अवन्ती खण्ड · अध्याय 276
सोम तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.276.1)
मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल चन्द्रहासमतः परम् । यत्र सिद्धिं परां प्राप्तः सोमराजः सुरोत्तमः ।
mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla candrahāsam ataḥ param| yatra siddhiṁ parāṁ prāptaḥ somarājaḥ surottamaḥ||
मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात राजा को चन्द्रहास तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ सुरश्रेष्ठ सोमराज (चन्द्रमा) ने परम सिद्धि प्राप्त की थी।
श्लोक 2 (skanda.5.276.2)
युधिष्ठिर उवाच। कथं सिद्धिं परां प्राप्तः सोमनाथो जगत्पतिः । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथयस्व ममानघ ।
yudhiṣṭhira uvāca| kathaṁ siddhiṁ parāṁ prāptaḥ somanātho jagatpatiḥ| tat sarvaṁ śrotum icchāmi kathayasva mamānagha||
युधिष्ठिर बोले - जगत्पति सोमनाथ (चन्द्रमा) ने परम सिद्धि कैसे प्राप्त की? हे निष्पाप! मैं वह सब सुनना चाहता हूँ, मुझे बताइए।
श्लोक 3 (skanda.5.276.3)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। पुरा शप्तो मुनीन्द्रेण दक्षेण किल भारत । असेवनाद्धि दाराणां क्षयरोगी भविष्यसि ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| purā śapto munīndreṇa dakṣeṇa kila bhārata| asevanād dhi dārāṇāṁ kṣayarogī bhaviṣyasi||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे भारत! पूर्वकाल में मुनीन्द्र दक्ष ने उसे शाप दिया था - 'पत्नियों की अवहेलना करने के कारण तू क्षयरोगी हो जाएगा।'
श्लोक 4 (skanda.5.276.4)
उद्वाहितानां पत्नीनां ये न कुर्वन्ति सेवनम् । या निष्ठा जायते नृणां तां शृणुष्व नराधिप ।
udvāhitānāṁ patnīnāṁ ye na kurvanti sevanam| yā niṣṭhā jāyate nṛṇāṁ tāṁ śṛṇuṣva narādhipa||
हे नराधिप! जो पुरुष अपनी विवाहित पत्नियों की सेवा नहीं करते, उनकी जो गति होती है, वह सुनो।
श्लोक 5 (skanda.5.276.5)
ऋतावृतौ हि नारीणां सेवनाज्जायते सुतः । सुतात्स्वर्गश्च मोक्षश्च इत्येवं श्रुतिभाषितम् ।
ṛtāvṛtau hi nārīṇāṁ sevanāj jāyate sutaḥ| sutāt svargaś ca mokṣaś ca ity evaṁ śrutibhāṣitam||
स्त्रियों की ऋतु के समय सेवा करने से पुत्र उत्पन्न होता है, और पुत्र से स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त होते हैं - ऐसा श्रुति में कहा गया है।
श्लोक 6 (skanda.5.276.6)
तत्कालोचितधर्मेण वेष्टितो रौरवे पतेत् । तस्यास्तद्रुधिरं पापः पिबते कालमीप्सितम् ।
tatkālocitadharmeṇa veṣṭito raurave patet| tasyās tad rudhiraṁ pāpaḥ pibate kālam īpsitam||
उस समयोचित धर्म के उल्लंघन से बंधकर वह रौरव नरक में गिरता है, और वह पापी उस स्त्री का रक्त नियत काल तक पीता रहता है।
श्लोक 7 (skanda.5.276.7)
ततोऽवतीर्णः कालेन यां यां योनिं प्रयास्यति । तस्यां तस्यां स दुष्टात्मा दुर्भगो जायते सदा ।
tato 'vatīrṇaḥ kālena yāṁ yāṁ yoniṁ prayāsyati| tasyāṁ tasyāṁ sa duṣṭātmā durbhago jāyate sadā||
फिर काल पूर्ण होने पर वह जिस-जिस योनि में जाता है, उस-उस योनि में वह दुष्टात्मा सदा दुर्भाग्यशाली होकर जन्म लेता है।
श्लोक 8 (skanda.5.276.8)
नारीणां तु सदा कामोऽभ्यधिकाः परिवर्तते । विशेषेण ऋतौ काले पीड्यते कामसायकैः ।
nārīṇāṁ tu sadā kāmo 'bhyadhikāḥ parivartate| viśeṣeṇa ṛtau kāle pīḍyate kāmasāyakaiḥ||
स्त्रियों में काम सदा अधिक होता है और बदलता रहता है, विशेषतः ऋतुकाल में वे कामबाणों से पीड़ित होती हैं।
