अवन्ती खण्ड · अध्याय 227
मणिनागेश्वर तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.227.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र मणिनागेश्वरं शुभम्। उत्तरे नर्मदाकूले सर्वपापक्षयंकरम्। स्थापितं मणिनागेन लोकानां हितकाम्यया
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra maṇināgeśvaraṁ śubham| uttare narmadākūle sarvapāpakṣayaṁkaram| sthāpitaṁ maṇināgena lokānāṁ hitakāmyayā
श्री मार्कण्डेय ने कहा — तदनन्तर हे राजेन्द्र! नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित शुभ मणिनागेश्वर तीर्थ को जाओ, जो सब पापों का क्षय करने वाला है, तथा मणिनाग द्वारा लोकों के हित की कामना से स्थापित किया गया है।
श्लोक 2 (skanda.5.227.2)
युधिष्ठिर उवाच। आशीविषेण सर्पेण ईश्वरस्तोषितः कथम्। क्षुद्राः सर्वस्य लोकस्य भयदा विषशालिनः
yudhiṣṭhira uvāca| āśīviṣeṇa sarpeṇa īśvarastoṣitaḥ katham| kṣudrāḥ sarvasya lokasya bhayadā viṣaśālinaḥ
युधिष्ठिर ने कहा — विषधर सर्प के द्वारा ईश्वर कैसे संतुष्ट हुए? विषधारी सर्प तो क्षुद्र होते हैं और समस्त लोक के लिए भयदायक होते हैं।
श्लोक 3 (skanda.5.227.3)
कथ्यतां तात मे सर्वं पातकस्योपशान्तिदम्। मम सन्तापजं दुःखं दुर्योधनसमुद्भवम्
kathyatāṁ tāta me sarvaṁ pātakasyopaśāntidam| mama santāpajaṁ duḥkhaṁ duryodhanasamudbhavam
हे तात! मुझे यह सब कहिए, जो पाप की शान्ति देने वाला है — दुर्योधन से उत्पन्न मेरे संतापजनित दुःख को (शान्त करने वाला),
श्लोक 4 (skanda.5.227.4)
कर्णभीष्मोद्भवं रौद्रं दुःखं पाञ्चालिसम्भवम्। तव वक्त्राम्बुजौघेन प्लावितं निर्वृतिं गतः
karṇabhīṣmodbhavaṁ raudraṁ duḥkhaṁ pāñcālisambhavam| tava vaktrāmbujaughena plāvitaṁ nirvṛtiṁ gataḥ
कर्ण और भीष्म से उत्पन्न भयंकर दुःख, तथा पांचाली से सम्बद्ध दुःख — आपके मुखकमल की वाणी के प्रवाह से वह सब बह गया है, और मैं शान्ति को प्राप्त हुआ हूँ।
श्लोक 5 (skanda.5.227.5)
श्रुत्वा तव मुखोद्गीतां कथां वै पापनाशिनीम्। अयुक्तमिदमस्माकं द्विज क्लेशो न शाम्यति
śrutvā tava mukhodgītāṁ kathāṁ vai pāpanāśinīm| ayuktamidamasmākaṁ dvija kleśo na śāmyati
आपके मुख से गाई गई इस पापनाशिनी कथा को सुनकर भी, हे द्विज! यह उचित नहीं होगा कि हमारा क्लेश शान्त न हो।
श्लोक 6 (skanda.5.227.6)
अथवा प्राप्स्यते तात विद्यादानस्य यत्फलम्। तत्फलं प्राप्यते नित्यं कथाश्रवणतो हरेः
athavā prāpsyate tāta vidyādānasya yatphalam| tatphalaṁ prāpyate nityaṁ kathāśravaṇato hareḥ
अथवा हे तात! विद्यादान से जो फल प्राप्त होता है, वही फल हरि की कथा के श्रवण से नित्य प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (skanda.5.227.7)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। यथायथा त्वं नृप भाषसे च तथातथा मे सुखमेति भारती। शैथिल्यता वा जरयान्वितस्य त्वत्सौहृदं नश्यति नैव तात। शृणुष्व तस्मात्सह बान्धवैश्च कथामिमां पापहरां प्रशस्ताम्
śrīmārkaṇḍeya uvāca| yathāyathā tvaṁ nṛpa bhāṣase ca tathātathā me sukhameti bhāratī| śaithilyatā vā jarayānvitasya tvatsauhṛdaṁ naśyati naiva tāta| śṛṇuṣva tasmātsaha bāndhavaiśca kathāmimāṁ pāpaharāṁ praśastām
