अवन्ती खण्ड · अध्याय 139
पिशाचेश्वर की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.139.1)
ईश्वर उवाच। अष्टषष्टिकसंख्याकं पिशाचाख्यमथेश्वरम्। शृणु देवि प्रयत्नेन दर्शनात्पापनाशनम्॥
īśvara uvāca| aṣṭaṣaṣṭikasaṁkhyākaṁ piśācākhyamatheśvaram| śṛṇu devi prayatnena darśanātpāpanāśanam||
ईश्वर ने कहा - हे देवी! अड़सठवें देवता का नाम पिशाच (पिशाचेश्वर) है; प्रयत्नपूर्वक सुनो, जिनके दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।
श्लोक 2 (skanda.5.139.2)
आदौ कलियुगे देवि शूद्रो बहुधनोऽभवत्। सोमो नाम सुविख्यातो नास्तिको वेदनिंदकः॥
ādau kaliyuge devi śūdro bahudhano'bhavat| somo nāma suvikhyāto nāstiko vedaniṁdakaḥ||
कलियुग के आरंभ में, हे देवी! एक शूद्र हुआ जो अत्यंत धनवान था; वह सोम नाम से सुविख्यात था, किंतु नास्तिक और वेदों की निंदा करने वाला था।
श्लोक 3 (skanda.5.139.3)
अब्रह्मण्यो नृशंसश्च कदर्यो निरपत्रपः। विश्वासघातकश्चैव परस्वहरणे रतः॥
abrahmaṇyo nṛśaṁsaśca kadaryo nirapatrapaḥ| viśvāsaghātakaścaiva parasvaharaṇe rataḥ||
वह ब्राह्मणद्रोही, क्रूर, कंजूस, निर्लज्ज, विश्वासघाती तथा सदा दूसरों का धन हरण करने में तत्पर था।
श्लोक 4 (skanda.5.139.4)
त्रिवर्गहंता चान्येषामात्मकामानुवर्त्तकः। स कदाचिन्मृतो देवि कष्टेन परमेण च॥
trivargahaṁtā cānyeṣāmātmakāmānuvarttakaḥ| sa kadācinmṛto devi kaṣṭena parameṇa ca||
वह त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का नाशक था, और सदा अपनी ही स्वार्थ कामनाओं का अनुसरण करता था। हे देवी! एक बार वह अत्यंत कष्ट सहते हुए मर गया।
श्लोक 5 (skanda.5.139.5)
मरुदेशे पिशाचोऽभून्नग्नो दीनो भयावहः। नाशकृत्स पिशाचानां स्वपक्षोच्छेदकारकः॥
marudeśe piśāco'bhūnnagno dīno bhayāvahaḥ| nāśakṛtsa piśācānāṁ svapakṣocchedakārakaḥ||
मरुभूमि में वह नग्न, दीन और भयावह पिशाच बना; वह पिशाचों का नाशक और अपने ही पक्ष का उच्छेद करने वाला बना।
श्लोक 6 (skanda.5.139.6)
बहवो मर्द्दितास्तेन पिशाचा बलवत्तराः॥
bahavo mardditāstena piśācā balavattarāḥ||
उस बलशाली पिशाच ने अनेक अधिक बलवान पिशाचों को भी कुचल डाला।
श्लोक 7 (skanda.5.139.7)
अथ तेनैव मार्गेण कदाचिच्छाकटायनः। स्वाध्यायनिरतो विद्वान्वाग्ग्मी शमपरायणः॥
atha tenaiva mārgeṇa kadācicchākaṭāyanaḥ| svādhyāyanirato vidvānvāggmī śamaparāyaṇaḥ||
एक बार उसी मार्ग से शाकटायन नामक विद्वान ब्राह्मण जा रहा था, जो स्वाध्याय में रत, वाक्पटु और शांतिपरायण था।
श्लोक 8 (skanda.5.139.8)
उदयादित्यसंकाशो विभावसुसमद्युतिः। शकटेन सदा याति स पश्यन्पर्वतात्मजे॥
udayādityasaṁkāśo vibhāvasusamadyutiḥ| śakaṭena sadā yāti sa paśyanparvatātmaje||