श्लोक 9 (skanda.5.276.9)
परिभूता हिता भर्त्रा ध्यायन्तेऽन्यं पतिं स्त्रियः । ततः पुत्रः समुत्पन्नो ह्यटते कुलमुत्तमम् ।
paribhūtā hitā bhartrā dhyāyante 'nyaṁ patiṁ striyaḥ| tataḥ putraḥ samutpanno hy aṭate kulam uttamam||
पति के द्वारा उपेक्षित होकर भी प्रिय स्त्रियाँ अन्य पुरुष का ध्यान करने लगती हैं, और तब उत्पन्न पुत्र श्रेष्ठ कुल को नष्ट कर देता है।
श्लोक 10 (skanda.5.276.10)
स्वर्गस्थास्तेन पितरः पूर्वजास्ते पितामहाः । पतन्ति जातमात्रेण कुलटस्तेन चोच्यते ।
svargasthās tena pitaraḥ pūrvajās te pitāmahāḥ| patanti jātamātreṇa kulaṭas tena cocyate||
उसके कारण स्वर्गस्थ पूर्वज पितर और पितामह उसके जन्म लेते ही पतित हो जाते हैं, और वह 'कुलट' कहलाता है।
श्लोक 11 (skanda.5.276.11)
तेन कर्मविपाकेन क्षयरोग्यभवच्छशी । त्यक्त्वा लोकं सुरेन्द्राणां मर्त्यलोकमुपागतः ।
tena karmavipākena kṣayarogy abhavac chaśī| tyaktvā lokaṁ surendrāṇāṁ martyalokam upāgataḥ||
उस कर्म के फलस्वरूप चन्द्रमा क्षयरोगी हो गया, और सुरेन्द्रों के लोक को त्यागकर मर्त्यलोक में आ गया।
श्लोक 12 (skanda.5.276.12)
ततस्तीर्थान्यनेकानि पुण्यान्यायतनानि च । भ्रमन्वै नर्मदां प्राप्तः सर्वपापप्रणाशनीम् ।
tatas tīrthāny anekāni puṇyāny āyatanāni ca| bhraman vai narmadāṁ prāptaḥ sarvapāpapraṇāśanīm||
फिर अनेक तीर्थों और पवित्र स्थानों में भ्रमण करता हुआ वह सर्वपाप का नाश करने वाली नर्मदा में पहुँचा।
श्लोक 13 (skanda.5.276.13)
उपवासं च दानानि व्रतानि नियमांस्तथा । चचार द्वादशाब्दानि ततो मुक्तः स किल्बिषैः ।
upavāsaṁ ca dānāni vratāni niyamāṁs tathā| cacāra dvādaśābdāni tato muktaḥ sa kilbiṣaiḥ||
उसने बारह वर्षों तक उपवास, दान, व्रत और नियमों का पालन किया, जिससे वह पापों से मुक्त हो गया।
श्लोक 14 (skanda.5.276.14)
स्नापयित्वा महादेवं सर्वपातकनाशनम् । जगाम प्रभया पूर्णः स च लोकमनुत्तमम् ।
snāpayitvā mahādevaṁ sarvapātakanāśanam| jagāma prabhayā pūrṇaḥ sa ca lokam anuttamam||
सर्वपातकनाशक महादेव का अभिषेक करके वह प्रभा से परिपूर्ण होकर सर्वोत्तम लोक को चला गया।
श्लोक 15 (skanda.5.276.15)
येनैव स्थापितो देवः पूज्यते वर्षसंख्यया । तावद्वर्षसहस्राणि रुद्रलोके स पूज्यते ।
yenaiva sthāpito devaḥ pūjyate varṣasaṅkhyayā| tāvad varṣasahasrāṇi rudraloke sa pūjyate||
जिसके द्वारा स्थापित देव जितने वर्षों तक पूजित होता है, वह पूजक उतने ही सहस्र वर्षों तक रुद्रलोक में पूजित होता है।
श्लोक 16 (skanda.5.276.16)
तेन देवान्विधानोक्तान्स्थापयन्ति नरा भुवि । अक्षयं चाव्ययं यस्मात्कालं भुञ्जन्ति मानवाः ।
tena devān vidhānoktān sthāpayanti narā bhuvi| akṣayaṁ cāvyayaṁ yasmāt kālaṁ bhuñjanti mānavāḥ||
इसीलिए मनुष्य पृथ्वी पर विधानोक्त देवताओं की स्थापना करते हैं, क्योंकि इससे मनुष्य अक्षय और अव्यय काल का भोग करते हैं।
श्लोक 17 (skanda.5.276.17)
सोमतीर्थे नरः स्नात्वा पूजयेद्देवमीश्वरम् । स भ्राजते नरो लोके सोमवत्प्रियदर्शनः ।
somatīrthe naraḥ snātvā pūjayed devam īśvaram| sa bhrājate naro loke somavat priyadarśanaḥ||
सोमतीर्थ में स्नान कर ईश्वर देव की पूजा करने वाला मनुष्य लोक में चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन होकर सुशोभित होता है।
श्लोक 18 (skanda.5.276.18)
