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अवन्ती खण्ड · अध्याय 7

महाकालवनवासविधि-वर्णन

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

श्लोक 1 (skanda.5.7.1)

व्यास उवाच। भगवन्केन विधिना महाकालवने नरैः। रुद्रलोकमभीप्सद्भिर्वस्तव्यं क्षेत्रवासिभिः

vyāsa uvāca| bhagavankena vidhinā mahākālavane naraiḥ| rudralokamabhīpsadbhirvastavyaṁ kṣetravāsibhiḥ

व्यास ने कहा—हे भगवन्, रुद्रलोक की कामना करने वाले क्षेत्रवासी मनुष्यों को महाकालवन में किस विधि से रहना चाहिए?

श्लोक 2 (skanda.5.7.2)

किं मनुष्यैरुत स्त्रीभिः सिद्ध्यर्थं ह्याश्रमान्वितैः। वसद्भिः किमनुष्ठेयमेतत्सर्वं ब्रवीहि नः

kiṁ manuṣyairuta strībhiḥ siddhyarthaṁ hyāśramānvitaiḥ| vasadbhiḥ kimanuṣṭheyametatsarvaṁ bravīhi naḥ

स्त्री-पुरुषों को, जो सिद्धि हेतु आश्रमों से युक्त होकर वहाँ निवास करते हैं, क्या करना चाहिए? यह सब हमें बताइए।

श्लोक 3 (skanda.5.7.3)

नरैः स्त्रीभिश्च वस्तव्यं वर्णैश्चाश्रमवासिभिः। स्वधर्माचारनिरतैर्दंभमोहविवर्जितैः

naraiḥ strībhiśca vastavyaṁ varṇaiścāśramavāsibhiḥ| svadharmācāraniratairdaṁbhamohavivarjitaiḥ

समस्त वर्णों और आश्रमों के स्त्री-पुरुषों को अपने-अपने स्वधर्म के आचरण में तत्पर, दंभ और मोह से रहित होकर वहाँ रहना चाहिए।

श्लोक 4 (skanda.5.7.4)

कर्मणा मनसा वाचा रुद्रभक्तैर्यतेन्द्रियैः। अनुश्रुतिभिरक्षुद्रैः सर्वभूत हिते रतैः। किं कुर्वाणैर्नरैः कर्म रुद्रभक्तिं ब्रवीहि नः

karmaṇā manasā vācā rudrabhaktairyatendriyaiḥ| anuśrutibhirakṣudraiḥ sarvabhūta hite rataiḥ| kiṁ kurvāṇairnaraiḥ karma rudrabhaktiṁ bravīhi naḥ

कर्म, मन और वाणी से रुद्रभक्त, जितेन्द्रिय, श्रुतिपरम्परा का पालन करने वाले, क्षुद्रतारहित, समस्त प्राणियों के हित में रत—ऐसे मनुष्यों को क्या कर्म करना चाहिए, तथा रुद्रभक्ति क्या है, यह हमें बताइए।

श्लोक 5 (skanda.5.7.5)

सनत्कुमार उवाच। त्रिविधा कथिता ह्यत्र मनोवाक्कायसंभवा। लौकिकी वैदिकी चान्या भवेदाध्यात्मिकी तथा

sanatkumāra uvāca| trividhā kathitā hyatra manovākkāyasaṁbhavā| laukikī vaidikī cānyā bhavedādhyātmikī tathā

सनत्कुमार ने कहा—यहाँ मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न त्रिविध भक्ति कही गई है: लौकिकी, वैदिकी तथा अन्य आध्यात्मिकी।

श्लोक 6 (skanda.5.7.6)

ध्यानधारणया बुद्ध्या रुद्राणां स्मरणं हि तत्। रुद्रभक्तिकरी चैषा मानसी भक्तिरु च्यते

dhyānadhāraṇayā buddhyā rudrāṇāṁ smaraṇaṁ hi tat| rudrabhaktikarī caiṣā mānasī bhaktiru cyate

ध्यान, धारणा और बुद्धि द्वारा रुद्रों का स्मरण—यह रुद्रभक्ति उत्पन्न करने वाली भक्ति मानसी भक्ति कहलाती है।

श्लोक 7 (skanda.5.7.7)

व्रतोपवासनियमैर्यतेद्रियनिरोधिभिः। कायिका भक्ती रुद्रस्य ज्ञानध्यानस्य धर्मिणाम्

vratopavāsaniyamairyatedriyanirodhibhiḥ| kāyikā bhaktī rudrasya jñānadhyānasya dharmiṇām

व्रत, उपवास और नियमों द्वारा, इन्द्रियों को नियंत्रित कर—यह रुद्र की कायिक भक्ति ज्ञान-ध्यान में धर्मरत लोगों की होती है।

श्लोक 8 (skanda.5.7.8)

गोघृतक्षीरदधिभिर्गंधरक्तकुशो दकैः। गन्धमाल्यैश्च विविधैर्धातुभिश्चोपपादिता

goghṛtakṣīradadhibhirgaṁdharaktakuśo dakaiḥ| gandhamālyaiśca vividhairdhātubhiścopapāditā

गोघृत, दूध और दही से, सुगन्धित द्रव्यों, लाल कुशोदक, नाना गन्ध-मालाओं तथा धातुओं से युक्त...

श्लोक 9 (skanda.5.7.9)

घृतगुग्गुलधूपैश्च कृष्णागरुसुगंधिभिः। भूषणैर्हेमरत्नानां चित्राभिः स्रग्भिरेव च

ghṛtagugguladhūpaiśca kṛṣṇāgarusugaṁdhibhiḥ| bhūṣaṇairhemaratnānāṁ citrābhiḥ sragbhireva ca

...घृत, गुग्गुल तथा कृष्णागुरु की सुगन्धित धूप से, स्वर्ण-रत्नों के आभूषणों तथा विचित्र मालाओं से...