श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे राजन्! जैसे-जैसे तुम बोलते हो, वैसे-वैसे मेरी वाणी को सुख प्राप्त होता है; और हे तात! वृद्धावस्था से युक्त पुरुष की शिथिलता होने पर भी तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह कभी नष्ट नहीं होता। अतः बन्धुजनों सहित इस पापहारिणी, प्रशस्त कथा को सुनो।
श्लोक 8 (skanda.5.227.8)
कथयामि यथावृत्तमितिहासं पुरातनम्
kathayāmi yathāvṛttamitihāsaṁ purātanam
मैं जैसा घटित हुआ था, वह पुरातन इतिहास कहता हूँ।
श्लोक 9 (skanda.5.227.9)
कथितं पूर्वतो वृत्तैः पारम्पर्येण भारत
kathitaṁ pūrvato vṛttaiḥ pāramparyeṇa bhārata
हे भारत! यह पूर्वकाल से ही वृद्धजनों द्वारा परम्परा से कथित होता आया है।
श्लोक 10 (skanda.5.227.10)
द्वे भार्ये कश्यपस्यास्तां सर्वलोकेष्वनुत्तमे। गरुत्मन्तं च विनतासूत कद्रूरहीनथ
dve bhārye kaśyapasyāstāṁ sarvalokeṣvanuttame| garutmantaṁ ca vinatāsūta kadrūrahīnatha
कश्यप की दो पत्नियाँ थीं, जो समस्त लोकों में अनुपम थीं; विनता ने गरुत्मान् (गरुड़) को तथा कद्रू ने सर्पों को जन्म दिया।
श्लोक 11 (skanda.5.227.11)
संतोषेण च ते तात तिष्ठतः काश्यपे गृहे। कद्रूश्च विनता नाम हृष्टे च वनिते सदा
santoṣeṇa ca te tāta tiṣṭhataḥ kāśyape gṛhe| kadrūśca vinatā nāma hṛṣṭe ca vanite sadā
हे तात! वे दोनों पत्नियाँ, कद्रू और विनता नामक, संतोषपूर्वक सदा प्रसन्न होकर कश्यप के घर में रहती थीं।
श्लोक 12 (skanda.5.227.12)
ताभ्यां सार्द्धं क्रीडते च कश्यपोऽपि प्रजापतिः। ततस्त्वेकदिने प्राप्ते आश्रमस्था शुभानना
tābhyāṁ sārddhaṁ krīḍate ca kaśyapo'pi prajāpatiḥ| tatastvekadine prāpte āśramasthā śubhānanā
प्रजापति कश्यप भी उन दोनों के साथ क्रीड़ा करते थे। तदनन्तर एक दिन, आश्रम में रहते हुए, शुभाननावाली विनता,
श्लोक 13 (skanda.5.227.13)
उच्चैःश्रवं हयं दृष्ट्वा मनोवेगसमन्वितम्। पश्य पश्य हि तन्वङ्गी हयं सर्वत्र पाण्डुरम्
uccaiḥśravaṁ hayaṁ dṛṣṭvā manovegasamanvitam| paśya paśya hi tanvaṅgi hayaṁ sarvatra pāṇḍuram
मनोवेग से युक्त उच्चैःश्रवा अश्व को देखकर बोली — "देखो, देखो, हे तन्वंगी! यह अश्व सर्वत्र श्वेत है,
श्लोक 14 (skanda.5.227.14)
धावमानमविश्रान्तं जवेन मनसोपमम्। तं दृष्ट्वा सहसा चाश्वमीर्ष्याभावेन चाब्रवीत्
dhāvamānamaviśrāntaṁ javena manasopamam| taṁ dṛṣṭvā sahasā cāśvamīrṣyābhāvena cābravīt
निरन्तर दौड़ता हुआ, वेग में मन के समान।" उस अश्व को अचानक देखकर, कद्रू ईर्ष्याभाव से बोली।
श्लोक 15 (skanda.5.227.15)
कद्रूरुवाच। ब्रूहि भद्रे सहस्रांशोरश्वः किंवर्णको भवेत्। अहं ब्रवीमि कृष्णोऽयं त्वं किं वदसि तद्वद
kadrūruvāca| brūhi bhadre sahasrāṁśoraśvaḥ kiṁvarṇako bhavet| ahaṁ bravīmi kṛṣṇo'yaṁ tvaṁ kiṁ vadasi tadvada
कद्रू ने कहा — "हे भद्रे! बताओ, सहस्रांशु (सूर्य) का यह अश्व किस वर्ण का है? मैं कहती हूँ यह काला है; तुम जो कहती हो, वह कहो।"
श्लोक 16 (skanda.5.227.16)
विनतोवाच। पश्यसे ननु नेत्रैश्च कृष्णं श्वेतं न पश्यसि। असत्यभाषणाद्भद्रे यमलोकं गमिष्यसि
