अवन्ती खण्ड · अध्याय 222
लुंकेश्वर तीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.5.222.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। तस्यैवानन्तरं तात जलमध्ये व्यवस्थितम्। लुङ्केश्वरमिति ख्यातं सुरासुरनमस्कृतम्॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tasyaivānantaraṁ tāta jalamadhye vyavasthitam| luṅkeśvaramiti khyātaṁ surāsuranamaskṛtam||
श्रीमार्कण्डेय ने कहा—हे तात! उसी के ठीक बाद, जल के मध्य में स्थित, देवों और असुरों द्वारा नमस्कृत तीर्थ लुंकेश्वर नाम से विख्यात है।
श्लोक 2 (skanda.5.222.2)
इदं तीर्थं महापुण्यं नानाश्चर्यं महीतले। अस्य तीर्थस्य माहात्म्यमुत्पत्तिं शृणु भारत॥
idaṁ tīrthaṁ mahāpuṇyaṁ nānāścaryaṁ mahītale| asya tīrthasya māhātmyamutpattiṁ śṛṇu bhārata||
यह तीर्थ अत्यन्त पुण्यमय तथा पृथ्वीतल पर नाना आश्चर्यों से युक्त है। हे भारत! इस तीर्थ के माहात्म्य और उत्पत्ति को सुनो।
श्लोक 3 (skanda.5.222.3)
आसीत्पुरा महावीर्यो दानवो बलदर्पितः। कालपृष्ठ इति ख्यातः सुतो ब्रह्मसुतस्य च॥
āsītpurā mahāvīryo dānavo baladarpitaḥ| kālapṛṣṭha iti khyātaḥ suto brahmasutasya ca||
पूर्वकाल में कालपृष्ठ नाम से विख्यात, बल से गर्वित, महापराक्रमी एक दानव था, जो ब्रह्मपुत्र का पुत्र था।
श्लोक 4 (skanda.5.222.4)
गङ्गातटं समाश्रित्य चचार विपुलं तपः। अधोमुखोऽपि संस्थित्वापिबद्धूममहर्निशम्॥
gaṅgātaṭaṁ samāśritya cacāra vipulaṁ tapaḥ| adhomukho'pi saṁsthitvāpibaddhūmamaharniśam||
गंगा के तट का आश्रय लेकर उसने विपुल तप किया; अधोमुख होकर स्थित रहकर वह रात-दिन धूम्रपान करता रहा।
श्लोक 5 (skanda.5.222.5)
ततश्चानन्तरं देवस्तिष्ठते ह्युमया सह। दृष्ट्वा तं पार्वती सा तु तपस्युग्रे व्यवस्थितम्॥
tataścānantaraṁ devastiṣṭhate hyumayā saha| dṛṣṭvā taṁ pārvatī sā tu tapasyugre vyavasthitam||
तब उसके ठीक बाद देव उमा के साथ विराजमान थे। पार्वती ने उसे उस उग्र तप में स्थित देखकर [कहा]—
श्लोक 6 (skanda.5.222.6)
पश्य पश्य महादेव धूमाशी तिष्ठते नरः। प्रसीद तं कुरुष्वाद्य देहि शीघ्रं वरं विभो॥
paśya paśya mahādeva dhūmāśī tiṣṭhate naraḥ| prasīda taṁ kuruṣvādya dehi śīghraṁ varaṁ vibho||
"देखो, देखो, हे महादेव! एक पुरुष धूम्र पीता हुआ खड़ा है। प्रसन्न होकर आज ही शीघ्र उसे वर दीजिए, हे विभो!"
श्लोक 7 (skanda.5.222.7)
ईश्वर उवाच। यदुक्तं वचनं देवि न तन्मे रोचते प्रिये। स्वकार्यं च सदा चिन्त्यं परकार्यं विसर्जयेत्॥
īśvara uvāca| yaduktaṁ vacanaṁ devi na tanme rocate priye| svakāryaṁ ca sadā cintyaṁ parakāryaṁ visarjayet||
ईश्वर ने कहा—"हे देवि! जो वचन तुमने कहा, वह मुझे प्रिय नहीं लगा। अपने कार्य का सदा चिन्तन करना चाहिए, दूसरे के कार्य को त्याग देना चाहिए।
श्लोक 8 (skanda.5.222.8)
मूर्खस्त्रीबालशत्रूणां यश्छन्देनानुवर्तते। व्यसने पतते घोरे सत्यमेतदुदीरितम्॥
mūrkhastrībālaśatrūṇāṁ yaśchandenānuvartate| vyasane patate ghore satyametadudīritam||
जो मूर्ख, स्त्री, बालक और शत्रु की इच्छा का अनुसरण करता है, वह घोर विपत्ति में पड़ता है—यह सत्य कहा गया है।"
श्लोक 9 (skanda.5.222.9)
देव्युवाच। भार्ययाभ्यर्थितो भर्ता कारणं बहु भाषते। लघुत्वं याति सा नारी एवं शास्त्रेषु पठ्यते॥
devyuvāca| bhāryayābhyarthito bhartā kāraṇaṁ bahu bhāṣate| laghutvaṁ yāti sā nārī evaṁ śāstreṣu paṭhyate||
देवी ने कहा—"पत्नी द्वारा प्रार्थना किए जाने पर पति बहुत बहाने बताता है; ऐसी स्त्री लघुता को प्राप्त होती है, ऐसा शास्त्रों में पढ़ा जाता है।
श्लोक 10 (skanda.5.222.10)
प्राणत्यागं करिष्यामि यदि मां त्वं न मन्यसे। पार्वत्या प्रेरितो देवो गतोऽसौ दानवं प्रति॥
prāṇatyāgaṁ kariṣyāmi yadi māṁ tvaṁ na manyase| pārvatyā prerito devo gato'sau dānavaṁ prati||
यदि तुम मेरा वचन नहीं मानोगे तो मैं प्राणत्याग कर दूँगी।" पार्वती से प्रेरित होकर देव उस दानव के प्रति गए।
श्लोक 11 (skanda.5.222.11)
ईश्वर उवाच। किमर्थं पिबसे धूमं किमर्थं तप्यसे तपः। किं दुःखं किं नु सन्तापो वद कार्यमभीप्सितम्॥
īśvara uvāca| kimarthaṁ pibase dhūmaṁ kimarthaṁ tapyase tapaḥ| kiṁ duḥkhaṁ kiṁ nu santāpo vada kāryamabhīpsitam||
ईश्वर ने कहा—"किसलिए तुम धूम्र पीते हो, किसलिए तप करते हो? कैसा दुःख है, कैसा सन्ताप है? अपनी अभीष्ट इच्छा बताओ।
श्लोक 12 (skanda.5.222.12)
युवा त्वं दृश्यसेऽद्यापि वर्षविंशतिरेव च। तदाचक्ष्व हि मे सर्वं तपसः कारणं महत्॥
yuvā tvaṁ dṛśyase'dyāpi varṣaviṁśatireva ca| tadācakṣva hi me sarvaṁ tapasaḥ kāraṇaṁ mahat||
तुम अभी भी युवा दिखाई देते हो, बीस वर्ष के ही लगते हो; तप का सम्पूर्ण महान कारण मुझसे कहो।"
श्लोक 13 (skanda.5.222.13)
दानव उवाच। अचला दीयतां भक्तिर्मम स्थैर्यं तवोपरि। अपरं वर्षसाहस्रं निर्विघ्नं मे गतं विभो॥
dānava uvāca| acalā dīyatāṁ bhaktirmama sthairyaṁ tavopari| aparaṁ varṣasāhasraṁ nirvighnaṁ me gataṁ vibho||
दानव ने कहा—"मुझे अचल भक्ति दी जाए, आप पर मेरी स्थिरता बनी रहे। हे विभो! मुझे निर्विघ्न एक हजार वर्ष और बीत गए हैं;
श्लोक 14 (skanda.5.222.14)
दिवसानां सहस्रे द्वे पूर्णे त्वत्तपसा मम॥