श्लोक 10 (skanda.5.7.10)

वासप्रविसरास्तोत्रैः पताकाव्यजनोच्छ्रितैः। नृत्यवादित्रगीतैश्च सर्वप्रत्युपहारकैः

vāsapravisarāstotraiḥ patākāvyajanocchritaiḥ| nṛtyavāditragītaiśca sarvapratyupahārakaiḥ

...प्रचुर सुगन्ध-द्रव्यों, स्तोत्रों, ऊँची पताकाओं और चामरों से, नृत्य-वाद्य-गीत से तथा सभी प्रकार के उपहारों से...

श्लोक 11 (skanda.5.7.11)

भक्ष्यभोज्यानुपानैश्च यावत्पूजाक्षतैर्नरैः। महेश्वरं पुरस्कृत्य भक्तिः सा लौकिकी मता

bhakṣyabhojyānupānaiśca yāvatpūjākṣatairnaraiḥ| maheśvaraṁ puraskṛtya bhaktiḥ sā laukikī matā

...खाद्य-पेय पदार्थों तथा पूजा के अक्षतों सहित जो कुछ भी अर्पित किया जाए, उससे महेश्वर की अर्चना करने वाले मनुष्यों की यह भक्ति लौकिकी मानी गई है।

श्लोक 12 (skanda.5.7.12)

वेदमन्त्रहविर्यागैर्या क्रिया वैदिकी मता

vedamantrahaviryāgairyā kriyā vaidikī matā

वेदमंत्रों, हवि तथा यागों से जो क्रिया की जाती है, वह वैदिकी मानी गई है।

श्लोक 13 (skanda.5.7.13)

दर्शे च पूर्णमास्यां वा कर्तव्यं चाग्निहोत्रकम्। प्राशनं दक्षिणादानं पुरोडाशश्च सत्क्रिया

darśe ca pūrṇamāsyāṁ vā kartavyaṁ cāgnihotrakam| prāśanaṁ dakṣiṇādānaṁ puroḍāśaśca satkriyā

अमावस्या या पूर्णिमा को किया जाने वाला अग्निहोत्र, प्राशन, दक्षिणादान तथा पुरोडाश की उत्तम क्रिया...

श्लोक 14 (skanda.5.7.14)

इष्टवृत्तिः सोमपानं याज्ञिकं सर्वकर्म च। ऋग्यजुःसामजाप्यानि संहिताध्ययनानि च

iṣṭavṛttiḥ somapānaṁ yājñikaṁ sarvakarma ca| ṛgyajuḥsāmajāpyāni saṁhitādhyayanāni ca

...इष्ट सृष्टि की वृत्ति, सोमपान, समस्त याज्ञिक कर्म, तथा ऋक्-यजुः-साम के जप और संहिताओं का अध्ययन...

श्लोक 15 (skanda.5.7.15)

क्रियते रुद्रमुद्दिश्य सा भक्तिर्वैदिकी स्मृता। अग्निभूम्यनिलाकाशनिशाकरदिवाकरान्

kriyate rudramuddiśya sā bhaktirvaidikī smṛtā| agnibhūmyanilākāśaniśākaradivākarān

...रुद्र को उद्दिष्ट कर किया जाने वाला वह कर्म वैदिकी भक्ति स्मृत है। अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश, चन्द्र और सूर्य को उद्दिष्ट कर...

श्लोक 16 (skanda.5.7.16)

समुद्दिश्य कृतं कर्म तत्सर्वं दैविकं भवेत्। आध्यात्मिकी तु द्विविधा रुद्रभक्तिः स्थिता मुने

samuddiśya kṛtaṁ karma tatsarvaṁ daivikaṁ bhavet| ādhyātmikī tu dvividhā rudrabhaktiḥ sthitā mune

...किया गया वह सब कर्म दैविक हो जाता है। हे मुने, आध्यात्मिकी रुद्रभक्ति दो प्रकार की है।

श्लोक 17 (skanda.5.7.17)

सांख्याख्या यौगिकी चान्या विभागं तत्र मे शृणु। चतुर्विंशतितत्त्वानि प्रधानादीनि संख्यया

sāṁkhyākhyā yaugikī cānyā vibhāgaṁ tatra me śṛṇu| caturviṁśatitattvāni pradhānādīni saṁkhyayā

एक सांख्य नामक तथा दूसरी यौगिकी—इनका विभाग मुझसे सुनो। प्रधान आदि चौबीस तत्त्व संख्या में हैं...

श्लोक 18 (skanda.5.7.18)

अचेतनानि योज्यानि पुरुषः पञ्चविंशकः। चेतनः पुरुषो भोक्ता न कार्यं तस्य कर्मणः

acetanāni yojyāni puruṣaḥ pañcaviṁśakaḥ| cetanaḥ puruṣo bhoktā na kāryaṁ tasya karmaṇaḥ

...ये अचेतन माने गए हैं; पुरुष पच्चीसवाँ तत्त्व है। चेतन पुरुष भोक्ता है; कर्म उसका कार्य नहीं है।

श्लोक 19 (skanda.5.7.19)

रुद्रः षड्विंशकः कर्ता सर्वज्ञश्चेतनः प्रभुः। अजन्मा नित्यमव्यक्तमधिष्ठाता प्रयोजकः

rudraḥ ṣaḍviṁśakaḥ kartā sarvajñaścetanaḥ prabhuḥ| ajanmā nityamavyaktamadhiṣṭhātā prayojakaḥ

रुद्र छब्बीसवाँ तत्त्व है, वे कर्ता, सर्वज्ञ, चेतन प्रभु हैं; अजन्मा, नित्य, अव्यक्त, अधिष्ठाता तथा प्रयोजक हैं।

श्लोक 20 (skanda.5.7.20)