वह उदयकालीन सूर्य के समान तेजस्वी और अग्नि के समान कांतिमान था; हे पर्वतात्मजे! वह सदा बैलगाड़ी पर चढ़कर यात्रा करता था।
श्लोक 9 (skanda.5.139.9)
गतो ददर्श तं रौद्रं पिशाचं च भयावहम्। स पिशाचः क्षुधाविष्टो भोक्तुकामोऽभ्यधावत॥
gato dadarśa taṁ raudraṁ piśācaṁ ca bhayāvaham| sa piśācaḥ kṣudhāviṣṭo bhoktukāmo'bhyadhāvata||
जाते हुए उसने उस भयंकर, भयावह पिशाच को देखा; और भूख से व्याकुल वह पिशाच उसे खाने की इच्छा से उसकी ओर दौड़ा।
श्लोक 10 (skanda.5.139.10)
दृष्ट्वा तं शकटारूढं ब्राह्मणं शाकटायनम्। शकटस्य ध्वनिं श्रुत्वा रूपं दृष्ट्वा द्विजस्य च॥
dṛṣṭvā taṁ śakaṭārūḍhaṁ brāhmaṇaṁ śākaṭāyanam| śakaṭasya dhvaniṁ śrutvā rūpaṁ dṛṣṭvā dvijasya ca||
किंतु गाड़ी पर सवार उस ब्राह्मण शाकटायन को देखकर, तथा गाड़ी की ध्वनि सुनकर और उस द्विज के रूप को देखकर -
श्लोक 11 (skanda.5.139.11)
तथारूपः पिशाचस्तु कर्णाभ्यां बधिरीकृतः। आत्मत्राणपरो भूत्वा नष्टः कष्टेन पार्वति। तं धावंतं समालोक्य पिशाचं ब्राह्मणोऽब्रवीत्॥
tathārūpaḥ piśācastu karṇābhyāṁ badhirīkṛtaḥ| ātmatrāṇaparo bhūtvā naṣṭaḥ kaṣṭena pārvati| taṁ dhāvaṁtaṁ samālokya piśācaṁ brāhmaṇo'bravīt||
- वैसा भयंकर रूप वाला वह पिशाच भी उस ध्वनि से जैसे बहरा हो गया; हे पार्वति! भयभीत होकर, आत्मरक्षा में तत्पर हो वह बड़े कष्ट से भाग खड़ा हुआ। उस भागते हुए पिशाच को देखकर ब्राह्मण ने कहा -
श्लोक 12 (skanda.5.139.12)
पिशाच त्रस्तरूपोऽसि त्वरितश्चैव लक्ष्यसे। क्व धावसि समाचक्ष्व कुतस्ते भयमागतम्॥
piśāca trastarūpo'si tvaritaścaiva lakṣyase| kva dhāvasi samācakṣva kutaste bhayamāgatam||
'हे पिशाच! तुम भयभीत दिखाई देते हो, और शीघ्रता से भाग रहे हो; बताओ, कहां भाग रहे हो? तुम्हें भय किस कारण उत्पन्न हुआ?'
श्लोक 13 (skanda.5.139.13)
पिशाच उवाच। शकटस्यास्य महतो घोषं श्रुत्वा भयंकरम्। कर्णाभ्यां बधिरो जातो विसंज्ञस्तव दर्शनात्॥
piśāca uvāca| śakaṭasyāsya mahato ghoṣaṁ śrutvā bhayaṁkaram| karṇābhyāṁ badhiro jāto visaṁjñastava darśanāt||
पिशाच ने कहा - 'इस विशाल गाड़ी की भयंकर घरघराहट सुनकर मेरे दोनों कान बहरे हो गए हैं, और आपके दर्शन से मैं मूर्च्छित सा हो गया हूं।'
श्लोक 14 (skanda.5.139.14)
ब्राह्मण उवाच। पिशाचानां बलिष्ठाश्च श्रूयंते ब्रह्मराक्षसाः। स त्वं मां भोक्तुकामोऽसि विख्यातो ब्रह्मराक्षसः॥
brāhmaṇa uvāca| piśācānāṁ baliṣṭhāśca śrūyaṁte brahmarākṣasāḥ| sa tvaṁ māṁ bhoktukāmo'si vikhyāto brahmarākṣasaḥ||
ब्राह्मण ने कहा - 'पिशाचों में ब्रह्मराक्षस सबसे बलवान सुने जाते हैं; क्या तुम वही विख्यात ब्रह्मराक्षस हो, जो मुझे खाना चाहते हो?'
