अवन्ती खण्ड · अध्याय 8
अप्सरःकुण्ड-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.5.8.1)
व्यास उवाच। आचारः परमो धर्मः सर्वधर्मपरायणः। स्वधर्मनिरताश्चैव जितक्रोधा जितेंद्रियाः
vyāsa uvāca| ācāraḥ paramo dharmaḥ sarvadharmaparāyaṇaḥ| svadharmaniratāścaiva jitakrodhā jiteṁdriyāḥ
व्यास ने कहा—आचार ही परम धर्म है, जो सर्वधर्म का आश्रय है; अपने स्वधर्म में रत, क्रोधविजयी तथा जितेन्द्रिय...
श्लोक 2 (skanda.5.8.2)
रुद्रलोकं व्रजंतीह नात्र चित्रा मतिर्मम। असंशयं च गच्छंति लोकानन्याञ्छशिप्रभैः
rudralokaṁ vrajaṁtīha nātra citrā matirmama| asaṁśayaṁ ca gacchaṁti lokānanyāñchaśiprabhaiḥ
...इस प्रकार रुद्रलोक को जाते हैं; इसमें मेरे मन को कोई संशय नहीं है। और वे निःसंदेह चन्द्रकांति के समान अन्य लोकों को भी प्राप्त होते हैं।
श्लोक 3 (skanda.5.8.3)
विनापि क्षेत्रवासेन तथैव नियमेन च। स्त्रियो म्लेच्छाश्च शूद्राश्च पशवः पक्षिणो मृगाः
vināpi kṣetravāsena tathaiva niyamena ca| striyo mlecchāśca śūdrāśca paśavaḥ pakṣiṇo mṛgāḥ
परन्तु क्षेत्रवास और नियम के बिना भी—स्त्रियाँ, म्लेच्छ, शूद्र, पशु, पक्षी, मृग...
श्लोक 4 (skanda.5.8.4)
मूका जडांधबधिरास्तपोनियमवर्जिताः। एषां तु का गतिश्चेत्ते महाकालवने मृताः
mūkā jaḍāṁdhabadhirāstaponiyamavarjitāḥ| eṣāṁ tu kā gatiścette mahākālavane mṛtāḥ
...मूक, जड़, अन्धे, बहरे, जो तप-नियम से रहित हैं—यदि ये महाकालवन में मर जाएँ, तो इनकी क्या गति होती है?
श्लोक 5 (skanda.5.8.5)
सनत्कुमार उवाच। स्त्रियो म्लेच्छाश्च मूढाश्च पशवः पक्षिणो मृगाः। कालेनैव मृता व्यास रुद्रलोकं व्रजंति ते
sanatkumāra uvāca| striyo mlecchāśca mūḍhāśca paśavaḥ pakṣiṇo mṛgāḥ| kālenaiva mṛtā vyāsa rudralokaṁ vrajaṁti te
सनत्कुमार ने कहा—स्त्रियाँ, म्लेच्छ, मूढ़, पशु, पक्षी और मृग, हे व्यास, यदि वे कालवश ही वहाँ मर जाएँ, तो रुद्रलोक को जाते हैं।
श्लोक 6 (skanda.5.8.6)
शरीरैर्दिव्यरूपैश्च सर्वभोगसमन्विताः। रमंते शंभुना सार्धं स्मशाने प्रेतसंकुले
śarīrairdivyarūpaiśca sarvabhogasamanvitāḥ| ramaṁte śaṁbhunā sārdhaṁ smaśāne pretasaṁkule
दिव्य रूपधारी शरीरों से, समस्त भोगों से युक्त होकर, वे प्रेतों से भरे स्मशान में शम्भु के साथ आनन्दित होते हैं।
श्लोक 7 (skanda.5.8.7)
निर्भत्सिता पुरा देवी कालीति पार्वतीति च। तदा सा कुपिता देवी कटके शंकरं प्रति
nirbhatsitā purā devī kālīti pārvatīti ca| tadā sā kupitā devī kaṭake śaṁkaraṁ prati
पूर्वकाल में देवी को काली और पार्वती कहकर तिरस्कृत किया गया था; तब वह देवी कटक में शंकर के प्रति क्रुद्ध हो गई।
श्लोक 8 (skanda.5.8.8)
एवं हि कलहो जातः शिवगौर्योर्हि यत्र तु। देवस्तत्र समुद्भूतो नाम्ना कलकलेश्वरः
evaṁ hi kalaho jātaḥ śivagauryorhi yatra tu| devastatra samudbhūto nāmnā kalakaleśvaraḥ
इस प्रकार शिव और गौरी के मध्य कलह उत्पन्न हुआ; वहाँ कलकलेश्वर नामक देवता प्रकट हुए।
श्लोक 9 (skanda.5.8.9)
कृतमग्रे तदा कुंडं नाम्ना कलहनाशनम्। स्नाने तत्र कृते व्यास जाताऽकलहिनी प्रिया
kṛtamagre tadā kuṁḍaṁ nāmnā kalahanāśanam| snāne tatra kṛte vyāsa jātā'kalahinī priyā
वहाँ पहले कलहनाशन नामक कुण्ड बनाया गया; हे व्यास, वहाँ स्नान करने से प्रिया देवी कलहरहित हो गई।
श्लोक 10 (skanda.5.8.10)
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्। उपोष्य रजनीमेकां कुलानां तारयेच्छतम्
tasmiṁstīrthe naraḥ snātvā pūjayitvā maheśvaram| upoṣya rajanīmekāṁ kulānāṁ tārayecchatam
उस तीर्थ में स्नान कर, महेश्वर की पूजा कर, एक रात्रि उपवास करने वाला व्यक्ति अपने कुल की सौ पीढ़ियों को तार देता है।
श्लोक 11 (skanda.5.8.11)
तत्र यच्छति यो दानं त्रुटिमात्रं च चंदनम्। आत्मना तारि तास्तेन दश पूर्वे दशापरे
