अवन्ती खण्ड · अध्याय 277
कोहन तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.277.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल कोहनस्वेति विश्रुतम् । सर्वपापहरं पुण्यं तीर्थं मृत्युविनाशनम् ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla kohanasveti viśrutam| sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ tīrthaṁ mṛtyuvināśanam||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात 'कोहनस्व' नाम से विख्यात पुण्य तीर्थ में जाना चाहिए, जो समस्त पापों का हरण करने वाला और मृत्यु का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.5.277.2)
पुरा तत्र द्विजः कश्चिद्वेदवेदाङ्गपारगः । पत्नीपुत्रसुहृद्वर्गैः स्वकर्मनिरतोऽवसत् ।
purā tatra dvijaḥ kaścid vedavedāṅgapāragaḥ| patnīputrasuhṛdvargaiḥ svakarmanirato 'vasat||
पूर्वकाल में वहाँ वेद-वेदांग में पारंगत एक ब्राह्मण अपनी पत्नी, पुत्र और मित्र-वर्ग के साथ अपने कर्म में निरत रहकर निवास करता था।
श्लोक 3 (skanda.5.277.3)
युधिष्ठिर उवाच। ब्राह्मणस्य तु यत्कर्म उत्पत्तिः क्षत्रियस्य तु । वैश्यस्यापि च शूद्रस्य तत्सर्वं कथयस्व मे ।
yudhiṣṭhira uvāca| brāhmaṇasya tu yat karma utpattiḥ kṣatriyasya tu| vaiśyasyāpi ca śūdrasya tat sarvaṁ kathayasva me||
युधिष्ठिर बोले - ब्राह्मण का जो कर्म है, क्षत्रिय की जो उत्पत्ति और कर्म है, तथा वैश्य और शूद्र का भी, वह सब मुझे बताइए।
श्लोक 4 (skanda.5.277.4)
धर्मस्यार्हस्य कामस्य मोक्षस्य च परं विधिम् । निखिलं ज्ञातुमिच्छामि नान्यो वेत्ता मतिर्मम ।
dharmasyārhasya kāmasya mokṣasya ca paraṁ vidhim| nikhilaṁ jñātum icchāmi nānyo vettā matir mama||
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के परम विधान को मैं पूर्ण रूप से जानना चाहता हूँ; मेरी बुद्धि में इसका अन्य ज्ञाता कोई नहीं है।
श्लोक 5 (skanda.5.277.5)
मार्कण्डेय उवाच। उत्पत्तिकारणं ब्रह्मा देवदेवः प्रकीर्तितः । प्रथमं सर्वभूतानां चराचरजगद्गुरुः ।
mārkaṇḍeya uvāca| utpattikāraṇaṁ brahmā devadevaḥ prakīrtitaḥ| prathamaṁ sarvabhūtānāṁ carācarajagadguruḥ||
मार्कण्डेय बोले - ब्रह्मा को देवदेव और समस्त प्राणियों में प्रथम, चराचर जगत् का गुरु तथा उत्पत्ति का कारण कहा गया है।
श्लोक 6 (skanda.5.277.6)
द्विजातयो मुखाज्जाताः क्षत्रिया बाहुयन्त्रतः । ऊरुप्रदेशाद्वैश्यास्तु शूद्राः पादेष्वथाभवन् ।
dvijātayo mukhāj jātāḥ kṣatriyā bāhuyantrataḥ| ūrupradeśād vaiśyās tu śūdrāḥ pādeṣv athābhavan||
मुख से द्विज (ब्राह्मण) उत्पन्न हुए, भुजाओं के बल से क्षत्रिय, ऊरु-प्रदेश से वैश्य, और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 7 (skanda.5.277.7)
ततस्त्वन्ये पृथग्वर्णाः पृथग्धर्मान् समाचरन् । पर्यायेण समुत्पन्ना ह्यनुलोमविलोमतः ।
tatas tv anye pṛthagvarṇāḥ pṛthagdharmān samācaran| paryāyeṇa samutpannā hy anulomavilomataḥ||