श्लोक 15 (skanda.5.139.15)
पिशाच उवाच। पिशाचानां समर्थोऽस्मि नष्टोऽहं तव दर्शनात्॥
piśāca uvāca| piśācānāṁ samartho'smi naṣṭo'haṁ tava darśanāt||
पिशाच ने कहा - 'मैं पिशाचों में समर्थ अवश्य हूं, किंतु आपके दर्शन मात्र से मेरी शक्ति नष्ट हो गई है।'
श्लोक 16 (skanda.5.139.16)
दुःखं हि मृत्युः सर्वेषां जीवितं च सुदुर्ल्लभम्। अतो भीतः पलायामि जीवहेतोः सुखार्थतः॥
duḥkhaṁ hi mṛtyuḥ sarveṣāṁ jīvitaṁ ca sudurllabham| ato bhītaḥ palāyāmi jīvahetoḥ sukhārthataḥ||
मृत्यु सबके लिए दुःखदायी है, और जीवन पाना अत्यंत दुर्लभ है; इसीलिए भयभीत होकर मैं अपने जीवन की रक्षा और सुख की कामना से भाग रहा हूं।
श्लोक 17 (skanda.5.139.17)
ब्राह्मण उवाच। कुतः पिशाच सौख्यं ते मरणं श्रेय एव ते। पैशाची कुत्सिता योनिः पापिनामेव जायते॥
brāhmaṇa uvāca| kutaḥ piśāca saukhyaṁ te maraṇaṁ śreya eva te| paiśācī kutsitā yoniḥ pāpināmeva jāyate||
ब्राह्मण ने कहा - 'हे पिशाच! तुम्हें सुख कहां से प्राप्त होगा? तुम्हारे लिए तो मृत्यु ही श्रेयस्कर है। यह निंदित पैशाची योनि तो केवल पापियों को ही प्राप्त होती है।'
श्लोक 18 (skanda.5.139.18)
पिशाच उवाच। सर्वत्र हि गतो जीवो भवत्येव सुखाश्रयः। तस्माज्जीवितुमिच्छामि प्रसीद ब्रह्मराक्षस॥
piśāca uvāca| sarvatra hi gato jīvo bhavatyeva sukhāśrayaḥ| tasmājjīvitumicchāmi prasīda brahmarākṣasa||
पिशाच ने कहा - 'जीव जहां भी जाता है, वहीं उसे सुख का कुछ न कुछ आश्रय मिल ही जाता है; इसीलिए मैं जीवित रहना चाहता हूं। हे ब्रह्मराक्षस! मुझ पर प्रसन्न हों।'
श्लोक 19 (skanda.5.139.19)
ब्राह्मण उवाच। नाहं त्वां भोक्तुकामोऽस्मि ब्राह्मणोऽहं न राक्षसः। सर्वभूतहितार्थाय विचरामि महीतले॥
brāhmaṇa uvāca| nāhaṁ tvāṁ bhoktukāmo'smi brāhmaṇo'haṁ na rākṣasaḥ| sarvabhūtahitārthāya vicarāmi mahītale||
ब्राह्मण ने कहा - 'मैं तुम्हें खाना नहीं चाहता, मैं ब्राह्मण हूं, राक्षस नहीं; मैं तो समस्त प्राणियों के हित के लिए पृथ्वी पर विचरण करता हूं।'
श्लोक 20 (skanda.5.139.20)
सर्वेषामेव जंतूनां मैत्रो ब्राह्मण उच्यते। मा कुरुष्व भयं मत्तो मित्रभावगतो ह्यहम्॥
sarveṣāmeva jaṁtūnāṁ maitro brāhmaṇa ucyate| mā kuruṣva bhayaṁ matto mitrabhāvagato hyaham||
'ब्राह्मण को सभी प्राणियों का मित्र कहा जाता है; अतः तुम मुझसे भय मत करो, क्योंकि मैं मित्रभाव से ही तुम्हारे प्रति स्थित हूं।'
श्लोक 21 (skanda.5.139.21)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पिशाचः स्वस्थमानसः। प्रणम्य प्रत्युवाचेदं ब्राह्मणं शाकटायनम्॥
tasya tadvacanaṁ śrutvā piśācaḥ svasthamānasaḥ| praṇamya pratyuvācedaṁ brāhmaṇaṁ śākaṭāyanam||
उसका यह वचन सुनकर पिशाच का मन स्वस्थ हो गया; प्रणाम करके उसने शाकटायन ब्राह्मण को इस प्रकार उत्तर दिया -
श्लोक 22 (skanda.5.139.22)
यदि ते सर्वभूतानां दत्ता ह्यभयदक्षिणा। कर्मणा मनसा वाचा मित्रभावं गतो यदि॥
yadi te sarvabhūtānāṁ dattā hyabhayadakṣiṇā| karmaṇā manasā vācā mitrabhāvaṁ gato yadi||
- 'यदि आपने सचमुच समस्त प्राणियों को अभयदान रूपी दक्षिणा दी है, और कर्म, मन तथा वाणी से सबके प्रति मित्रभाव धारण किया है -'
श्लोक 23 (skanda.5.139.23)
पृच्छामि त्वां महाभाग संशयो हृदये स्थितः। श्रुत्वानुकंपया सम्यक्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥
pṛcchāmi tvāṁ mahābhāga saṁśayo hṛdaye sthitaḥ| śrutvānukaṁpayā samyaktanme vyākhyātumarhasi||
'- हे महाभाग! तो मैं आपसे पूछता हूं, मेरे हृदय में एक संशय स्थित है; कृपापूर्वक सुनकर आप उसे मुझे भलीभांति समझाने की कृपा करें।'
श्लोक 24 (skanda.5.139.24)
केन कर्मविपाकेन पैशाचं याति मानवः। पिशाचत्वात्कथं मुक्तिः प्राप्यते पापकर्मभिः॥
kena karmavipākena paiśācaṁ yāti mānavaḥ| piśācatvātkathaṁ muktiḥ prāpyate pāpakarmabhiḥ||
'किस कर्म के फलस्वरूप मनुष्य पिशाच योनि को प्राप्त होता है? और पापकर्मी मनुष्य पिशाचत्व से मुक्ति कैसे पाता है?'