tatra yacchati yo dānaṁ truṭimātraṁ ca caṁdanam| ātmanā tāri tāstena daśa pūrve daśāpare
जो वहाँ चन्दन का एक कण मात्र भी दान देता है, वह स्वयं सहित दस पूर्व और दस उत्तर पीढ़ियों को तार देता है।
श्लोक 12 (skanda.5.8.12)
भूमिदानं च यस्तत्र प्रदास्यति नरो मुने। अपि गोचर्ममात्रेण सर्वभूम्यधिपो भवेत्
bhūmidānaṁ ca yastatra pradāsyati naro mune| api gocarmamātreṇa sarvabhūmyadhipo bhavet
हे मुने, जो वहाँ भूमिदान करता है, चाहे गोचर्ममात्र ही क्यों न हो, वह सम्पूर्ण पृथ्वी का अधिपति बनता है।
श्लोक 13 (skanda.5.8.13)
गामेकां रक्ति कामेकां भूमेरप्येकमंगुलम्। यः प्रदास्यति भक्त्या हि स वै राजा भविष्यति
gāmekāṁ rakti kāmekāṁ bhūmerapyekamaṁgulam| yaḥ pradāsyati bhaktyā hi sa vai rājā bhaviṣyati
जो भक्तिपूर्वक एक गाय, एक माणिक्य, अथवा भूमि की एक अंगुल भर भी देता है, वह अवश्य राजा बनेगा।
श्लोक 14 (skanda.5.8.14)
धेनुमश्वांस्तिलान्वस्त्रं भाजनं ताम्रदोहनम्। उपानहश्च च्छत्रं च तथा च श्रेष्ठपादुके
dhenumaśvāṁstilānvastraṁ bhājanaṁ tāmradohanam| upānahaśca cchatraṁ ca tathā ca śreṣṭhapāduke
धेनु, अश्व, तिल, वस्त्र, पात्र, ताम्रदोहन, उपानह और छत्र, तथा श्रेष्ठ पादुकाएँ...
श्लोक 15 (skanda.5.8.15)
ये प्रदास्यंति विप्रेभ्यस्तेषां लोकाः सदाऽक्षयाः। तस्य दक्षिणपार्श्वे तु पृष्ठे मात्राख्य देवताः
ye pradāsyaṁti viprebhyasteṣāṁ lokāḥ sadā'kṣayāḥ| tasya dakṣiṇapārśve tu pṛṣṭhe mātrākhya devatāḥ
...जो ये ब्राह्मणों को देते हैं, उनके लोक सदा अक्षय होते हैं। उस कुण्ड के दाहिने पार्श्व में, पृष्ठभाग में, मातृ नामक देवताएँ हैं।
श्लोक 16 (skanda.5.8.16)
सा तत्र सर्वलोकानां देवी दुरितहारिणी। सर्वतीर्थं तु विज्ञेयं मणिकर्णिकमुत्तमम्
sā tatra sarvalokānāṁ devī duritahāriṇī| sarvatīrthaṁ tu vijñeyaṁ maṇikarṇikamuttamam
वहाँ समस्त लोकों के दुरितों को हरने वाली देवी विराजमान हैं; यह सर्वतीर्थस्वरूप उत्तम मणिकर्णिका जानना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.5.8.17)
तस्मिन्स्नात्वा तु यः पश्येत्पृष्ठमातर आदरात्। स मुक्तः सर्वपापेभ्यः सिद्धिमाप्नोति वांछिताम्
tasminsnātvā tu yaḥ paśyetpṛṣṭhamātara ādarāt| sa muktaḥ sarvapāpebhyaḥ siddhimāpnoti vāṁchitām
जो वहाँ स्नान कर आदरपूर्वक पृष्ठभाग की मातृकाओं का दर्शन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर वांछित सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 18 (skanda.5.8.18)
तासां तु दर्शनं कृत्वा मार्गे गमनमाचरेत्। न भयं तस्य चोरेभ्यो रक्षोभूतभयं तथा
tāsāṁ tu darśanaṁ kṛtvā mārge gamanamācaret| na bhayaṁ tasya corebhyo rakṣobhūtabhayaṁ tathā
उनका दर्शन कर पथ पर गमन करना चाहिए; उसे न चोरों का भय रहता है, न राक्षस-भूतों का।
श्लोक 19 (skanda.5.8.19)
स्वदेशे परदेशे वा पर्वतेष्वटवीषु च। न समुद्रे भयं तस्य तथा वै दुष्टभावना
svadeśe paradeśe vā parvateṣvaṭavīṣu ca| na samudre bhayaṁ tasya tathā vai duṣṭabhāvanā
अपने देश में या परदेश में, पर्वतों या वनों में, समुद्र में भी उसे भय नहीं होता, न दुष्ट भावना का भय।
श्लोक 20 (skanda.5.8.20)
ग्रहपीडासु सर्वासु तथा राजभयादिकम्। बस्तं वा यदि वा मेषं महिषं चापि घातयेत्
grahapīḍāsu sarvāsu tathā rājabhayādikam| bastaṁ vā yadi vā meṣaṁ mahiṣaṁ cāpi ghātayet
समस्त ग्रहपीड़ाओं में तथा राजभय आदि में भी उसे भय नहीं होता। यदि कोई बकरा, मेष अथवा महिष का बलिदान करे...
श्लोक 21 (skanda.5.8.21)
देवीमुद्दिश्य यो विप्र सोऽभीष्टफलमश्नुते। आश्विनस्य सिताष्टम्यामर्धरात्रिगते नरः
devīmuddiśya yo vipra so'bhīṣṭaphalamaśnute| āśvinasya sitāṣṭamyāmardharātrigate naraḥ
...देवी को उद्दिष्ट कर, हे विप्र, वह इच्छित फल प्राप्त करता है। आश्विन शुक्ल अष्टमी को अर्धरात्रि बीतने पर जो मनुष्य...
