tīrthasya punaḥ prāptaṁ padaṁ svakam| evaṁ vyāsa samākhyātaṁ tīrthaṁ vidyādharaṁ śubham
...उस तीर्थ के प्रभाव से उसने पुनः अपना पद प्राप्त कर लिया। हे व्यास, इस प्रकार शुभ विद्याधर तीर्थ का वर्णन किया गया।
श्लोक 14 (skanda.5.11.14)
तत्र पुष्पाणि यो दद्याच्चंदनं च विलेपनम्। लभेत्समस्तभोगान्स इहलोके परत्र च
tatra puṣpāṇi yo dadyāccaṁdanaṁ ca vilepanam| labhetsamastabhogānsa ihaloke paratra ca
जो वहाँ पुष्प तथा चन्दन का विलेपन अर्पित करता है, वह इस लोक और परलोक में समस्त भोगों को प्राप्त करता है।