श्लोक 25 (skanda.5.139.25)
इति तस्य वचः श्रुत्वा पिशाचस्य वरानने। ममत्वेनावृतस्तस्मै प्रावोचच्छाकटायनः॥
iti tasya vacaḥ śrutvā piśācasya varānane| mamatvenāvṛtastasmai prāvocacchākaṭāyanaḥ||
हे वरानने! पिशाच के इस वचन को सुनकर, ममता (करुणा) से भरे हुए शाकटायन ने उसे उत्तर दिया -
श्लोक 26 (skanda.5.139.26)
अपहृत्य च विप्रस्वं देवस्वं च विशेषतः। तेन पापेन पापिष्ठाः पिशाचत्वं प्रयांति च॥
apahṛtya ca viprasvaṁ devasvaṁ ca viśeṣataḥ| tena pāpena pāpiṣṭhāḥ piśācatvaṁ prayāṁti ca||
- 'ब्राह्मणों के धन का, और विशेष रूप से देवताओं की संपत्ति का हरण करके, उस पाप के कारण अत्यंत पापी लोग पिशाच योनि को प्राप्त होते हैं।'
श्लोक 27 (skanda.5.139.27)
पितरं मातरं चैव स्त्रियं बालं द्विजं तथा। वंचयित्वा हरत्यर्थं स पिशाचो भवेन्नरः॥
pitaraṁ mātaraṁ caiva striyaṁ bālaṁ dvijaṁ tathā| vaṁcayitvā haratyarthaṁ sa piśāco bhavennaraḥ||
'जो मनुष्य पिता, माता, स्त्री, बालक अथवा ब्राह्मण को धोखा देकर उनका धन हर लेता है, वह मरने के बाद पिशाच बनता है।'
श्लोक 28 (skanda.5.139.28)
राजद्रव्यं गृहीत्वा तु न यजेन्न ददाति यः। आत्मानमेव पुष्णाति पिशाचत्वं स गच्छति॥
rājadravyaṁ gṛhītvā tu na yajenna dadāti yaḥ| ātmānameva puṣṇāti piśācatvaṁ sa gacchati||
'जो राजा का धन ग्रहण करके न यज्ञ करता है, न दान देता है, और केवल अपने ही स्वार्थ का पोषण करता है, वह पिशाचत्व को प्राप्त होता है।'
श्लोक 29 (skanda.5.139.29)
विश्वासघातका ये च परदाररताश्च ये। प्राप्नुवंति पिशाचत्वं तथा ये वेदनिंदकाः॥
viśvāsaghātakā ye ca paradāraratāśca ye| prāpnuvaṁti piśācatvaṁ tathā ye vedaniṁdakāḥ||
'जो विश्वासघाती हैं, जो परस्त्रीगामी हैं, और जो वेदों की निंदा करते हैं, वे सब पिशाचत्व को प्राप्त होते हैं।'
श्लोक 30 (skanda.5.139.30)
निंदंति ये पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वदा। ते भवंति पिशाचाश्च ये सदा पिशुना नराः॥
niṁdaṁti ye purāṇāni dharmaśāstrāṇi sarvadā| te bhavaṁti piśācāśca ye sadā piśunā narāḥ||
'जो सदा पुराणों तथा धर्मशास्त्रों की निंदा करते हैं, और जो सदा चुगलखोर होते हैं, वे मनुष्य भी पिशाच बनते हैं।'
श्लोक 31 (skanda.5.139.31)
इति ते कथितं सर्वं वेदप्रामाण्यतोऽधुना। इदानीं कथयिष्यामि यस्त्वं जातोसि तच्छृणु॥
iti te kathitaṁ sarvaṁ vedaprāmāṇyato'dhunā| idānīṁ kathayiṣyāmi yastvaṁ jātosi tacchṛṇu||
'इस प्रकार वेद के प्रमाण से मैंने तुम्हें यह सब बताया है; अब मैं यह बताता हूं कि तुम किस कारण जन्मे हो, वह सुनो।'
श्लोक 32 (skanda.5.139.32)
सोमको नाम शूद्रस्त्वं परमर्मप्रकाशकः। विश्वासघातको जातो देवब्राह्मणदूषकः॥
somako nāma śūdrastvaṁ paramarmaprakāśakaḥ| viśvāsaghātako jāto devabrāhmaṇadūṣakaḥ||
'तुम पूर्वजन्म में सोमक नामक शूद्र थे, जो दूसरों के गुप्त भेद प्रकट करने वाला, विश्वासघाती तथा देवताओं और ब्राह्मणों को दूषित करने वाला था।