पुरुषो नित्यव्यक्तः स्यात्कारणं च महेश्वरः। तत्त्वसर्गं भवेत्सर्गं भूतसर्गं च तत्त्वतः

puruṣo nityavyaktaḥ syātkāraṇaṁ ca maheśvaraḥ| tattvasargaṁ bhavetsargaṁ bhūtasargaṁ ca tattvataḥ

पुरुष नित्यव्यक्त है, तथा महेश्वर कारण हैं। तत्त्वों की सृष्टि ही वास्तविक सृष्टि है, और उससे ही भूतों की सृष्टि होती है।

श्लोक 21 (skanda.5.7.21)

संख्यया परिसर्गाय प्रधानं च गुणात्मकम्। साधर्म्यमात्मनैश्वर्यं प्रधानं वै विधर्मि च

saṁkhyayā parisargāya pradhānaṁ ca guṇātmakam| sādharmyamātmanaiśvaryaṁ pradhānaṁ vai vidharmi ca

संख्या के अनुसार, गौण सृष्टि के लिए गुणात्मक प्रधान होता है; आत्मैश्वर्य से साधर्म्य होते हुए भी प्रधान वस्तुतः विधर्मी है।

श्लोक 22 (skanda.5.7.22)

कारणं तच्च रुद्रस्य काम्य त्वमिदमुच्यते। सर्वत्र कर्तृता रुद्रे पुरुषे चाप्यकर्तृता

kāraṇaṁ tacca rudrasya kāmya tvamidamucyate| sarvatra kartṛtā rudre puruṣe cāpyakartṛtā

वही कारण है, और यही रुद्र की कामनाशीलता कही जाती है। सर्वत्र कर्तृत्व रुद्र में है, तथा पुरुष में अकर्तृत्व है।

श्लोक 23 (skanda.5.7.23)

अचैतन्यं प्रधाने च तच्च तत्त्वमिदं स्मृतम्। तत्त्वांतरेण मुच्यंते कार्यं कारणमेव च

acaitanyaṁ pradhāne ca tacca tattvamidaṁ smṛtam| tattvāṁtareṇa mucyaṁte kāryaṁ kāraṇameva ca

प्रधान में अचेतनता है—यही तत्त्व माना गया है; अन्य तत्त्व के द्वारा कार्य और कारण दोनों मुक्त होते हैं।

श्लोक 24 (skanda.5.7.24)

प्रयोजने च वैजात्यं ज्ञात्वा तत्त्वमसंख्यया। संख्यास्तीत्युच्यते प्राज्ञै रुद्रतत्त्वार्थचिंतकैः

prayojane ca vaijātyaṁ jñātvā tattvamasaṁkhyayā| saṁkhyāstītyucyate prājñai rudratattvārthaciṁtakaiḥ

प्रयोजन में भेद जानकर, तथा तत्त्व को असंख्येय जानकर भी, रुद्रतत्त्व के मर्मज्ञ प्राज्ञजन इसे संख्यायुक्त भी कहते हैं।

श्लोक 25 (skanda.5.7.25)

इति तस्य तत्त्वभावं तत्त्वसंख्या च तत्त्वतः। रुद्रतत्त्वाधिकं चापि ज्ञानतत्त्वं विदुर्बुधाः

iti tasya tattvabhāvaṁ tattvasaṁkhyā ca tattvataḥ| rudratattvādhikaṁ cāpi jñānatattvaṁ vidurbudhāḥ

इस प्रकार उस तत्त्वभाव और यथार्थ तत्त्वसंख्या को, तथा रुद्रतत्त्व से भी अधिक ज्ञानतत्त्व को बुधजन जानते हैं।

श्लोक 26 (skanda.5.7.26)

सांख्ये कृता भक्तिरेषा सद्भिराध्यात्मिकी मता। योगिनामपि मे भक्त्या शृणु भक्तिं महासुर

sāṁkhye kṛtā bhaktireṣā sadbhirādhyātmikī matā| yogināmapi me bhaktyā śṛṇu bhaktiṁ mahāsura

सांख्य द्वारा की गई यह भक्ति सज्जनों द्वारा आध्यात्मिकी मानी गई है। हे महाभाग, अब मुझसे योगियों की भक्ति भी सुनो।

श्लोक 27 (skanda.5.7.27)

प्राणायामपरो नित्यं ध्यायते नियतेंद्रियः। धारणां हृदये धृत्वा ध्यायते यो महेश्वरम्

prāṇāyāmaparo nityaṁ dhyāyate niyateṁdriyaḥ| dhāraṇāṁ hṛdaye dhṛtvā dhyāyate yo maheśvaram

प्राणायाम में नित्य तत्पर, इन्द्रियनियंत्रित, महेश्वर पर धारणा को हृदय में धारण कर ध्यान करने वाला...

श्लोक 28 (skanda.5.7.28)

हृत्कञ्जकर्णिकासीनं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम्। शशांकज्योतिजठरं व्यालवृत्तकटीतटम्

hṛtkañjakarṇikāsīnaṁ pañcavaktraṁ trilocanam| śaśāṁkajyotijaṭharaṁ vyālavṛttakaṭītaṭam

...हृदयकमल की कर्णिका पर विराजमान, पंचमुख, त्रिनेत्र, चन्द्रज्योतिमय उदर वाले, सर्पवलययुक्त कटितटवाले...

