अवन्ती खण्ड · अध्याय 192
देव तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.192.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत राजेन्द्र देवतीर्थमनुत्तमम्। येन देवास्त्रयस्त्रिंशत्स्नात्वा सिद्धिं परां गताः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gaccheta rājendra devatīrthamanuttamam| yena devāstrayastriṁśatsnātvā siddhiṁ parāṁ gatāḥ
श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे राजेन्द्र! फिर उत्तम देव तीर्थ को जाना चाहिए, जिसमें स्नान कर तैंतीस कोटि देवता परम सिद्धि को प्राप्त हुए।
श्लोक 2 (skanda.5.192.2)
युधिष्ठिर उवाच। कथं तात सुराः सर्वे दानवैर्बलवत्तरैः। निर्जितास्तत्र तीर्थे च स्नात्वा सिद्धिं परां गताः
yudhiṣṭhira uvāca| kathaṁ tāta surāḥ sarve dānavairbalavattaraiḥ| nirjitāstatra tīrthe ca snātvā siddhiṁ parāṁ gatāḥ
युधिष्ठिर ने कहा — हे तात! अत्यन्त बलवान दानवों से पराजित हुए सभी देवगण किस प्रकार उस तीर्थ में स्नान कर परम सिद्धि को प्राप्त हुए?
श्लोक 3 (skanda.5.192.3)
मार्कण्डेय उवाच। पुरा दैत्यगणैरुग्रैर्युद्धेऽतिबलवत्तरैः। इन्द्रो देवगणैः सार्द्धं स्वराज्याच्च्यावितो नृप
mārkaṇḍeya uvāca| purā daityagaṇairugrairyuddhe'tibalavattaraiḥ| indro devagaṇaiḥ sārddhaṁ svarājyāccyāvito nṛpa
मार्कण्डेय ने कहा — हे राजन्! पूर्वकाल में युद्ध में अत्यन्त बलवान उग्र दैत्यगणों द्वारा इन्द्र अपने देवगणों सहित अपने राज्य से च्युत कर दिया गया।
श्लोक 4 (skanda.5.192.4)
हस्त्यश्वरथयानौघैर्मर्दयित्वा वरूथिनीम्। विध्वस्ता भेजिरे मार्गं प्रहारैर्जर्जरीकृताः
hastyaśvarathayānaughairmardayitvā varūthinīm| vidhvastā bhejire mārgaṁ prahāraiḥ jarjarīkṛtāḥ
हाथी, घोड़े, रथ और वाहनों के समूह से उनकी सेना को कुचलकर, आघातों से चूर-चूर होकर विध्वस्त देवगण मार्ग की ओर भाग गए।
श्लोक 5 (skanda.5.192.5)
जम्भशुम्भैश्च कूष्माण्डकुहकादिभिः। वेपमानार्दिताः सर्वे ब्रह्माणमुपतस्थिरे
jambhaśumbhaiśca kūṣmāṇḍakuhakādibhiḥ| vepamānārditāḥ sarve brahmāṇamupatasthire
जम्भ, शुम्भ, कूष्माण्ड, कुहक आदि दैत्यों से पीड़ित होकर काँपते हुए सभी देवगण ब्रह्मा की शरण में गए।
श्लोक 6 (skanda.5.192.6)
प्रणम्य शिरसा देवं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्। तदा विज्ञापयामासुर्देवा वह्निपुरोगमाः
praṇamya śirasā devaṁ brahmāṇaṁ parameṣṭhinam| tadā vijñāpayāmāsurdevā vahnipurogamāḥ
मस्तक झुकाकर परमेष्ठी देव ब्रह्मा को प्रणाम कर, अग्नि को आगे रखकर देवगणों ने तब यह निवेदन किया।
श्लोक 7 (skanda.5.192.7)
पश्य पश्य महाभाग दानवैः शकलीकृताः। वियोजिताः पुत्रदारैस्त्वामेव शरणं गताः
paśya paśya mahābhāga dānavaiḥ śakalīkṛtāḥ| viyojitāḥ putradāraistvāmeva śaraṇaṁ gatāḥ