श्लोक 22 (skanda.5.8.22)
यः स्नाति पुरतो देव्याः स सिद्धि लभते पराम्। मृतपुत्रा च या नारी कुण्डे स्नात्वा सभर्तृका
yaḥ snāti purato devyāḥ sa siddhi labhate parām| mṛtaputrā ca yā nārī kuṇḍe snātvā sabhartṛkā
...देवी के समक्ष स्नान करता है, वह परम सिद्धि प्राप्त करता है। और जिस स्त्री के पुत्र मर चुके हों, वह अपने पति सहित कुण्ड में स्नान कर...
श्लोक 23 (skanda.5.8.23)
स्नाति वै फलकुम्भेन अग्रे देव्या विधानतः। स्नात्वा नान्यमुखं पश्येत्कुम्भस्नानेन वै मुने
snāti vai phalakumbhena agre devyā vidhānataḥ| snātvā nānyamukhaṁ paśyetkumbhasnānena vai mune
...विधानपूर्वक देवी के समक्ष फलकुम्भ से स्नान करती है; हे मुने, कुम्भस्नान के पश्चात् किसी अन्य के मुख को नहीं देखना चाहिए।
श्लोक 24 (skanda.5.8.24)
तस्य संजायते पुत्रो यथा देवः षडाननः। पृष्ठे मातुः परं पुण्यं तीर्थमप्सरसां शुभम्
tasya saṁjāyate putro yathā devaḥ ṣaḍānanaḥ| pṛṣṭhe mātuḥ paraṁ puṇyaṁ tīrthamapsarasāṁ śubham
उसे षडानन देव के समान पुत्र उत्पन्न होता है। माता के पृष्ठभाग में अप्सराओं का परम पुण्य शुभ तीर्थ है।
श्लोक 25 (skanda.5.8.25)
रूपसौभाग्यसंपन्नस्तत्र स्नातो भवेन्नरः। उर्वश्या वै पुरा व्यास तीर्थस्यास्य प्रभावतः
rūpasaubhāgyasaṁpannastatra snāto bhavennaraḥ| urvaśyā vai purā vyāsa tīrthasyāsya prabhāvataḥ
वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य रूप और सौभाग्य से सम्पन्न हो जाता है; हे व्यास, पूर्वकाल में इस तीर्थ के प्रभाव से...
श्लोक 26 (skanda.5.8.26)
भर्ता पुरूरवा लब्धं ऐलेयोंऽसौ महीपतिः। इति कौतूहलं श्रुत्वा व्यासो वचनमब्रवीत्
bhartā purūravā labdhaṁ aileyoṁ'sau mahīpatiḥ| iti kautūhalaṁ śrutvā vyāso vacanamabravīt
...उर्वशी ने ऐल पुरूरवा को, उस पृथ्वीपति को, पति रूप में प्राप्त किया। यह कौतूहलजनक बात सुनकर व्यास ने यह वचन कहा।
श्लोक 27 (skanda.5.8.27)
व्यास उवाच। कथमप्सरसां तीर्थं तत्र जातं महामुने। कारणेन यथा तेन यस्मिन्काले प्रतिष्ठितम्। तथा तन्मे सविस्तारं सरहस्यं प्रकीर्तय
vyāsa uvāca| kathamapsarasāṁ tīrthaṁ tatra jātaṁ mahāmune| kāraṇena yathā tena yasminkāle pratiṣṭhitam| tathā tanme savistāraṁ sarahasyaṁ prakīrtaya
व्यास ने कहा—हे महामुने, वहाँ अप्सराओं का तीर्थ किस प्रकार उत्पन्न हुआ? जिस कारण से तथा जिस काल में यह प्रतिष्ठित हुआ, वह सब मुझे विस्तारपूर्वक, रहस्य सहित बताइए।
श्लोक 28 (skanda.5.8.28)
कथं पुरूरवाश्चासौ भार्यास्तस्य वराप्सराः। उर्वशीनाम का सा तु केन जाता वरांगना। सर्वमेतद्यथावृत्तं वद कौतूहलं हि मे
kathaṁ purūravāścāsau bhāryāstasya varāpsarāḥ| urvaśīnāma kā sā tu kena jātā varāṁganā| sarvametadyathāvṛttaṁ vada kautūhalaṁ hi me
वह पुरूरवा किस प्रकार उस श्रेष्ठ अप्सरा को पत्नी रूप में प्राप्त कर पाया? यह उर्वशी कौन है, और वह सुन्दरी किससे उत्पन्न हुई? यह सब यथावत् बताइए; मुझे बड़ा कौतूहल है।
श्लोक 29 (skanda.5.8.29)
सनत्कुमार उवाच। नरनारायणौ पूर्वं यत्र वै तेपतुस्तपः
sanatkumāra uvāca| naranārāyaṇau pūrvaṁ yatra vai tepatustapaḥ
सनत्कुमार ने कहा—पूर्वकाल में जहाँ नर और नारायण तपस्या करते थे...
श्लोक 30 (skanda.5.8.30)
बदरिकाश्रमस्थौ तौ तेनेन्द्रो भयमागतः। सर्वाश्चाप्सरसो हृद्या रूपयौवनदर्पिताः
badarikāśramasthau tau tenendro bhayamāgataḥ| sarvāścāpsaraso hṛdyā rūpayauvanadarpitāḥ
...बदरिकाश्रम में स्थित उन दोनों से इन्द्र को भय उत्पन्न हो गया; रूप और यौवन से गर्वित समस्त मनोहर अप्सराएँ...