श्लोक 29 (skanda.5.7.29)

श्वेतं दशभुजं भद्रं वरदाभयहस्तकम्। योगजा मानसी व्यास रुद्रभक्तिः परा स्मृता

śvetaṁ daśabhujaṁ bhadraṁ varadābhayahastakam| yogajā mānasī vyāsa rudrabhaktiḥ parā smṛtā

...श्वेतवर्ण, दशभुज, भद्र, वरद-अभय मुद्रावाले हाथों से युक्त—हे व्यास, यह योगजनित मानसी रुद्रभक्ति परम स्मृत है।

श्लोक 30 (skanda.5.7.30)

य एव भक्तिमान्रुद्रे रुद्रभक्तः स उच्यते। विधिं तु शृणु मे व्यास यः स्मृतः क्षेत्रवासिनाम्

ya eva bhaktimānrudre rudrabhaktaḥ sa ucyate| vidhiṁ tu śṛṇu me vyāsa yaḥ smṛtaḥ kṣetravāsinām

जो रुद्र के प्रति भक्तिमान् है, वही रुद्रभक्त कहलाता है। हे व्यास, अब मुझसे वह विधि सुनो, जो क्षेत्रवासियों के लिए स्मृत है।

श्लोक 31 (skanda.5.7.31)

स्वयं रुद्रेण विहितो ब्रह्मादीनां समागमे। कथितो विस्तरात्पूर्वं सर्वेषां तत्र सन्निधौ

svayaṁ rudreṇa vihito brahmādīnāṁ samāgame| kathito vistarātpūrvaṁ sarveṣāṁ tatra sannidhau

स्वयं रुद्र द्वारा विहित यह विधि, ब्रह्मा आदि के समागम में, पूर्वकाल में उन सबकी उपस्थिति में विस्तारपूर्वक कही गई थी।

श्लोक 32 (skanda.5.7.32)

निर्ममा निरहंकारा निःसंगा निष्परिग्रहाः। बंधुवर्गेण निःस्नेहाः समलोष्टाश्मकांचनाः

nirmamā nirahaṁkārā niḥsaṁgā niṣparigrahāḥ| baṁdhuvargeṇa niḥsnehāḥ samaloṣṭāśmakāṁcanāḥ

ममतारहित, अहंकाररहित, असंग, अपरिग्रही; बन्धुवर्ग के प्रति भी स्नेहरहित, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने को समान मानने वाले।

श्लोक 33 (skanda.5.7.33)

भूतानां कर्मभिर्नित्यं त्रिविधैरभयप्रदाः। सांख्ययोगविधिज्ञाश्च धर्मज्ञाश्छिन्नसंशयाः

bhūtānāṁ karmabhirnityaṁ trividhairabhayapradāḥ| sāṁkhyayogavidhijñāśca dharmajñāśchinnasaṁśayāḥ

प्राणियों को अपने त्रिविध कर्मों से सदा अभयदान देने वाले; सांख्य-योग की विधि के ज्ञाता, धर्मज्ञ, संशयरहित।

श्लोक 34 (skanda.5.7.34)

यजंतो विविधैर्यज्ञैर्ये विप्राः क्षेत्रवासिनः। महाकालवने तेषां मृतानां यत्फलं शृणु

yajaṁto vividhairyajñairye viprāḥ kṣetravāsinaḥ| mahākālavane teṣāṁ mṛtānāṁ yatphalaṁ śṛṇu

जो ब्राह्मण क्षेत्रवासी नाना यज्ञों से यजन करते हैं, उनके महाकालवन में मरने पर जो फल होता है, वह सुनो।

श्लोक 35 (skanda.5.7.35)

व्रजंत्येव सुदुष्प्राप्यं ब्रह्मसायुज्यमक्षयम्। संप्राप्य न पुनर्जन्म लभंते मोक्षमव्ययम्

vrajaṁtyeva suduṣprāpyaṁ brahmasāyujyamakṣayam| saṁprāpya na punarjanma labhaṁte mokṣamavyayam

वे अत्यन्त दुष्प्राप्य, अक्षय ब्रह्मसायुज्य को ही प्राप्त होते हैं; उसे पाकर वे पुनर्जन्म नहीं लेते, अव्यय मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 36 (skanda.5.7.36)

पुनरावर्तनं हित्वा विधिं माहेश्वरं स्थिताः। पुनरावृत्तिरन्येषां प्रपंचाश्रमवासिनाम्

punarāvartanaṁ hitvā vidhiṁ māheśvaraṁ sthitāḥ| punarāvṛttiranyeṣāṁ prapaṁcāśramavāsinām

माहेश्वर विधि में स्थित लोग पुनरावर्तन को त्यागकर मुक्त हो जाते हैं; अन्य विविध आश्रमवासियों के लिए पुनरावृत्ति होती है।

श्लोक 37 (skanda.5.7.37)

गार्हस्थ्यं विधिमासाद्य षट्कर्मनिरताः सदा। जुह्वते विधिना सम्यङ्मंत्रस्तोत्रैर्नियंत्रिताः

gārhasthyaṁ vidhimāsādya ṣaṭkarmaniratāḥ sadā| juhvate vidhinā samyaṅmaṁtrastotrairniyaṁtritāḥ

गृहस्थ की विधि को अपनाकर, सदा षट्कर्मों में तत्पर होकर, वे मन्त्र-स्तोत्रों से नियंत्रित होकर विधिपूर्वक हवन करते हैं।

श्लोक 38 (skanda.5.7.38)

अधिकं फलमायांति सर्वदुःखविवर्जिताः। सर्व लोकेषु चान्यत्र गतिस्तस्य न हन्यते

adhikaṁ phalamāyāṁti sarvaduḥkhavivarjitāḥ| sarva lokeṣu cānyatra gatistasya na hanyate

वे समस्त दुःखों से रहित होकर अधिक फल प्राप्त करते हैं; समस्त लोकों में तथा अन्यत्र भी उनकी गति नष्ट नहीं होती।

श्लोक 39 (skanda.5.7.39)

दिव्येनैश्वर्ययोगेन स्वारूढः स्वपरिग्रहः। बहुसूर्यप्रकाशेन विमानेन सुवर्चसा

divyenaiśvaryayogena svārūḍhaḥ svaparigrahaḥ| bahusūryaprakāśena vimānena suvarcasā

दिव्य ऐश्वर्ययोग से अपने ही वाहन पर आरूढ़, अनेक सूर्यों के प्रकाश के समान तेजस्वी विमान पर...