divasānāṁ sahasre dve pūrṇe tvattapasā mama||
आपके प्रति मेरे तप के दो हजार दिन पूर्ण हो चुके हैं।"
श्लोक 15 (skanda.5.222.15)
ईश्वर उवाच। याचयाभीप्सितं कार्यं तुष्टोऽहं तव सुव्रत। देवस्य वचनं श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः॥
īśvara uvāca| yācayābhīpsitaṁ kāryaṁ tuṣṭo'haṁ tava suvrata| devasya vacanaṁ śrutvā cintayāmāsa dānavaḥ||
ईश्वर ने कहा—"हे सुव्रत! अपनी अभीष्ट इच्छा माँगो, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।" देव के वचन सुनकर दानव विचार करने लगा—
श्लोक 16 (skanda.5.222.16)
किं नाकं याचयाम्यद्य किमद्य सकलां महीम्। एवं संचिन्तयामास कामबाणेन पीडितः॥
kiṁ nākaṁ yācayāmyadya kimadya sakalāṁ mahīm| evaṁ saṁcintayāmāsa kāmabāṇena pīḍitaḥ||
"क्या मैं आज स्वर्ग माँगूँ, या आज सम्पूर्ण पृथ्वी माँगूँ?" इस प्रकार वह कामबाण से पीड़ित होकर विचार करने लगा।
श्लोक 17 (skanda.5.222.17)
दानव उवाच। यदि तुष्टोऽसि मे देव वरं दास्यसि मे प्रभो। सङ्ग्रामैस्तु न तुष्टोऽहं बलं नास्तीति किंचन॥
dānava uvāca| yadi tuṣṭo'si me deva varaṁ dāsyasi me prabho| saṅgrāmaistu na tuṣṭo'haṁ balaṁ nāstīti kiṁcana||
दानव ने कहा—"हे देव! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, हे प्रभो! तो मुझे वर दीजिए। मैं युद्धों से संतुष्ट नहीं हूँ, [उनमें] मेरा कोई बल नहीं है।
श्लोक 18 (skanda.5.222.18)
यस्य मूर्धन्यहं देव पाणिना समुपस्पृशे। देवदानवगन्धर्वो भस्मसाद्यातु तत्क्षणात्॥
yasya mūrdhanyahaṁ deva pāṇinā samupaspṛśe| devadānavagandharvo bhasmasādyātu tatkṣaṇāt||
हे देव! जिसके सिर पर मैं अपने हाथ से स्पर्श करूँ, वह देव, दानव अथवा गन्धर्व, उसी क्षण भस्म हो जाए।"
श्लोक 19 (skanda.5.222.19)
ईश्वर उवाच। यत्त्वया चिन्तितं किंचित्तत्सर्वं सफलं तव। उत्तिष्ठ गच्छ शीघ्रं त्वं भवनं प्रति दानव॥
īśvara uvāca| yattvayā cintitaṁ kiṁcittatsarvaṁ saphalaṁ tava| uttiṣṭha gaccha śīghraṁ tvaṁ bhavanaṁ prati dānava||
ईश्वर ने कहा—"जो कुछ तुमने सोचा है, वह सब तुम्हारे लिए सफल हो। हे दानव! उठो, शीघ्र अपने भवन की ओर जाओ।"
श्लोक 20 (skanda.5.222.20)
दानव उवाच। स्थीयतां देवदेवेश यावज्ज्ञास्यामि ते वरम्। युष्मन्मूर्ध्नि न्यसे पाणिं प्रत्ययो मे भवेद्यथा॥
dānava uvāca| sthīyatāṁ devadeveśa yāvajjñāsyāmi te varam| yuṣmanmūrdhni nyase pāṇiṁ pratyayo me bhavedyathā||
दानव ने कहा—"हे देवदेवेश! तब तक ठहरिए जब तक मैं आपके वरदान को जान न लूँ। आपके सिर पर हाथ रखूँ, जिससे मुझे विश्वास हो जाए।"
श्लोक 21 (skanda.5.222.21)
ततश्चानन्तरं देवश्चिन्तयानो महेश्वरः। न स्कन्दो न हरिर्ब्रह्मा यः कार्येषु क्षमोऽधुना॥
tataścānantaraṁ devaścintayāno maheśvaraḥ| na skando na harirbrahmā yaḥ kāryeṣu kṣamo'dhunā||
तब उसके ठीक बाद देव महेश्वर विचार करने लगे—अभी न स्कन्द, न हरि, न ब्रह्मा इस कार्य में समर्थ थे।
श्लोक 22 (skanda.5.222.22)
ज्ञात्वा चैवापदं प्राप्तां देवः प्रार्थयते वृषम्। अनेन सह पापेन युध्यस्व साम्प्रतं क्षणम्॥
jñātvā caivāpadaṁ prāptāṁ devaḥ prārthayate vṛṣam| anena saha pāpena yudhyasva sāmprataṁ kṣaṇam||
और अपने ऊपर आई विपत्ति को जानकर देव ने वृषभ से प्रार्थना की—"अभी इसी क्षण इस पापी के साथ युद्ध करो।"
श्लोक 23 (skanda.5.222.23)
करं प्रासारयद्दैत्यो देवं मूर्ध्नि किल स्पृशेत्। लाङ्गूलेनाहतो दैत्यो विषण्णः पतितो भुवि॥
karaṁ prāsārayaddaityo devaṁ mūrdhni kila spṛśet| lāṅgūlenāhato daityo viṣaṇṇaḥ patito bhuvi||
दैत्य ने देव के सिर को स्पर्श करने के लिए हाथ बढ़ाया; तभी वृषभ की पूँछ के प्रहार से आहत होकर दैत्य विषण्ण होकर भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 24 (skanda.5.222.24)
देवस्तु दक्षिणामाशां गतश्चैवोमया सह। भयभीतो निरीक्षेत ग्रीवां भज्य पुनःपुनः॥
devastu dakṣiṇāmāśāṁ gataścaivomayā saha| bhayabhīto nirīkṣeta grīvāṁ bhajya punaḥpunaḥ||
तब देव उमा सहित दक्षिण दिशा की ओर चले गए; भयभीत होकर वे बार-बार गर्दन मोड़कर पीछे देखते रहे।
श्लोक 25 (skanda.5.222.25)
गते चादर्शनं देवे युयुधे वृषभेण सः। द्वावेतौ बलिनां श्रेष्ठौ युयुधाते महाबलौ॥
gate cādarśanaṁ deve yuyudhe vṛṣabheṇa saḥ| dvāvetau balināṁ śreṣṭhau yuyudhāte mahābalau||
देव के दृष्टि से ओझल हो जाने पर वह वृषभ से युद्ध करने लगा; बलवानों में श्रेष्ठ, महाबली वे दोनों युद्ध करने लगे,
श्लोक 26 (skanda.5.222.26)
प्रहारैर्वज्रसदृशैः कोपेन घटिकात्रयम्। पाणिभ्यां न स्पृशेद्यो वै वृषभस्य शिरस्तथा॥
prahārairvajrasadṛśaiḥ kopena ghaṭikātrayam| pāṇibhyāṁ na spṛśedyo vai vṛṣabhasya śirastathā||
वज्र के समान प्रहारों से, क्रोधपूर्वक तीन घटिका तक। जिसे वृषभ के खुरों तथा सिर से भी छुआ न जा सका,
श्लोक 27 (skanda.5.222.27)
हत्वा लाङ्गूलपातेन आगतो वृषभस्तदा। उत्थितश्चाप्यसौ दैत्यो व्रजते वृषपृष्ठतः॥
hatvā lāṅgūlapātena āgato vṛṣabhastadā| utthitaścāpyasau daityo vrajate vṛṣapṛṣṭhataḥ||
वह पूँछ के प्रहार से आहत होकर [गिर गया]; तब वृषभ [वापस] आया, और वह दैत्य भी उठकर वृषभ के पीछे-पीछे चलने लगा।
श्लोक 28 (skanda.5.222.28)
