अवन्ती खण्ड · अध्याय 9
महिषकुण्ड-रुद्रसरो-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.9.1)
व्यास उवाच। कथं तन्माहिषं कुण्डं मातॄणामाकृतिः कथम्। रुद्रस्यैव कथं क्षेत्रे महिषो दानवो हतः
vyāsa uvāca| kathaṁ tanmāhiṣaṁ kuṇḍaṁ mātṝṇāmākṛtiḥ katham| rudrasyaiva kathaṁ kṣetre mahiṣo dānavo hataḥ
व्यास ने कहा—वह माहिष कुण्ड कैसे बना, मातृकाओं का आकार किस प्रकार हुआ, तथा रुद्र के ही क्षेत्र में महिष नामक दानव किस प्रकार मारा गया?
श्लोक 2 (skanda.5.9.2)
सनत्कुमार उवाच। कपालखंडमादायं महादेवोऽप्यतिप्रभम्। ब्रह्मतेजोमयं दिव्यं ज्वलंतमिव चार्चिषा
sanatkumāra uvāca| kapālakhaṁḍamādāyaṁ mahādevo'pyatiprabham| brahmatejomayaṁ divyaṁ jvalaṁtamiva cārciṣā
सनत्कुमार ने कहा—महादेव ने अत्यन्त प्रभावशाली, ब्रह्मतेज से युक्त, अर्चि से मानो ज्वलंत उस दिव्य कपालखण्ड को हाथ में लेकर...
श्लोक 3 (skanda.5.9.3)
क्रीडमानो जगन्नाथो मोहयामास वै सुरान्। निमेषात्स इमं लोकं योगात्मा योगलीलया
krīḍamāno jagannātho mohayāmāsa vai surān| nimeṣātsa imaṁ lokaṁ yogātmā yogalīlayā
...जगन्नाथ क्रीड़ा करते हुए देवताओं को मोहित करने लगे; वे योगात्मा क्षणभर में योगलीला से इस लोक को...
श्लोक 4 (skanda.5.9.4)
प्राप्य पुण्यतमं क्षेत्रं यत्रातिष्ठन्महाप्रभुः। तत्रतत्र महद्दिव्यं कपालं देवताधिपः
prāpya puṇyatamaṁ kṣetraṁ yatrātiṣṭhanmahāprabhuḥ| tatratatra mahaddivyaṁ kapālaṁ devatādhipaḥ
उस परम पुण्य क्षेत्र को प्राप्त कर, जहाँ महाप्रभु स्थित रहते थे, वहाँ-वहाँ वह महान् दिव्य कपाल देवताधिप ने...
श्लोक 5 (skanda.5.9.5)
स्थापयामास दीप्तार्चिर्गणानामग्रतः प्रभुः। त्वत्स्थापितमथो दृष्ट्वा गताः सर्वे महौजसः
sthāpayāmāsa dīptārcirgaṇānāmagrataḥ prabhuḥ| tvatsthāpitamatho dṛṣṭvā gatāḥ sarve mahaujasaḥ
...उस देदीप्यमान कपाल को गणों के आगे प्रभु ने स्थापित किया। तुम्हारे द्वारा स्थापित उसे देखकर समस्त महातेजस्वी [देव]...