हे महाभाग! देखिए, देखिए, हम दानवों द्वारा खण्ड-खण्ड कर दिए गए हैं, पुत्र-पत्नियों से बिछुड़ गए हैं, अतः हम आपकी ही शरण में आए हैं।
श्लोक 8 (skanda.5.192.8)
परित्रायस्व देवेश सर्वलोकपितामह। नान्या गतिः सुरेशान त्वां मुक्त्वा परमेश्वर
paritrāyasva deveśa sarvalokapitāmaha| nānyā gatiḥ sureśāna tvāṁ muktvā parameśvara
हे देवेश! हे सर्वलोकपितामह! हमारी रक्षा कीजिए। हे सुरेशान! हे परमेश्वर! आपके अतिरिक्त हमारी कोई अन्य गति नहीं है।
श्लोक 9 (skanda.5.192.9)
ब्रह्मोवाच। दानवानां विघातार्थं नर्मदातटमास्थिताः। तपः कुरुध्वं स्वस्थाः स्थ तपो हि परमं बलम्
brahmovāca| dānavānāṁ vighātārthaṁ narmadātaṭamāsthitāḥ| tapaḥ kurudhvaṁ svasthāḥ stha tapo hi paramaṁ balam
ब्रह्मा ने कहा — दानवों के नाश हेतु नर्मदा के तट पर स्थित होकर स्वस्थचित्त होकर तप करो, क्योंकि तप ही परम बल है।
श्लोक 10 (skanda.5.192.10)
नान्योपायो न वै मन्त्रो विद्यते न च मे क्रिया। विना रेवाजलं पुण्यं सर्वपापक्षयंकरम्
nānyopāyo na vai mantro vidyate na ca me kriyā| vinā revājalaṁ puṇyaṁ sarvapāpakṣayaṁkaram
पुण्य रेवा-जल के बिना, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है, न कोई अन्य उपाय है, न मन्त्र है, न ही मेरे पास कोई अन्य साधन है।
श्लोक 11 (skanda.5.192.11)
दारिद्र्यव्याधिमरणबन्धनव्यसनानि च। एतानि चैव पापस्य फलानीति मतिर्मम
dāridryavyādhimaraṇabandhanavyasanāni ca| etāni caiva pāpasya phalānīti matirmama
दरिद्रता, व्याधि, मृत्यु, बन्धन और व्यसन — ये सब पाप के ही फल हैं, यही मेरा मत है।
श्लोक 12 (skanda.5.192.12)
एवं ज्ञात्वा ततश्चैव तपः कुरुत दुष्करम्। तथा चैव सुराः सर्वे देवा ह्यग्निपुरोगमाः
evaṁ jñātvā tataścaiva tapaḥ kuruta duṣkaram| tathā caiva surāḥ sarve devā hyagnipurogamāḥ
यह जानकर तुम सभी दुष्कर तप करो; उसी प्रकार अग्नि को आगे रखकर सभी देवगण।
श्लोक 13 (skanda.5.192.13)
तच्छ्रुत्वा वचनं तथ्यं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः। नर्मदामागताः सर्वे देवा ह्यग्निपुरोगमाः
tacchrutvā vacanaṁ tathyaṁ brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ| narmadāmāgatāḥ sarve devā hyagnipurogamāḥ
परमेष्ठी ब्रह्मा के इस सत्य वचन को सुनकर अग्नि को आगे रखकर सभी देवगण नर्मदा के पास आए।
श्लोक 14 (skanda.5.192.14)
चेरुर्वै तत्र विपुलं तपः सिद्धिमवाप्नुवन्। तदाप्रभृति तत्तीर्थं देवतीर्थमनुत्तमम्
cerurvai tatra vipulaṁ tapaḥ siddhimavāpnuvan| tadāprabhṛti tattīrthaṁ devatīrthamanuttamam
वहाँ उन्होंने विपुल तप किया और सिद्धि प्राप्त की; और तभी से वह तीर्थ उत्तम देवतीर्थ कहलाया।
श्लोक 15 (skanda.5.192.15)
गीयते त्रिषु लोकेषु सर्वपापक्षयंकरम्। तत्र गत्वा च यो मर्त्यो विधिना संयतेन्द्रियः