vinatovāca| paśyase nanu netraiśca kṛṣṇaṁ śvetaṁ na paśyasi| asatyabhāṣaṇādbhadre yamalokaṁ gamiṣyasi
विनता ने कहा — "क्या तुम नेत्रों से नहीं देखतीं? तुम श्वेत को काला कहकर नहीं देख पातीं। हे भद्रे! असत्य भाषण से तुम यमलोक को जाओगी।"
श्लोक 17 (skanda.5.227.17)
सत्यानृते तु वचने पणस्तव ममैव तु। सहस्रं चैव वर्षाणां दास्यहं तव मन्दिरे
satyānṛte tu vacane paṇastava mamaiva tu| sahasraṁ caiva varṣāṇāṁ dāsyahaṁ tava mandire
"इस सत्य अथवा असत्य वचन पर हमारे बीच शर्त हो — यदि मैं हारूँ तो एक सहस्र वर्षों तक तुम्हारे घर में दासी बनकर रहूँगी।"
श्लोक 18 (skanda.5.227.18)
असत्या यदि मे वाणी कृष्ण उच्चैःश्रवा यदि। तदाहं त्वद्गृहे दासी भवामि सर्पमातृके
asatyā yadi me vāṇī kṛṣṇa uccaiḥśravā yadi| tadāhaṁ tvadgṛhe dāsī bhavāmi sarpamātṛke
"यदि मेरी वाणी असत्य हो और उच्चैःश्रवा काला निकले, तो हे सर्पमातृके! मैं तुम्हारे घर में दासी बन जाऊँगी।"
श्लोक 19 (skanda.5.227.19)
यदि उच्चैःश्रवाः श्वेतोऽहं दासी च तवैव तु। एवं परस्परं द्वाभ्यां संवादोऽयं व्यवर्धत
yadi uccaiḥśravāḥ śveto'haṁ dāsī ca tavaiva tu| evaṁ parasparaṁ dvābhyāṁ saṁvādo'yaṁ vyavardhata
"और यदि उच्चैःश्रवा श्वेत निकला, तो तुम्हीं मेरी दासी बनोगी।" इस प्रकार दोनों के बीच यह वाद-विवाद बढ़ता गया।
श्लोक 20 (skanda.5.227.20)
आश्रमेषु गता बाला रात्रौ चिन्तापरा स्थिता। बन्धुवर्गस्य कथितं समस्तं तद्विचेष्टितम्
āśrameṣu gatā bālā rātrau cintāparā sthitā| bandhuvargasya kathitaṁ samastaṁ tadviceṣṭitam
वह युवती (कद्रू) आश्रम में जाकर रात्रि में चिन्ता में डूबी रही; उसने अपने बन्धुवर्ग को वह सारी घटना बता दी।
श्लोक 21 (skanda.5.227.21)
पुत्राणां कथितं पार्थ पणं चैव मया कृतम्। हाहाकारः कृतः सर्पैः श्रुत्वा मात्रा पणं कृतम्
putrāṇāṁ kathitaṁ pārtha paṇaṁ caiva mayā kṛtam| hāhākāraḥ kṛtaḥ sarpaiḥ śrutvā mātrā paṇaṁ kṛtam
हे पार्थ! उसने अपने पुत्रों को वह शर्त बता दी, जो मैंने की है। माता द्वारा की गई शर्त सुनकर सर्पों ने हाहाकार मचाया।
श्लोक 22 (skanda.5.227.22)
जाता दासी न सन्देहः श्वेतो भास्करवाहनः। उच्चैःश्रवा हयः श्वेतो न कृष्णो विद्यते क्वचित्
jātā dāsī na sandehaḥ śveto bhāskaravāhanaḥ| uccaiḥśravā hayaḥ śveto na kṛṣṇo vidyate kvacit
"निःसन्देह हमारी माता दासी बन जाएगी — भास्कर का वाहन तो श्वेत है; उच्चैःश्रवा अश्व श्वेत है, कहीं भी काला नहीं है।"
श्लोक 23 (skanda.5.227.23)
कद्रूरुवाच। यथाहं न भवे दासी तत्कार्यं च विचिन्त्यताम्। विशध्वं रोमकूपेषु ह्युच्चैःश्रवहयस्य तु
kadrūruvāca| yathāhaṁ na bhave dāsī tatkāryaṁ ca vicintyatām| viśadhvaṁ romakūpeṣu hyuccaiḥśravahayasya tu
कद्रू ने कहा — "जिस उपाय से मैं दासी न बनूँ, उसका विचार करो: उच्चैःश्रवा अश्व के रोमकूपों में प्रवेश करो,
श्लोक 24 (skanda.5.227.24)
एकं मुहूर्तमात्रं तु यावत्कृष्णः स दृश्यते। क्षणमात्रेण चैकेन दासी सा भवते मम
ekaṁ muhūrtamātraṁ tu yāvatkṛṣṇaḥ sa dṛśyate| kṣaṇamātreṇa caikena dāsī sā bhavate mama
"मात्र एक मुहूर्त के लिए, जब तक वह काला दिखाई दे। उस एक क्षणमात्र में ही वह विनता मेरी दासी बन जाएगी।"
श्लोक 25 (skanda.5.227.25)