श्लोक 33 (skanda.5.139.33)
नास्तिको भिन्नमर्यादो जन्मन्यत्रापि सप्तमे। सकुलं पातयित्वात्र नरके दारुणे भृशम्॥
nāstiko bhinnamaryādo janmanyatrāpi saptame| sakulaṁ pātayitvātra narake dāruṇe bhṛśam||
तुम नास्तिक और मर्यादाभंजक थे, इस सातवें जन्म में भी वैसे ही रहे। अपने संपूर्ण कुल को अत्यंत भयंकर नरक में गिराकर -'
श्लोक 34 (skanda.5.139.34)
पिशाचयोनिं संप्राप्तः पुनः प्राप्स्यसि रौरवम्। महारौरवसंज्ञं तु क्रकचं कालसूत्रकम्। यंत्रपीडनकं रौद्रं मथनं कुम्भवालुकम्॥
piśācayoniṁ saṁprāptaḥ punaḥ prāpsyasi rauravam| mahārauravasaṁjñaṁ tu krakacaṁ kālasūtrakam| yaṁtrapīḍanakaṁ raudraṁ mathanaṁ kumbhavālukam||
'- तुम पिशाच योनि को प्राप्त हुए, और अब पुनः रौरव, महारौरव नामक, क्रकच (आरे का), कालसूत्रक, यंत्र में पीले जाने वाले भयंकर, मथन तथा कुंभीपाक-वालुका नामक नरकों को भी प्राप्त करोगे।'
श्लोक 35 (skanda.5.139.35)
इत्येवं वदतस्तस्य ब्राह्मणस्य यशस्विनि। सस्मार प्राक्तनं जन्म सत्संगात्कुत्सितं स्वकम्॥
ityevaṁ vadatastasya brāhmaṇasya yaśasvini| sasmāra prāktanaṁ janma satsaṁgātkutsitaṁ svakam||
हे यशस्विनि! उस ब्राह्मण के इस प्रकार कहने पर, सत्संग के प्रभाव से उसे अपने पूर्वजन्म का वह निंदित स्वरूप स्मरण हो आया।
श्लोक 36 (skanda.5.139.36)
दुःखाभिभूतो निश्चेष्टो धिग्धिगित्यसकृद्ब्रुवन्। पतितो भूतले देवि इदं वाक्यमथाब्रवीत्॥
duḥkhābhibhūto niśceṣṭo dhigdhigityasakṛdbruvan| patito bhūtale devi idaṁ vākyamathābravīt||
हे देवी! दुःख से अभिभूत और निश्चेष्ट होकर वह बार-बार 'धिक्कार है, धिक्कार है' कहता हुआ भूमि पर गिर पड़ा, और फिर यह वचन कहने लगा -
श्लोक 37 (skanda.5.139.37)
अहो केनापि पुण्येन भवता सह दर्शनम्। जातं ममाल्पपुण्यस्य दीनस्य कृपणस्य च॥
aho kenāpi puṇyena bhavatā saha darśanam| jātaṁ mamālpapuṇyasya dīnasya kṛpaṇasya ca||
- 'अहो! किसी पुण्य के प्रभाव से ही मुझ अल्पपुण्य, दीन और कृपण को आपका दर्शन प्राप्त हुआ है।'
श्लोक 38 (skanda.5.139.38)
नास्ति धर्मसमं मित्रं नास्ति धर्मसमा गतिः। नास्ति धर्मसम्ं त्राणं स च नास्ति मम प्रभो॥
nāsti dharmasamaṁ mitraṁ nāsti dharmasamā gatiḥ| nāsti dharmasamṁ trāṇaṁ sa ca nāsti mama prabho||
'धर्म के समान कोई मित्र नहीं, धर्म के समान कोई गति नहीं, धर्म के समान कोई रक्षक नहीं है - और हे प्रभो! वह धर्म भी मेरे पास नहीं है।'
श्लोक 39 (skanda.5.139.39)
मग्नोऽहं दुःखजलधौ मग्नोऽहं पापकर्दमे। भ्रांतोऽहमंधतमसि ततस्त्वां शरणं गतः॥
magno'haṁ duḥkhajaladhau magno'haṁ pāpakardame| bhrāṁto'hamaṁdhatamasi tatastvāṁ śaraṇaṁ gataḥ||
'मैं दुःख के सागर में डूबा हुआ हूं, पाप के कीचड़ में डूबा हुआ हूं, और घोर अंधकार में भटक रहा हूं; इसीलिए मैं आपकी शरण में आया हूं।'
श्लोक 40 (skanda.5.139.40)
नमस्तेऽस्तु महाभाग किं करोमि प्रशाधि माम्। तत्तपोबलनिर्दिष्टमिदं प्राप्तं मयाऽधुना॥