श्लोक 40 (skanda.5.7.40)

वृतः स्त्रीणां सहस्रैश्च स्वच्छंदगमनालयः। विचरत्यविचार्यैव सर्वलोकान्दिवौकसाम्

vṛtaḥ strīṇāṁ sahasraiśca svacchaṁdagamanālayaḥ| vicaratyavicāryaiva sarvalokāndivaukasām

...सहस्रों स्त्रियों से घिरा हुआ, स्वच्छन्द गमन करने वाला, वह बिना किसी विचार के देवताओं के समस्त लोकों में विचरण करता है।

श्लोक 41 (skanda.5.7.41)

स्पृहणीयतमः पुंसां सर्ववर्णोत्तमो धनी। स्वर्गाच्च्युतः प्रजायेत कुले महति रूपवान्

spṛhaṇīyatamaḥ puṁsāṁ sarvavarṇottamo dhanī| svargāccyutaḥ prajāyeta kule mahati rūpavān

पुरुषों में सर्वाधिक स्पृहणीय, समस्त वर्णों में श्रेष्ठ, धनवान्; स्वर्ग से च्युत होने पर वह महान् कुल में रूपवान् उत्पन्न होता है...

श्लोक 42 (skanda.5.7.42)

धर्मज्ञो रुद्रभक्तश्च सर्वविद्यार्थपारगः। तथैव ब्रह्मचर्येण गुरुशुश्रूषणेन च

dharmajño rudrabhaktaśca sarvavidyārthapāragaḥ| tathaiva brahmacaryeṇa guruśuśrūṣaṇena ca

...धर्मज्ञ, रुद्रभक्त, समस्त विद्याओं के अर्थ में पारंगत; तथा ब्रह्मचर्य और गुरुसेवा से युक्त।

श्लोक 43 (skanda.5.7.43)

वेदाध्ययनसंयुक्तो च भैक्षवृत्तिर्जितेंद्रियः। नित्यं सत्यव्रते युक्तः स्वधर्मे च प्रमोदवान्

vedādhyayanasaṁyukto ca bhaikṣavṛttirjiteṁdriyaḥ| nityaṁ satyavrate yuktaḥ svadharme ca pramodavān

वेदाध्ययन में लगा हुआ, भिक्षावृत्ति से जीवन यापन करने वाला, जितेन्द्रिय; सत्यव्रत में सदा तत्पर तथा अपने धर्म में आनन्दित।

श्लोक 44 (skanda.5.7.44)

मृतः काले समृद्धेन सर्वभोगावलंबिना। सूर्येणेव द्वितीयेन विमानेन विचारितः

mṛtaḥ kāle samṛddhena sarvabhogāvalaṁbinā| sūryeṇeva dvitīyena vimānena vicāritaḥ

समृद्धिशाली, समस्त भोगों से युक्त, मानो द्वितीय सूर्य के समान विमान द्वारा, उचित काल में मरकर वह ऊपर उठाया जाता है...

श्लोक 45 (skanda.5.7.45)

गुह्यकोनाम रुद्रस्य गणः परमसंमतः। अप्रमेयबलैश्वर्यो देवदानवपूजितः

guhyakonāma rudrasya gaṇaḥ paramasaṁmataḥ| aprameyabalaiśvaryo devadānavapūjitaḥ

...वह रुद्र का गुह्यक नामक अत्यन्त सम्मानित गण बन जाता है, जो अपरिमित बल-ऐश्वर्य से युक्त तथा देव-दानवों द्वारा पूजित है।

श्लोक 46 (skanda.5.7.46)

तेषां च समतां याति तुल्यैश्वर्यसमन्वितः। देवदानवमर्त्येषु स च पूज्यतमो भवेत

teṣāṁ ca samatāṁ yāti tulyaiśvaryasamanvitaḥ| devadānavamartyeṣu sa ca pūjyatamo bhaveta

वह उनके समान हो जाता है, समान ऐश्वर्य से युक्त होकर; देव, दानव और मनुष्यों में वह परम पूज्य हो जाता है।

श्लोक 47 (skanda.5.7.47)

वर्षकोटिसहस्राणि वर्षकोटिशतानि च। ऐवमैश्वर्यसंयुक्तो रुद्रलोके महीयते

varṣakoṭisahasrāṇi varṣakoṭiśatāni ca| aivamaiśvaryasaṁyukto rudraloke mahīyate

हजारों करोड़ वर्षों तथा सैकड़ों करोड़ वर्षों तक, इस प्रकार ऐश्वर्ययुक्त होकर वह रुद्रलोक में सम्मानित रहता है।

श्लोक 48 (skanda.5.7.48)

वसित्वासौ विभूत्या वै यदा च च्यवते नरः। रुद्रलोकाच्च्युतो भूमौ वसते नात्र संशयः

vasitvāsau vibhūtyā vai yadā ca cyavate naraḥ| rudralokāccyuto bhūmau vasate nātra saṁśayaḥ

वहाँ इस वैभव के साथ निवास करने के पश्चात्, जब वह मनुष्य च्युत होता है, तो रुद्रलोक से च्युत होकर निःसंदेह पृथ्वी पर निवास करता है।

श्लोक 49 (skanda.5.7.49)

महाकालवने क्षेत्रे ब्रह्मचर्याश्रमे स्थितः। महेश्वरपरो नित्यं वसेद्वाऽथ म्रियेत वा

mahākālavane kṣetre brahmacaryāśrame sthitaḥ| maheśvaraparo nityaṁ vasedvā'tha mriyeta vā

जो महाकालवन क्षेत्र में ब्रह्मचर्याश्रम में स्थित रहकर सदा महेश्वरपरायण रहता है, चाहे वह वहाँ निवास करे या मृत्यु को प्राप्त हो...