दासीं कृत्वा तु तां तन्वीं विनतां सत्यगर्विताम्। ततः स्वस्थानगाः सर्वे भविष्यथ यथासुखम्
dāsīṁ kṛtvā tu tāṁ tanvīṁ vinatāṁ satyagarvitām| tataḥ svasthānagāḥ sarve bhaviṣyatha yathāsukham
"और उस तन्वंगी, सत्य पर गर्वित विनता को दासी बनाकर, तुम सब सुखपूर्वक अपने-अपने स्थानों को लौट जाना।"
श्लोक 26 (skanda.5.227.26)
सर्पा ऊचुः। यथा त्वं जननी चाम्ब सर्वेषां भुवि पूजिता। तथा सापि विशेषेण वञ्चितव्या न मातरः
sarpā ūcuḥ| yathā tvaṁ jananī cāmba sarveṣāṁ bhuvi pūjitā| tathā sāpi viśeṣeṇa vañcitavyā na mātaraḥ
सर्पों ने कहा — "हे अम्ब! जैसे तुम इस पृथ्वी पर हम सबकी जननी के रूप में पूजित हो, वैसे ही विनता को भी विशेष रूप से छलना उचित नहीं — माताओं को धोखा नहीं देना चाहिए।"
श्लोक 27 (skanda.5.227.27)
माता च पितृभार्या च मातृमाता पितामही। कर्मणा मनसा वाचा हितं तासां समाचरेत्
mātā ca pitṛbhāryā ca mātṛmātā pitāmahī| karmaṇā manasā vācā hitaṁ tāsāṁ samācaret
"अपनी माता, पिता की पत्नी, नानी, तथा दादी — इन सबका हित कर्म, मन और वचन से करना चाहिए।"
श्लोक 28 (skanda.5.227.28)
सा ततस्तेन वाक्येन क्रुद्धा कालानलोपमा। मम वाक्यमकुर्वाणा ये केचिद्भुवि पन्नगाः
sā tatastena vākyena kruddhā kālānalopamā| mama vākyamakurvāṇā ye kecidbhuvi pannagāḥ
तब उस वचन से क्रुद्ध होकर, कालाग्नि के समान वह कद्रू बोली — "पृथ्वी पर जो भी सर्प मेरी आज्ञा का पालन नहीं करेंगे,
श्लोक 29 (skanda.5.227.29)
हव्यवाहमुखे सर्वे ते यास्यन्त्यविचारितम्। मातुस्तद्वचनं श्रुत्वा सर्वे चैव भुजङ्गमाः
havyavāhamukhe sarve te yāsyantyavicāritam| mātustadvacanaṁ śrutvā sarve caiva bhujaṅgamāḥ
"वे सब बिना विचार किये अग्नि के मुख में जा गिरेंगे।" माता के इस वचन को सुनकर सभी सर्प —
श्लोक 30 (skanda.5.227.30)
केचित्प्रविष्टा रोमेषु उच्चैःश्रवहयस्य च। नष्टाः केचिद्दशदिशं कद्रूशापभयात्ततः
kecitpraviṣṭā romeṣu uccaiḥśravahayasya ca| naṣṭāḥ keciddaśadiśaṁ kadrūśāpabhayāttataḥ
कुछ उच्चैःश्रवा अश्व के रोमों में प्रविष्ट हो गए, और कुछ कद्रू के शाप के भय से दसों दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 31 (skanda.5.227.31)
केचिद्गङ्गाजले नष्टाः केचिन्नष्टाः सरस्वतीम्। केचिन्महोदधौ लीनाः प्रविष्टा विन्ध्यकन्दरे
kecidgaṅgājale naṣṭāḥ kecinnaṣṭāḥ sarasvatīm| kecinmahodadhau līnāḥ praviṣṭā vindhyakandare
कुछ गंगाजल में लीन हो गए, कुछ सरस्वती में विलीन हुए; कुछ महासागर में लीन हुए, तथा कुछ विन्ध्य की गुफाओं में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 32 (skanda.5.227.32)
आश्रित्य नर्मदातोये मणिनागोत्तमो नृप। तपश्चचार विपुलमुत्तरे नर्मदातटे
āśritya narmadātoye maṇināgottamo nṛpa| tapaścacāra vipulamuttare narmadātaṭe
हे राजन्! नर्मदा के जल का आश्रय लेकर, उत्तम सर्प मणिनाग ने नर्मदा के उत्तरी तट पर विपुल तपस्या की।
श्लोक 33 (skanda.5.227.33)
मातृशापभयात्पार्थ ध्यायते कामनाशनम्। अच्छेद्यमप्रतर्क्यं च विनाशोत्पत्तिवर्जितम्
mātṛśāpabhayātpārtha dhyāyate kāmanāśanam| acchedyamapratarkyaṁ ca vināśotpattivarjitam
