Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 279

नर्मदेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 278अध्याय-सूचीअध्याय 280

श्लोक 1 (skanda.5.279.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल नर्मदेश्वरमुत्तमम् । तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla narmadeśvaram uttamam| tatra tīrthe naraḥ snātvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ||

श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात उत्तम नर्मदेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए। उस तीर्थ में स्नान करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.279.2)

अग्निप्रवेशश्च जलेऽथवा मृत्युरनाशके । अनिवर्तिका गतिस्तस्य यथा मे शङ्करोऽब्रवीत् ।

agnipraveśaś ca jale 'thavā mṛtyur anāśake| anivartikā gatis tasya yathā me śaṅkaro 'bravīt||

वहाँ अग्नि-प्रवेश करने से, जल में अथवा अनशन द्वारा मृत्यु प्राप्त करने से, उसकी गति अनिवर्तक होती है - जैसा शंकर ने मुझसे कहा था।

अध्याय 278अध्याय-सूचीअध्याय 280