श्लोक 31 (skanda.5.8.31)
आदिष्टा या मघवता विघ्नार्थं च समागताः। तौ दृष्ट्वाप्सरसस्तत्र रमन्तीर्मदविह्वलाः
ādiṣṭā yā maghavatā vighnārthaṁ ca samāgatāḥ| tau dṛṣṭvāpsarasastatra ramantīrmadavihvalāḥ
...मघवान् द्वारा आदिष्ट होकर विघ्न उत्पन्न करने के लिए वहाँ एकत्रित हुईं। उन दोनों को देखकर अप्सराएँ मदविह्वल होकर वहाँ क्रीड़ा करने लगीं।
श्लोक 32 (skanda.5.8.32)
विघ्नार्थमिह आयातास्तदा देवौ जजल्पतुः। अस्माकं न स्त्रियः संति तेन वै विघ्नकारणम्
vighnārthamiha āyātāstadā devau jajalpatuḥ| asmākaṁ na striyaḥ saṁti tena vai vighnakāraṇam
'हम यहाँ विघ्न के लिए आई हैं,' तब उन दोनों ऋषियों ने आपस में कहा। 'हमारे पास स्त्रियाँ नहीं हैं; इसी में विघ्न का कारण है।'
श्लोक 33 (skanda.5.8.33)
एवं संजल्प्य च नरो नारायणमुवाच ह। करिष्याम्यहमेकां वै आसां तु रूपतोऽधिकाम्
evaṁ saṁjalpya ca naro nārāyaṇamuvāca ha| kariṣyāmyahamekāṁ vai āsāṁ tu rūpato'dhikām
ऐसा कहकर नर ने नारायण से कहा—'मैं इन सबसे भी अधिक रूपवती एक स्त्री की सृष्टि करूँगा।'
श्लोक 34 (skanda.5.8.34)
मंजर्या सहकारस्य स्त्रीमूरुभ्यां चकार ह। रूपेणाप्रतिमां लोके सर्वाभरणभूषिताम्
maṁjaryā sahakārasya strīmūrubhyāṁ cakāra ha| rūpeṇāpratimāṁ loke sarvābharaṇabhūṣitām
आम्र की मंजरी से, अपनी दोनों जंघाओं से, उन्होंने एक स्त्री की सृष्टि की, जो लोक में अनुपम रूप वाली तथा समस्त आभूषणों से भूषित थी।
श्लोक 35 (skanda.5.8.35)
उत्थितां प्रमदां दृष्ट्वा ज्वलनाभां वरांगनाम्। गत्वा शशंसुस्ताः शक्रं नर्तौ लोभयितुं क्षमाः
utthitāṁ pramadāṁ dṛṣṭvā jvalanābhāṁ varāṁganām| gatvā śaśaṁsustāḥ śakraṁ nartau lobhayituṁ kṣamāḥ
उस उठी हुई, अग्निकांति के समान तेजस्विनी, उस श्रेष्ठ युवती को देखकर, तथा उन दोनों को मोहित करने में असमर्थ होकर, वे शक्र के पास गईं और यह बात कही।
श्लोक 36 (skanda.5.8.36)
शक्रस्तासां वचः श्रुत्वा गत्वा देवावुवाच ह। प्रणामावनतो भूत्वा कृत्वा शिरसि चांजलिम्
śakrastāsāṁ vacaḥ śrutvā gatvā devāvuvāca ha| praṇāmāvanato bhūtvā kṛtvā śirasi cāṁjalim
शक्र उनकी बात सुनकर उन दोनों देवों के पास गए, तथा प्रणाम में झुककर, शिर पर अंजलि जोड़कर, कहने लगे...
श्लोक 37 (skanda.5.8.37)
अहमर्थी स्त्रियाश्चास्याः प्रसादः क्रियतामिति। ततस्तां ददतुर्देवाविंद्राय परमेश्वरौ
ahamarthī striyāścāsyāḥ prasādaḥ kriyatāmiti| tatastāṁ dadaturdevāviṁdrāya parameśvarau
'मैं इस स्त्री का याचक हूँ; मुझ पर यह अनुग्रह किया जाए।' तब उन दोनों परमेश्वरों ने उसे इन्द्र को दे दिया।
श्लोक 38 (skanda.5.8.38)
अस्मद्वचनसामर्थ्याद्गृहाणेमां त्वमुर्वशीम्। ऊरुभ्यां जनिता यस्मान्नरेणेयं वरांगना
asmadvacanasāmarthyādgṛhāṇemāṁ tvamurvaśīm| ūrubhyāṁ janitā yasmānnareṇeyaṁ varāṁganā
'हमारे वचन के सामर्थ्य से इस उर्वशी को ग्रहण करो; चूँकि यह श्रेष्ठ स्त्री नर द्वारा दोनों ऊरुओं से उत्पन्न हुई है...'
श्लोक 39 (skanda.5.8.39)
मंजर्या सहकारस्य तेनेयमुर्वशी स्मृता। पुरंदरो गृहीत्वा तामुर्वशीं परमांगनाम्
maṁjaryā sahakārasya teneyamurvaśī smṛtā| puraṁdaro gṛhītvā tāmurvaśīṁ paramāṁganām
'...आम्र की मंजरी से उत्पन्न हुई है, इसीलिए यह उर्वशी नाम से स्मृत है।' पुरन्दर उस परम स्त्री उर्वशी को लेकर...