हे पार्थ! माता के शाप के भय से वह कामनाशक शिव का ध्यान करता रहा — जो अच्छेद्य, अचिन्त्य तथा उत्पत्ति-विनाश से रहित हैं।
श्लोक 34 (skanda.5.227.34)
वायुभक्षः शतं साग्रं तदर्धं रविवीक्षकः। एवं ध्यानरतस्यैव प्रत्यक्षस्त्रिपुरान्तकः
vāyubhakṣaḥ śataṁ sāgraṁ tadardhaṁ ravivīkṣakaḥ| evaṁ dhyānaratasyaiva pratyakṣastripurāntakaḥ
सौ वर्षों से अधिक तक वायु का ही आहार करते हुए, तथा उसके आधे समय तक सूर्य की ओर देखते हुए — इस प्रकार ध्यान में लीन उस सर्प के समक्ष त्रिपुरान्तक शिव साक्षात् प्रकट हुए।
श्लोक 35 (skanda.5.227.35)
साधु साधु महाभाग सत्त्ववांस्तु भुजंगम। त्वया भक्त्या गृहीतोऽहं प्रीतस्ते ह्युरगेश्वर। वरं याचय मे क्षिप्रं यस्ते मनसि वर्तते
sādhu sādhu mahābhāga sattvavāṁstu bhujaṁgama| tvayā bhaktyā gṛhīto'haṁ prītaste hyurageśvara| varaṁ yācaya me kṣipraṁ yaste manasi vartate
"साधु साधु, हे महाभाग! हे सत्त्वशाली सर्प! तुम्हारी भक्ति से मैं वश में हो गया हूँ, हे उरगेश्वर! तुमसे प्रसन्न हूँ। शीघ्र वह वर मांगो जो तुम्हारे मन में हो।"
श्लोक 36 (skanda.5.227.36)
मणिनाग उवाच। मातृशापभयान्नाथ क्लिष्टोऽहं नर्मदातटे। त्वत्प्रसादेन मे नाथ मातृशापो भवेद्वृथा
maṇināga uvāca| mātṛśāpabhayānnātha kliṣṭo'haṁ narmadātaṭe| tvatprasādena me nātha mātṛśāpo bhavedvṛthā
मणिनाग ने कहा — "हे नाथ! माता के शाप के भय से मैं नर्मदा तट पर पीड़ित रहा हूँ। हे नाथ! तुम्हारी कृपा से मेरी माता का शाप व्यर्थ हो जाए।"
श्लोक 37 (skanda.5.227.37)
ईश्वर उवाच। हव्यवाहमुखं वत्स न प्राप्स्यसि ममाज्ञया। मम लोके निवासश्च तव पुत्र भविष्यति
īśvara uvāca| havyavāhamukhaṁ vatsa na prāpsyasi mamājñayā| mama loke nivāsaśca tava putra bhaviṣyati
ईश्वर ने कहा — "हे वत्स! मेरी आज्ञा से तुम अग्निमुख को प्राप्त नहीं होगे; हे पुत्र! तुम्हारा निवास मेरे लोक में होगा।"
श्लोक 38 (skanda.5.227.38)
मणिनाग उवाच। अत्र स्थाने महादेव स्थीयतामंशभागतः। सहस्रांशेन भागेन स्थीयतां नर्मदाजले। उपकाराय लोकानां मम नाम्नैव शङ्कर
maṇināga uvāca| atra sthāne mahādeva sthīyatāmaṁśabhāgataḥ| sahasrāṁśena bhāgena sthīyatāṁ narmadājale| upakārāya lokānāṁ mama nāmnaiva śaṅkara
मणिनाग ने कहा — "हे महादेव! इस स्थान में अपने अंश-भाग से निवास करो; सहस्रांश भाग से नर्मदा के जल में स्थित रहो; हे शंकर! लोकों के उपकार के लिए यहाँ मेरे ही नाम से प्रतिष्ठित रहो।"
श्लोक 39 (skanda.5.227.39)
ईश्वर उवाच। स्थापयस्व परं लिङ्गमाज्ञया मम पन्नग। इत्युक्त्वान्तर्हितो देवो जगाम ह्युमया सह
īśvara uvāca| sthāpayasva paraṁ liṅgamājñayā mama pannaga| ityuktvāntarhito devo jagāma hyumayā saha
ईश्वर ने कहा — "हे सर्प! मेरी आज्ञा से यहाँ परम लिंग की स्थापना करो।" यह कहकर देव अन्तर्धान हो गए और उमा सहित चले गए।
श्लोक 40 (skanda.5.227.40)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। तत्र तीर्थे तु ये गत्वा शुचिप्रयतमानसाः। पञ्चम्यां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां शुक्लकृष्णयोः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tatra tīrthe tu ye gatvā śuciprayatamānasāḥ| pañcamyāṁ vā caturdaśyāmaṣṭamyāṁ śuklakṛṣṇayoḥ
