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अवन्ती खण्ड · अध्याय 275

कम्बुकेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 274अध्याय-सूचीअध्याय 276

श्लोक 1 (skanda.5.275.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। अतः परं प्रवक्ष्यामि कम्बुकेश्वरमुत्तमम् । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो दानवो बलदर्पितः ।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| ataḥ paraṁ pravakṣyāmi kambukeśvaram uttamam| hiraṇyakaśipur daityo dānavo baladarpitaḥ||

श्री मार्कण्डेय बोले - अब मैं इससे आगे उत्तम कम्बुकेश्वर तीर्थ का वर्णन करूँगा। हिरण्यकशिपु नामक दैत्य बल के मद में चूर एक दानव था।

श्लोक 2 (skanda.5.275.2)

अवध्यः सर्वलोकानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । तस्य पुत्रो महातेजाः प्रह्लादो नाम नामतः ।

avadhyaḥ sarvalokānāṁ triṣu lokeṣu viśrutaḥ| tasya putro mahātejāḥ prahlādo nāma nāmataḥ||

वह समस्त लोकों के लिए अवध्य था और तीनों लोकों में विख्यात था। उसका पुत्र महातेजस्वी प्रह्लाद नाम से प्रसिद्ध था।

श्लोक 3 (skanda.5.275.3)

विष्णुप्रसादाद्भक्त्या च तस्य राज्ये प्रतिष्ठितः । विरोचनस्तस्य सुतस्तस्यापि बलिरेव च ।

viṣṇuprasādād bhaktyā ca tasya rājye pratiṣṭhitaḥ| virocanas tasya sutas tasyāpi balir eva ca||

विष्णु की कृपा और भक्ति से वह अपने राज्य में प्रतिष्ठित हुआ। उसका पुत्र विरोचन था और विरोचन का पुत्र बलि था।

श्लोक 4 (skanda.5.275.4)

बलिपुत्रोऽभवद्बाणस्तस्मादपि च शम्बरः । शम्बरस्यान्वये जातः कम्बुर्नाम महासुरः ।

baliputro 'bhavad bāṇas tasmād api ca śambaraḥ| śambarasyānvaye jātaḥ kambur nāma mahāsuraḥ||

बलि का पुत्र बाण हुआ, उससे शम्बर उत्पन्न हुआ। शम्बर के वंश में कम्बु नामक महान असुर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 5 (skanda.5.275.5)

ज्ञात्वा विष्णुमयं घोरं महद्भयमुपस्थितम् । दानवानां विनाशाय नान्यो हेतुः कदाचन ।

jñātvā viṣṇumayaṁ ghoraṁ mahad bhayam upasthitam| dānavānāṁ vināśāya nānyo hetuḥ kadācana||

यह जानकर कि विष्णुमय भयंकर महाभय उपस्थित है, और दानवों के विनाश का इसके अतिरिक्त कभी कोई अन्य कारण नहीं होता,

श्लोक 6 (skanda.5.275.6)

स त्यक्त्वा पुत्रदारांश्च सुहृद्बन्धुपरिग्रहान् । चचार मौनमास्थाय तपः कम्बुर्महामतिः ।

sa tyaktvā putradārāṁś ca suhṛdbandhuparigrahān| cacāra maunam āsthāya tapaḥ kambur mahāmatiḥ||

उस महामति कम्बु ने पुत्र, पत्नी, मित्र, बन्धु-बान्धव और परिग्रह का त्याग करके मौन धारण कर तपस्या की।

श्लोक 7 (skanda.5.275.7)

अक्षसूत्रकरो भूत्वा दण्डी मुण्डी च मेखली । शाकयावकभक्षश्च वल्कलाजिनसंवृतः ।

akṣasūtrakaro bhūtvā daṇḍī muṇḍī ca mekhalī| śākayāvakabhakṣaś ca valkalājinasaṁvṛtaḥ||

हाथ में अक्षसूत्र (माला) लिए, दण्डधारी, मुण्डित मस्तक, करधनी बाँधे, शाक और यवाग्र भोजन करता हुआ, वल्कल और मृगचर्म धारण किए हुए,

श्लोक 8 (skanda.5.275.8)

स्नात्वा नित्यं धृतिपरो नर्मदाजलमाश्रितः । पूजयंस्तु महादेवमर्बुदं वर्षसंख्यया ।

snātvā nityaṁ dhṛtiparo narmadājalam āśritaḥ| pūjayaṁs tu mahādevam arbudaṁ varṣasaṅkhyayā||

वह प्रतिदिन स्नान कर धैर्यपरायण होकर नर्मदा के जल का आश्रय लेकर अर्बुद (करोड़ों) वर्षों तक महादेव की पूजा करता रहा।

श्लोक 9 (skanda.5.275.9)