gīyate triṣu lokeṣu sarvapāpakṣayaṁkaram| tatra gatvā ca yo martyo vidhinā saṁyatendriyaḥ
यह तीनों लोकों में समस्त पापों का नाशक कहा जाता है; वहाँ जाकर जो मनुष्य विधिपूर्वक इन्द्रियों को संयत रखते हुए,
श्लोक 16 (skanda.5.192.16)
स्नानं समाचरेद्भक्त्या स लभेन्मौक्तिकं फलम्। यस्तु भोजयते विप्रांस्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप
snānaṁ samācaredbhaktyā sa labhenmauktikaṁ phalam| yastu bhojayate viprāṁstasmiṁstīrthe narādhipa
भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह मौक्तिक (मोती-दान के समान उत्तम) फल प्राप्त करता है। हे नराधिप! जो वहाँ ब्राह्मणों को भोजन कराता है,
श्लोक 17 (skanda.5.192.17)
स लभेन्मुख्यविप्राणां फलं साहस्रिकं नृप। तत्र देवशिला रम्या महापुण्यविवर्धिनी
sa labhenmukhyaviprāṇāṁ phalaṁ sāhasrikaṁ nṛpa| tatra devaśilā ramyā mahāpuṇyavivardhinī
हे नृप! वह सहस्र प्रमुख ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल प्राप्त करता है। वहाँ रमणीय देवशिला महापुण्य को बढ़ाने वाली है।
श्लोक 18 (skanda.5.192.18)
संन्यासेन मृता ये तु तेषां स्यादक्षया गतिः। अग्निप्रवेशं यः कुर्यात्तस्मिंस्तीर्थे नराधिप
sannyāsena mṛtā ye tu teṣāṁ syādakṣayā gatiḥ| agnipraveśaṁ yaḥ kuryāttasmiṁstīrthe narādhipa
जो लोग संन्यास से देह त्यागते हैं, उनकी गति अक्षय होती है। हे नराधिप! जो उस तीर्थ में अग्निप्रवेश करता है,
श्लोक 19 (skanda.5.192.19)
रुद्रलोके वसेत्तावद्यावदाभूतसंप्लवम्। एवं स्नानं जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम्
rudraloke vasettāvadyāvadābhūtasaṁplavam| evaṁ snānaṁ japo homaḥ svādhyāyo devatārcanam
वह प्रलयकाल तक रुद्रलोक में निवास करता है। इस प्रकार स्नान, जप, होम, स्वाध्याय तथा देवता-पूजन —
श्लोक 20 (skanda.5.192.20)
सुकृतं दुष्कृतं वाऽपि तत्र तीर्थेऽक्षयं भवेत्। एष ते विधिरुद्दिष्ट उत्पत्तिश्चैव भारत
sukṛtaṁ duṣkṛtaṁ vā'pi tatra tīrthe'kṣayaṁ bhavet| eṣa te vidhiruddiṣṭa utpattiścaiva bhārata
चाहे वह सुकृत हो या दुष्कृत, उस तीर्थ में सब अक्षय हो जाता है। हे भारत! यह तुम्हें विधि तथा उत्पत्ति दोनों बताई गई।
श्लोक 21 (skanda.5.192.21)
देवतीर्थस्य निखिला यथा वै शङ्कराच्छ्रुता। पठन्ति ये पापहरं सर्वदुःखविमोचनम्
devatīrthasya nikhilā yathā vai śaṅkarācchrutā| paṭhanti ye pāpaharaṁ sarvaduḥkhavimocanam
जो देवतीर्थ की इस समूची कथा को, जैसी मैंने शंकर से सुनी है, पढ़ते हैं — जो पापनाशक तथा समस्त दुःखों से मुक्त करने वाली है,
श्लोक 22 (skanda.5.192.22)
देवतीर्थस्य चरितं देवलोकं व्रजन्ति ते
devatīrthasya caritaṁ devalokaṁ vrajanti te
उस देवतीर्थ के चरित को पढ़ने-सुनने वाले वे लोग देवलोक को प्राप्त होते हैं।