अवन्ती खण्ड · अध्याय 278
कर्मदेश्वर तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.278.1)
मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र कर्मदीतीर्थमुत्तमम् । यत्र तिष्ठति विघ्नेशो गणनाथो महाबलः ।
mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchet tu rājendra karmadītīrtham uttamam| yatra tiṣṭhati vighneśo gaṇanātho mahābalaḥ||
मार्कण्डेय बोले - हे राजेन्द्र! इसके पश्चात उत्तम कर्मदी तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ महाबली गणनाथ विघ्नेश (गणेश) विराजमान हैं।
श्लोक 2 (skanda.5.278.2)
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा चतुर्थ्यां वा ह्युपोषितः । विघ्नं न विद्यते तस्य सप्तजन्मनि भारत ।
tatra tīrthe naraḥ snātvā caturthyāṁ vā hy upoṣitaḥ| vighnaṁ na vidyate tasya saptajanmani bhārata||
हे भारत! उस तीर्थ में स्नान करने वाला अथवा चतुर्थी को उपवास करने वाला मनुष्य सात जन्मों तक विघ्न से रहित रहता है।
श्लोक 3 (skanda.5.278.3)
तत्र तीर्थे हि यत्किंचिद्दीयते नृपसत्तम । तदक्षयफलं सर्वं जायते नात्र संशयः ।
tatra tīrthe hi yat kiñcid dīyate nṛpasattama| tad akṣayaphalaṁ sarvaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ||
हे नृपसत्तम! उस तीर्थ में जो कुछ भी दान दिया जाता है, वह सब निःसन्देह अक्षय फल देने वाला होता है।