श्लोक 40 (skanda.5.8.40)
गत्वा स्वर्गमथाहूय चित्रांगदमुवाच ह। शिक्षाऽस्याः क्रियतां चित्र यथा नृत्ये विचक्षणा
gatvā svargamathāhūya citrāṁgadamuvāca ha| śikṣā'syāḥ kriyatāṁ citra yathā nṛtye vicakṣaṇā
...स्वर्ग गए, और चित्रांगद को बुलाकर कहा—'हे चित्र, इसे इस प्रकार शिक्षित करो कि यह नृत्य में निपुण हो जाए।'
श्लोक 41 (skanda.5.8.41)
क्रियतामचिरादेषा यत्नमास्थाय शोभनम्। एवमुक्ते तु शक्रेण कृता तेन विचक्षणा। वरं प्रवीणा सा जाता नृत्ये गीते च कोविदा
kriyatāmacirādeṣā yatnamāsthāya śobhanam| evamukte tu śakreṇa kṛtā tena vicakṣaṇā| varaṁ pravīṇā sā jātā nṛtye gīte ca kovidā
'शीघ्र ही उत्तम प्रयत्न से यह किया जाए।' शक्र के इस प्रकार कहने पर उसने उसे निपुण बना दिया; वह नृत्य और गीत में अत्यन्त प्रवीण एवं कुशल हो गई।
श्लोक 42 (skanda.5.8.42)
एवं सा न्यवसत्तत्र सुरसद्मनि सुन्दरी। गते बहुतिथे काले तत्रा गात्स नरेश्वरः
evaṁ sā nyavasattatra surasadmani sundarī| gate bahutithe kāle tatrā gātsa nareśvaraḥ
इस प्रकार वह सुन्दरी वहाँ देवसदन में निवास करती रही; बहुत समय बीत जाने पर वहाँ एक राजा आया।
श्लोक 43 (skanda.5.8.43)
इलस्यपुत्रो धर्मात्मा नाम्ना चैव पुरूरवाः। इन्द्रस्यार्द्धासनगतो नृत्यं पश्यति तत्र ह
ilasyaputro dharmātmā nāmnā caiva purūravāḥ| indrasyārddhāsanagato nṛtyaṁ paśyati tatra ha
इल का पुत्र, धर्मात्मा, पुरूरवा नामक वह राजा, इन्द्र के आधे आसन पर बैठकर वहाँ नृत्य देखने लगा।
श्लोक 44 (skanda.5.8.44)
नृत्यन्तीं वासवस्याग्रे उर्वशीं वीक्ष्य कामुकः। हृतचित्तस्तया राजा न किंचित्प्रत्यपद्यत
nṛtyantīṁ vāsavasyāgre urvaśīṁ vīkṣya kāmukaḥ| hṛtacittastayā rājā na kiṁcitpratyapadyata
वासव के समक्ष नृत्य करती उर्वशी को देखकर, कामातुर हुए राजा का चित्त उसने हर लिया; वह कुछ भी समझ न सका।
श्लोक 45 (skanda.5.8.45)
धैर्यं चित्ते समावेश्य मुहूर्तं पर्यवस्थितः। उर्वशी च तदा तेन दर्शनाहतमानसा
dhairyaṁ citte samāveśya muhūrtaṁ paryavasthitaḥ| urvaśī ca tadā tena darśanāhatamānasā
धैर्य धारण कर वह क्षणभर स्थिर रहा; और उर्वशी का मन भी उसे देखकर आहत हो गया...
श्लोक 46 (skanda.5.8.46)
तत्प्रदेशाद्विनिष्क्रम्य कामार्ता चातिविह्वला। भूमौ सा पतिता बाला उच्छ्रिताद्रंगमण्डलात्
tatpradeśādviniṣkramya kāmārtā cātivihvalā| bhūmau sā patitā bālā ucchritādraṁgamaṇḍalāt
...उस स्थान से हटकर, कामपीड़ित और अत्यन्त विह्वल होकर, वह बाला उठे हुए रंगमण्डल से भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 47 (skanda.5.8.47)
अथात्मानं च संवेद्य उत्थिता भूमिमण्डलात्। दृष्टा सा राजसिंहेन मन्मथेन प्रपीडिता
athātmānaṁ ca saṁvedya utthitā bhūmimaṇḍalāt| dṛṣṭā sā rājasiṁhena manmathena prapīḍitā
तब सचेत होकर भूमि से उठी हुई वह, कामदेव से पीड़ित, उस राजसिंह द्वारा देखी गई।
श्लोक 48 (skanda.5.8.48)
गतः पुरूरवा भूमिं तामेव मनसा स्मरन्। स्मरन्ती राजशार्दूलं गता साप्युर्वशी गृहम्
gataḥ purūravā bhūmiṁ tāmeva manasā smaran| smarantī rājaśārdūlaṁ gatā sāpyurvaśī gṛham
पुरूरवा उसी का मन ही मन स्मरण करता हुआ पृथ्वी पर लौट गया; और उर्वशी भी उस राजशार्दूल का स्मरण करती हुई अपने घर गई।
श्लोक 49 (skanda.5.8.49)
चित्रांगदगृहे गत्वा दूतं साथ चकार ह। चित्रांगदेन सा नीता रात्रौ यत्र पुरूरवाः
citrāṁgadagṛhe gatvā dūtaṁ sātha cakāra ha| citrāṁgadena sā nītā rātrau yatra purūravāḥ
चित्रांगद के घर जाकर उसने तब एक दूत भेजा; और चित्रांगद द्वारा वह रात्रि में वहाँ ले जाई गई, जहाँ पुरूरवा थे।
श्लोक 50 (skanda.5.8.50)
उर्वश्या रहितः स्वर्गः शून्योऽप्यासीद्दिवौकसाम्। रात्रावेव च सा तेन आनीता त्रिदिवं पुनः
urvaśyā rahitaḥ svargaḥ śūnyo'pyāsīddivaukasām| rātrāveva ca sā tena ānītā tridivaṁ punaḥ
उर्वशी से रहित होने पर स्वर्ग देवताओं के लिए भी शून्य हो गया; और उसी रात्रि में वह पुनः उसके द्वारा त्रिदिव में ले जाई गई।
श्लोक 51 (skanda.5.8.51)
तया विरहितः सोऽपि शून्यचित्तः परिभ्रमन्। उन्मत्ततां गतो व्यास षष्टिवर्षाणि पार्थिवः
tayā virahitaḥ so'pi śūnyacittaḥ paribhraman| unmattatāṁ gato vyāsa ṣaṣṭivarṣāṇi pārthivaḥ
उससे विरहित होकर वह भी शून्यचित्त होकर भटकता रहा, हे व्यास, वह राजा साठ वर्षों तक उन्मत्त रहा।
श्लोक 52 (skanda.5.8.52)
परिभ्रमन्स तीर्थानि महाकालवनं गतः। गंधवेंणोर्वशी स्वर्गे नीता सा परमाप्सराः
paribhramansa tīrthāni mahākālavanaṁ gataḥ| gaṁdhaveṁṇorvaśī svarge nītā sā paramāpsarāḥ
तीर्थों में भटकते हुए वह महाकालवन में पहुँचा। उर्वशी, वह परम अप्सरा, गन्धर्व द्वारा स्वर्ग को ले जाई जा चुकी थी।
श्लोक 53 (skanda.5.8.53)
नापि शेते न वा स्नाति हे राजन्निति जल्पति। तावदप्सरसः सर्वास्ताः प्राप्ता यत्र चोर्वशी
nāpi śete na vā snāti he rājanniti jalpati| tāvadapsarasaḥ sarvāstāḥ prāptā yatra corvaśī
'हे राजन्, वह न सोता है, न स्नान करता है,' ऐसा लोग उसके विषय में कहते थे। इसी बीच सभी अप्सराएँ वहाँ एकत्रित हुईं, जहाँ उर्वशी थी।
श्लोक 54 (skanda.5.8.54)
रंभा च मेनका चैव प्रम्लोचा पुंजिकस्थली। जलपूर्णाश्रुपूर्णा च वसंता चंद्रिका तथा
raṁbhā ca menakā caiva pramlocā puṁjikasthalī| jalapūrṇāśrupūrṇā ca vasaṁtā caṁdrikā tathā
रम्भा, मेनका, प्रम्लोचा, पुंजिकस्थली, जलपूर्णा, अश्रुपूर्णा, तथा वसन्ता और चन्द्रिका...