वायुवेगेन सम्प्राप्तो यत्र देवो महेश्वरः। आगतं दानवं दृष्ट्वा वृषो वचनमब्रवीत्॥
vāyuvegena samprāpto yatra devo maheśvaraḥ| āgataṁ dānavaṁ dṛṣṭvā vṛṣo vacanamabravīt||
वायु के वेग से वहाँ जा पहुँचा जहाँ देव महेश्वर थे; आते हुए दानव को देखकर वृषभ ने यह वचन कहा—
श्लोक 29 (skanda.5.222.29)
आरुह्य पृष्ठे मे देव शीघ्रमेव हि गम्यताम्। आरुह्य वृषभं देवो जगाम चोमया सह॥
āruhya pṛṣṭhe me deva śīghrameva hi gamyatām| āruhya vṛṣabhaṁ devo jagāma comayā saha||
"हे देव! मेरी पीठ पर चढ़कर शीघ्र चलिए।" वृषभ पर चढ़कर देव उमा सहित चल पड़े।
श्लोक 30 (skanda.5.222.30)
नाकं प्राप्तस्ततो देवो गतः शक्रस्य मन्दिरम्। नात्यजद्देवपृष्ठं तु दानवो बलदर्पितः॥
nākaṁ prāptastato devo gataḥ śakrasya mandiram| nātyajaddevapṛṣṭhaṁ tu dānavo baladarpitaḥ||
तब देव स्वर्ग पहुँचकर शक्र के मन्दिर को गए; परन्तु बल से गर्वित वह दानव देव की पीठ [का पीछा करना] नहीं छोड़ता था।
श्लोक 31 (skanda.5.222.31)
इन्द्रलोकं परित्यज्य ब्रह्मलोकं गतस्तदा। यत्रयत्र व्रजेद्देवो भयात्सह दिवौकसैः॥
indralokaṁ parityajya brahmalokaṁ gatastadā| yatrayatra vrajeddevo bhayātsaha divaukasaiḥ||
इन्द्रलोक को त्यागकर तब वे ब्रह्मलोक को गए; देव जहाँ-जहाँ भी भय से देवताओं सहित जाते,
श्लोक 32 (skanda.5.222.32)
अपश्यत्तत्र तत्रैव पृष्ठे लग्नं तु दानवम्। सर्वांल्लोकान् भ्रमित्वा तु देवो विस्मयमागतः॥
apaśyattatra tatraiva pṛṣṭhe lagnaṁ tu dānavam| sarvāṁllokān bhramitvā tu devo vismayamāgataḥ||
वहीं-वहीं उन्हें वह दानव पीठ से चिपका हुआ दिखाई देता। सभी लोकों में भ्रमण करके देव विस्मय को प्राप्त हुए।
श्लोक 33 (skanda.5.222.33)
न स्थानं विद्यते किंचिद्यत्र विश्रम्यते क्षणम्। देवदानवयोस्तत्र युद्धं ज्ञात्वा सुदारुणम्॥
na sthānaṁ vidyate kiṁcidyatra viśramyate kṣaṇam| devadānavayostatra yuddhaṁ jñātvā sudāruṇam||
ऐसा कोई स्थान नहीं था जहाँ क्षणभर भी विश्राम किया जा सके। वहाँ देव और दानव के उस अत्यन्त भयंकर युद्ध को जानकर,
श्लोक 34 (skanda.5.222.34)
हर्षितात्मा मुनिस्तत्र चिरं नृत्यति नारदः। धन्योऽहमद्य मे जन्म जीवितं च सुजीवितम्॥
harṣitātmā munistatra ciraṁ nṛtyati nāradaḥ| dhanyo'hamadya me janma jīvitaṁ ca sujīvitam||
मुनि नारद हर्षित मन से देर तक नाचने लगे—"आज मैं धन्य हूँ, मेरा जन्म और जीवन सुफल हो गया!
श्लोक 35 (skanda.5.222.35)
महान्तं च कलिं दृष्ट्वा संतोषः परमोऽभवत्। देवदानवयोस्तत्र युद्धं त्यक्त्वा च नारदः॥
mahāntaṁ ca kaliṁ dṛṣṭvā saṁtoṣaḥ paramo'bhavat| devadānavayostatra yuddhaṁ tyaktvā ca nāradaḥ||
यह महान कलह देखकर मुझे परम संतोष हुआ।" यह कहकर नारद देव-दानव के उस युद्ध को छोड़कर,
श्लोक 36 (skanda.5.222.36)
आजगाम ततो विप्रो यत्र देवो महेश्वरः। दृष्ट्वा देवोऽथ तं विप्रं प्रतिपूज्याब्रवीदिदम्॥
ājagāma tato vipro yatra devo maheśvaraḥ| dṛṣṭvā devo'tha taṁ vipraṁ pratipūjyābravīdidam||
वहाँ गए, वह विप्र, जहाँ देव महेश्वर थे। उस ब्राह्मण को देखकर देव ने उनका सत्कार करके यह कहा—
श्लोक 37 (skanda.5.222.37)
भो नारद मुनिश्रेष्ठ जानीषे केशवं क्वचित्। गत्वा तत्र च शीघ्रं त्वं केशवाय निवेदय॥
bho nārada muniśreṣṭha jānīṣe keśavaṁ kvacit| gatvā tatra ca śīghraṁ tvaṁ keśavāya nivedaya||
"हे नारद, मुनिश्रेष्ठ! क्या तुम केशव को कहीं जानते हो? वहाँ शीघ्र जाकर केशव को यह सूचना दो।"
श्लोक 38 (skanda.5.222.38)
नारद उवाच। देवदानवसिद्धानां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। सर्वेषामेव देवेशो हरते ध्रुवमापदम्॥
nārada uvāca| devadānavasiddhānāṁ gandharvoragarakṣasām| sarveṣāmeva deveśo harate dhruvamāpadam||
नारद ने कहा—"देवेश निश्चय ही देवों, दानवों, सिद्धों, गन्धर्वों, नागों तथा राक्षसों—सभी की विपत्ति दूर करते हैं।
श्लोक 39 (skanda.5.222.39)
असंभाव्यं न वक्तव्यं मनसापि न चिन्तयेत्। ईदृशीं नैव बुध्यामि आपदं च विभो तव॥
asaṁbhāvyaṁ na vaktavyaṁ manasāpi na cintayet| īdṛśīṁ naiva budhyāmi āpadaṁ ca vibho tava||
जो असम्भाव्य है, वह कहने योग्य नहीं है, मन से भी उसका चिन्तन नहीं करना चाहिए। हे विभो! आपकी ऐसी विपत्ति तो मैंने कभी जानी ही नहीं।"
श्लोक 40 (skanda.5.222.40)
ईश्वर उवाच। गच्छ नारद शीघ्रं त्वं यत्र देवो जनार्दनः। विदितं च त्वया सर्वं यत्कृतं दानवेन तु॥
īśvara uvāca| gaccha nārada śīghraṁ tvaṁ yatra devo janārdanaḥ| viditaṁ ca tvayā sarvaṁ yatkṛtaṁ dānavena tu||
ईश्वर ने कहा—"हे नारद! शीघ्र वहाँ जाओ जहाँ देव जनार्दन हैं। दानव ने जो कुछ किया है, वह सब तुम्हें ज्ञात है।
श्लोक 41 (skanda.5.222.41)
अवध्यो दानवो ह्येष सेन्द्रैरपि मरुद्गणैः। गत्वा तु केशवं देवं निवेदय महामुने॥
avadhyo dānavo hyeṣa sendrairapi marudgaṇaiḥ| gatvā tu keśavaṁ devaṁ nivedaya mahāmune||
यह दानव इन्द्र सहित मरुद्गणों द्वारा भी अवध्य है। हे महामुने! जाकर देव केशव को निवेदन करो।"
श्लोक 42 (skanda.5.222.42)
नारद उवाच। न तु गच्छाम्यहं देव सुप्तः क्षीरोदधौ सुखी। केशवः प्रेरणे ह्येषामादेशो दीयतां प्रभो॥