फिर अन्य पृथक्-पृथक् वर्ण भिन्न-भिन्न धर्मों का आचरण करने वाले क्रमशः अनुलोम और विलोम विवाहों से उत्पन्न हुए।
श्लोक 8 (skanda.5.277.8)
तेषां धर्मं प्रवक्ष्यामि श्रुतिस्मृत्यर्थचोदितम् । येन सम्यक्कृतेनैव सर्वे यान्ति परां गतिम् ।
teṣāṁ dharmaṁ pravakṣyāmi śrutismṛtyarthacoditam| yena samyak kṛtenaiva sarve yānti parāṁ gatim||
मैं उनके उस धर्म का वर्णन करूँगा जो श्रुति-स्मृति द्वारा निर्दिष्ट है, जिसके सम्यक् पालन से सभी परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 9 (skanda.5.277.9)
गतिर्ध्यानं विना भक्तैर्ब्राह्मणैः प्राप्यते नृप । अध्यापयन्यतो वेदान्वेदं वापि यथाविधि ।
gatir dhyānaṁ vinā bhaktair brāhmaṇaiḥ prāpyate nṛpa| adhyāpayan yato vedān vedaṁ vāpi yathāvidhi||
हे राजन्! भक्त ब्राह्मण बिना ध्यान के भी वह गति प्राप्त कर लेते हैं, क्योंकि वे विधिपूर्वक वेदों का अथवा वेद का अध्यापन करते हैं।
श्लोक 10 (skanda.5.277.10)
कुलजां रूपसम्पन्नां सर्वलक्षणलक्षिताम् । उद्वाहयेत्ततः पत्नीं गुरुणानुमते तदा ।
kulajāṁ rūpasampannāṁ sarvalakṣaṇalakṣitām| udvāhayet tataḥ patnīṁ guruṇānumate tadā||
वह कुलीन, रूपवती और सर्वलक्षणों से युक्त पत्नी से गुरु की अनुमति लेकर विवाह करे।
श्लोक 11 (skanda.5.277.11)
ततः स्मार्तं विवाहाग्निं श्रौतं वा पूजयेत्क्रमात् । प्रतिग्रहधनो भूत्वा दम्भलोभविवर्जितः ।
tataḥ smārtaṁ vivāhāgniṁ śrautaṁ vā pūjayet kramāt| pratigrahadhano bhūtvā dambhalobhavivarjitaḥ||
तत्पश्चात् वह क्रमशः स्मार्त अथवा श्रौत विवाहाग्नि की पूजा करे, प्रतिग्रह के धन से जीवन निर्वाह करे, तथा दम्भ और लोभ से रहित रहे।
श्लोक 12 (skanda.5.277.12)
पञ्चयज्ञविधानानि कारयेद्वै यथाविधि । वनं गच्छेत्ततः पश्चाद्द्वितीयाश्रमसेवनात् ।
pañcayajñavidhānāni kārayed vai yathāvidhi| vanaṁ gacchet tataḥ paścād dvitīyāśramasevanāt||
वह यथाविधि पञ्च महायज्ञों का अनुष्ठान करे, फिर द्वितीय आश्रम (गृहस्थ) का सेवन करने के पश्चात् वन को जाए।
श्लोक 13 (skanda.5.277.13)
पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य सर्वसङ्गविवर्जितः । इष्टांल्लोकानवाप्नोति न चेह जायते पुनः ।
putreṣu bhāryāṁ nikṣipya sarvasaṅgavivarjitaḥ| iṣṭāṁl lokān avāpnoti na ceha jāyate punaḥ||
पत्नी को पुत्रों के संरक्षण में सौंपकर, समस्त आसक्ति से मुक्त होकर, वह इच्छित लोकों को प्राप्त करता है और पुनः इस संसार में जन्म नहीं लेता।
श्लोक 14 (skanda.5.277.14)
क्षत्रियस्तु स्थितो राज्ये पालयित्वा वसुंधराम् । शश्वद्धर्ममनाश्चैव प्राप्नोति परमां गतिम् ।
kṣatriyas tu sthito rājye pālayitvā vasundharām| śaśvad dharmamanāś caiva prāpnoti paramāṁ gatim||
क्षत्रिय राज्य में स्थित रहकर पृथ्वी का पालन करते हुए, सदा धर्म में मन लगाकर परम गति को प्राप्त करता है।
श्लोक 15 (skanda.5.277.15)