श्लोक 50 (skanda.5.7.50)

मृतोऽसौ याति दिव्ये वै विमाने सूर्यवर्चसि। पूर्णचंद्रप्रकाशो वै शशिवत्प्रियदर्शनः

mṛto'sau yāti divye vai vimāne sūryavarcasi| pūrṇacaṁdraprakāśo vai śaśivatpriyadarśanaḥ

...यदि वह मरता है, तो सूर्य के समान तेजस्वी दिव्य विमान द्वारा जाता है; पूर्णचन्द्र के समान प्रकाशमान तथा चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन।

श्लोक 51 (skanda.5.7.51)

रुद्रलोकं समासाद्य गुह्यकैः सह मोदते। ऐश्वर्यं च महद्भुंक्ते सर्वस्य जगतः प्रभुः

rudralokaṁ samāsādya guhyakaiḥ saha modate| aiśvaryaṁ ca mahadbhuṁkte sarvasya jagataḥ prabhuḥ

रुद्रलोक को प्राप्त कर वह गुह्यकों के साथ आनन्दित होता है; वह समस्त जगत् के स्वामी के समान महान् ऐश्वर्य भोगता है।

श्लोक 52 (skanda.5.7.52)

भुक्त्वा युगसहस्राणि रुद्रलोके महीयते। प्रच्युतस्तु पुनस्तस्माद्रुद्रलोकात्क्रमेण तु

bhuktvā yugasahasrāṇi rudraloke mahīyate| pracyutastu punastasmādrudralokātkrameṇa tu

सहस्र युगों तक भोग करके वह रुद्रलोक में सम्मानित रहता है; तत्पश्चात् उस रुद्रलोक से पुनः च्युत होकर क्रमशः...

श्लोक 53 (skanda.5.7.53)

नित्यं प्रमुदितस्तत्र भुक्त्वा लोकमनामयम्। द्विजानां साधने नित्यं कुले महति जायते

nityaṁ pramuditastatra bhuktvā lokamanāmayam| dvijānāṁ sādhane nityaṁ kule mahati jāyate

...वहाँ नित्य आनन्दित रहते हुए निरामय लोक का भोग करके, वह पुनः द्विजों की महान् साधनसम्पन्न कुल में जन्म लेता है।

श्लोक 54 (skanda.5.7.54)

मानवेषु च धर्मेषु वसेद्भूयांश्च रूपवान्। स्पृहणीयवपुः स्त्रीणां महाभोगपतिर्भवेत्

mānaveṣu ca dharmeṣu vasedbhūyāṁśca rūpavān| spṛhaṇīyavapuḥ strīṇāṁ mahābhogapatirbhavet

वह धर्मपरायण मनुष्यों में निवास करता है, और अधिक रूपवान् होकर, स्त्रियों द्वारा वांछित देहवाला, महाभोग का स्वामी बन जाता है।

श्लोक 55 (skanda.5.7.55)

वानप्रस्थसमाचारो वनौषधिविवर्जितः। शीर्णपर्णसमाहारः फलपुष्पांबुभोजनः

vānaprasthasamācāro vanauṣadhivivarjitaḥ| śīrṇaparṇasamāhāraḥ phalapuṣpāṁbubhojanaḥ

जो वानप्रस्थ के आचार का पालन करता है, वनौषधि का त्याग करता है, केवल गिरे हुए पत्तों का संग्रह करता है, तथा फल-फूल-जल का भोजन करता है...

श्लोक 56 (skanda.5.7.56)

कणाशनोऽश्मकुट्टो वा दंतोलूखलकोऽथ वा। येन केनाप्युपायेन जीर्णवल्कलधारकः

kaṇāśano'śmakuṭṭo vā daṁtolūkhalako'tha vā| yena kenāpyupāyena jīrṇavalkaladhārakaḥ

...कण खाने वाला, अथवा पत्थर से कूटने वाला, अथवा दाँतों को ही ओखली बनाने वाला; किसी भी उपाय से जीर्ण वल्कल धारण करने वाला...

श्लोक 57 (skanda.5.7.57)

जटी त्रिषवणस्नायी मुक्तकेशः सुदंडवान्। जलशायी पंचतपा वर्षास्वभ्रावकाशकः

jaṭī triṣavaṇasnāyī muktakeśaḥ sudaṁḍavān| jalaśāyī paṁcatapā varṣāsvabhrāvakāśakaḥ

...जटाधारी, तीनों संध्याओं में स्नान करने वाला, केश खुले रखने वाला, दण्डधारी; जलशायी, पंचाग्नितप, वर्षाकाल में खुले आकाश के नीचे रहने वाला...

श्लोक 58 (skanda.5.7.58)

कीटकंटकपाषाणभूम्यां तु शयनं तथा। स्थानं वीरासनरतः संविभागी दृढबतः

kīṭakaṁṭakapāṣāṇabhūmyāṁ tu śayanaṁ tathā| sthānaṁ vīrāsanarataḥ saṁvibhāgī dṛḍhabataḥ

...कीट-कण्टक-पाषाणों से युक्त भूमि पर शयन करने वाला; वीरासन में रत, बाँटकर भोजन करने वाला, दृढ़व्रती।

श्लोक 59 (skanda.5.7.59)

अरण्यौषधिभोक्ता च सर्वभूताभयप्रदः। नित्यं धर्मपरो मौनी जितक्रोधो जितेंद्रियः

araṇyauṣadhibhoktā ca sarvabhūtābhayapradaḥ| nityaṁ dharmaparo maunī jitakrodho jiteṁdriyaḥ

अरण्य की औषधियों से जीवन यापन करने वाला, समस्त प्राणियों को अभयदान देने वाला; सदा धर्मपरायण, मौनी, क्रोधविजयी, जितेन्द्रिय...