namaste'stu mahābhāga kiṁ karomi praśādhi mām| tattapobalanirdiṣṭamidaṁ prāptaṁ mayā'dhunā||
'हे महाभाग! आपको नमस्कार है, मुझे बताइए मैं क्या करूं, मुझे आज्ञा दीजिए; अपने ही पूर्व तपोबल से निर्धारित यह दशा मुझे अब प्राप्त हुई है।'
श्लोक 41 (skanda.5.139.41)
एवं निगदतस्तस्य पिशाचस्य वरानने। कथयामास माहात्म्यं स विप्रः शाकटायनः॥
evaṁ nigadatastasya piśācasya varānane| kathayāmāsa māhātmyaṁ sa vipraḥ śākaṭāyanaḥ||
हे वरानने! उस पिशाच के इस प्रकार कहने पर, विप्र शाकटायन ने उसे यह माहात्म्य कह सुनाया -
श्लोक 42 (skanda.5.139.42)
पृथिव्यां यानि तीर्थानि आसमुद्रगतानि वै। क्षेत्राणि यानि संतीह तेषां क्षेत्रं सुपुण्यदम्॥
pṛthivyāṁ yāni tīrthāni āsamudragatāni vai| kṣetrāṇi yāni saṁtīha teṣāṁ kṣetraṁ supuṇyadam||
- 'पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं, समुद्रपर्यंत जितने भी क्षेत्र विद्यमान हैं, उन सबमें सर्वाधिक पुण्यदायक एक क्षेत्र है -'
श्लोक 43 (skanda.5.139.43)
महाकालवनं क्षेत्रं प्रलयेऽप्यक्षयं गतम्। लिंगं तत्र महाक्षेत्रे पिशाचत्वविनाशनम्॥
mahākālavanaṁ kṣetraṁ pralaye'pyakṣayaṁ gatam| liṁgaṁ tatra mahākṣetre piśācatvavināśanam||
'- वह है महाकालवन क्षेत्र, जो प्रलय काल में भी अक्षय रहता है; उस महाक्षेत्र में एक लिंग है, जो पिशाचत्व का विनाश करने वाला है।'
श्लोक 44 (skanda.5.139.44)
ढुंढेश्वरस्य देवस्य दक्षिणे त्रिदशार्चितम्। पैशाचं विद्यते भूयः पिशाचयोनिनाशनम्। तस्य दर्शनमात्रेण पिशाचत्वात्प्रमोक्ष्यसे॥
ḍhuṁḍheśvarasya devasya dakṣiṇe tridaśārcitam| paiśācaṁ vidyate bhūyaḥ piśācayonināśanam| tasya darśanamātreṇa piśācatvātpramokṣyase||
'ढुंढेश्वर देव के दक्षिण में देवताओं द्वारा पूजित वह पैशाच लिंग विद्यमान है, जो पिशाच योनि का नाश करने वाला है; उसके दर्शन मात्र से तुम पिशाचत्व से मुक्त हो जाओगे।'
श्लोक 45 (skanda.5.139.45)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स पिशाचो वरानने। आजगाम त्वरायुक्तो नमस्कृत्य द्विजं तदा॥
tasya tadvacanaṁ śrutvā sa piśāco varānane| ājagāma tvarāyukto namaskṛtya dvijaṁ tadā||
हे वरानने! उसका यह वचन सुनकर वह पिशाच उस द्विज को प्रणाम करके शीघ्रतापूर्वक वहां पहुंच गया।
श्लोक 46 (skanda.5.139.46)
महाकालवने पुण्ये समीहितफलप्रदे। ददर्श तत्र तल्लिंगं स्नात्वा शिप्राजले शुभे॥
mahākālavane puṇye samīhitaphalaprade| dadarśa tatra talliṁgaṁ snātvā śiprājale śubhe||
पुण्यमय, इच्छित फल देने वाले महाकालवन में पहुंचकर, शिप्रा के शुभ जल में स्नान करके उसने वहां उस लिंग के दर्शन किए।
श्लोक 47 (skanda.5.139.47)
दर्शनात्तस्य लिंगस्य स पिशाचो वरानने। तत्क्षणाद्दिव्यदेहस्तु दिव्याभरणभूषितः॥
darśanāttasya liṁgasya sa piśāco varānane| tatkṣaṇāddivyadehastu divyābharaṇabhūṣitaḥ||
