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अवन्ती खण्ड · अध्याय 10

कुटुम्बिकेश्वर-माहात्म्य-वर्णन

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (skanda.5.10.1)

सनत्कुमार उवाच। अथातः संप्रवक्ष्यामि तीर्थ त्रैलोक्य विश्रुतम्। स्वयंभूतं महेशस्य विख्यातं कुटुंबिकेश्वरम्

sanatkumāra uvāca| athātaḥ saṁpravakṣyāmi tīrtha trailokya viśrutam| svayaṁbhūtaṁ maheśasya vikhyātaṁ kuṭuṁbikeśvaram

सनत्कुमार ने कहा—अब इसके पश्चात् मैं त्रैलोक्यविख्यात उस तीर्थ को कहूँगा: महेश का स्वयंभू, विख्यात कुटुम्बिकेश्वर।

श्लोक 2 (skanda.5.10.2)

मुच्यते सर्वपापैस्तु सप्तजन्मकृतैरपि। शुचिः पश्यति यो देवं कृत्वा श्राद्धं यथा विधि

mucyate sarvapāpaistu saptajanmakṛtairapi| śuciḥ paśyati yo devaṁ kṛtvā śrāddhaṁ yathā vidhi

सात जन्मों में किए गए भी समस्त पापों से वह मुक्त हो जाता है; जो शुद्ध होकर, विधिपूर्वक श्राद्ध करके उस देव का दर्शन करता है...

श्लोक 3 (skanda.5.10.3)

सर्वाँल्लोकानतिक्रम्य शिवलोकं स गच्छति। यस्तु सर्वाणि शाकानि कन्दानि विविधानि च

sarvām̐llokānatikramya śivalokaṁ sa gacchati| yastu sarvāṇi śākāni kandāni vividhāni ca

...समस्त लोकों को लांघकर वह शिवलोक को जाता है। और जो समस्त प्रकार के शाक तथा नाना कन्द...

श्लोक 4 (skanda.5.10.4)

तीरे तस्य प्रयच्छेत स प्राप्नोति परां गतिम्। पौषे प्रतिपदि सिते अष्टम्यां वा समाहितः

tīre tasya prayaccheta sa prāpnoti parāṁ gatim| pauṣe pratipadi site aṣṭamyāṁ vā samāhitaḥ

...उसके तट पर अर्पित करता है, वह परम गति को प्राप्त करता है। पौष शुक्ल प्रतिपदा को अथवा अष्टमी को समाहितचित्त होकर...

श्लोक 5 (skanda.5.10.5)

एकेनैवोपवासेन अश्वमेधफलं लभेत्। आश्विन्यां पौर्णमास्यां च शुचिः पश्यति मानवः

ekenaivopavāsena aśvamedhaphalaṁ labhet| āśvinyāṁ paurṇamāsyāṁ ca śuciḥ paśyati mānavaḥ

...एक ही उपवास से अश्वमेध का फल प्राप्त करता है। आश्विन पूर्णिमा को शुद्ध होकर जो मनुष्य दर्शन करता है...

श्लोक 6 (skanda.5.10.6)

पट्टबंधं महेशस्य स विपाप्मा दिवं व्रजेत्। चैत्रे मासि सिते पक्षे पञ्चम्यां समुपोषितः

paṭṭabaṁdhaṁ maheśasya sa vipāpmā divaṁ vrajet| caitre māsi site pakṣe pañcamyāṁ samupoṣitaḥ

...महेश का पट्टबन्ध प्राप्त कर वह पापरहित होकर स्वर्ग को जाता है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में पंचमी को उपवास करके...

श्लोक 7 (skanda.5.10.7)

कर्पूरं कुङ्कुमं चैव मृगनाभि सचन्दनम्। निवेदयति देवाय नैवेद्यं घृतपायसम्

karpūraṁ kuṅkumaṁ caiva mṛganābhi sacandanam| nivedayati devāya naivedyaṁ ghṛtapāyasam

...कर्पूर, कुंकुम, कस्तूरी तथा चन्दन, और घृत-पायस का नैवेद्य देव को समर्पित करके...

श्लोक 8 (skanda.5.10.8)

स्वरूपं चैव विप्रेन्द्र सभार्यं भोजयेद्द्विजम्। रुद्रलोकमवाप्नोति यावदिंद्राश्चतुर्दश

svarūpaṁ caiva viprendra sabhāryaṁ bhojayeddvijam| rudralokamavāpnoti yāvadiṁdrāścaturdaśa

हे विप्रेन्द्र, अपने ही समान एक ब्राह्मण को पत्नी सहित भोजन कराना चाहिए; इससे मनुष्य चौदह इन्द्रों के काल तक रुद्रलोक को प्राप्त करता है।

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