वैश्यधर्मो न सन्देहः कृषिगोरक्षणे रतः । सत्यशौचसमोपेतो गच्छते स्वर्गमुत्तमम् ।
vaiśyadharmo na sandehaḥ kṛṣigorakṣaṇe rataḥ| satyaśaucasamopeto gacchate svargam uttamam||
वैश्य का धर्म निःसन्देह कृषि और गोरक्षा में रत रहना है; सत्य और शौच से युक्त होकर वह उत्तम स्वर्ग को प्राप्त होता है।
श्लोक 16 (skanda.5.277.16)
न शूद्रस्य पृथग्धर्मो विहितः परमेष्ठिना । न मन्त्रो न च संस्कारो न विद्यापरिसेवनम् ।
na śūdrasya pṛthagdharmo vihitaḥ parameṣṭhinā| na mantro na ca saṁskāro na vidyāparisevanam||
परमेष्ठी (ब्रह्मा) ने शूद्र के लिए न तो पृथक् धर्म विहित किया है, न मन्त्र, न संस्कार और न विद्या का अध्ययन।
श्लोक 17 (skanda.5.277.17)
न शब्दविद्यासमयो देवताभ्यर्चनानि च । यथा जातेन सततं वर्तितव्यमहर्निशम् ।
na śabdavidyāsamayo devatābhyarcanāni ca| yathā jātena satataṁ vartitavyam ahar niśam||
न उसके लिए शब्दविद्या का अध्ययन है, न देवताओं की पूजा-विधि; जिस रूप में उत्पन्न हुआ है, उसी के अनुसार उसे दिन-रात आचरण करना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.5.277.18)
स धर्मः सर्ववर्णानां पुरा सृष्टः स्वयम्भुवा । मन्त्रसंस्कारसम्पन्नास्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
sa dharmaḥ sarvavarṇānāṁ purā sṛṣṭaḥ svayambhuvā| mantrasaṁskārasampannās trayo varṇā dvijātayaḥ||
यह समस्त वर्णों का धर्म पूर्वकाल में स्वयंभू (ब्रह्मा) द्वारा रचा गया था; मन्त्र और संस्कार से सम्पन्न तीन वर्ण द्विज कहलाते हैं।
श्लोक 19 (skanda.5.277.19)
तेषां मतमनादृत्य यदि वर्तेत कामतः । स मृतो जायते श्वा वै गतिरूर्ध्वा न विद्यते ।
teṣāṁ matam anādṛtya yadi varteta kāmataḥ| sa mṛto jāyate śvā vai gatir ūrdhvā na vidyate||
यदि वह उनके मत की अवहेलना करके स्वेच्छा से आचरण करे, तो मरने पर वह श्वान (कुत्ता) बनकर जन्म लेता है, उसकी कोई ऊर्ध्वगति नहीं होती।
श्लोक 20 (skanda.5.277.20)
न तेषां प्रेषणं नित्यं तेषां मतमनुस्मरन् । यशोभागी स्वधर्मस्थः स्वर्गभागी स जायते ।
na teṣāṁ preṣaṇaṁ nityaṁ teṣāṁ matam anusmaran| yaśobhāgī svadharmasthaḥ svargabhāgī sa jāyate||
किन्तु जो उनके मत का सदैव अनुसरण करते हुए अपने धर्म में स्थित रहता है, वह यशभागी और स्वर्गभागी होता है।
श्लोक 21 (skanda.5.277.21)
एवं गुणगणाकीर्णोऽवसद्विप्रः स भारत । हनस्वेति हनस्वेति शृणोति वाक्यमीदृशम् ।
evaṁ guṇagaṇākīrṇo 'vasad vipraḥ sa bhārata| hanasveti hanasveti śṛṇoti vākyam īdṛśam||
हे भारत! इस प्रकार गुणों से युक्त वह विप्र निवास करता था; तभी उसने 'मार डालो, मार डालो' इस प्रकार की वाणी सुनी।
श्लोक 22 (skanda.5.277.22)
ततो निरीक्षते चोर्ध्वमधश्चैव दिशो दश । वेपमानः स भीतश्च प्रस्खलंश्च पदे पदे ।
tato nirīkṣate cordhvam adhaś caiva diśo daśa| vepamānaḥ sa bhītaś ca praskhalaṁś ca pade pade||
तब वह ऊपर, नीचे और दसों दिशाओं में देखने लगा; भय से काँपता हुआ वह पग-पग पर लड़खड़ाता था।