श्लोक 60 (skanda.5.7.60)

रुद्रभक्तः क्षेत्रवासी महाकालवने मुनिः। सर्वसंगपरित्यागी स्वारामो विगतस्पृहः

rudrabhaktaḥ kṣetravāsī mahākālavane muniḥ| sarvasaṁgaparityāgī svārāmo vigataspṛhaḥ

...रुद्रभक्त, क्षेत्रवासी, महाकालवन में रहने वाला मुनि; सर्वसंगत्यागी, स्वारामी, स्पृहारहित।

श्लोक 61 (skanda.5.7.61)

यश्चात्र वसते व्यास शृणु तस्य हि या गतिः। तरुणार्कप्रदीप्तेन वेदिकास्तंभशोभिना

yaścātra vasate vyāsa śṛṇu tasya hi yā gatiḥ| taruṇārkapradīptena vedikāstaṁbhaśobhinā

और हे व्यास, जो यहाँ निवास करता है, अब उसकी जो गति है, वह सुनो: उदीयमान सूर्य के समान देदीप्यमान, वेदी के स्तम्भों से सुशोभित विमान द्वारा...

श्लोक 62 (skanda.5.7.62)

रुद्रभक्तो विमानेन याति कामप्रचारिणा। विराजमानो नभसि द्वितीय इव चंद्रमाः

rudrabhakto vimānena yāti kāmapracāriṇā| virājamāno nabhasi dvitīya iva caṁdramāḥ

...रुद्रभक्त इच्छानुसार विचरण करने वाले उस विमान से जाता है, आकाश में द्वितीय चन्द्रमा के समान विराजमान होकर।

श्लोक 63 (skanda.5.7.63)

गीतवादित्रशब्देन संवृतोऽप्सरसां गणै। वर्षकोटिशतं साग्रं रुद्रलोके महीयते

gītavāditraśabdena saṁvṛto'psarasāṁ gaṇai| varṣakoṭiśataṁ sāgraṁ rudraloke mahīyate

गीत-वाद्य की ध्वनि से युक्त, अप्सराओं के समूहों से घिरा हुआ, वह पूरे सौ करोड़ वर्षों तक रुद्रलोक में सम्मानित रहता है।

श्लोक 64 (skanda.5.7.64)

रुद्रलोकाच्च्युतश्चापि विष्णुलोके महीयते। विष्णुलोकात्परिभ्रष्टो ब्रह्मलोकं स गच्छति

rudralokāccyutaścāpi viṣṇuloke mahīyate| viṣṇulokātparibhraṣṭo brahmalokaṁ sa gacchati

रुद्रलोक से च्युत होकर भी वह विष्णुलोक में सम्मानित रहता है; विष्णुलोक से भ्रष्ट होकर वह ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 65 (skanda.5.7.65)

तस्मादपि च्युतः स्थानाद्द्वीपेषु स हि जायते। स्वर्गषु च तथान्येषु भोगान्भुंक्ते यथेच्छया

tasmādapi cyutaḥ sthānāddvīpeṣu sa hi jāyate| svargaṣu ca tathānyeṣu bhogānbhuṁkte yathecchayā

उस स्थान से भी च्युत होकर वह द्वीपों में जन्म लेता है; तथा स्वर्गों और अन्यत्र भी वह इच्छानुसार भोग भोगता है।

श्लोक 66 (skanda.5.7.66)

भुक्तैश्वर्यो नरस्तेषु मर्त्यामर्त्येषु जायते। राजा वा राजतुल्यो वा जायते धनवान्सुखी। सुरूपः सुभगः कांतः कीर्तिमान्रुद्रभावितः

bhuktaiśvaryo narasteṣu martyāmartyeṣu jāyate| rājā vā rājatulyo vā jāyate dhanavānsukhī| surūpaḥ subhagaḥ kāṁtaḥ kīrtimānrudrabhāvitaḥ

उन लोकों में ऐश्वर्य भोगकर वह मनुष्य मर्त्य अथवा अमर्त्यों में जन्म लेता है; वह राजा या राजतुल्य होकर धनवान्, सुखी, सुरूप, सुभग, कान्त, कीर्तिमान् तथा रुद्रभावित होता है।

श्लोक 67 (skanda.5.7.67)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा क्षेत्रवासिनः। स्वधर्मनिरता व्यास स्वभृत्या चारजीविनः

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrā vā kṣetravāsinaḥ| svadharmaniratā vyāsa svabhṛtyā cārajīvinaḥ

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र, हे व्यास, जो क्षेत्रवासी अपने-अपने स्वधर्म में रत हैं, चाहे वे स्वयं के सेवक हों या दूत के रूप में जीविका चलाने वाले...

श्लोक 68 (skanda.5.7.68)

सर्वात्मना रुद्रभक्ता भूतानुग्रहकारिणः। महाकालवने क्षेत्रे ये वसंति मुमुक्षवः

sarvātmanā rudrabhaktā bhūtānugrahakāriṇaḥ| mahākālavane kṣetre ye vasaṁti mumukṣavaḥ

...सर्वात्मना रुद्रभक्त, समस्त प्राणियों पर अनुग्रह करने वाले, जो मुमुक्षु होकर महाकालवन क्षेत्र में निवास करते हैं...

श्लोक 69 (skanda.5.7.69)

मृतास्ते रुद्रभवने विमानैर्यांति शोभनैः। अप्सरोगणसंयुक्तैः कामगैः कामरूपिभिः

mṛtāste rudrabhavane vimānairyāṁti śobhanaiḥ| apsarogaṇasaṁyuktaiḥ kāmagaiḥ kāmarūpibhiḥ

...मरने पर वे रुद्रभवन को शोभनीय विमानों द्वारा जाते हैं, जो अप्सरागणों से युक्त तथा इच्छानुसार गमन और रूपधारण करने वाले हैं।

श्लोक 70 (skanda.5.7.70)

अथवा संविदग्नौ च शरीरं विजुहोति यः। रुद्रध्यायी महासत्त्वः स रुद्र भवने वसेत्

athavā saṁvidagnau ca śarīraṁ vijuhoti yaḥ| rudradhyāyī mahāsattvaḥ sa rudra bhavane vaset