हे वरानने! उस लिंग के दर्शन मात्र से वह पिशाच उसी क्षण दिव्य देह वाला हो गया, दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर -
श्लोक 48 (skanda.5.139.48)
दिव्यं विमानमारूढो गतो लोके सनातने। उद्धृत्य सकलं गोत्रं मातृकं पैतृकं तथा॥
divyaṁ vimānamārūḍho gato loke sanātane| uddhṛtya sakalaṁ gotraṁ mātṛkaṁ paitṛkaṁ tathā||
- वह दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर सनातन लोक को चला गया, और अपने संपूर्ण मातृ तथा पितृ गोत्र का भी उद्धार कर दिया।
श्लोक 49 (skanda.5.139.49)
दृष्ट्वा तन्महदाश्चर्यं माहात्म्यातिशयं श्रिये। प्रोक्तं देवैर्विमानस्थैः सिद्धैराकाशगैस्तथा॥
dṛṣṭvā tanmahadāścaryaṁ māhātmyātiśayaṁ śriye| proktaṁ devairvimānasthaiḥ siddhairākāśagaistathā||
उस महान आश्चर्य तथा अतिशय माहात्म्य को देखकर, विमानों में स्थित देवताओं ने तथा आकाशगामी सिद्धों ने यह कहा -
श्लोक 50 (skanda.5.139.50)
पिशाचोपि गतः स्वर्गमस्य लिंगस्य दर्शनात्। अतो देवः स विख्यातो भविष्यति महीतले। पिशाचेश्वरसंज्ञस्तु सर्वपापप्रणाशनः॥
piśācopi gataḥ svargamasya liṁgasya darśanāt| ato devaḥ sa vikhyāto bhaviṣyati mahītale| piśāceśvarasaṁjñastu sarvapāpapraṇāśanaḥ||
- 'यह पिशाच भी इस लिंग के दर्शन मात्र से स्वर्ग को प्राप्त हो गया; अतः यह देव पृथ्वी पर पिशाचेश्वर नाम से विख्यात होगा, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है।'
श्लोक 51 (skanda.5.139.51)
ये पश्यंति नरा देवि पिशाचेश्वरसंज्ञकम्। तेषां हि पितरः सद्यो ये चापि निरये स्थिताः। पिशाचत्वाद्विमुच्यंते स्वर्गं यांति न संशयः॥
ye paśyaṁti narā devi piśāceśvarasaṁjñakam| teṣāṁ hi pitaraḥ sadyo ye cāpi niraye sthitāḥ| piśācatvādvimucyaṁte svargaṁ yāṁti na saṁśayaḥ||
हे देवी! जो मनुष्य पिशाचेश्वर नामक इस लिंग के दर्शन करते हैं, उनके पितर - चाहे वे नरक में ही क्यों न पड़े हों - तत्काल पिशाचत्व से मुक्त हो जाते हैं और निःसंदेह स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 52 (skanda.5.139.52)
अश्वमेधस्य यज्ञस्य सम्यगिष्टस्य यत्फलम्। तत्फलं लभते सोऽपि पिशाचेश्वरदर्शनात्॥
aśvamedhasya yajñasya samyagiṣṭasya yatphalam| tatphalaṁ labhate so'pi piśāceśvaradarśanāt||
अश्वमेध यज्ञ को विधिपूर्वक संपन्न करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल पिशाचेश्वर के दर्शन से भी प्राप्त होता है।
श्लोक 53 (skanda.5.139.53)
गयायां पिंडदानेन यत्पुण्यं समुदाहृतम्। तत्पुण्यमधिकं ज्ञेयं पिशाचेश्वरदर्शनात्॥
gayāyāṁ piṁḍadānena yatpuṇyaṁ samudāhṛtam| tatpuṇyamadhikaṁ jñeyaṁ piśāceśvaradarśanāt||
गया में पिंडदान करने से जो पुण्य कहा गया है, पिशाचेश्वर के दर्शन से उससे भी अधिक पुण्य जानना चाहिए।
श्लोक 54 (skanda.5.139.54)
ये पश्यंति चतुर्दश्यां पिशाचेश्वरसंज्ञकम्। प्रेतत्वं च पिशाचत्वं कुले तेषां न जायते॥
ye paśyaṁti caturdaśyāṁ piśāceśvarasaṁjñakam| pretatvaṁ ca piśācatvaṁ kule teṣāṁ na jāyate||