श्री मार्कण्डेय ने कहा — उस तीर्थ में जो शुद्ध, संयमित मन से जाकर, शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष की पंचमी, चतुर्दशी अथवा अष्टमी को,
श्लोक 41 (skanda.5.227.41)
अर्चयन्ति सदा पार्थ नोपसर्पन्ति ते यमम्। दध्ना च मधुना चैव घृतेन क्षीरयोगतः
arcayanti sadā pārtha nopasarpanti te yamam| dadhnā ca madhunā caiva ghṛtena kṣīrayogataḥ
सदा पूजा करते हैं, हे पार्थ! वे यम के समीप नहीं जाते; दधि, मधु तथा घृत को दूध में मिलाकर,
श्लोक 42 (skanda.5.227.42)
स्नापयन्ति विरूपाक्षमुमादेहार्धधारिणम्। कामाङ्गदहनं देवमघासुरनिषूदनम्
snāpayanti virūpākṣamumādehārdhadhāriṇam| kāmāṅgadahanaṁ devamaghāsuraniṣūdanam
वे उमा के अर्धांग को धारण करने वाले, कामदेव के शरीर को भस्म करने वाले, अघासुर के संहारक विरूपाक्ष का अभिषेक करते हैं।
श्लोक 43 (skanda.5.227.43)
स्नाप्यमानं च ये भक्त्वा पश्यन्ति परमेश्वरम्। ते यान्ति च परे लोके सर्वपापविवर्जितैः
snāpyamānaṁ ca ye bhaktvā paśyanti parameśvaram| te yānti ca pare loke sarvapāpavivarjitaiḥ
और जो भक्तिपूर्वक अभिषिक्त होते हुए परमेश्वर का दर्शन करते हैं, वे सब पापों से रहित होकर परम लोक को जाते हैं।
श्लोक 44 (skanda.5.227.44)
श्राद्धं प्रेतेषु ये पार्थ चाष्टम्यां पञ्चमीषु च। ब्राह्मणैश्च सदा योग्यैर्वेदपाठकचिन्तकैः
śrāddhaṁ preteṣu ye pārtha cāṣṭamyāṁ pañcamīṣu ca| brāhmaṇaiśca sadā yogyairvedapāṭhakacintakaiḥ
हे पार्थ! जो अष्टमी अथवा पंचमी को प्रेतों का श्राद्ध, सदा योग्य ब्राह्मणों द्वारा — जो वेदपाठी और वेद के मननशील हों —
श्लोक 45 (skanda.5.227.45)
स्वदारनिरतैः श्लक्ष्णैः परदारविवर्जितैः। षट्कर्मनिरतैस्तात शूद्रप्रेषणवर्जितैः
svadāranirataiḥ ślakṣṇaiḥ paradāravivarjitaiḥ| ṣaṭkarmanirataistāta śūdrapreṣaṇavarjitaiḥ
अपनी ही पत्नी में अनुरक्त, सुशील, परस्त्री से रहित, षट्कर्मों में निरत, तथा हे तात! शूद्र-सेवा से रहित ब्राह्मणों द्वारा (श्राद्ध कराते हैं),
श्लोक 46 (skanda.5.227.46)
खञ्जाश्च दर्दुराः षण्ढा वार्द्धुष्याश्च कृषीवलाः। भिन्नवृत्तिकराः पुत्र नियोज्या न कदाचन
khañjāśca dardurāḥ ṣaṇḍhā vārddhuṣyāśca kṛṣīvalāḥ| bhinnavṛttikarāḥ putra niyojyā na kadācana
लंगड़े, बेडौल, नपुंसक, सूदखोर, कृषक, तथा भिन्न वृत्ति करने वाले जनों को, हे पुत्र! कभी नियुक्त न करे।
श्लोक 47 (skanda.5.227.47)
वृषलीमन्दिरे यस्य महिषीं यस्तु पालयेत्। स विप्रो दूरतस्त्याज्यो व्रते श्राद्धे नराधिप
vṛṣalīmandire yasya mahiṣīṁ yastu pālayet| sa vipro dūratastyājyo vrate śrāddhe narādhipa
जिस ब्राह्मण के घर में कुलटा स्त्री रहती हो और वह अपनी सच्ची पत्नी की उपेक्षा करता हो, हे नराधिप! उस ब्राह्मण को व्रत और श्राद्ध में दूर से ही त्याग देना चाहिए।
श्लोक 48 (skanda.5.227.48)
काणाष्टुंटाश्च मण्टाश्च वेदपाठविवर्जिताः। न ते पूज्या द्विजाः पार्थ मणिनागेश्वरे शुभे
kāṇāṣṭuṇṭāśca maṇṭāśca vedapāṭhavivarjitāḥ| na te pūjyā dvijāḥ pārtha maṇināgeśvare śubhe
काने, अंगहीन तथा शरीर से क्षीण, वेदपाठ से रहित — ऐसे द्विज, हे पार्थ! शुभ मणिनागेश्वर में पूज्य नहीं हैं।
