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अवन्ती खण्ड · अध्याय 269

अयोनिसंभव तीर्थ की महिमा

अध्याय 268अध्याय-सूचीअध्याय 270

श्लोक 1 (skanda.5.269.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम्। अयोनिजं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchettu rājendra tīrthaṁ paramaśobhanam| ayonijaṁ mahāpuṇyaṁ sarvapāpapraṇāśanam||

श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजेन्द्र! इसके पश्चात एक परम सुंदर तीर्थ है, जो अयोनिज (योनि से उत्पन्न न हुआ), महापुण्यमय तथा समस्त पापों का नाशक है।

श्लोक 2 (skanda.5.269.2)

अयोनिजे नरः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम्। पितृदेवार्चनं कृत्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः।

ayonije naraḥ snātvā pūjayetparameśvaram| pitṛdevārcanaṁ kṛtvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ||

अयोनिज तीर्थ में स्नान कर मनुष्य परमेश्वर की पूजा करे तथा पितृदेवताओं का पूजन करे, तो वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.5.269.3)

तत्र तीर्थे तु विधिना प्राणत्यागं करोति यः। स कदाचिन्महाराज योनिद्वारं न पश्यति।

tatra tīrthe tu vidhinā prāṇatyāgaṁ karoti yaḥ| sa kadācinmahārāja yonidvāraṁ na paśyati||

हे महाराज! जो कोई विधिपूर्वक उस तीर्थ में प्राणत्याग करता है, वह कभी भी योनि-द्वार को नहीं देखता, अर्थात पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है।

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