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अवन्ती खण्ड · अध्याय 270

अंगारक तीर्थ की महिमा

अध्याय 269अध्याय-सूचीअध्याय 271

श्लोक 1 (skanda.5.270.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महाराज तीर्थमङ्गारकं परम्। रूपदं सर्वलोकानां विश्रुतं नर्मदातटे।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahārāja tīrthamaṅgārakaṁ param| rūpadaṁ sarvalokānāṁ viśrutaṁ narmadātaṭe||

श्री मार्कण्डेय बोले - हे महाराज! इसके पश्चात परम अंगारक तीर्थ में जाना चाहिए, जो समस्त लोकों को रूप प्रदान करने वाला तथा नर्मदा के तट पर विख्यात है।

श्लोक 2 (skanda.5.270.2)

अङ्गारकेण राजेन्द्र पुरा तप्तं तपः किल। अर्बुदं च निखर्वं च प्रयुतं वर्षसंख्यया।

aṅgārakeṇa rājendra purā taptaṁ tapaḥ kila| arbudaṁ ca nikharvaṁ ca prayutaṁ varṣasaṁkhyayā||

हे राजेन्द्र! पूर्वकाल में अंगारक ने अर्बुद, निखर्व और प्रयुत वर्षों की संख्या तक तप किया था।

श्लोक 3 (skanda.5.270.3)

ततस्तुष्टो महादेवः परया कृपया नृप। प्रत्यक्षदर्शी भगवानुवाच क्षितिनन्दनम्।

tatastuṣṭo mahādevaḥ parayā kṛpayā nṛpa| pratyakṣadarśī bhagavānuvāca kṣitinandanam||

तब हे राजन्! परम कृपा से प्रसन्न होकर भगवान महादेव साक्षात् प्रकट होकर पृथ्वीनंदन (अंगारक) से बोले।

श्लोक 4 (skanda.5.270.4)

वरदोऽस्मि महाभाग दुर्लभं त्रिदशैरपि। वरं दास्याम्यहं वत्स ब्रूहि यत्ते विवक्षितम्।

varado'smi mahābhāga durlabhaṁ tridaśairapi| varaṁ dāsyāmyahaṁ vatsa brūhi yatte vivakṣitam||

हे महाभाग! मैं वरदाता हूं, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। हे वत्स! मैं तुम्हें वर दूंगा, जो चाहते हो कहो।

श्लोक 5 (skanda.5.270.5)

अङ्गारक उवाच। तव प्रसादाद्देवेश सर्वलोकमहेश्वर। ग्रहमध्यगतो नित्यं विचरामि नभस्तले।

aṅgāraka uvāca| tava prasādāddeveśa sarvalokamaheśvara| grahamadhyagato nityaṁ vicarāmi nabhastale||

अंगारक बोले - हे देवेश! हे सर्वलोकमहेश्वर! आपकी कृपा से मैं नित्य ग्रहों के मध्य स्थित होकर आकाश में विचरण करूं -

श्लोक 6 (skanda.5.270.6)

यावद्धराधरो लोके यावच्चन्द्रदिवाकरौ। नद्यो नदाः समुद्राश्च वरो मे चाक्षयो भवेत्।

yāvaddharādharo loke yāvaccandradivākarau| nadyo nadāḥ samudrāśca varo me cākṣayo bhavet||

-जब तक संसार में पर्वत, चंद्र-सूर्य, नदियां, नद और समुद्र विद्यमान रहें, तब तक मेरा यह वर अक्षय रहे।

श्लोक 7 (skanda.5.270.7)

एवमस्त्विति देवेशो दत्त्वा वरमनुत्तमम्। जगामाकाशमाविश्य वन्द्यमानः सुरासुरैः।

evamastviti deveśo dattvā varamanuttamam| jagāmākāśamāviśya vandyamānaḥ surāsuraiḥ||

"ऐसा ही हो" कहकर देवेश ने वह अनुपम वर देकर, देव-दानवों द्वारा वंदित होते हुए आकाश में प्रविष्ट होकर प्रस्थान किया।

श्लोक 8 (skanda.5.270.8)

भूमिपुत्रस्ततस्तस्मिन्स्थापयामास शङ्करम्। गतः सुरालये लोके ग्रहभावे निवेशितः।

bhūmiputrastatastasminsthāpayāmāsa śaṅkaram| gataḥ surālaye loke grahabhāve niveśitaḥ||

तत्पश्चात भूमिपुत्र (अंगारक) ने वहां शंकर को स्थापित किया, और ग्रह-भाव में स्थापित होकर देवलोक को चले गए।

श्लोक 9 (skanda.5.270.9)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम्। हुतहोमो जितक्रोधः सोऽश्वमेधफलं लभेत्।

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetparameśvaram| hutahomo jitakrodhaḥ so'śvamedhaphalaṁ labhet||

वहां उस तीर्थ में स्नान कर जो परमेश्वर की पूजा करता है, हवन कर तथा क्रोध पर विजय पाकर, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 10 (skanda.5.270.10)

चतुर्थ्यङ्गारके यस्तु स्नात्वा चाभ्यर्चयेद्ग्रहम्। अङ्गारकं विधानेन सप्तजन्मानि भारत।

caturthyaṅgārake yastu snātvā cābhyarcayedgraham| aṅgārakaṁ vidhānena saptajanmāni bhārata||

हे भारत! जो चतुर्थी को मंगलवार के दिन स्नान कर विधिपूर्वक अंगारक ग्रह की पूजा करता है, वह सात जन्मों तक -

श्लोक 11 (skanda.5.270.11)

दशयोजनविस्तीर्णे मण्डले रूपवान् भवेत्। तत्रैव ता मृतो जन्तुः कामतोऽकामतोऽपि वा। रुद्रस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते।

daśayojanavistīrṇe maṇḍale rūpavān bhavet| tatraiva tā mṛto jantuḥ kāmato'kāmato'pi vā| rudrasyānucaro bhūtvā tenaiva saha modate||

-दस योजन विस्तृत मंडल में रूपवान होता है। वहां जो भी प्राणी इच्छा से अथवा अनिच्छा से मृत्यु को प्राप्त होता है, वह रुद्र का अनुचर बनकर उन्हीं के साथ आनंद मनाता है।

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