चन्द्रहासे तु यो गत्वा ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः । स्नानं समाचरेद्भक्त्या मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।
candrahāse tu yo gatvā grahaṇe candrasūryayoḥ| snānaṁ samācared bhaktyā mucyate sarvakilbiṣaiḥ||
जो चन्द्रहास तीर्थ में जाकर चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण के समय भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 19 (skanda.5.276.19)
तत्र स्नानं च दानं च चन्द्रहासे शुभाशुभम् । कृतं नृपवरश्रेष्ठ सर्वं भवति चाक्षयम् ।
tatra snānaṁ ca dānaṁ ca candrahāse śubhāśubham| kṛtaṁ nṛpavaraśreṣṭha sarvaṁ bhavati cākṣayam||
हे नृपश्रेष्ठ! चन्द्रहास तीर्थ में किया गया स्नान और दान, चाहे शुभ हो या साधारण, सब अक्षय हो जाता है।
श्लोक 20 (skanda.5.276.20)
ते धन्यास्ते महात्मानस्तेषां जन्म सुजीवितम् । चन्द्रहासे तु ये स्नात्वा पश्यन्ति ग्रहणं नराः ।
te dhanyās te mahātmānas teṣāṁ janma sujīvitam| candrahāse tu ye snātvā paśyanti grahaṇaṁ narāḥ||
वे धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उनका जन्म सफल है, जो चन्द्रहास में स्नान कर ग्रहण के दर्शन करते हैं।
श्लोक 21 (skanda.5.276.21)
वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुराकृतम् । स्नानमात्रेण राजेन्द्र तत्र तीर्थे प्रणश्यति ।
vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karmajaṁ yat purākṛtam| snānamātreṇa rājendra tatra tīrthe praṇaśyati||
हे राजेन्द्र! वाणी, मन और कर्म से उत्पन्न जो भी पूर्वकृत पाप हो, वह उस तीर्थ में केवल स्नान मात्र से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 22 (skanda.5.276.22)
बहवस्तं न जानन्ति महामोहसमन्विताः । देहस्थमिव सर्वेषां परमानन्दरूपिणम् ।
bahavas taṁ na jānanti mahāmohasamanvitāḥ| dehastham iva sarveṣāṁ paramānandarūpiṇam||
अनेक लोग महामोह से युक्त होकर उसे नहीं पहचानते, जो सबके शरीर में स्थित परमानन्दस्वरूप है।
श्लोक 23 (skanda.5.276.23)
पश्चिमे सागरे गत्वा सोमतीर्थे तु यत्फलम् । तत्समग्रमवाप्नोति चन्द्रहासे न संशयः ।
paścime sāgare gatvā somatīrthe tu yat phalam| tat samagram avāpnoti candrahāse na saṁśayaḥ||
पश्चिम समुद्र में जाकर सोमतीर्थ में जो फल मिलता है, वह समस्त फल निःसन्देह चन्द्रहास में ही प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.5.276.24)
संक्रान्तौ च व्यतीपाते अयने विषुवे तथा । चन्द्रहासे नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
saṅkrāntau ca vyatīpāte ayane viṣuve tathā| candrahāse naraḥ snātvā sarvapāpaiḥ pramucyate||
संक्रान्ति, व्यतीपात, अयन तथा विषुव के समय चन्द्रहास में स्नान करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 25 (skanda.5.276.25)
ते मूढास्ते दुराचारास्तेषां जन्म निरर्थकम् । चन्द्रहासं न जानन्ति ये रेवायां व्यवस्थितम् ।
te mūḍhās te durācārās teṣāṁ janma nirarthakam| candrahāsaṁ na jānanti ye revāyāṁ vyavasthitam||
वे मूर्ख हैं, वे दुराचारी हैं, उनका जन्म निरर्थक है, जो रेवा में स्थित चन्द्रहास को नहीं जानते।
श्लोक 26 (skanda.5.276.26)
चन्द्रहासे तु यः कश्चित्संन्यासं कुरुते द्विजः । अनिवर्तिका गतिस्तस्य सोमलोकान्न संशयः ।
candrahāse tu yaḥ kaścit sannyāsaṁ kurute dvijaḥ| anivartikā gatis tasya somalokān na saṁśayaḥ||
चन्द्रहास में जो भी द्विज संन्यास (देहत्याग) करता है, उसकी गति निःसन्देह अनिवर्तक होकर सोमलोक की होती है।