श्लोक 55 (skanda.5.8.55)
सूर्यदत्ता विशालाक्षी चंद्रा चन्द्रप्रभा तथा। आगत्य तास्तु सहिता उर्वशीं वाक्यमब्रुवन्
sūryadattā viśālākṣī caṁdrā candraprabhā tathā| āgatya tāstu sahitā urvaśīṁ vākyamabruvan
...सूर्यदत्ता, विशालाक्षी, चन्द्रा तथा चन्द्रप्रभा—वे सब मिलकर उर्वशी से यह कहने लगीं।
श्लोक 56 (skanda.5.8.56)
किं रोदिषि वरारोहे मर्त्यहेतोः सुलोचने। तद्वाक्यमुर्वशी तासां श्रुत्वा वचनमब्रवीत्
kiṁ rodiṣi varārohe martyahetoḥ sulocane| tadvākyamurvaśī tāsāṁ śrutvā vacanamabravīt
'हे वरारोहे, हे सुलोचने, तुम एक मर्त्य के लिए क्यों रोती हो?' उनकी यह बात सुनकर उर्वशी ने उत्तर दिया।
श्लोक 57 (skanda.5.8.57)
सौख्यं षण्ढो न जानाति संगात्स्त्रीपुंसयोर्हि यत्। अनयोपमया ज्ञेयं तस्यार्थे कृतनिश्चया
saukhyaṁ ṣaṇḍho na jānāti saṁgātstrīpuṁsayorhi yat| anayopamayā jñeyaṁ tasyārthe kṛtaniścayā
'षण्ढ (नपुंसक) स्त्री-पुरुष के संगम से जो सुख होता है, उसे नहीं जानता; इसे इसी उपमा से समझना चाहिए, जो इसके लिए दृढ़ निश्चयवाली हो।'
श्लोक 58 (skanda.5.8.58)
श्रुत्वा चेति वचस्तस्यास्ताः संमंत्र्य समाहिताः। अविदिते च देवानां महाकालवने गताः
śrutvā ceti vacastasyāstāḥ saṁmaṁtrya samāhitāḥ| avidite ca devānāṁ mahākālavane gatāḥ
उसकी यह बात सुनकर, वे परस्पर विचार-विमर्श कर, संयत होकर, देवताओं से अज्ञात रहकर महाकालवन गईं।
श्लोक 59 (skanda.5.8.59)
नृपं च ददृशुस्तत्र वृक्षच्छायानिषेवितम्। दृष्ट्वा चाथ नृपं सर्वा भृशं जाताः सुविह्वलाः
nṛpaṁ ca dadṛśustatra vṛkṣacchāyāniṣevitam| dṛṣṭvā cātha nṛpaṁ sarvā bhṛśaṁ jātāḥ suvihvalāḥ
वहाँ उन्होंने राजा को वृक्ष की छाया में विश्राम करते हुए देखा; और राजा को देखकर वे सभी अत्यन्त विह्वल हो गईं।
श्लोक 60 (skanda.5.8.60)
दृष्ट्वा तथाविधाः सर्वाः कामार्ता सुरयोषितः। मूढचित्ताः प्रहस्यैवमुर्वशी वाक्यमब्रवीत्
dṛṣṭvā tathāvidhāḥ sarvāḥ kāmārtā surayoṣitaḥ| mūḍhacittāḥ prahasyaivamurvaśī vākyamabravīt
उसे इस प्रकार देखकर वे सभी देवांगनाएँ कामातुर तथा मूढ़चित्त हो गईं; तब हँसते हुए उर्वशी ने यह वचन कहा।
श्लोक 61 (skanda.5.8.61)
उर्वश्युवाच। अयं स पुरुषव्याघ्रो विना येनाहमीदृशी। ऐलः पुरूरवा नाम विख्यातो जगतीपतिः
urvaśyuvāca| ayaṁ sa puruṣavyāghro vinā yenāhamīdṛśī| ailaḥ purūravā nāma vikhyāto jagatīpatiḥ
उर्वशी ने कहा—'यह वही पुरुषव्याघ्र है, जिसके बिना मैं ऐसी न होती—ऐल, पुरूरवा नामक, विख्यात पृथ्वीपति।'
श्लोक 62 (skanda.5.8.62)
एवं ब्रुवन्त्यां वै तस्यामुर्वश्यामप्सरोगणः। मौनीभूतश्चिरं तस्थौ लज्जयानतकन्धरः
evaṁ bruvantyāṁ vai tasyāmurvaśyāmapsarogaṇaḥ| maunībhūtaściraṁ tasthau lajjayānatakandharaḥ
उर्वशी के इस प्रकार कहने पर अप्सराओं का सारा समूह मौन हो गया, और लज्जा से गर्दन झुकाए दीर्घकाल तक वहीं खड़ा रहा।
श्लोक 63 (skanda.5.8.63)
एतस्मिन्नन्तरे प्रायाद्भगवांस्तत्र नारदः। दृष्ट्वा तथागताः सर्वा उर्वश्या सहितं नृपम्
etasminnantare prāyādbhagavāṁstatra nāradaḥ| dṛṣṭvā tathāgatāḥ sarvā urvaśyā sahitaṁ nṛpam
इसी बीच भगवान् नारद वहाँ आ पहुँचे, और उन सबको उस दशा में, उर्वशी सहित राजा के साथ, वहाँ देखा।
श्लोक 64 (skanda.5.8.64)
संप्रेक्ष्य च ततः प्राह कि यूयमिह निस्वनाः। त्यक्त्वा तथाविधं रम्यमिन्द्रस्यालयमुत्तमम्
saṁprekṣya ca tataḥ prāha ki yūyamiha nisvanāḥ| tyaktvā tathāvidhaṁ ramyamindrasyālayamuttamam
उन्हें देखकर उन्होंने कहा—'तुम सब मौन होकर इन्द्र के उस रमणीय उत्तम धाम को छोड़कर यहाँ क्यों हो?'
