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अवन्ती खण्ड · अध्याय 253

प्रभास तीर्थ माहात्म्य

अध्याय 252अध्याय-सूचीअध्याय 254

श्लोक 1 (skanda.5.253.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच - ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र प्रभासेश्वरमुत्तमम्। विख्यातं त्रिषु लोकेषु स्वर्गसोपानमुत्तमम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca - tato gacchettu rājendra prabhāseśvaramuttamam| vikhyātaṁ triṣu lokeṣu svargasopānamuttamam

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे राजेन्द्र, तदनन्तर उत्तम प्रभासेश्वर को जाना चाहिए, जो तीनों लोकों में विख्यात है और स्वर्ग की उत्तम सीढ़ी है।

श्लोक 2 (skanda.5.253.2)

युधिष्ठिर उवाच - प्रभासं तात मे ब्रूहि कथं जातं महाफलम्। स्वर्गसोपानदं दृश्यं संक्षेपात्कथयस्व मे

yudhiṣṭhira uvāca - prabhāsaṁ tāta me brūhi kathaṁ jātaṁ mahāphalam| svargasopānadaṁ dṛśyaṁ saṁkṣepātkathayasva me

युधिष्ठिर बोले — हे तात, मुझे प्रभास के विषय में बताइए, यह कैसे उत्पन्न हुआ, महाफलदायी; स्वर्गसोपानदायी उस दर्शन को संक्षेप में मुझसे कहिए।

श्लोक 3 (skanda.5.253.3)

श्रीमार्कण्डेय उवाच - दुर्भगा रविपत्नी च प्रभानामेति विश्रुता। तया चाराधितः शम्भुरुग्रेण तपसा पुरा

śrīmārkaṇḍeya uvāca - durbhagā ravipatnī ca prabhānāmeti viśrutā| tayā cārādhitaḥ śambhurugreṇa tapasā purā

श्रीमार्कण्डेय बोले — सूर्य की एक अभागिनी पत्नी थी, जो प्रभा नाम से विख्यात थी; उसने पूर्वकाल में उग्र तप से शम्भु की आराधना की थी।

श्लोक 4 (skanda.5.253.4)

वायुभक्षा स्थिता वर्षं वर्षं ध्यानपरायणा। ततस्तुष्टो महादेवः प्रभायाः पाण्डुनन्दन

vāyubhakṣā sthitā varṣaṁ varṣaṁ dhyānaparāyaṇā| tatastuṣṭo mahādevaḥ prabhāyāḥ pāṇḍunandana

वायु मात्र का भक्षण करते हुए, वर्ष-दर-वर्ष, ध्यान में तत्पर रहकर — तब हे पाण्डुनन्दन, महादेव प्रभा से प्रसन्न हुए।

श्लोक 5 (skanda.5.253.5)

ईश्वर उवाच - कस्मात्संक्लिश्यसे बाले कथ्यतां यद्विवक्षितम्। अहं हि भास्करोऽप्येको नानात्वं नैव विद्यते

īśvara uvāca - kasmātsaṁkliśyase bāle kathyatāṁ yadvivakṣitam| ahaṁ hi bhāskaro'pyeko nānātvaṁ naiva vidyate

ईश्वर बोले — हे बाले, तू क्यों कष्ट उठा रही है? जो कहना चाहती है, वह कह। मैं ही भास्कर भी हूँ — इसमें कोई भेद नहीं है।

श्लोक 6 (skanda.5.253.6)

प्रभोवाच - नान्यो देवः स्त्रियः शम्भो विना भर्त्रा क्वचित्प्रभो। सगुणो निर्गुणो वापि धनाढ्यो वाप्यकिंचनः

prabhovāca - nānyo devaḥ striyaḥ śambho vinā bhartrā kvacitprabho| saguṇo nirguṇo vāpi dhanāḍhyo vāpyakiṁcanaḥ

प्रभा बोली — हे शम्भो, स्त्री के लिए पति के अतिरिक्त कहीं कोई अन्य देवता नहीं है, हे प्रभो — चाहे वह गुणवान् हो या निर्गुण, चाहे धनाढ्य हो या अकिंचन,

श्लोक 7 (skanda.5.253.7)

