अवन्ती खण्ड · अध्याय 237
दधिस्कन्दादि पंचतीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.237.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल वह्नितीर्थमनुत्तमम्। यत्र सिद्धो महातेजास्तपः कृत्वा हुताशनः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla vahnitīrthamanuttamam| yatra siddho mahātejāstapaḥ kṛtvā hutāśanaḥ
श्री मार्कण्डेय ने कहा — तत्पश्चात् हे महीपाल! अनुपम वह्नि-तीर्थ को जाओ, जहाँ महातेजस्वी अग्नि तपस्या करके सिद्ध हुए।
श्लोक 2 (skanda.5.237.2)
सर्वभक्ष्यः कृतो योऽसौ दण्डके मुनिना पुरा। नर्मदातटमाश्रित्य पूतो जातो हुताशनः
sarvabhakṣyaḥ kṛto yo'sau daṇḍake muninā purā| narmadātaṭamāśritya pūto jāto hutāśanaḥ
जिस अग्नि को प्राचीन काल में दण्डक मुनि ने सर्वभक्षी (सब कुछ खा जाने वाला) बना दिया था, वह नर्मदा के तट का आश्रय लेकर पवित्र हो गया।
श्लोक 3 (skanda.5.237.3)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्। अग्निप्रवेशं कुरुते स गच्छेदग्निसाम्यताम्
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayitvā maheśvaram| agnipraveśaṁ kurute sa gacchedagnisāmyatām
उस तीर्थ में जो स्नान करके, महेश्वर की पूजा करके, अग्निप्रवेश करता है, वह अग्नि के समान पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (skanda.5.237.4)
भक्त्या स्नात्वा तु यस्तत्र तर्पयेत्पितृदेवताः। अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमाप्नोत्यसंशयम्
bhaktyā snātvā tu yastatra tarpayetpitṛdevatāḥ| agniṣṭomasya yajñasya phalamāpnotyasaṁśayam
जो भक्तिपूर्वक स्नान करके वहाँ पितरों और देवताओं का तर्पण करता है, वह निःसंदेह अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.5.237.5)
तस्यैवानन्तरं राजन्कौबेरं तीर्थमुत्तमम्। कुबेरो यत्र संसिद्धो यक्षाणामधिपः पुरा
tasyaivānantaraṁ rājankauberaṁ tīrthamuttamam| kubero yatra saṁsiddho yakṣāṇāmadhipaḥ purā
हे राजन्! उसके ठीक पश्चात् उत्तम कौबेर-तीर्थ है, जहाँ प्राचीन काल में यक्षों के स्वामी कुबेर सिद्ध हुए थे।
श्लोक 6 (skanda.5.237.6)
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा समभ्यर्च्य जगद्गुरुम्। उमया सहितं भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते
tatra tīrthe naraḥ snātvā samabhyarcya jagadgurum| umayā sahitaṁ bhaktyā sarvapāpaiḥ pramucyate
उस तीर्थ में मनुष्य स्नान करके, उमा सहित जगद्गुरु की भक्तिपूर्वक पूजा करके, सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 7 (skanda.5.237.7)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा दद्याद्विप्राय कांचनम्। नाभिमात्रे जले तिष्ठन्स लभेतार्बुदं फलम्
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā dadyādviprāya kāṁcanam| nābhimātre jale tiṣṭhansa labhetārbudaṁ phalam
उस तीर्थ में जो स्नान करके, नाभि तक जल में खड़े होकर ब्राह्मण को सुवर्ण दान करता है, वह अर्बुद गुना फल प्राप्त करता है।
श्लोक 8 (skanda.5.237.8)
दधिस्कन्दे मधुस्कन्दे नन्दीशे वरुणालये। आग्नेये यत्फलं तात स्नात्वा तत्फलमाप्नुयात्