श्लोक 49 (skanda.5.227.49)
यदीच्छेदूर्ध्वगमनमात्मनः पितृभिः सह। सर्वाङ्गरुचिरां धेनुं यो दद्यादग्रजन्मने
yadīcchedūrdhvagamanamātmanaḥ pitṛbhiḥ saha| sarvāṅgarucirāṁ dhenuṁ yo dadyādagrajanmane
यदि कोई अपने पितरों सहित अपने लिए ऊर्ध्वगमन चाहता है, तो वह श्रेष्ठ ब्राह्मण को सर्वांग सुन्दर गाय दान करे —
श्लोक 50 (skanda.5.227.50)
स याति परमं लोकं यावदाभूतसम्प्लवम्। ततः स्वर्गाच्च्युतः सोऽपि जायते विमले कुले
sa yāti paramaṁ lokaṁ yāvadābhūtasamplavam| tataḥ svargāccyutaḥ so'pi jāyate vimale kule
वह उस परम लोक को जाता है, प्राणियों के प्रलय होने तक; फिर स्वर्ग से च्युत होकर वह भी निर्मल कुल में जन्म लेता है।
श्लोक 51 (skanda.5.227.51)
ये पश्यन्ति परं भक्त्या मणिनागेश्वरं नृप। न तेषां जायते वंशे पन्नगानां भयं नृप
ye paśyanti paraṁ bhaktyā maṇināgeśvaraṁ nṛpa| na teṣāṁ jāyate vaṁśe pannagānāṁ bhayaṁ nṛpa
हे राजन्! जो लोग परम भक्ति से मणिनागेश्वर का दर्शन करते हैं, हे राजन्! उनके वंश में सर्पों का भय कभी उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 52 (skanda.5.227.52)
पन्नगः शङ्कते तेषां मणिनागप्रदर्शनात्। सौपर्णरूपिणस्ते वै दृश्यन्ते नागमण्डले
pannagaḥ śaṅkate teṣāṁ maṇināgapradarśanāt| sauparṇarūpiṇaste vai dṛśyante nāgamaṇḍale
सर्प भी उनसे मणिनाग के दर्शन के कारण शंकित रहता है; वे नागमण्डल में गरुड़ के समान रूपधारी दिखाई देते हैं।
श्लोक 53 (skanda.5.227.53)
फलानि चैव दानानां शृणुष्वाथ नृपोत्तम। अन्नं संस्कारसंयुक्तं ये ददन्ते नरोत्तमाः
phalāni caiva dānānāṁ śṛṇuṣvātha nṛpottama| annaṁ saṁskārasaṁyuktaṁ ye dadante narottamāḥ
अब दानों के फल सुनो, हे नृपोत्तम! जो श्रेष्ठ पुरुष संस्कारयुक्त अन्न दान करते हैं,
श्लोक 54 (skanda.5.227.54)
तोयं शय्यां तथा छत्रं कन्यां दासीं सुभाषिणीम्। पात्रे देयं यतो राजन् यदीच्छेच्छ्रेय आत्मनः
toyaṁ śayyāṁ tathā chatraṁ kanyāṁ dāsīṁ subhāṣiṇīm| pātre deyaṁ yato rājan yadīcchecchreya ātmanaḥ
जल, शय्या, छत्र, कन्या, अथवा सुभाषिणी दासी — यदि कोई अपना कल्याण चाहे, तो हे राजन्! योग्य पात्र को यह देना चाहिए;
श्लोक 55 (skanda.5.227.55)
सुरभीणि च पुष्पाणि गन्धवस्त्राणि दापयेत्। दीपं धान्यं गृहं शुभ्रं सर्वोपस्करसंयुतम्
surabhīṇi ca puṣpāṇi gandhavastrāṇi dāpayet| dīpaṁ dhānyaṁ gṛhaṁ śubhraṁ sarvopaskarasaṁyutam
सुगन्धित पुष्प, सुगन्धित वस्त्र, दीप, धान्य तथा सभी उपकरणों से युक्त शुभ गृह भी देना चाहिए।
श्लोक 56 (skanda.5.227.56)
ये ददन्ते परं भक्त्या ते व्रजन्ति त्रिविष्टपम्। मणिनागे नृपश्रेष्ठ यच्च दानं प्रदीयते
ye dadante paraṁ bhaktyā te vrajanti triviṣṭapam| maṇināge nṛpaśreṣṭha yacca dānaṁ pradīyate
जो परम भक्ति से दान करते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं; और हे नृपश्रेष्ठ! मणिनाग में जो भी दान दिया जाता है,
श्लोक 57 (skanda.5.227.57)
तस्य दानस्य भावेन स्वर्गे वासो भवेद्ध्रुवम्। पातकानि प्रलीयन्ते आमपात्रे यथा जलम्
tasya dānasya bhāvena svarge vāso bhaveddhruvam| pātakāni pralīyante āmapātre yathā jalam