nārada uvāca| na tu gacchāmyahaṁ deva suptaḥ kṣīrodadhau sukhī| keśavaḥ preraṇe hyeṣāmādeśo dīyatāṁ prabho||
नारद ने कहा—"हे देव! मैं नहीं जाऊँगा, वे सुखपूर्वक क्षीरसागर में सोए हुए हैं। हे प्रभो! केशव को जगाने का आदेश दिया जाए।
श्लोक 43 (skanda.5.222.43)
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा राजानं च तथा प्रभुम्। गुरुं चैवादितः कृत्वा शयानं न प्रबोधयेत्॥
mātrā svasrā duhitrā vā rājānaṁ ca tathā prabhum| guruṁ caivāditaḥ kṛtvā śayānaṁ na prabodhayet||
माता, बहिन, पुत्री, तथा राजा और स्वामी को, और सबसे पहले गुरु को, सोए हुए को नहीं जगाना चाहिए।"
श्लोक 44 (skanda.5.222.44)
ईश्वर उवाच। यदि क्वचिदगारेषु वह्निरुत्पद्यते महान्। निधनं यान्ति तत्रस्था यद्बुध्येरन्नसूरयः॥
īśvara uvāca| yadi kvacidagāreṣu vahnirutpadyate mahān| nidhanaṁ yānti tatrasthā yadbudhyerannasūrayaḥ||
ईश्वर ने कहा—"यदि कहीं घरों में महान अग्नि उत्पन्न हो जाए, तो वहाँ रहने वाले लोग तभी विनाश को प्राप्त होते हैं जब बुद्धिमान लोग [समय पर] नहीं जागते।"
श्लोक 45 (skanda.5.222.45)
नारद उवाच। शीघ्रं गच्छ महादेव आत्मानं रक्ष सुप्रभो। गच्छाम्यहं न सन्देहो यत्र देवो जनार्दनः॥
nārada uvāca| śīghraṁ gaccha mahādeva ātmānaṁ rakṣa suprabho| gacchāmyahaṁ na sandeho yatra devo janārdanaḥ||
नारद ने कहा—"हे महादेव! शीघ्र जाइए, अपनी रक्षा कीजिए, हे सुप्रभो! मैं निश्चय ही जाता हूँ जहाँ देव जनार्दन हैं।"
श्लोक 46 (skanda.5.222.46)
ततो नन्दिमहाकालौ स्तम्भहस्तौ भयानकौ। जघ्नतुर्दानवं तत्र मुद्गरादिभिरायुधैः॥
tato nandimahākālau stambhahastau bhayānakau| jaghnaturdānavaṁ tatra mudgarādibhirāyudhaiḥ||
तब नन्दि और महाकाल, हाथों में स्तम्भ (गदा) लिए, भयानक रूप से, वहाँ मुद्गर आदि आयुधों से दानव पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 47 (skanda.5.222.47)
त्रयोऽपि च महाकायाः सप्ततालप्रमाणकाः। न शमो जायते तेषां युध्यतां च परस्परम्॥
trayo'pi ca mahākāyāḥ saptatālapramāṇakāḥ| na śamo jāyate teṣāṁ yudhyatāṁ ca parasparam||
वे तीनों ही महाकाय, सात ताड़ के बराबर [ऊँचाई के] थे; परस्पर युद्ध करते हुए उनमें कोई शांति नहीं हो रही थी।
श्लोक 48 (skanda.5.222.48)
ततश्चानन्तरं विप्रोऽगच्छत्तं केशवं प्रति। सुप्तं क्षीरार्णवेऽपश्यच्छेषपर्यङ्कसंस्थितम्॥
tataścānantaraṁ vipro'gacchattaṁ keśavaṁ prati| suptaṁ kṣīrārṇave'paśyaccheṣaparyaṅkasaṁsthitam||
तब उसके ठीक बाद वह विप्र (नारद) केशव के पास गए; उन्होंने उन्हें क्षीरसागर में सोया हुआ, शेष-शय्या पर विराजमान देखा,
श्लोक 49 (skanda.5.222.49)
लक्ष्म्या पादयुगं गृह्य ऊरूपरि निवेशितम्। अप्सरोगीयमानं तु भक्त्यानम्य च केशवम्॥
lakṣmyā pādayugaṁ gṛhya ūrūpari niveśitam| apsarogīyamānaṁ tu bhaktyānamya ca keśavam||
जिनके दोनों चरण लक्ष्मी द्वारा पकड़कर अपनी जाँघों पर रखे हुए थे, तथा अप्सराएँ जिनका गान कर रही थीं। भक्तिपूर्वक केशव को प्रणाम करके [नारद ने कहा]—
श्लोक 50 (skanda.5.222.50)
अद्य मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम्। उत्थापयस्व देवेशं लक्ष्मि त्वमविशङ्किता॥
adya me saphalaṁ janma jīvitaṁ ca sujīvitam| utthāpayasva deveśaṁ lakṣmi tvamaviśaṅkitā||
"आज मेरा जन्म सफल हुआ, मेरा जीवन सुफल हुआ। हे लक्ष्मि! बिना किसी संकोच के देवेश को जगाओ।"
श्लोक 51 (skanda.5.222.51)
नारदस्य वचः श्रुत्वा पदाङ्गुष्ठं व्यमर्दयत्। नारदस्तिष्ठते द्वारि उत्तिष्ठ मधुसूदन॥
nāradasya vacaḥ śrutvā padāṅguṣṭhaṁ vyamardayat| nāradastiṣṭhate dvāri uttiṣṭha madhusūdana||
नारद का वचन सुनकर उन्होंने [विष्णु के] पैर के अंगूठे को दबाया—"नारद द्वार पर खड़े हैं, उठिए, हे मधुसूदन!"
श्लोक 52 (skanda.5.222.52)
देवोऽपि नारदं दृष्ट्वा परं हर्षमुपागतः। स्वागतं तु मुनिश्रेष्ठ सुप्रभाताद्य शर्वरी॥
devo'pi nāradaṁ dṛṣṭvā paraṁ harṣamupāgataḥ| svāgataṁ tu muniśreṣṭha suprabhātādya śarvarī||
देव ने भी नारद को देखकर परम हर्ष प्राप्त किया—"स्वागत है, हे मुनिश्रेष्ठ! आज रात्रि का सुप्रभात हुआ है।"
श्लोक 53 (skanda.5.222.53)
नारद उवाच। अद्य मे सफलं देव प्रभातं तव दर्शनात्। कुशलं च न देवानां शीघ्रमुत्तिष्ठ गम्यताम्॥
nārada uvāca| adya me saphalaṁ deva prabhātaṁ tava darśanāt| kuśalaṁ ca na devānāṁ śīghramuttiṣṭha gamyatām||
नारद ने कहा—"हे देव! आज आपके दर्शन से मेरा प्रभात सफल हुआ। देवों का कुशल नहीं है, शीघ्र उठिए, चलिए।"
श्लोक 54 (skanda.5.222.54)
श्रीविष्णुरुवाच। ब्रह्मा चेन्द्रश्च रुद्रश्च ये चान्ये तु मरुद्गणाः। आपदः कारणं यच्च तत्समाख्यातुमर्हसि॥
śrīviṣṇuruvāca| brahmā cendraśca rudraśca ye cānye tu marudgaṇāḥ| āpadaḥ kāraṇaṁ yacca tatsamākhyātumarhasi||
श्रीविष्णु ने कहा—"ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र तथा अन्य जो मरुद्गण हैं, इस विपत्ति का कारण मुझसे कहना उचित है।"
श्लोक 55 (skanda.5.222.55)
नारद उवाच। दानवेन महातीव्रं तपस्तप्तं सुदारुणम्। रुद्रेण च वरो दत्तो भस्मत्वं मनसेप्सितम्॥
nārada uvāca| dānavena mahātīvraṁ tapastaptaṁ sudāruṇam| rudreṇa ca varo datto bhasmatvaṁ manasepsitam||