श्लोक 65 (skanda.5.8.65)
वरं च व्रियतां शीघ्रं वियोगो न भविष्यति। माहात्म्यं चास्य तीर्थस्य कथयामास नारदः
varaṁ ca vriyatāṁ śīghraṁ viyogo na bhaviṣyati| māhātmyaṁ cāsya tīrthasya kathayāmāsa nāradaḥ
'शीघ्र वर माँगो; वियोग नहीं होगा।' और नारद ने तब इस तीर्थ का माहात्म्य बताया।
श्लोक 66 (skanda.5.8.66)
अस्मिन्हि दुर्भगा तीर्थे स्नात्वा स्त्री पुरुषोऽपि वा। सौभाग्यं लभते सम्यक्सर्वभोगांस्तथोत्तमान्
asminhi durbhagā tīrthe snātvā strī puruṣo'pi vā| saubhāgyaṁ labhate samyaksarvabhogāṁstathottamān
'इस तीर्थ में दुर्भागी स्त्री अथवा पुरुष, स्नान कर, भलीभाँति सौभाग्य तथा समस्त उत्तम भोगों को प्राप्त करते हैं।'
श्लोक 67 (skanda.5.8.67)
आत्मानं तोलयेद्यस्तु तिलैर्वा लवणेन वा। शर्कराभिश्च बह्वीभिर्वित्तशाठ्यविवर्जितः
ātmānaṁ tolayedyastu tilairvā lavaṇena vā| śarkarābhiśca bahvībhirvittaśāṭhyavivarjitaḥ
'जो कोई अपने को तिल, लवण अथवा प्रचुर शर्करा के तुल्य तौलता है, धनविषयक कंजूसी से रहित होकर...'
श्लोक 68 (skanda.5.8.68)
गुडेन मधुना वापि देवीमुद्दिस्य पार्वतीम्। लवणेन स्वरूपाढ्यस्तिलैः सर्वांगशोभनः
guḍena madhunā vāpi devīmuddisya pārvatīm| lavaṇena svarūpāḍhyastilaiḥ sarvāṁgaśobhanaḥ
'...अथवा गुड़ या मधु से, देवी पार्वती को उद्दिष्ट करके तौलता है, वह लवण से स्वरूपसम्पन्न, तिल से सर्वांगशोभन हो जाता है।'
श्लोक 69 (skanda.5.8.69)
द्रव्यवृद्धिः शर्करया गुडेनांगेषु पूर्णता। मधुना चैव सौभाग्यं तीर्थस्यास्य प्रभावतः
dravyavṛddhiḥ śarkarayā guḍenāṁgeṣu pūrṇatā| madhunā caiva saubhāgyaṁ tīrthasyāsya prabhāvataḥ
'शर्करा से द्रव्यवृद्धि, गुड़ से अंगों की पूर्णता, तथा मधु से सौभाग्य होता है—इस तीर्थ के प्रभाव से।'
श्लोक 70 (skanda.5.8.70)
द्वादशैव तु युग्मानि देव्या देवस्य भोजयेत्। कूपीं नखरिणीं दद्यात्ताटंकं कतकांजनम्
dvādaśaiva tu yugmāni devyā devasya bhojayet| kūpīṁ nakhariṇīṁ dadyāttāṭaṁkaṁ katakāṁjanam
देवी और देव के नाम पर बारह जोड़ों को भोजन कराना चाहिए; कूपी, नखरिणी, ताटंक तथा कतक सहित अंजन देना चाहिए।
श्लोक 71 (skanda.5.8.71)
वेत्रजां कंचुकीं चैव वस्त्रे कौसुंभके तथा। श्वेतानुलेपनं पुंसां स्त्रीणां दद्याच्च कुंकुमम्
vetrajāṁ kaṁcukīṁ caiva vastre kausuṁbhake tathā| śvetānulepanaṁ puṁsāṁ strīṇāṁ dadyācca kuṁkumam
बेंत की कंचुकी, तथा कुसुम्भ रंग के वस्त्र भी; पुरुषों को श्वेत अनुलेपन तथा स्त्रियों को कुंकुम देना चाहिए।
श्लोक 72 (skanda.5.8.72)
आषाढे श्रावणे वापि मासि भाद्रपदे तथा। शुक्लाश्विनतृतीयाया मुत्तमं व्रतमाचरेत्
āṣāḍhe śrāvaṇe vāpi māsi bhādrapade tathā| śuklāśvinatṛtīyāyā muttamaṁ vratamācaret
आषाढ़, श्रावण अथवा भाद्रपद मास में, अथवा शुक्ल आश्विन तृतीया को यह उत्तम व्रत करना चाहिए।
श्लोक 73 (skanda.5.8.73)
उत्तमा जायते नारी यथा देवी उमा तथा। उमामहेश्वरौ कार्यौ सौवर्णौ च स्वशक्तितः
uttamā jāyate nārī yathā devī umā tathā| umāmaheśvarau kāryau sauvarṇau ca svaśaktitaḥ
स्त्री उत्तम हो जाती है, मानो साक्षात् देवी उमा के समान; अपनी शक्ति के अनुसार उमा-महेश्वर की स्वर्णमूर्ति बनवानी चाहिए।