श्लोक 23 (skanda.5.277.23)
शृङ्खलायुधहस्तैश्च पाशैश्चैव सुदारुणैः । वेष्टितं महिषारूढं नरं पश्यति मन्मुखम् ।
śṛṅkhalāyudhahastaiś ca pāśaiś caiva sudāruṇaiḥ| veṣṭitaṁ mahiṣārūḍhaṁ naraṁ paśyati manmukham||
उसने भैंसे पर आरूढ़, शृंखला-आयुध और भयंकर पाशों से घिरे हुए, मेरे (यम के) समान मुखवाले पुरुष को देखा।
श्लोक 24 (skanda.5.277.24)
कृष्णांजनचयप्रख्यं कृष्णाम्बरविभूषितम् । रक्ताक्षमायतभुजं सर्वलक्षणलक्षितम् ।
kṛṣṇāñjanacayaprakhyaṁ kṛṣṇāmbaravibhūṣitam| raktākṣam āyatabhujaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam||
वह अंजन के समूह के समान काला, काले वस्त्रों से विभूषित, लाल नेत्रों वाला, लम्बी भुजाओं वाला और समस्त लक्षणों से युक्त था।
श्लोक 25 (skanda.5.277.25)
दृष्ट्वा तं तु समायान्तं निरीक्ष्यात्मानमात्मना । जपञ्जाप्यं च परमं शतरुद्रीयसंस्तवम् ।
dṛṣṭvā taṁ tu samāyāntaṁ nirīkṣyātmānam ātmanā| japañ jāpyaṁ ca paramaṁ śatarudrīyasaṁstavam||
उसे इस प्रकार आते हुए देखकर और आत्मनिरीक्षण करते हुए वह परम जाप्य शतरुद्रीय स्तोत्र का जप करने लगा।
श्लोक 26 (skanda.5.277.26)
ततः प्रोवाच भगवान्यमः संयमनो महान् । शृणु वाक्यमतो ब्रह्मन्यमोऽहं सर्वजन्तुषु ।
tataḥ provāca bhagavān yamaḥ saṁyamano mahān| śṛṇu vākyam ato brahman yamo 'haṁ sarvajantuṣu||
तब महान् भगवान् यम, जो संयमन करने वाले हैं, बोले - 'हे ब्राह्मण! सुनो, मैं समस्त प्राणियों का यम हूँ।'
श्लोक 27 (skanda.5.277.27)
संहरस्व महाभाग रुद्रजाप्यं सुदुर्भिदम् । येनाहं कालपाशैस्त्वां संयमामि गतव्यथः ।
saṁharasva mahābhāga rudrajāpyaṁ sudurbhidam| yenāhaṁ kālapāśais tvāṁ saṁyamāmi gatavyathaḥ||
'हे महाभाग! उस दुर्भेद्य रुद्र-जाप्य को बन्द करो, जिससे मैं निश्चिंत होकर तुम्हें कालपाशों से बाँध सकूँ।'
श्लोक 28 (skanda.5.277.28)
तच्छ्रुत्वा निष्ठुरं वाक्यं यमस्य मुखनिर्गतम् । महाभयसमोपेतो ब्राह्मणः प्रपलायितः ।
tac chrutvā niṣṭhuraṁ vākyaṁ yamasya mukhanirgatam| mahābhayasamopeto brāhmaṇaḥ prapalāyitaḥ||
यम के मुख से निकले उस कठोर वचन को सुनकर वह ब्राह्मण महाभय से युक्त होकर भाग खड़ा हुआ।
श्लोक 29 (skanda.5.277.29)
तस्य मार्गे गताः सर्वे यमेन सह किंकराः । तिष्ठ तिष्ठेति तं विप्रमूचुस्ते सोऽप्यधावत ।
tasya mārge gatāḥ sarve yamena saha kiṅkarāḥ| tiṣṭha tiṣṭheti taṁ vipram ūcus te so 'py adhāvata||
यम के साथ सभी किंकर उसके मार्ग में गए और उस विप्र से 'ठहरो, ठहरो' कहते रहे, परन्तु वह और भी दौड़ता रहा।
श्लोक 30 (skanda.5.277.30)
त्वरमाणः परिश्रान्तो हा हतोऽहं दुरात्मभिः । रक्ष रक्ष महादेव शरणागतवत्सल ।
tvaramāṇaḥ pariśrāntaḥ hā hato 'haṁ durātmabhiḥ| rakṣa rakṣa mahādeva śaraṇāgatavatsala||
शीघ्रता करता हुआ, परिश्रान्त होकर वह पुकार उठा - 'हाय! इन दुरात्माओं ने मुझे मार डाला। हे महादेव! शरणागतवत्सल! रक्षा करो, रक्षा करो!'