जो लोग चतुर्दशी के दिन पिशाचेश्वर के दर्शन करते हैं, उनके कुल में न तो प्रेतत्व और न पिशाचत्व कभी उत्पन्न होता है।
श्लोक 55 (skanda.5.139.55)
न वियोनिं नरो याति नरकं च न पश्यति। प्रसंगेनापि यः पश्येत्पिशाचेश्वरसंज्ञकम्॥
na viyoniṁ naro yāti narakaṁ ca na paśyati| prasaṁgenāpi yaḥ paśyetpiśāceśvarasaṁjñakam||
जो मनुष्य प्रसंगवश भी पिशाचेश्वर नामक लिंग के दर्शन कर लेता है, वह कभी नीच योनि को प्राप्त नहीं होता और न ही नरक देखता है।
श्लोक 56 (skanda.5.139.56)
सर्वैश्वर्यसमायुक्तः सर्वबन्धुसमन्वितः। मोदते पितृलोके स पिशाचेश्वरदर्शनात्॥
sarvaiśvaryasamāyuktaḥ sarvabandhusamanvitaḥ| modate pitṛloke sa piśāceśvaradarśanāt||
पिशाचेश्वर के दर्शन से मनुष्य समस्त ऐश्वर्य से युक्त और समस्त बंधुजनों से घिरा हुआ पितृलोक में आनंदित रहता है।
श्लोक 57 (skanda.5.139.57)
कीर्तनान्मुच्यते पापाद्दृष्ट्वा स्वर्गं च गच्छति। स्पर्शनादस्य लिंगस्य पुनात्यासप्तमं कुलम्॥
kīrtanānmucyate pāpāddṛṣṭvā svargaṁ ca gacchati| sparśanādasya liṁgasya punātyāsaptamaṁ kulam||
इसके कीर्तन मात्र से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है, और दर्शन करने पर वह स्वर्ग को प्राप्त होता है; इस लिंग के स्पर्श से सात पीढ़ियों तक का कुल पवित्र हो जाता है।
श्लोक 58 (skanda.5.139.58)
तदैव स नरो मुक्तः संसारनिगडादिभिः। यदैव वीक्षते लिंगं पिशाचेश्वरसंज्ञकम्॥
tadaiva sa naro muktaḥ saṁsāranigaḍādibhiḥ| yadaiva vīkṣate liṁgaṁ piśāceśvarasaṁjñakam||
जिस क्षण मनुष्य पिशाचेश्वर नामक इस लिंग को देख लेता है, उसी क्षण वह संसार की बेड़ियों आदि से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 59 (skanda.5.139.59)
यज्ञानां तपसां चैव दानानां चैव यत्फलम्। तत्फलं कोटिगुणितं जायते तस्य दर्शनात्॥
yajñānāṁ tapasāṁ caiva dānānāṁ caiva yatphalam| tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ jāyate tasya darśanāt||
यज्ञों, तपस्याओं तथा दानों से जो फल प्राप्त होता है, उसके दर्शन से वही फल करोड़ गुना होकर प्राप्त होता है।
श्लोक 60 (skanda.5.139.60)
यदि पश्येच्चतुर्दश्यां वैशाखे कार्त्तिके तथा। तस्य पुण्यमसंख्यातं जायते नात्र संशयः॥
yadi paśyeccaturdaśyāṁ vaiśākhe kārttike tathā| tasya puṇyamasaṁkhyātaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ||
यदि कोई वैशाख अथवा कार्तिक मास की चतुर्दशी के दिन इसके दर्शन करे, तो उसे असंख्य पुण्य प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 61 (skanda.5.139.61)
एष ते कथितो देवि प्रभावः पापनाशनः। पिशाचेश्वरदेवस्य श्रूयतां संगमेश्वरम्॥
eṣa te kathito devi prabhāvaḥ pāpanāśanaḥ| piśāceśvaradevasya śrūyatāṁ saṁgameśvaram||
हे देवी! यह मैंने तुम्हें भगवान पिशाचेश्वर देव का पापनाशक प्रभाव बताया; अब संगमेश्वर के विषय में सुनो।