श्लोक 74 (skanda.5.8.74)
धार्यौ नार्या हि तौ देवौ स्वयं तुलावरोहणे। फलानि चैव देयानि शाकानि विविधानि च
dhāryau nāryā hi tau devau svayaṁ tulāvarohaṇe| phalāni caiva deyāni śākāni vividhāni ca
स्त्री को स्वयं तुला पर चढ़ते समय उन दोनों देवताओं को धारण करना चाहिए; तथा फल और नाना प्रकार की शाक भी देनी चाहिए।
श्लोक 75 (skanda.5.8.75)
तत्र दत्तं हुतं जप्तं सर्वं कोटिगुणं भवेत्। एवं या कुरुते तत्र तीर्थे नारी समाहिता
tatra dattaṁ hutaṁ japtaṁ sarvaṁ koṭiguṇaṁ bhavet| evaṁ yā kurute tatra tīrthe nārī samāhitā
वहाँ जो कुछ भी दान, हवन अथवा जप किया जाता है, वह करोड़ गुना फलदायी हो जाता है। इस प्रकार जो स्त्री उस तीर्थ में समाहितचित्त होकर यह करती है...
श्लोक 76 (skanda.5.8.76)
गन्धर्वाप्सरसां लोके मृता याति न संशयः। अत्र तीर्थे च द्वे लिंगे पूजिते देवदानवैः
gandharvāpsarasāṁ loke mṛtā yāti na saṁśayaḥ| atra tīrthe ca dve liṁge pūjite devadānavaiḥ
...वह मृत्यु के पश्चात् निःसंदेह गन्धर्व-अप्सराओं के लोक को जाती है। इस तीर्थ में दो लिंग हैं, जो देव-दानवों द्वारा पूजित हैं।
श्लोक 77 (skanda.5.8.77)
दृष्ट्वा ते परमां सिद्धिं प्राप्नुतो दंपती तदा। कार्तिक्यां तु विशेषेण कृत्वा तत्र प्रजागरम्। संपूज्य गंधपुष्पैश्च रुद्रलोकमवाप्नुयात्
dṛṣṭvā te paramāṁ siddhiṁ prāpnuto daṁpatī tadā| kārtikyāṁ tu viśeṣeṇa kṛtvā tatra prajāgaram| saṁpūjya gaṁdhapuṣpaiśca rudralokamavāpnuyāt
उनका दर्शन कर दम्पती परम सिद्धि प्राप्त करते हैं; विशेष रूप से कार्तिकी में वहाँ जागरण कर, गन्ध-पुष्पों से पूजा कर, वे रुद्रलोक को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 78 (skanda.5.8.78)
यथा देव्याः स्वरूपेण वियोगो नैव दृश्यते। तथा तयोर्वियोगश्च दृश्यते न कदाचन
yathā devyāḥ svarūpeṇa viyogo naiva dṛśyate| tathā tayorviyogaśca dṛśyate na kadācana
जैसे देवी के स्वरूप से वियोग कभी नहीं देखा जाता, वैसे ही उन दोनों का वियोग भी कभी नहीं देखा जाता।
श्लोक 79 (skanda.5.8.79)
एवं कृत्वाथ तां विप्र सर्वाश्च त्रिदिवं गताः। उक्तमप्सरसां तीर्थं तीर्थांतरमथोच्यते
evaṁ kṛtvātha tāṁ vipra sarvāśca tridivaṁ gatāḥ| uktamapsarasāṁ tīrthaṁ tīrthāṁtaramathocyate
हे विप्र, इस प्रकार उसे [पुनःस्थापित] कर वे सब स्वर्ग गईं। इस प्रकार अप्सराओं का तीर्थ बताया गया; अब अन्य तीर्थ कहा जाता है।
श्लोक 80 (skanda.5.8.80)
दक्षिणे पृष्ठदेव्या वै माहिषं कुण्डमुच्यते। महिषो दानवः पूर्वं निहतो गणनायकैः
dakṣiṇe pṛṣṭhadevyā vai māhiṣaṁ kuṇḍamucyate| mahiṣo dānavaḥ pūrvaṁ nihato gaṇanāyakaiḥ
देवी के पृष्ठभाग में दक्षिण दिशा में माहिष नामक कुण्ड है; पूर्वकाल में वहाँ महिष नामक दानव गणनायकों द्वारा मारा गया था।
श्लोक 81 (skanda.5.8.81)
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा मातॄः संपूज्य यत्नतः। प्रेतरक्षः पिशाचानां पीडया स विमुच्यते
tatra tīrthe naraḥ snātvā mātṝḥ saṁpūjya yatnataḥ| pretarakṣaḥ piśācānāṁ pīḍayā sa vimucyate
उस तीर्थ में स्नान कर, यत्नपूर्वक मातृकाओं की पूजा करने वाला मनुष्य प्रेत, राक्षस और पिशाचों की पीड़ा से मुक्त हो जाता है।