प्रियो वा यदि वा द्वेष्यः स्त्रीणां भर्तैव दैवतम्। दुर्भगत्वेन दग्धाहं सखीमध्ये सुरेश्वर। भर्त्तर्यल्लब्धसौख्यास्मि तेन क्लिश्याम्यहं भृशम्

priyo vā yadi vā dveṣyaḥ strīṇāṁ bhartaiva daivatam| durbhagatvena dagdhāhaṁ sakhīmadhye sureśvara| bharttaryallabdhasaukhyāsmi tena kliśyāmyahaṁ bhṛśam

...चाहे प्रिय हो या द्वेष्य, पति ही स्त्रियों का देवता है। हे सुरेश्वर, मैं सखियों के बीच दुर्भाग्य से जल रही हूँ; क्योंकि मुझे पति से सुख प्राप्त नहीं हुआ, इसीलिए मैं अत्यन्त क्लेश पा रही हूँ।

श्लोक 8 (skanda.5.253.8)

ईश्वर उवाच - वल्लभा भास्करस्यैव मत्प्रसादाद्भविष्यसि

īśvara uvāca - vallabhā bhāskarasyaiva matprasādādbhaviṣyasi

ईश्वर बोले — मेरी कृपा से तू स्वयं भास्कर की प्रिय पत्नी बनेगी।

श्लोक 9 (skanda.5.253.9)

पार्वत्युवाच - अप्रमाणं भवद्वाक्यं भास्करोऽपि करिष्यति। वृथा क्लेशो भवेदस्याः प्रभायाः परमेश्वर

pārvatyuvāca - apramāṇaṁ bhavadvākyaṁ bhāskaro'pi kariṣyati| vṛthā kleśo bhavedasyāḥ prabhāyāḥ parameśvara

पार्वती बोलीं — आपका वचन अप्रमाण हो सकता है — क्या भास्कर सचमुच ऐसा करेंगे? हे परमेश्वर, इस प्रभा का क्लेश व्यर्थ ही हो जाएगा।

श्लोक 10 (skanda.5.253.10)

उमावाक्यान्महेशानध्यातस्तिमिरनाशनः। आगतो गगनाद्भानुर्नर्मदोत्तररोधसि

umāvākyānmaheśānadhyātastimiranāśanaḥ| āgato gaganādbhānurnarmadottararodhasi

उमा के वचन से, महेश द्वारा ध्यान किए गए, अन्धकार के नाशक भानु आकाश से नर्मदा के उत्तरी तट पर आए।

श्लोक 11 (skanda.5.253.11)

भानुरुवाच - आहूतोऽस्मि कथं देव ह्यघासुरनिषूदन

bhānuruvāca - āhūto'smi kathaṁ deva hyaghāsuraniṣūdana

भानु बोले — हे देव, हे अघासुरनिषूदन, मैं किसलिए बुलाया गया हूँ?

श्लोक 12 (skanda.5.253.12)

ईश्वर उवाच - प्रभां पालय भो भानो संतोषेण परेण हि

īśvara uvāca - prabhāṁ pālaya bho bhāno saṁtoṣeṇa pareṇa hi

ईश्वर बोले — हे भानो, प्रभा का परम संतोष के साथ पालन करो।

श्लोक 13 (skanda.5.253.13)

उमोवाच - प्रभाया मन्दिरे नित्यं स्थीयतां हिमनाशन। अग्रपत्नी समस्तानां भार्याणां क्रियतां रवे

umovāca - prabhāyā mandire nityaṁ sthīyatāṁ himanāśana| agrapatnī samastānāṁ bhāryāṇāṁ kriyatāṁ rave

उमा बोलीं — हे हिमनाशन, प्रभा के मन्दिर में सदा निवास करो; हे रवे, उसे अपनी समस्त पत्नियों में अग्रगण्य बनाओ।

श्लोक 14 (skanda.5.253.14)

भानुरुवाच - एवं देवि करिष्यामि तव वाक्यं वरानने। एतच्छ्रुत्वा प्रभाहूता प्रत्युवाच महेश्वरम्

bhānuruvāca - evaṁ devi kariṣyāmi tava vākyaṁ varānane| etacchrutvā prabhāhūtā pratyuvāca maheśvaram