उस दान के प्रभाव से स्वर्ग में निवास निश्चित हो जाता है; पाप वहाँ उसी प्रकार गल जाते हैं, जैसे कच्चे मिट्टी के पात्र में जल।
श्लोक 58 (skanda.5.227.58)
नर्मदातोयसंसिद्धं भोज्यं विप्रे ददाति यः। सोऽपि पापैर्विनिर्मुक्तः क्रीडते दैवतैः सह
narmadātoyasaṁsiddhaṁ bhojyaṁ vipre dadāti yaḥ| so'pi pāpairvinirmuktaḥ krīḍate daivataiḥ saha
जो नर्मदा के जल से सिद्ध भोजन ब्राह्मण को देता है, वह भी पापों से मुक्त होकर देवताओं के साथ क्रीड़ा करता है।
श्लोक 59 (skanda.5.227.59)
ततः स्वर्गच्युतानां हि लक्षणं प्रवदाम्यहम्। दीर्घायुषो जीवपुत्रा धनवन्तः सुशोभनाः
tataḥ svargacyutānāṁ hi lakṣaṇaṁ pravadāmyaham| dīrghāyuṣo jīvaputrā dhanavantaḥ suśobhanāḥ
अब मैं स्वर्ग से च्युत हुए लोगों के लक्षण बताता हूँ: वे दीर्घायु, जीवित पुत्रों वाले, धनवान् तथा सुन्दर होते हैं,
श्लोक 60 (skanda.5.227.60)
सर्वव्याधिविनिर्मुक्ताः सुतभृत्यैः समन्विताः। त्यागिनो भोगसंयुक्ता धर्माख्यानरताः सदा
sarvavyādhivinirmuktāḥ sutabhṛtyaiḥ samanvitāḥ| tyāgino bhogasaṁyuktā dharmākhyānaratāḥ sadā
सब व्याधियों से मुक्त, पुत्रों और सेवकों से युक्त, त्यागी, भोगयुक्त, तथा सदा धर्म-कथाओं में अनुरक्त रहते हैं,
श्लोक 61 (skanda.5.227.61)
देवद्विजगुरोर्भक्तास्तीर्थसेवापरायणाः। मातापितृवशा नित्यं द्रोहक्रोधविवर्जिताः
devadvijagurorbhaktāstīrthasevāparāyaṇāḥ| mātāpitṛvaśā nityaṁ drohakrodhavivarjitāḥ
देव, द्विज और गुरु के भक्त, तीर्थ-सेवा में तत्पर, सदा माता-पिता के वशवर्ती, तथा द्रोह और क्रोध से रहित होते हैं।
श्लोक 62 (skanda.5.227.62)
एभिरेव गुणैर्युक्ता ये नराः पाण्डुनन्दन। सत्यं ते स्वर्गादायाताः स्वर्गे वासं व्रजन्ति ते
ebhireva guṇairyuktā ye narāḥ pāṇḍunandana| satyaṁ te svargādāyātāḥ svarge vāsaṁ vrajanti te
हे पाण्डुनन्दन! जो मनुष्य इन्हीं गुणों से युक्त होते हैं — सत्य ही वे स्वर्ग से आए हैं, और स्वर्ग में ही निवास को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 63 (skanda.5.227.63)
सर्वतीर्थवरं तीर्थं मणिनागं नृपोत्तम। तीर्थाख्यानमिदं पुण्यं यः पठेच्छृणुयादपि
sarvatīrthavaraṁ tīrthaṁ maṇināgaṁ nṛpottama| tīrthākhyānamidaṁ puṇyaṁ yaḥ paṭhecchṛṇuyādapi
मणिनाग समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ है, हे नृपोत्तम! इस पुण्य तीर्थ-कथा को जो पढ़े या सुने भी,
श्लोक 64 (skanda.5.227.64)
सोऽपि पापैर्विनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते। न विषं क्रमते तेषां विचरन्ति यथेच्छया
so'pi pāpairvinirmuktaḥ śivaloke mahīyate| na viṣaṁ kramate teṣāṁ vicaranti yathecchayā
वह भी पापों से मुक्त होकर शिवलोक में महिमामण्डित होता है; उन पर विष का प्रभाव नहीं होता, वे इच्छानुसार विचरण करते हैं।
श्लोक 65 (skanda.5.227.65)
भाद्रपद्यां च यत्षष्ठ्यां पुण्यं सूर्यस्य दर्शने। तत्फलं समवाप्नोति आख्यानश्रवणेन तु
bhādrapadyāṁ ca yatṣaṣṭhyāṁ puṇyaṁ sūryasya darśane| tatphalaṁ samavāpnoti ākhyānaśravaṇena tu
और भाद्रपद की षष्ठी को सूर्य के दर्शन का जो पुण्य है, वही फल इस आख्यान के श्रवण से प्राप्त होता है।