नारद ने कहा—"एक दानव द्वारा अत्यन्त तीव्र, घोर तप किया गया, और रुद्र द्वारा उसे मनोवांछित भस्म-वर दिया गया।
श्लोक 56 (skanda.5.222.56)
वरदानबलेनैव स देवं हन्तुमर्हति। ईदृशं चेष्टितं ज्ञात्वा नीतो देवोऽमरैः सह॥
varadānabalenaiva sa devaṁ hantumarhati| īdṛśaṁ ceṣṭitaṁ jñātvā nīto devo'maraiḥ saha||
उसी वरदान के बल से वह अब देव को मारना चाहता है। ऐसी चेष्टा जानकर देव को अमरों सहित [वहाँ से] ले जाया गया।"
श्लोक 57 (skanda.5.222.57)
नारदस्य वचः श्रुत्वा जगाम समुनिर्हरिः। दृष्ट्वा देवस्तमीशानं गच्छन्तं दिशमुत्तराम्॥
nāradasya vacaḥ śrutvā jagāma samunirhariḥ| dṛṣṭvā devastamīśānaṁ gacchantaṁ diśamuttarām||
नारद का वचन सुनकर हरि उस मुनि के साथ चल पड़े; देव ने उस ईशान (शिव) को उत्तर दिशा की ओर जाते देखा।
श्लोक 58 (skanda.5.222.58)
दृष्ट्वा देवं च रुद्रोऽथ परिष्वज्य पुनःपुनः। नमस्कृत्य जगन्नाथं देवं च मधुसूदनः॥
dṛṣṭvā devaṁ ca rudro'tha pariṣvajya punaḥpunaḥ| namaskṛtya jagannāthaṁ devaṁ ca madhusūdanaḥ||
देव को देखकर रुद्र ने तब बार-बार आलिंगन किया; और मधुसूदन ने जगन्नाथ देव को नमस्कार किया।
श्लोक 59 (skanda.5.222.59)
विष्णुरुवाच। भयस्य कारणं देव कथ्यतां च महेश्वर। देवदानवयक्षाणां प्रेषयेयं यमालयम्॥
viṣṇuruvāca| bhayasya kāraṇaṁ deva kathyatāṁ ca maheśvara| devadānavayakṣāṇāṁ preṣayeyaṁ yamālayam||
विष्णु ने कहा—"हे देव महेश्वर! भय का कारण बताइए; मैं देव, दानव, यक्षों के [इस उपद्रवी] को यमलोक भेज दूँगा।"
श्लोक 60 (skanda.5.222.60)
ललाटे च कृतो धर्मो युष्माकं च महेश्वर। छित्त्वा शिरस्तथाङ्गानि इन्द्रियाणि न संशयः॥
lalāṭe ca kṛto dharmo yuṣmākaṁ ca maheśvara| chittvā śirastathāṅgāni indriyāṇi na saṁśayaḥ||
[कहा गया—] "हे महेश्वर! आप सबके ललाट पर धर्म रखा गया है; उसका सिर तथा अंग और इन्द्रियाँ काटकर [ही यह हल होगा], इसमें संशय नहीं।"
श्लोक 61 (skanda.5.222.61)
ईश्वर उवाच। नास्ति सौख्यं च मूर्खेषु नास्ति सौख्यं च रोगिषु। पराधीनेन सौख्यं तु स्त्रीजिते च विशेषतः॥
īśvara uvāca| nāsti saukhyaṁ ca mūrkheṣu nāsti saukhyaṁ ca rogiṣu| parādhīnena saukhyaṁ tu strījite ca viśeṣataḥ||
ईश्वर ने कहा—"मूर्खों में सुख नहीं है, रोगियों में भी सुख नहीं है; पराधीन व्यक्ति को सुख नहीं है, और विशेष रूप से स्त्री-जित पुरुष को।
श्लोक 62 (skanda.5.222.62)
स्त्रीजितेन मया विष्णो वरो दत्तस्तु दानवे। यस्य मूर्ध्नि न्यसेत्पाणिं स भवेद्भस्मपुंजवत्॥
strījitena mayā viṣṇo varo dattastu dānave| yasya mūrdhni nyasetpāṇiṁ sa bhavedbhasmapuṁjavat||
हे विष्णो! स्त्री से जीते जाने के कारण ही मैंने उस दानव को वर दिया—जिसके सिर पर वह हाथ रखेगा, वह भस्म के ढेर के समान हो जाएगा।
श्लोक 63 (skanda.5.222.63)
अजेयश्चामरश्चैव मया ह्युक्तः स केशव। हन्तुमिच्छति मां पाप उपायस्तव विद्यते॥
ajeyaścāmaraścaiva mayā hyuktaḥ sa keśava| hantumicchati māṁ pāpa upāyastava vidyate||
हे केशव! मैंने ही उसे अजेय और अमर कहा था। वह पापी अब मुझे मारना चाहता है—इसका उपाय तुम्हारे पास है।"
श्लोक 64 (skanda.5.222.64)
विष्णुरुवाच। गच्छन्तु अमराः सर्वे युष्माभिः सह शङ्कर। उपायं सर्जयाम्यद्य वधार्थं दानवस्य च॥
viṣṇuruvāca| gacchantu amarāḥ sarve yuṣmābhiḥ saha śaṅkara| upāyaṁ sarjayāmyadya vadhārthaṁ dānavasya ca||
विष्णु ने कहा—"हे शंकर! सभी अमर आपके साथ जाएँ। मैं आज ही दानव के वध के लिए उपाय रचता हूँ।
श्लोक 65 (skanda.5.222.65)
रेवायाश्च तटे तिष्ठ देव त्वममरैः सह। कालक्षेपो न कर्तव्यो गम्यतां त्वरितं प्रभो॥
revāyāśca taṭe tiṣṭha deva tvamamaraiḥ saha| kālakṣepo na kartavyo gamyatāṁ tvaritaṁ prabho||
हे देव! आप अमरों सहित रेवा के तट पर ठहरिए। समय नष्ट नहीं करना चाहिए; हे प्रभो! शीघ्र चलिए।
श्लोक 66 (skanda.5.222.66)
दक्षिणा यत्र गङ्गा च रेवा चैव महानदी। यत्रयत्र च दृश्येत प्राची चैव सरस्वती॥
dakṣiṇā yatra gaṅgā ca revā caiva mahānadī| yatrayatra ca dṛśyeta prācī caiva sarasvatī||
जहाँ दक्षिणी गंगा है, तथा महानदी रेवा भी है, और जहाँ-जहाँ पूर्वाभिमुखी सरस्वती दिखाई देती है,
श्लोक 67 (skanda.5.222.67)
तत्समं च महातीर्थं न मर्त्ये चैव दृश्यते। स्नानं ये तत्र कुर्वन्ति दानं चैव तु भक्तितः॥
tatsamaṁ ca mahātīrthaṁ na martye caiva dṛśyate| snānaṁ ye tatra kurvanti dānaṁ caiva tu bhaktitaḥ||
उसके समान महातीर्थ मर्त्यलोक में कहीं और नहीं दिखता। जो वहाँ स्नान करते हैं, तथा भक्तिपूर्वक दान भी करते हैं,
श्लोक 68 (skanda.5.222.68)
सप्तजन्मकृतं पापं नश्यते नात्र संशयः। एतत्तीर्थं महापुण्यं सर्वपातकनाशनम्॥
saptajanmakṛtaṁ pāpaṁ naśyate nātra saṁśayaḥ| etattīrthaṁ mahāpuṇyaṁ sarvapātakanāśanam||
उनका सात जन्मों में किया गया पाप नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। यह तीर्थ महापुण्य, सभी पापों का नाशक है।
श्लोक 69 (skanda.5.222.69)
गम्यतां तत्र देवेश लुङ्केशं त्वं सहामरैः। विष्णोस्तु वचनादेव प्रविष्टो ह्रदमुत्तमम्॥
gamyatāṁ tatra deveśa luṅkeśaṁ tvaṁ sahāmaraiḥ| viṣṇostu vacanādeva praviṣṭo hradamuttamam||