भानु बोले — हे देवि, हे वरानने, मैं तुम्हारे वचन के अनुसार ऐसा ही करूँगा। यह सुनकर, बुलाई गई प्रभा ने महेश्वर से कहा —

श्लोक 15 (skanda.5.253.15)

प्रभोवाच - स्वांशेन स्थीयतां देव मन्मथारे उमापते। एकांशः स्थाप्यतामत्र तीर्थस्योन्मीलनाय च

prabhovāca - svāṁśena sthīyatāṁ deva manmathāre umāpate| ekāṁśaḥ sthāpyatāmatra tīrthasyonmīlanāya ca

प्रभा बोलीं — हे मन्मथारे उमापते, देव यहाँ अपने अंश से रहें; और यहाँ तीर्थ के प्रकट होने के लिए एक अंश स्थापित किया जाए।

श्लोक 16 (skanda.5.253.16)

श्रीमार्कण्डेय उवाच - सर्वदेवमयं लिङ्गं स्थापितं तत्र पाण्डव। प्रभासेश इति ख्यातं सर्वलोकेषु दुर्लभम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca - sarvadevamayaṁ liṅgaṁ sthāpitaṁ tatra pāṇḍava| prabhāseśa iti khyātaṁ sarvalokeṣu durlabham

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे पाण्डव, वहाँ सर्वदेवमय लिंग स्थापित हुआ, जो प्रभासेश नाम से विख्यात है और समस्त लोकों में दुर्लभ है।

श्लोक 17 (skanda.5.253.17)

अन्यानि यानि तीर्थानि काले तानि फलन्ति वै। प्रभासेशस्तु राजेन्द्र सद्यः कामफलप्रदः

anyāni yāni tīrthāni kāle tāni phalanti vai| prabhāseśastu rājendra sadyaḥ kāmaphalapradaḥ

अन्य जो तीर्थ हैं, वे समय पर फल देते हैं; परन्तु हे राजेन्द्र, प्रभासेश तो तत्काल इच्छित फल देने वाला है।

श्लोक 18 (skanda.5.253.18)

माघमासे सिते पक्षे सप्तम्यां च विशेषतः। अश्वं यः स्पर्शयेत्तत्र यथोक्तब्राह्मणे नृप

māghamāse site pakṣe saptamyāṁ ca viśeṣataḥ| aśvaṁ yaḥ sparśayettatra yathoktabrāhmaṇe nṛpa

विशेषतः माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को — हे राजन्, जो वहाँ यथोक्त ब्राह्मण को अश्व का स्पर्श कराता है,

श्लोक 19 (skanda.5.253.19)

इन्द्रत्वं प्राप्यते तेन भास्करस्याथवा पदम्। स्नात्वा परमया भक्त्या दानं दद्याद्द्विजातये

indratvaṁ prāpyate tena bhāskarasyāthavā padam| snātvā paramayā bhaktyā dānaṁ dadyāddvijātaye

...उससे इन्द्रत्व अथवा भास्कर के पद को प्राप्त करता है। परम भक्ति के साथ स्नान करके ब्राह्मण को दान देना चाहिए —

श्लोक 20 (skanda.5.253.20)

गोप्रदाता लभेत्स्वर्गं सत्यलोकं वरेश्वर। सर्वाङ्गसुन्दरीं शुभ्रां क्षीरिणीं तरुणीं शुभाम्

gopradātā labhetsvargaṁ satyalokaṁ vareśvara| sarvāṅgasundarīṁ śubhrāṁ kṣīriṇīṁ taruṇīṁ śubhām

हे वरेश्वर, गौ का दाता स्वर्ग तथा सत्यलोक को प्राप्त करता है — सर्वांगसुन्दरी, श्वेत, दूधवाली, युवा और शुभ गौ,

श्लोक 21 (skanda.5.253.21)

सवत्सां घण्टासंयुक्तां कांस्यपात्रावदोहिनीम्। ददते ये नृपश्रेष्ठ न ते यान्ति यमालयम्

savatsāṁ ghaṇṭāsaṁyuktāṁ kāṁsyapātrāvadohinīm| dadate ye nṛpaśreṣṭha na te yānti yamālayam