श्लोक 6 (skanda.5.9.6)
विनदत्समहानादं नादयंत दिशो दश। क्षोभार्णवाशनिप्रख्यं नभो येन विदीर्यते
vinadatsamahānādaṁ nādayaṁta diśo daśa| kṣobhārṇavāśaniprakhyaṁ nabho yena vidīryate
...विशाल गर्जना करते हुए दसों दिशाओं को गुंजायमान कर दिया, जिससे मानो क्षुब्ध सागर और वज्रपात के समान आकाश विदीर्ण हो गया।
श्लोक 7 (skanda.5.9.7)
तेन शब्देन घोरेण दानवो देवकंटकः। हालाहल इति ख्यातो देशं तमभिधावितः
tena śabdena ghoreṇa dānavo devakaṁṭakaḥ| hālāhala iti khyāto deśaṁ tamabhidhāvitaḥ
उस भीषण शब्द से देवकंटक नामक, हालाहल नाम से विख्यात दानव उस स्थान की ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 8 (skanda.5.9.8)
अमृष्यमाणः क्रोधार्तो दुरात्मा दुर्जयः सुरैः। ब्रह्मदत्तवरश्चैव माहिषं वपुरास्थितः
amṛṣyamāṇaḥ krodhārto durātmā durjayaḥ suraiḥ| brahmadattavaraścaiva māhiṣaṁ vapurāsthitaḥ
क्रोध से पीड़ित, असहनशील, दुरात्मा, देवताओं के लिए दुर्जय, ब्रह्मा से वर प्राप्त वह, भैंसे का रूप धारण किए हुए था।
श्लोक 9 (skanda.5.9.9)
दैत्यैः परिवृतो घोरै कोटिभिश्चोद्यतायुधैः। तमायांतं तु सक्रोधं महिषं देवकंटकम्
daityaiḥ parivṛto ghorai koṭibhiścodyatāyudhaiḥ| tamāyāṁtaṁ tu sakrodhaṁ mahiṣaṁ devakaṁṭakam
भयंकर, शस्त्र उठाए करोड़ों दैत्यों से घिरे, क्रोधयुक्त होकर आते हुए उस देवकंटक महिष को...
श्लोक 10 (skanda.5.9.10)
समावेक्ष्याह वै देवो गणान्सर्वान्पिनाकधृक्। मायावी गणपा दैत्यस्त्रैलोक्यस्यापि कंटकः
samāvekṣyāha vai devo gaṇānsarvānpinākadhṛk| māyāvī gaṇapā daityastrailokyasyāpi kaṁṭakaḥ
...देखकर पिनाकधारी देव ने समस्त गणों से कहा—'यह मायावी, गणों का शत्रु दैत्य त्रैलोक्य के लिए भी कंटकस्वरूप है।'
श्लोक 11 (skanda.5.9.11)
आयाति त्वरितो यूयं तस्मादेनं विनिघ्नथ। कपालस्य गतिं सर्व आश्रिता गणनायकाः
āyāti tvarito yūyaṁ tasmādenaṁ vinighnatha| kapālasya gatiṁ sarva āśritā gaṇanāyakāḥ
'यह शीघ्रता से आ रहा है; अतः इसका वध करो।' कपाल की उस गति का आश्रय लेकर समस्त गणनायक...
श्लोक 12 (skanda.5.9.12)
ततो देवगणा दृष्ट्वा तमायांतं महासुरम्। गर्जमानं महानादं भ्रममाणं महाभुजम्
tato devagaṇā dṛṣṭvā tamāyāṁtaṁ mahāsuram| garjamānaṁ mahānādaṁ bhramamāṇaṁ mahābhujam
तब देवगणों ने उस आते हुए महान् असुर को देखा, जो गर्जना करता हुआ, महानाद करता हुआ, विशाल भुजाओं सहित घूम रहा था।
श्लोक 13 (skanda.5.9.13)
बिभिदुः शलसंघातैरसिभि र्मुसलैस्तथा। संमुह्य शरजालेन ततो भूमौ न्यपातयन्
bibhiduḥ śalasaṁghātairasibhi rmusalaistathā| saṁmuhya śarajālena tato bhūmau nyapātayan
उन्होंने उसे त्रिशूलों के समूहों से, तलवारों तथा मूसलों से बींध डाला; और बाणों के जाल से मोहित कर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया।
श्लोक 14 (skanda.5.9.14)
हते तस्मिन्महादेवो देवान्प्रोवाच वै तदा। अहो दर्पातिमूढः स दर्पेण निधनं गतः
hate tasminmahādevo devānprovāca vai tadā| aho darpātimūḍhaḥ sa darpeṇa nidhanaṁ gataḥ
उसके मारे जाने पर महादेव ने तब देवताओं से कहा—'आश्चर्य है, वह अभिमान से अत्यन्त मूढ़ था, अपने ही अभिमान से मृत्यु को प्राप्त हुआ।'
श्लोक 15 (skanda.5.9.15)
एतस्मिन्नंतरे व्यास तत्कपालात्सुभैरवाः। दीप्तास्या मातरः सर्वाः प्रचंडास्त्रा महाबलाः
etasminnaṁtare vyāsa tatkapālātsubhairavāḥ| dīptāsyā mātaraḥ sarvāḥ pracaṁḍāstrā mahābalāḥ
हे व्यास, इसी बीच उस कपाल से अत्यन्त भैरव, प्रज्वलित मुखवाली, प्रचण्ड अस्त्रधारी, महाबली समस्त मातृकाएँ...