हे देवेश! अमरों सहित वहीं लुंकेश को जाइए।" विष्णु के वचन से ही वे उस उत्तम कुण्ड में प्रविष्ट हुए,
श्लोक 70 (skanda.5.222.70)
रतिं सुमहतीं चक्रे सह तत्र मरुद्गणैः। ततश्चानन्तरं देवो मायां कृत्वा ह्यनेकधा॥
ratiṁ sumahatīṁ cakre saha tatra marudgaṇaiḥ| tataścānantaraṁ devo māyāṁ kṛtvā hyanekadhā||
और वहाँ मरुद्गणों सहित अत्यन्त रति (आनन्द) का अनुभव किया। तब उसके ठीक बाद देव [विष्णु] ने अनेक प्रकार की माया रचकर,
श्लोक 71 (skanda.5.222.71)
वसन्तमासं संसृज्य उद्यानवनशोभितम्। अशोकैर्बकुलैश्चैव ब्रह्मवृक्षैः सुशोभनैः॥
vasantamāsaṁ saṁsṛjya udyānavanaśobhitam| aśokairbakulaiścaiva brahmavṛkṣaiḥ suśobhanaiḥ||
वसन्त ऋतु की रचना की, जो उद्यान-वन से सुशोभित थी, अशोक, बकुल तथा सुशोभित ब्रह्मवृक्षों से युक्त,
श्लोक 72 (skanda.5.222.72)
श्रीवृक्षैश्च कपित्थैश्च शिरीषैर्राजचम्पकैः। श्रीफलैश्च तथा तालैः कदम्बोदुम्बरैस्तथा॥
śrīvṛkṣaiśca kapitthaiśca śirīṣairrājacampakaiḥ| śrīphalaiśca tathā tālaiḥ kadambodumbaraistathā||
श्रीवृक्ष, कैथ, शिरीष, राजचम्पक, बिल्व तथा ताड़, कदम्ब और गूलर के वृक्षों से भी युक्त,
श्लोक 73 (skanda.5.222.73)
अश्वत्थादिद्रुमैश्चैव नानावृक्षैरनेकशः। नानापुष्पैः सुगन्धाढ्यैर्भ्रमरैश्च निनादितम्॥
aśvatthādidrumaiścaiva nānāvṛkṣairanekaśaḥ| nānāpuṣpaiḥ sugandhāḍhyairbhramaraiśca nināditam||
पीपल आदि वृक्षों से, तथा अनेक प्रकार के नाना वृक्षों से युक्त, सुगन्धित नाना पुष्पों से भरी हुई, भ्रमरों से गुंजायमान।
श्लोक 74 (skanda.5.222.74)
तस्मिन्मध्ये महावृक्षो न्यग्रोधश्च सुशोभनः। बहुपक्षिसमायुक्तः कोकिलारावनादितः॥
tasminmadhye mahāvṛkṣo nyagrodhaśca suśobhanaḥ| bahupakṣisamāyuktaḥ kokilārāvanāditaḥ||
उसके मध्य में एक विशाल, अत्यन्त सुशोभित वटवृक्ष था, जो अनेक पक्षियों से युक्त तथा कोकिल की कूक से गुंजायमान था।
श्लोक 75 (skanda.5.222.75)
कृष्णेन च कृतं तस्मिन्कन्यारूपं च तत्क्षणात्। न तस्याः सदृशी कन्या त्रैलोक्ये सचराचरे॥
kṛṣṇena ca kṛtaṁ tasminkanyārūpaṁ ca tatkṣaṇāt| na tasyāḥ sadṛśī kanyā trailokye sacarācare||
और उसमें कृष्ण ने उसी क्षण एक कन्या का रूप रचा; त्रैलोक्य में चराचर सहित उसके समान कोई कन्या नहीं थी।
श्लोक 76 (skanda.5.222.76)
अन्याश्च कन्यकाः सप्त सुरूपाः शुभलोचनाः। दिव्यरूपधराः सर्वा दिव्याभरणभूषिताः॥
anyāśca kanyakāḥ sapta surūpāḥ śubhalocanāḥ| divyarūpadharāḥ sarvā divyābharaṇabhūṣitāḥ||
और सात अन्य कन्याएँ भी थीं, सुरूपा, शुभ नेत्रों वाली, सभी दिव्य रूपधारी, दिव्य आभूषणों से विभूषित,
श्लोक 77 (skanda.5.222.77)
पुमांसमभिकाङ्क्षन्त्यो यद्येकः कामयेत्स्त्रियः। मौक्तिकैर्रत्नमाणिक्यैर्वैडूर्यैश्च सुशोभनैः॥
pumāṁsamabhikāṅkṣantyo yadyekaḥ kāmayetstriyaḥ| mauktikairratnamāṇikyairvaiḍūryaiśca suśobhanaiḥ||
एक पुरुष की कामना करती हुई—मानो प्रत्येक स्त्री उसे ही चाहती हो। मोतियों, रत्नों, माणिक्यों तथा सुशोभित वैडूर्यों से,
श्लोक 78 (skanda.5.222.78)
कामहारैश्च वंशैश्च बद्धो हिन्दोलकः कृतः। आरूढाश्च महाकन्या गायन्ते सुस्वरं तदा॥
kāmahāraiśca vaṁśaiśca baddho hindolakaḥ kṛtaḥ| ārūḍhāśca mahākanyā gāyante susvaraṁ tadā||
तथा मनोहर मालाओं और बाँसों से बँधा हुआ एक झूला बनाया गया था; उस पर चढ़कर वे महाकन्याएँ मधुर स्वर में गाने लगीं।
श्लोक 79 (skanda.5.222.79)
मारुतः शीतलो वाति वनं स्पृष्ट्वा सुशोभनम्। वातेन प्रेरितो गन्धो दानवो घ्राणपीडितः॥
mārutaḥ śītalo vāti vanaṁ spṛṣṭvā suśobhanam| vātena prerito gandho dānavo ghrāṇapīḍitaḥ||
उस सुशोभित वन को स्पर्श करके शीतल वायु बहने लगी; वायु द्वारा प्रेरित गन्ध से घ्राणपीड़ित दानव को,
श्लोक 80 (skanda.5.222.80)
ततः कुसुमगन्धेन विस्मयं परमं गतः। आघ्राय चेदृशं पुण्यं न दृष्टं न श्रुतं मया॥
tataḥ kusumagandhena vismayaṁ paramaṁ gataḥ| āghrāya cedṛśaṁ puṇyaṁ na dṛṣṭaṁ na śrutaṁ mayā||
पुष्पों की सुगन्ध से परम विस्मय हुआ—"ऐसी पवित्रता को सूँघकर मैंने न कभी देखा, न सुना।"
श्लोक 81 (skanda.5.222.81)
वने चिन्तयतः किंचिद्ध्वनिगीतं सुशोभनम्। गीतस्य च ध्वनिं श्रुत्वा मोहितो मायया हरेः॥
vane cintayataḥ kiṁciddhvanigītaṁ suśobhanam| gītasya ca dhvaniṁ śrutvā mohito māyayā hareḥ||
वन में कुछ विचार करते हुए उसे मधुर गीत-ध्वनि सुनाई पड़ी; उस गीत की ध्वनि सुनकर हरि की माया से मोहित होकर,
श्लोक 82 (skanda.5.222.82)
व्याधस्यैव महाकूटे पतन्ति च यथा मृगाः। कालस्पृष्टस्तथा कृष्णे पतितश्च नराधिप॥
vyādhasyaiva mahākūṭe patanti ca yathā mṛgāḥ| kālaspṛṣṭastathā kṛṣṇe patitaśca narādhipa||
जैसे मृग व्याध के बड़े जाल में गिर पड़ते हैं, हे नराधिप! उसी प्रकार काल से स्पृष्ट होकर वह कृष्ण [की माया] में गिर पड़ा।
श्लोक 83 (skanda.5.222.83)
दृष्ट्वा कन्यां च तां दैत्यो मूर्च्छया पतितो भुवि। पतितेन तु दृष्टैका कन्या वटतले स्थिता॥
dṛṣṭvā kanyāṁ ca tāṁ daityo mūrcchayā patito bhuvi| patitena tu dṛṣṭaikā kanyā vaṭatale sthitā||
उस कन्या को देखकर दैत्य मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा; गिरते हुए ही उसने वटवृक्ष के नीचे खड़ी एक कन्या को देखा।
श्लोक 84 (skanda.5.222.84)