...बछड़े सहित, घंटी से युक्त, कांस्यपात्र में दुही जाने वाली — हे नृपश्रेष्ठ, जो इस प्रकार देते हैं, वे यमलोक को नहीं जाते।

श्लोक 22 (skanda.5.253.22)

अथ यः परया भक्त्या स्नानं देवस्य कारयेत्। स प्राप्नोति परं लोकं यावदाभूतसम्प्लवम्

atha yaḥ parayā bhaktyā snānaṁ devasya kārayet| sa prāpnoti paraṁ lokaṁ yāvadābhūtasamplavam

अब, जो परम भक्ति से देव का स्नान कराता है, वह प्राणियों के प्रलय पर्यन्त परम लोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (skanda.5.253.23)

दौर्भाग्यं नाशमायाति स्नानमात्रेण पाण्डव। तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या कन्यादानं प्रयच्छति

daurbhāgyaṁ nāśamāyāti snānamātreṇa pāṇḍava| tatra tīrthe tu yo bhaktyā kanyādānaṁ prayacchati

हे पाण्डव, मात्र स्नान से दुर्भाग्य नष्ट हो जाता है। और जो वहाँ भक्तिपूर्वक कन्यादान करता है,

श्लोक 24 (skanda.5.253.24)

ब्राह्मणाय विवाहेन दापयेत्पाण्डुनन्दन। समानवयसे देया कुलशीलधनैस्तथा

brāhmaṇāya vivāhena dāpayetpāṇḍunandana| samānavayase deyā kulaśīladhanaistathā

...हे पाण्डुनन्दन, उसे विवाह द्वारा ब्राह्मण को दिलाना चाहिए; उसे समान आयु वाले तथा कुल-शील-धन से युक्त वर को देना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.5.253.25)

ये ददन्ते महाराज ह्यपि पातकसंयुताः। तेषां पापानि लीयन्ते ह्युदके लवणं यथा

ye dadante mahārāja hyapi pātakasaṁyutāḥ| teṣāṁ pāpāni līyante hyudake lavaṇaṁ yathā

हे महाराज, जो इस प्रकार देते हैं, चाहे वे पापों से युक्त भी हों — उनके पाप उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं जैसे जल में लवण।

श्लोक 26 (skanda.5.253.26)

स्वामिद्रोहकृतं पापं निक्षेपस्यापहारिणि। मित्रघ्ने च कृतघ्ने च कूटसाक्ष्यसमुद्भवम्

svāmidrohakṛtaṁ pāpaṁ nikṣepasyāpahāriṇi| mitraghne ca kṛtaghne ca kūṭasākṣyasamudbhavam

स्वामिद्रोह से किया गया पाप, धरोहर के अपहरण से, मित्रघात से, कृतघ्नता से, कूटसाक्षी से उत्पन्न पाप,

श्लोक 27 (skanda.5.253.27)

तद्ग्रामोद्यानभेदोत्थं परदारनिषेवणम्। वार्द्धुषिकस्य यत्पापं यत्पापं स्तेयसम्भवम्

tadgrāmodyānabhedotthaṁ paradāraniṣevaṇam| vārddhuṣikasya yatpāpaṁ yatpāpaṁ steyasambhavam

...ग्राम या उद्यान के विनाश से उत्पन्न, परस्त्रीसेवन से, सूदखोरी का पाप, चोरी से उत्पन्न पाप,

श्लोक 28 (skanda.5.253.28)

कूपभेदोद्भवं यच्च बैडालव्रतधारिणः। दाम्भिकं वृक्षच्छेदोत्थं विवाहस्य निषेधजम्

kūpabhedodbhavaṁ yacca baiḍālavratadhāriṇaḥ| dāmbhikaṁ vṛkṣacchedotthaṁ vivāhasya niṣedhajam

...कुआँ दूषित करने से उत्पन्न, बिडालव्रतधारी (पाखण्डी) का पाप, दम्भ, वृक्षच्छेदन से उत्पन्न, विवाह में विघ्न डालने से उत्पन्न पाप,

श्लोक 29 (skanda.5.253.29)