श्लोक 16 (skanda.5.9.16)
अभ्यधावंस्तमुद्देशं महादेवं निवेद्य वै। दैत्यं ता भक्षयंति स्म भित्त्वा भित्त्वा महाबलाः
abhyadhāvaṁstamuddeśaṁ mahādevaṁ nivedya vai| daityaṁ tā bhakṣayaṁti sma bhittvā bhittvā mahābalāḥ
...उस स्थान की ओर दौड़ीं, तथा महादेव को निवेदन कर, वे महाबली मातृकाएँ उस दैत्य को बार-बार बींध-बींधकर भक्षण करने लगीं।
श्लोक 17 (skanda.5.9.17)
कपालमातरस्तस्मात्ख्याताः क्षेत्रे महाबलाः। महाकपालस्तस्माद्वै तादृशः परिकीर्तितः
kapālamātarastasmātkhyātāḥ kṣetre mahābalāḥ| mahākapālastasmādvai tādṛśaḥ parikīrtitaḥ
इसीलिए वे क्षेत्र में कपालमातर नाम से विख्यात, महाबली कहलाईं; और उसी कारण वैसा वह [कपाल] महाकपाल नाम से प्रकीर्तित हुआ।
श्लोक 18 (skanda.5.9.18)
स्थापितस्य कपालस्य भित्त्वा समभवत्पुरा। ख्यातं शिवतडागं च सर्वपापप्रणाशनम्
sthāpitasya kapālasya bhittvā samabhavatpurā| khyātaṁ śivataḍāgaṁ ca sarvapāpapraṇāśanam
स्थापित किए गए उस कपाल के टूटने से पूर्वकाल में वहाँ शिवतडाग नामक, समस्त पापों का नाश करने वाला [सरोवर] प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 19 (skanda.5.9.19)
तदद्यापि महद्दिव्यं सरस्तत्र प्रकाशते। त्रिषु लोकेषु विख्यातं गणगंधर्वसेवितम्
tadadyāpi mahaddivyaṁ sarastatra prakāśate| triṣu lokeṣu vikhyātaṁ gaṇagaṁdharvasevitam
वह महान् दिव्य सरोवर आज भी वहाँ प्रकाशमान है; तीनों लोकों में विख्यात, गण-गन्धर्वों द्वारा सेवित।
श्लोक 20 (skanda.5.9.20)
पात्रस्थमुद्धुतं वापि शीतोष्णं क्वथितं जलम्। रौद्रं सरः पुनातीहाश्वमेधावभृथो यथा
pātrasthamuddhutaṁ vāpi śītoṣṇaṁ kvathitaṁ jalam| raudraṁ saraḥ punātīhāśvamedhāvabhṛtho yathā
पात्र में रखा हुआ, अथवा उछाला हुआ, शीत या उष्ण अथवा उबाला हुआ जल भी—वह रौद्र सरोवर इस लोक में उसी प्रकार पवित्र करता है, जैसे अश्वमेध का अवभृथस्नान।
श्लोक 21 (skanda.5.9.21)
प्रागाद्ब्रह्मापि तं देशं देवतानां शतैर्वृतः। स्वर्गलोकस्य निःश्रेणी कीर्तिता ब्रह्मणा स्वयम्
prāgādbrahmāpi taṁ deśaṁ devatānāṁ śatairvṛtaḥ| svargalokasya niḥśreṇī kīrtitā brahmaṇā svayam