ततस्तुतोष भगवान्देवदेवो महेश्वरः । उवाच दानवं काले मेघगम्भीरया गिरा ।

tatas tutoṣa bhagavān devadevo maheśvaraḥ| uvāca dānavaṁ kāle meghagambhīrayā girā||

तब भगवान् देवदेव महेश्वर संतुष्ट हुए और समय आने पर मेघ के समान गम्भीर वाणी में उस दानव से बोले।

श्लोक 10 (skanda.5.275.10)

भोभोः कम्बो महाभाग तुष्टोऽहं तव सुव्रत । इष्टं व्रतानां परमं मौनं सर्वार्थसाधनम् ।

bhobhoḥ kambo mahābhāga tuṣṭo 'haṁ tava suvrata| iṣṭaṁ vratānāṁ paramaṁ maunaṁ sarvārthasādhanam||

हे महाभाग कम्बु! हे सुव्रत! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। मौन व्रतों में सर्वश्रेष्ठ है और सभी प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है।

श्लोक 11 (skanda.5.275.11)

चरितं च त्वया लोके देवदानवदुश्चरम् । वरं वृणीष्व भद्रं ते यत्ते मनसि रोचते ।

caritaṁ ca tvayā loke devadānavaduścaram| varaṁ vṛṇīṣva bhadraṁ te yat te manasi rocate||

तुमने संसार में वह आचरण किया है जो देवों और दानवों के लिए भी दुष्कर है। जो तुम्हारे मन को भाए, वह वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 12 (skanda.5.275.12)

कम्बुरुवाच। यदि प्रसन्नो देवेश यदि देयो वरो मम । अक्षय्यश्चाव्ययश्चैव स्वेच्छया विचराम्यहम् ।

kamburuvāca| yadi prasanno deveśa yadi deyo varo mama| akṣayyaś cāvyayaś caiva svecchayā vicarāmy aham||

कम्बु ने कहा - हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो मैं अक्षय और अव्यय होकर अपनी इच्छा से विचरण करूँ।

श्लोक 13 (skanda.5.275.13)

दैत्यदानवसङ्घानां संयुगेष्वपलायिता । भयं चान्यन्न विद्येत मुक्त्वा देवं गदाधरम् ।

daityadānavasaṅghānāṁ saṁyugeṣv apalāyitā| bhayaṁ cānyan na vidyeta muktvā devaṁ gadādharam||

दैत्यों और दानवों के समूहों में युद्ध में कभी पलायन न करूँ, और गदाधर देव (विष्णु) को छोड़कर मुझे अन्य किसी से भय न हो।

श्लोक 14 (skanda.5.275.14)

तस्याहं संयुगे साध्यो येनोपायेन शङ्कर । भवामि न सदा कालं तं वदस्व वरं मम ।

tasyāhaṁ saṁyuge sādhyo yenopāyena śaṅkara| bhavāmi na sadā kālaṁ taṁ vadasva varaṁ mama||

हे शंकर! जिस उपाय से मैं उस विष्णु के लिए युद्ध में सदा-सर्वदा वश्य न रहूँ, वही वर मुझे बताइए।

श्लोक 15 (skanda.5.275.15)

ईश्वर उवाच। मम संनिहितो यत्र त्वं भविष्यसि दानव । तत्र विष्णुभयं नास्ति वसात्र विगतज्वरः ।

īśvara uvāca| mama saṁnihito yatra tvaṁ bhaviṣyasi dānava| tatra viṣṇubhayaṁ nāsti vasātra vigatajvaraḥ||

ईश्वर ने कहा - हे दानव! जहाँ तुम मेरे सान्निध्य में रहोगे, वहाँ विष्णु का भय नहीं होगा; निश्चिन्त होकर वहीं निवास करो।

श्लोक 16 (skanda.5.275.16)

तस्य देवाधिदेवस्य वेदगर्भस्य संयुगे । शङ्खचक्रधरस्येशा नाहं सर्वे सुरासुराः ।

tasya devādhidevasya vedagarbhasya saṁyuge| śaṅkhacakradharasyeśā nāhaṁ sarve surāsurāḥ||

उस देवाधिदेव, वेदगर्भ, शंख-चक्रधारी के युद्ध में न मैं और न ही समस्त सुर-असुर मिलकर भी समर्थ हैं।

श्लोक 17 (skanda.5.275.17)

किं पुनर्यो द्विषत्येनं लोकालोकप्रभुं हरिम् । स सुखी वर्तते कालं न निमेषं मतं मम ।

kiṁ punar yo dviṣaty enaṁ lokālokaprabhuṁ harim| sa sukhī vartate kālaṁ na nimeṣaṁ matam mama||