आस्यं दृष्ट्वा तु नारीणां पुनः कामेन पीडितः। गृहीत्वा हेमदण्डं तु तां पातयितुमिच्छति॥
āsyaṁ dṛṣṭvā tu nārīṇāṁ punaḥ kāmena pīḍitaḥ| gṛhītvā hemadaṇḍaṁ tu tāṁ pātayitumicchati||
स्त्रियों का मुख देखकर पुनः काम से पीड़ित होकर, स्वर्ण-दण्ड लेकर उसने उसे [झूले से] गिराना चाहा।
श्लोक 85 (skanda.5.222.85)
कन्योवाच। मा मानुस्पर्शयत्वं हि कुमार्यहं कुलोत्तम। भो मुञ्च मुञ्च मां शीघ्रं यावद्गच्छाम्यहं गृहम्॥
kanyovāca| mā mānusparśayatvaṁ hi kumāryahaṁ kulottama| bho muñca muñca māṁ śīghraṁ yāvadgacchāmyahaṁ gṛham||
कन्या ने कहा—"हे कुलोत्तम! मुझे मत छुओ, मैं कुमारी हूँ। अरे, मुझे शीघ्र छोड़ो, जिससे मैं अपने घर जा सकूँ।"
श्लोक 86 (skanda.5.222.86)
दानव उवाच। अहं विवाहमिच्छामि त्वया सह सुशोभने। भूपृष्ठे सकले राज्ञी भवस्येवं न संशयः॥
dānava uvāca| ahaṁ vivāhamicchāmi tvayā saha suśobhane| bhūpṛṣṭhe sakale rājñī bhavasyevaṁ na saṁśayaḥ||
दानव ने कहा—"हे सुशोभने! मैं तुम्हारे साथ विवाह करना चाहता हूँ। तुम सम्पूर्ण पृथ्वीतल की रानी बनोगी, इसमें कोई संशय नहीं।"
श्लोक 87 (skanda.5.222.87)
कन्योवाच। पिता रक्षति कौमार्ये भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रो रक्षति वृद्धत्वे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥
kanyovāca| pitā rakṣati kaumārye bhartā rakṣati yauvane| putro rakṣati vṛddhatve na strī svātantryamarhati||
कन्या ने कहा—"कौमार्य में पिता रक्षा करता है, यौवन में पति रक्षा करता है, वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है—स्त्री स्वातन्त्र्य की अधिकारी नहीं होती।
श्लोक 88 (skanda.5.222.88)
न स्वातन्त्र्यं ममैवास्ति उत्पन्नाहं महत्कुले। याच्यस्तु मत्पिता भ्राता मातापि हि तथैव च॥
na svātantryaṁ mamaivāsti utpannāhaṁ mahatkule| yācyastu matpitā bhrātā mātāpi hi tathaiva ca||
मेरा अपना कोई स्वातन्त्र्य नहीं है, मैं एक महान कुल में उत्पन्न हुई हूँ। मेरे पिता, भ्राता, तथा माता से भी, इस विषय में पूछना चाहिए।"
श्लोक 89 (skanda.5.222.89)
दानव उवाच। यदि मां नेच्छसे त्वद्य स्वातन्त्र्यं नावलम्बसे। ममापि च तदा हत्या सत्यं च शुभलोचने॥
dānava uvāca| yadi māṁ necchase tvadya svātantryaṁ nāvalambase| mamāpi ca tadā hatyā satyaṁ ca śubhalocane||
दानव ने कहा—"हे शुभलोचने! यदि तुम आज मुझे नहीं चाहतीं, स्वातन्त्र्य का सहारा नहीं लेतीं, तो सत्य ही मेरी भी मृत्यु निश्चित है।"
श्लोक 90 (skanda.5.222.90)
कन्योवाच। विश्वासो नैव कर्तव्यो यादृशे तादृशे नरे। नराः स्त्रीषु विचित्राश्च लम्पटाः काममोहिताः॥
kanyovāca| viśvāso naiva kartavyo yādṛśe tādṛśe nare| narāḥ strīṣu vicitrāśca lampaṭāḥ kāmamohitāḥ||
कन्या ने कहा—"जैसा-तैसा भी पुरुष हो, उस पर विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। पुरुष स्त्रियों के विषय में विचित्र, लम्पट तथा काम से मोहित होते हैं।
श्लोक 91 (skanda.5.222.91)
परिणीय तु मां त्वं हि भुङ्क्ष्व भोगान्मया सह। जन्मनाशो भवेत्पश्चान्न त्वं नान्यो भवेन्मम॥
pariṇīya tu māṁ tvaṁ hi bhuṅkṣva bhogānmayā saha| janmanāśo bhavetpaścānna tvaṁ nānyo bhavenmama||
मुझसे विवाह करके ही तुम मेरे साथ भोग भोगो; बाद में जन्म का नाश हो [चाहे जो हो], न तुम्हारा कोई और होगा, न मेरा कोई और।
श्लोक 92 (skanda.5.222.92)
ब्राह्मणी क्षत्रिणी वैशी शूद्री यावत्तथैव च। द्वितीयो न भवेद्भर्ता एकाकी चेह जन्मनि॥
brāhmaṇī kṣatriṇī vaiśī śūdrī yāvattathaiva ca| dvitīyo na bhavedbhartā ekākī ceha janmani||
ब्राह्मणी हो, क्षत्रिया हो, वैश्या हो, अथवा शूद्रा भी हो, दूसरा पति नहीं होना चाहिए; इस जन्म में स्त्री अकेली ही [एक पति वाली] रहे।"
श्लोक 93 (skanda.5.222.93)
दानव उवाच। यत्त्वया गदितं वाक्यं तन्मया धारितं हृदि। प्रत्ययं मे कुरुष्वाद्य यत्ते मनसि रोचते॥
dānava uvāca| yattvayā gaditaṁ vākyaṁ tanmayā dhāritaṁ hṛdi| pratyayaṁ me kuruṣvādya yatte manasi rocate||
दानव ने कहा—"जो वचन तुमने कहा, उसे मैंने हृदय में धारण कर लिया है। आज मुझे विश्वास दिलाओ जो तुम्हारे मन को भाए।"
श्लोक 94 (skanda.5.222.94)
कन्योवाच। जानीष्व गोपकन्यां मां क्रीडामि सखिभिः सह। अस्मत्कुलेषु यद्दिव्यं तत्कुरुष्व यथाविधि॥
kanyovāca| jānīṣva gopakanyāṁ māṁ krīḍāmi sakhibhiḥ saha| asmatkuleṣu yaddivyaṁ tatkuruṣva yathāvidhi||
कन्या ने कहा—"मुझे गोपकन्या जानो, मैं सखियों के साथ क्रीड़ा करती हूँ। हमारे कुल में जो दिव्य [रीति] है, उसे यथाविधि करो।"
श्लोक 95 (skanda.5.222.95)
न तद्दिव्यं कुलेऽस्माकं विषं कोशं न तत्तुला। गोपान्वयेषु सर्वेषु हस्तः शिरसि दीयते॥
na taddivyaṁ kule'smākaṁ viṣaṁ kośaṁ na tattulā| gopānvayeṣu sarveṣu hastaḥ śirasi dīyate||
हमारे कुल में जो दिव्य [रीति] नहीं है, वह विष के समान है, न वह कोश (धन) है, न तराजू के तुल्य है; सभी गोप-वंशों में हाथ सिर पर रखा जाता है [यही प्रतिज्ञा-रीति है]।
श्लोक 96 (skanda.5.222.96)
कामान्धेनैव राजेन्द्र निक्षिप्तो मस्तके करः। तत्क्षणाद्भस्मसाद्भूतो दग्धस्तृणचयो यथा॥
kāmāndhenaiva rājendra nikṣipto mastake karaḥ| tatkṣaṇādbhasmasādbhūto dagdhastṛṇacayo yathā||