आरामस्थतरुच्छेदमगम्यागमनोद्भवम्। स्वभार्यात्यजने यच्च परभार्यासमीहनात्

ārāmasthatarucchedamagamyāgamanodbhavam| svabhāryātyajane yacca parabhāryāsamīhanāt

...उद्यानस्थ वृक्ष का छेदन, अगम्यागमन से उत्पन्न, अपनी पत्नी को त्यागने से, तथा दूसरे की पत्नी की चाह से उत्पन्न पाप,

श्लोक 30 (skanda.5.253.30)

ब्रह्मस्वहरणे यच्च गरदे गोविघातिनि। विद्याविक्रयणोत्थं च संसर्गाद्यच्च पातकम्

brahmasvaharaṇe yacca garade govighātini| vidyāvikrayaṇotthaṁ ca saṁsargādyacca pātakam

...ब्राह्मण की सम्पत्ति के हरण से, विषदान से, गोवध से, विद्याविक्रय से उत्पन्न, तथा संसर्ग से उत्पन्न पाप,

श्लोक 31 (skanda.5.253.31)

श्वबिडालवधाद्घोरं सर्पशूद्रोद्भवं तथा। भूमिहर्तुश्च यत्पापं भूमिहारिणि चैव हि

śvabiḍālavadhādghoraṁ sarpaśūdrodbhavaṁ tathā| bhūmihartuśca yatpāpaṁ bhūmihāriṇi caiva hi

...कुत्ते या बिल्ली की हत्या से उत्पन्न घोर पाप, तथा सर्प या शूद्र की हत्या से उत्पन्न पाप, भूमि हरण करने वाले का पाप, तथा भूमि छीनने वाले का भी,

श्लोक 32 (skanda.5.253.32)

मा ददस्वेति यत्पापं गोवह्निब्राह्मणेषु च। तत्पापं याति विलयं कन्यादानेन पाण्डव

mā dadasveti yatpāpaṁ govahnibrāhmaṇeṣu ca| tatpāpaṁ yāti vilayaṁ kanyādānena pāṇḍava

...गौ, अग्नि और ब्राह्मणों के विषय में 'मत दो' कहने का जो पाप है — हे पाण्डव, वह पाप कन्यादान से विलीन हो जाता है।

श्लोक 33 (skanda.5.253.33)

स गत्वा भास्करं लोकं रुद्रलोके शुभे व्रजेत्। क्रीडते रुद्रलोकस्थो यावदिन्द्राश्चतुर्दश

sa gatvā bhāskaraṁ lokaṁ rudraloke śubhe vrajet| krīḍate rudralokastho yāvadindrāścaturdaśa

वहाँ जाकर वह भास्कर के लोक को प्राप्त करता है और शुभ रुद्रलोक को जाता है; रुद्रलोक में रहते हुए वह चौदह इन्द्रों के काल तक क्रीड़ा करता है।

श्लोक 34 (skanda.5.253.34)

सर्वपापक्षये जाते शिवे भवति भावना। एतद्व्रजति यस्तीर्थं प्रभासं पाण्डुनन्दन

sarvapāpakṣaye jāte śive bhavati bhāvanā| etadvrajati yastīrthaṁ prabhāsaṁ pāṇḍunandana

समस्त पाप का क्षय होने पर, उसका मन शिव में स्थिर हो जाता है। हे पाण्डुनन्दन, जो इस प्रभास तीर्थ को जाता है,

श्लोक 35 (skanda.5.253.35)

सर्वतीर्थफलं प्राप्य सोऽश्वमेधफलं लभेत्। गोप्रदानं महापुण्यं सर्वपापक्षयं परम्। प्रशस्तं सर्वकालं हि चतुर्दश्यां विशेषतः

sarvatīrthaphalaṁ prāpya so'śvamedhaphalaṁ labhet| gopradānaṁ mahāpuṇyaṁ sarvapāpakṣayaṁ param| praśastaṁ sarvakālaṁ hi caturdaśyāṁ viśeṣataḥ

...वह समस्त तीर्थों का फल प्राप्त करके अश्वमेध का फल प्राप्त करता है। गोदान महापुण्यकारी है, समस्त पापों का परम नाशक है, यह सदैव प्रशस्त है, परन्तु विशेषतः चतुर्दशी को।

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