dadhiskande madhuskande nandīśe varuṇālaye| āgneye yatphalaṁ tāta snātvā tatphalamāpnuyāt
हे तात! दधिस्कन्द, मधुस्कन्द, नन्दीश तथा वरुणालय में स्नान करने का जो फल है, वही फल आग्नेय तीर्थ में स्नान करने से प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (skanda.5.237.9)
ते वन्द्या मानुषे लोके धन्याः पूर्णमनोरथाः। यैस्तु दृष्टं महापुण्यं नर्मदातीर्थपञ्चकम्
te vandyā mānuṣe loke dhanyāḥ pūrṇamanorathāḥ| yaistu dṛṣṭaṁ mahāpuṇyaṁ narmadātīrthapañcakam
वे मनुष्यलोक में वन्दनीय, धन्य तथा पूर्णमनोरथ हैं, जिन्होंने इस महापुण्य नर्मदा के पांच तीर्थों का दर्शन किया है।
श्लोक 10 (skanda.5.237.10)
ते यान्ति भास्करे लोके परमे दुःखनाशने। भास्करादैश्वरे लोके चैश्वरादनिवर्तके
te yānti bhāskare loke parame duḥkhanāśane| bhāskarādaiśvare loke caiśvarādanivartake
वे सूर्यलोक को प्राप्त होते हैं, जो परम दुःखनाशक है; सूर्यलोक से ऐश्वर्यलोक को, और ऐश्वर्यलोक से उस अनिवर्तक पद को प्राप्त होते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।
श्लोक 11 (skanda.5.237.11)
नीयते स परे लोके यावदिन्द्राश्चतुर्दश। ततः स्वर्गाच्च्युतो मर्त्यो राजा भवति धार्मिकः
nīyate sa pare loke yāvadindrāścaturdaśa| tataḥ svargāccyuto martyo rājā bhavati dhārmikaḥ
वह उस परम लोक में तब तक ले जाया जाता है, जब तक चौदह इन्द्र न बदल जाएं; फिर स्वर्ग से च्युत होकर वह मर्त्य धर्मात्मा राजा बनता है।
श्लोक 12 (skanda.5.237.12)
सर्वरोगविनिर्मुक्तो भुनक्ति सचराचरम्। विष्णुश्च देवता येषां नर्मदातीर्थसेविनाम्
sarvarogavinirmukto bhunakti sacarācaram| viṣṇuśca devatā yeṣāṁ narmadātīrthasevinām
वह सब रोगों से मुक्त होकर चराचर जगत् का भोग करता है; और नर्मदा-तीर्थों की सेवा करने वालों की देवता विष्णु ही हैं।
श्लोक 13 (skanda.5.237.13)
अखण्डितप्रतापास्ते जायन्ते नात्र संशयः। गङ्गा कनखले पुण्या कुरुक्षेत्रे सरस्वती
akhaṇḍitapratāpāste jāyante nātra saṁśayaḥ| gaṅgā kanakhale puṇyā kurukṣetre sarasvatī
वे निःसंदेह अखण्डित प्रताप वाले जन्म लेते हैं; गंगा कनखल में पुण्य है, सरस्वती कुरुक्षेत्र में पुण्य है,
श्लोक 14 (skanda.5.237.14)
ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा। रेवातीरे वसेन्नित्यं रेवातोयं सदा पिबेत्
grāme vā yadi vāraṇye puṇyā sarvatra narmadā| revātīre vasennityaṁ revātoyaṁ sadā pibet
किन्तु नर्मदा गांव में हो अथवा वन में, सर्वत्र पुण्यमय है; रेवा के तट पर सदा निवास करना चाहिए, और सदा रेवा का जल पीना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.5.237.15)
स स्नातः सर्वतीर्थेषु सोमपानं दिने दिने। गङ्गाद्याः सरितः सर्वाः समुद्राश्च सरांसि च। कल्पान्ते संक्षयं यान्ति न मृता तेन नर्मदा
sa snātaḥ sarvatīrtheṣu somapānaṁ dine dine| gaṅgādyāḥ saritaḥ sarvāḥ samudrāśca sarāṁsi ca| kalpānte saṁkṣayaṁ yānti na mṛtā tena narmadā
वह मानो प्रतिदिन सोमपान करते हुए सब तीर्थों में स्नान करता है। गंगा आदि सभी नदियाँ, समुद्र तथा सरोवर कल्प के अन्त में नष्ट हो जाते हैं, किन्तु नर्मदा उनकी भांति कभी नष्ट नहीं होती।