फिर जो इस लोकालोकप्रभु हरि से द्वेष करता है, वह क्षणभर भी सुखी नहीं रह सकता - यह मेरा मत है।

श्लोक 18 (skanda.5.275.18)

तस्मात्त्वं परया भक्त्या सर्वभूतहिते रतः । वसिष्यसि चिरं कालमित्युक्त्वादर्शनं गतः ।

tasmāt tvaṁ parayā bhaktyā sarvabhūtahite rataḥ| vasiṣyasi ciraṁ kālam ity uktvādarśanaṁ gataḥ||

इसलिए तुम परम भक्ति से समस्त प्राणियों के हित में रत रहकर यहाँ दीर्घकाल तक निवास करोगे - ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 19 (skanda.5.275.19)

गते चादर्शनं देवे तत्र तीर्थे महामतिः । स्थापयामास देवेशं शिवं शान्तमनामयम् ।

gate cādarśanaṁ deve tatra tīrthe mahāmatiḥ| sthāpayāmāsa deveśaṁ śivaṁ śāntam anāmayam||

देव के अन्तर्धान हो जाने पर उस महामति ने उस तीर्थ में शान्त और निरामय देवेश शिव की स्थापना की।

श्लोक 20 (skanda.5.275.20)

तस्मिंस्तीर्थे महादेवं स्थापयित्वा दिवं गतः । तदाप्रभृति तत्पार्थ कम्बुतीर्थमिति श्रुतम् । विख्यातं सर्वलोकेषु महापातकनाशनम् ।

tasmiṁs tīrthe mahādevaṁ sthāpayitvā divaṁ gataḥ| tadāprabhṛti tat pārtha kambutīrtham iti śrutam| vikhyātaṁ sarvalokeṣu mahāpātakanāśanam||

उस तीर्थ में महादेव की स्थापना करके वह स्वर्ग को चला गया। हे पार्थ! तभी से वह कम्बुतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जो समस्त लोकों में महापातकों का नाशक माना जाता है।

श्लोक 21 (skanda.5.275.21)

कम्बुतीर्थे नरः स्नात्वा विधिनाभ्यर्च्य भास्करम् । ऋग्यजुःसाममन्त्रैश्च स्तूयमानो नृपोत्तम ।

kambutīrthe naraḥ snātvā vidhinābhyarcya bhāskaram| ṛgyajuḥsāmamantraiś ca stūyamāno nṛpottama||

हे नृपोत्तम! कम्बुतीर्थ में स्नान कर विधिपूर्वक सूर्य की पूजा करने वाला तथा ऋक्, यजुः और साम मन्त्रों से स्तुति किया जाने वाला मनुष्य,

श्लोक 22 (skanda.5.275.22)

तस्य पुण्यं समुद्दिष्टं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । तत्सर्वं तु शृणुष्वाद्य ममैव गदतो नृप ।

tasya puṇyaṁ samuddiṣṭaṁ brāhmaṇair vedapāragaiḥ| tat sarvaṁ tu śṛṇuṣvādya mamaiva gadato nṛpa||

उसे वह पुण्य प्राप्त होता है जो वेदपारंगत ब्राह्मणों द्वारा बताया गया है। हे राजन्! आज वह सब मुझसे ही सुनो।

श्लोक 23 (skanda.5.275.23)

ऋग्यजुःसामगीतेषु साङ्गोपाङ्गेषु यत्फलम् । तत्फलं समवाप्नोति गायत्रीमात्रमन्त्रवित् ।

ṛgyajuḥsāmagīteṣu sāṅgopāṅgeṣu yat phalam| tat phalaṁ samavāpnoti gāyatrīmātramantravit||

अंग-उपांगों सहित ऋक्, यजुः और साम के गान से जो फल प्राप्त होता है, वही फल केवल गायत्री मन्त्र जानने वाले को भी यहाँ प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 24 (skanda.5.275.24)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः । पूजयेद्देवमीशानं सोऽग्निष्टोमफलं लभेत् ।

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā tarpayet pitṛdevatāḥ| pūjayed devam īśānaṁ so 'gniṣṭomaphalaṁ labhet||

जो उस तीर्थ में स्नान कर पितरों और देवताओं का तर्पण करता है तथा ईशान देव की पूजा करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 25 (skanda.5.275.25)

अकामो वा सकामो वा तत्र तीर्थे कलेवरम् । यस्त्यजेन्नात्र सन्देहो रुद्रलोकं स गच्छति ।

akāmo vā sakāmo vā tatra tīrthe kalevaram| yas tyajen nātra sandeho rudralokaṁ sa gacchati||

चाहे निष्काम हो या सकाम, जो भी उस तीर्थ में अपना शरीर त्यागता है, वह निःसन्देह रुद्रलोक को प्राप्त होता है।

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