ब्रह्मा भी सैकड़ों देवताओं से घिरे हुए उस स्थान की ओर गए; उसे स्वयं ब्रह्मा ने स्वर्गलोक की सीढ़ी कहा।
श्लोक 22 (skanda.5.9.22)
अत्र त्यजंति ये प्राणान्रुद्रलोकं व्रजंति ते। धन्या व्यास नरा मर्त्ये महाकालवने स्थिताः
atra tyajaṁti ye prāṇānrudralokaṁ vrajaṁti te| dhanyā vyāsa narā martye mahākālavane sthitāḥ
जो यहाँ प्राणों का त्याग करते हैं, वे रुद्रलोक को जाते हैं; हे व्यास, धन्य हैं वे मनुष्य जो मृत्युलोक में महाकालवन में स्थित हैं।
श्लोक 23 (skanda.5.9.23)
रौद्रे सरसि ये स्नांति जलं वापि पिबंति ये। स्वधर्माचारनिरताः पश्यंतीशानमीश्वरम्
raudre sarasi ye snāṁti jalaṁ vāpi pibaṁti ye| svadharmācāraniratāḥ paśyaṁtīśānamīśvaram
जो उस रौद्र सरोवर में स्नान करते हैं, अथवा जो उसका जल पीते हैं, वे स्वधर्म के आचरण में तत्पर होकर ईश्वर ईशान का दर्शन करते हैं।
श्लोक 24 (skanda.5.9.24)
इति स्वर्गगता देवाः स्पृहां कुर्वंति नित्यशः
iti svargagatā devāḥ spṛhāṁ kurvaṁti nityaśaḥ
इस प्रकार स्वर्गस्थ देवता भी सदा इसकी अभिलाषा करते हैं।
श्लोक 25 (skanda.5.9.25)
इदं शुभं दिव्यमधर्मनाशनं महाकपालं सुरदैत्यपूजितम्। महाप्रभं पापहरं सनातनं सुरेशलोकादपि दुर्लभं सदा
idaṁ śubhaṁ divyamadharmanāśanaṁ mahākapālaṁ suradaityapūjitam| mahāprabhaṁ pāpaharaṁ sanātanaṁ sureśalokādapi durlabhaṁ sadā
यह शुभ, दिव्य, अधर्मनाशक महाकपाल देव-दानवों द्वारा पूजित है; यह महातेजस्वी, पापहारी, सनातन तथा देवेन्द्र के लोक से भी सदा दुर्लभ है।
श्लोक 26 (skanda.5.9.26)
तपोरतैः सिद्धगणैरभिष्टुतं यथा नभःस्थं दिननाथमंडलम्। य एकचित्तः शृणुयात्प्रसादतस्त्रिविष्टपं गच्छति सोऽभिनंदितः
taporataiḥ siddhagaṇairabhiṣṭutaṁ yathā nabhaḥsthaṁ dinanāthamaṁḍalam| ya ekacittaḥ śṛṇuyātprasādatastriviṣṭapaṁ gacchati so'bhinaṁditaḥ
जिस प्रकार आकाशस्थ सूर्यमण्डल तपस्यारत सिद्धगणों द्वारा स्तुति किया जाता है, उसी प्रकार यह भी स्तुत है; जो एकचित्त होकर इसे प्रसादपूर्वक सुनता है, वह अभिनन्दित होकर त्रिविष्टप [स्वर्ग] को प्राप्त करता है।