अथवा जो संविदग्नि में अपने शरीर की आहुति देता है, वह रुद्रध्यानी महासत्त्व रुद्रभवन में निवास करता है।

श्लोक 71 (skanda.5.7.71)

रुद्रलोकोऽक्षयस्तेषां शाश्वतो गुह्यकैः सह। सर्वलोकोत्तमो रम्यो भवतीष्टार्थसाधकः

rudraloko'kṣayasteṣāṁ śāśvato guhyakaiḥ saha| sarvalokottamo ramyo bhavatīṣṭārthasādhakaḥ

उनका रुद्रलोक गुह्यकों सहित अक्षय और शाश्वत है; समस्त लोकों में उत्तम, रम्य तथा समस्त इष्ट अर्थों को सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 72 (skanda.5.7.72)

ये त्यजंति महाकाले प्राणान नशनैर्नराः। तेषामप्यक्षयो व्यास रुद्रलोको महात्मनाम्

ye tyajaṁti mahākāle prāṇāna naśanairnarāḥ| teṣāmapyakṣayo vyāsa rudraloko mahātmanām

जो मनुष्य महाकाल में उपवास द्वारा प्राणों का त्याग करते हैं, हे व्यास, उन महात्माओं का रुद्रलोक भी अक्षय होता है।

श्लोक 73 (skanda.5.7.73)

सांख्याः स्तुवंति ते रुद्रं सर्वदुःखविवर्जिताः। सर्वामरयुतं देवं नंदिदेवगणैर्युतम्। अनाशकमृताः शूद्रा महाकालवने नराः

sāṁkhyāḥ stuvaṁti te rudraṁ sarvaduḥkhavivarjitāḥ| sarvāmarayutaṁ devaṁ naṁdidevagaṇairyutam| anāśakamṛtāḥ śūdrā mahākālavane narāḥ

सांख्यवादी जन उन रुद्र की स्तुति करते हैं, जो सर्वदुःखरहित, समस्त देवताओं सहित तथा नन्दी आदि देवगणों से युक्त हैं; और महाकालवन में अनशन से मरने वाले शूद्र मनुष्य भी...

श्लोक 74 (skanda.5.7.74)

सिंहयुक्तैस्तु ते यांति विमानैरर्कसन्निभैः

siṁhayuktaistu te yāṁti vimānairarkasannibhaiḥ

...वे सिंहयुक्त, सूर्य के समान तेजस्वी विमानों द्वारा जाते हैं।

श्लोक 75 (skanda.5.7.75)

नानावर्णसुवर्णाढ्यैर्हृष्टगंधाधिवा सितैः। अनौपम्यगुणै रम्यैरप्सरोगीतवादिभिः

nānāvarṇasuvarṇāḍhyairhṛṣṭagaṁdhādhivā sitaiḥ| anaupamyaguṇai ramyairapsarogītavādibhiḥ

नाना वर्णों और सुवर्ण से समृद्ध, हर्षजनक सुगन्ध से युक्त, अनुपम गुणों वाले, रम्य, अप्सराओं के गीत-वाद्य से सुशोभित...

श्लोक 76 (skanda.5.7.76)

पताकाध्वजविन्यस्तैर्नानाघंटानिनादितैः। सुप्रभैर्गुणसंपन्नैर्मयूरवरचारिभिः

patākādhvajavinyastairnānāghaṁṭānināditaiḥ| suprabhairguṇasaṁpannairmayūravaracāribhiḥ

...पताका-ध्वजों से सुसज्जित, नाना घण्टियों की ध्वनि से गुंजायमान, सुप्रभायुक्त, गुणसम्पन्न, तथा मयूर के समान श्रेष्ठ गति वाले।

श्लोक 77 (skanda.5.7.77)

रुद्रलोके नरा धीराः सर्वे चानशनैर्मृताः। तत्रोषित्वा चिरं कालं भोगान्भुक्त्वा यथेप्सितान्। धनी विप्रकुले भोगी जायते मर्त्यमागतः

rudraloke narā dhīrāḥ sarve cānaśanairmṛtāḥ| tatroṣitvā ciraṁ kālaṁ bhogānbhuktvā yathepsitān| dhanī viprakule bhogī jāyate martyamāgataḥ

रुद्रलोक में वे सभी धीर पुरुष, जो अनशन से मरे थे, वहाँ दीर्घकाल तक निवास कर इच्छानुसार भोग भोगकर, मृत्युलोक में लौटने पर धनी, भोगसम्पन्न, विप्रकुल में उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 78 (skanda.5.7.78)

करीषं साधयेद्यस्तु महाकालवने नरः। सर्वभोगविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति

karīṣaṁ sādhayedyastu mahākālavane naraḥ| sarvabhogavinirmukto rudralokaṁ sa gacchati

महाकालवन में जो मनुष्य करीष [गोबर के कण्डे] का संग्रह करता है, वह समस्त भोगों से मुक्त होकर रुद्रलोक को जाता है।

श्लोक 79 (skanda.5.7.79)

रुद्रलोके वसेत्तावद्यावत्कल्पक्षयो भवेत्

rudraloke vasettāvadyāvatkalpakṣayo bhavet

वह उतने समय तक रुद्रलोक में निवास करता है, जब तक कल्प का क्षय न हो जाए।

श्लोक 80 (skanda.5.7.80)

तत्र भुक्त्वा महाभोगानिह जातो महीपतिः। पृथिव्याः सकलायाश्च रूपवान्सुभगो भवेत्

tatra bhuktvā mahābhogāniha jāto mahīpatiḥ| pṛthivyāḥ sakalāyāśca rūpavānsubhago bhavet

वहाँ महान् भोगों का उपभोग कर, यहाँ पुनः जन्म लेने पर वह पृथ्वीपति बनता है; सम्पूर्ण पृथ्वी में रूपवान् और सौभाग्यशाली होता है।

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