हे राजेन्द्र! काम से अन्धे होकर ही उसने अपना हाथ अपने मस्तक पर रख दिया; उसी क्षण वह भस्म हो गया, जैसे घास का ढेर जल जाता है।
श्लोक 97 (skanda.5.222.97)
केशवोपरि देवैस्तु पुष्पवृष्टिः शुभा कृता। हृष्टाः सर्वेऽगमन्देवाः स्वस्थानं विगतज्वराः॥
keśavopari devaistu puṣpavṛṣṭiḥ śubhā kṛtā| hṛṣṭāḥ sarve'gamandevāḥ svasthānaṁ vigatajvarāḥ||
देवों ने केशव पर शुभ पुष्पवृष्टि की; सभी देव हर्षित होकर, ज्वर-रहित होकर अपने-अपने स्थान को चले गए।
श्लोक 98 (skanda.5.222.98)
क्षीरोदं केशवो गच्छत्कालपृष्ठे निपातिते। य इदं शृणुयाद्भक्त्या चरितं दानवस्य च॥
kṣīrodaṁ keśavo gacchatkālapṛṣṭhe nipātite| ya idaṁ śṛṇuyādbhaktyā caritaṁ dānavasya ca||
कालपृष्ठ के गिर जाने पर केशव क्षीरसागर को चले गए। जो कोई इस दानव के चरित्र को भक्तिपूर्वक सुनता है,
श्लोक 99 (skanda.5.222.99)
स जयी जायते नित्यं शङ्करस्य वचो यथा। एतस्मात्कारणाद्राजंल्लिङ्गेश्वरमिति श्रुतम्॥
sa jayī jāyate nityaṁ śaṅkarasya vaco yathā| etasmātkāraṇādrājaṁlliṅgeśvaramiti śrutam||
वह नित्य विजयी होता है, जैसा शंकर का वचन है। हे राजन्! इसी कारण से यह लिंगेश्वर (लुंकेश्वर) नाम से विख्यात हुआ,
श्लोक 100 (skanda.5.222.100)
लीनं च पातकं यस्मात्स्नानमात्रेण नश्यति। त्वगस्थि शोणितं मांसं मेदःस्नायुस्तथैव च॥
līnaṁ ca pātakaṁ yasmātsnānamātreṇa naśyati| tvagasthi śoṇitaṁ māṁsaṁ medaḥsnāyustathaiva ca||
क्योंकि केवल स्नान मात्र से संचित पाप नष्ट हो जाता है—त्वचा, अस्थि, रक्त, मांस, मेद तथा स्नायु में स्थित पाप भी।
श्लोक 101 (skanda.5.222.101)
मज्जाशुक्रगतं पापं नश्यते जन्मकोटिजम्। लुङ्केश्वरे महाराज तोयं पिबति भक्तितः॥
majjāśukragataṁ pāpaṁ naśyate janmakoṭijam| luṅkeśvare mahārāja toyaṁ pibati bhaktitaḥ||
मज्जा और शुक्र में स्थित, करोड़ों जन्मों का संचित पाप भी नष्ट हो जाता है। हे महाराज! जो लुंकेश्वर में भक्तिपूर्वक जल पीता है,
श्लोक 102 (skanda.5.222.102)
त्रिभिः प्रसृतिमात्राभिः पापं याति सहस्रधा। विशेषेण चतुर्दश्यामुभौ पक्षौ तु चाष्टमी॥
tribhiḥ prasṛtimātrābhiḥ pāpaṁ yāti sahasradhā| viśeṣeṇa caturdaśyāmubhau pakṣau tu cāṣṭamī||
मात्र तीन प्रसृति [अंजलि] जल से उसका पाप सहस्रगुना नष्ट हो जाता है; विशेष रूप से दोनों पक्षों की चतुर्दशी और अष्टमी को,
श्लोक 103 (skanda.5.222.103)
उपोष्य यो नरो भक्त्या पितॄणां पाण्डुनन्दन। उद्धृतास्तेन ते सर्वे नारकीयाः पितामहाः॥
upoṣya yo naro bhaktyā pitḥṇāṁ pāṇḍunandana| uddhṛtāstena te sarve nārakīyāḥ pitāmahāḥ||
हे पाण्डुनन्दन! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पितरों के लिए उपवास करता है, उसके द्वारा नरक में पड़े हुए वे सभी पितामह उद्धृत हो जाते हैं।
श्लोक 104 (skanda.5.222.104)
काकिणीं चैव यो दद्याद्ब्राह्मणे वेदपारगे। तेन दानफलं सर्वं कुरुक्षेत्रादिकं च यत्॥
kākiṇīṁ caiva yo dadyādbrāhmaṇe vedapārage| tena dānaphalaṁ sarvaṁ kurukṣetrādikaṁ ca yat||
जो वेदपारंगत ब्राह्मण को एक काकिणी भी देता है, उसे कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों के दान का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है,
श्लोक 105 (skanda.5.222.105)
प्राप्तं तु नान्यथा राजञ्छङ्करो वदते त्विदम्। स्पर्शलिङ्गमिदं राजञ्छङ्करेण तु निर्मितम्॥
prāptaṁ tu nānyathā rājañchaṅkaro vadate tvidam| sparśaliṅgamidaṁ rājañchaṅkareṇa tu nirmitam||
और वह अन्यथा प्राप्त नहीं होता, हे राजन्, ऐसा शंकर स्वयं कहते हैं। हे राजन्! यह स्पर्शमात्र से फलदायी लिंग शंकर द्वारा ही निर्मित है।
श्लोक 106 (skanda.5.222.106)
स्पर्शमात्रे मनुष्याणां रुद्रवासोऽभिजायते। तेन दानफलं सर्वं कुरुक्षेत्रादिकं च यत्॥
sparśamātre manuṣyāṇāṁ rudravāso'bhijāyate| tena dānaphalaṁ sarvaṁ kurukṣetrādikaṁ ca yat||
मात्र स्पर्श से ही मनुष्यों को रुद्रलोक में निवास प्राप्त हो जाता है; उससे कुरुक्षेत्र आदि दान का सम्पूर्ण फल भी [प्राप्त होता है]।
श्लोक 107 (skanda.5.222.107)
एतस्मात्कारणाद्राजंल्लोकपालाश्च रक्षकाः। दुर्गा च रक्षणे सृष्टा चतुर्हस्तधरा शुभा॥
etasmātkāraṇādrājaṁllokapālāśca rakṣakāḥ| durgā ca rakṣaṇe sṛṣṭā caturhastadharā śubhā||
हे राजन्! इसी कारण से लोकपाल इसके रक्षक हैं, और चार भुजाओं वाली शुभा दुर्गा भी इसकी रक्षा के लिए सृजित हुई हैं।
श्लोक 108 (skanda.5.222.108)
धनदो लोकपालेशो रक्षकश्चेश्वरस्य च। रक्षति च सदा कालं ग्रहव्यापाररूपतः॥
dhanado lokapāleśo rakṣakaśceśvarasya ca| rakṣati ca sadā kālaṁ grahavyāpārarūpataḥ||
धनद (कुबेर) लोकपालों के स्वामी, ईश्वर के भी रक्षक हैं, तथा ग्रहों की गति के रूप में सदैव काल की रक्षा करते हैं,
श्लोक 109 (skanda.5.222.109)
पुत्रभ्रातृसमारूपैः स्वामिसम्बन्धरूपिभिः। लङ्केश्वरं च राजेन्द्र देवैर्नाद्यापि मुच्यते॥
putrabhrātṛsamārūpaiḥ svāmisambandharūpibhiḥ| laṅkeśvaraṁ ca rājendra devairnādyāpi mucyate||
पुत्र, भ्राता के समान रूपों से, स्वामी-सम्बन्धी रूपों से भी। हे राजेन्द्र! देवों द्वारा लंकेश्वर आज तक भी [अरक्षित] नहीं छोड़ा गया है।