श्लोक 31 (skanda.5.277.31)
एवमुक्त्वापतद्भूमौ लिङ्गमालिङ्ग्य भारत । गतसत्त्वः स विप्रेन्द्रः समाश्रित्य सुरेश्वरम् ।
evam uktvāpatad bhūmau liṅgam āliṅgya bhārata| gatasattvaḥ sa viprendraḥ samāśritya sureśvaram||
हे भारत! ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण देवेश्वर की शरण लेकर लिंग का आलिंगन कर भूमि पर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 32 (skanda.5.277.32)
तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ देवदेवो महेश्वरः । को हनिष्यति माभैस्त्वं हुङ्कारमकरोत्तदा ।
taṁ dṛṣṭvā patitaṁ bhūmau devadevo maheśvaraḥ| ko haniṣyati mābhais tvaṁ huṅkāram akarot tadā||
उसे भूमि पर गिरा देख देवदेव महेश्वर ने कहा - 'कौन तुझे मारेगा? भय मत करो' - और तब उन्होंने हुंकार किया।
श्लोक 33 (skanda.5.277.33)
तेन ते किंकराः सर्वे यमेन सह भारत । हुङ्कारेण गताः सर्वे मेघा वातहता यथा ।
tena te kiṅkarāḥ sarve yamena saha bhārata| huṅkāreṇa gatāḥ sarve meghā vātahatā yathā||
हे भारत! उस हुंकार से यम सहित वे समस्त किंकर वैसे ही भाग गए, जैसे वायु से बिखरे हुए मेघ।
श्लोक 34 (skanda.5.277.34)
तदाप्रभृति तत्तीर्थं कोहनस्वेति विश्रुतम् । सर्वपापहरं पुण्यं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम् ।
tadāprabhṛti tat tīrthaṁ kohanasveti viśrutam| sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ sarvatīrtheṣv anuttamam||
तभी से वह तीर्थ 'कोहनस्व' नाम से विख्यात हुआ - जो सर्वपापहारी, पवित्र और समस्त तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 35 (skanda.5.277.35)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमाप्नोत्यनुत्तमम् ।
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram| agniṣṭomasya yajñasya phalam āpnoty anuttamam||
उस तीर्थ में स्नान कर परमेश्वर की पूजा करने वाला अग्निष्टोम यज्ञ का सर्वोत्तम फल प्राप्त करता है।
श्लोक 36 (skanda.5.277.36)
तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः । न पश्यति यमं देवमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ।
tatra tīrthe tu rājendra prāṇatyāgaṁ karoti yaḥ| na paśyati yamaṁ devam ity evaṁ śaṅkaro 'bravīt||
हे राजेन्द्र! उस तीर्थ में जो प्राणत्याग करता है, वह यमदेव के दर्शन नहीं करता - ऐसा शंकर ने कहा।
श्लोक 37 (skanda.5.277.37)
अग्निप्रवेशं यः कुर्याज्जले वा नृपसत्तम । अग्निलोके वसेत्तावद्यावत्कल्पशतत्रयम् ।
agnipraveśaṁ yaḥ kuryāj jale vā nṛpasattama| agniloke vaset tāvad yāvat kalpaśatatrayam||
हे नृपसत्तम! जो वहाँ अग्नि में अथवा जल में प्रवेश करता है, वह तीन सौ कल्पों तक अग्निलोक में निवास करता है।
श्लोक 38 (skanda.5.277.38)
एवं वरुणलोकेऽपि वसित्वा कालमीप्सितम् । इह लोकमनुप्राप्तो महाधनपतिर्भवेत् ।
evaṁ varuṇaloke 'pi vasitvā kālam īpsitam| iha lokam anuprāpto mahādhanapatir bhavet||
इसी प्रकार वरुणलोक में भी इच्छित काल तक निवास कर, वह पुनः इस लोक में आकर महाधनपति होता है।