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अवन्ती खण्ड · अध्याय 280

रवि तीर्थ की महिमा

अध्याय 279अध्याय-सूचीअध्याय 281

श्लोक 1 (skanda.5.280.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल रवितीर्थमनुत्तमम् । यत्र देवः सहस्रांशुस्तपस्तप्त्वा दिवं गतः ।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla ravitīrtham anuttamam| yatra devaḥ sahasrāṁśus tapas taptvā divaṁ gataḥ||

श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात अनुपम रवितीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ सहस्रांशु देव (सूर्य) तप करके स्वर्ग को गए थे।

श्लोक 2 (skanda.5.280.2)

युधिष्ठिर उवाच। कथं देवो जगद्धाता सर्वदेवनमस्कृतः । तपस्तपति देवेशस्तापसो भास्करो रविः ।

yudhiṣṭhira uvāca| kathaṁ devo jagaddhātā sarvadevanamaskṛtaḥ| tapas tapati deveśas tāpaso bhāskaro raviḥ||

युधिष्ठिर बोले - जगत् के धारक, सभी देवताओं द्वारा नमस्कृत, देवेश भास्कर रवि, वे तापस बनकर कैसे तप करते हैं?

श्लोक 3 (skanda.5.280.3)

आराध्यः सर्वभूतानां सर्वदेवैश्च पूजितः । प्रत्यक्षो दृश्यते लोके सृष्टिसंहारकारकः ।

ārādhyaḥ sarvabhūtānāṁ sarvadevaiś ca pūjitaḥ| pratyakṣo dṛśyate loke sṛṣṭisaṁhārakārakaḥ||

समस्त प्राणियों के आराध्य, सभी देवताओं द्वारा पूजित, संसार में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले सृष्टि और संहार के कर्ता -

श्लोक 4 (skanda.5.280.4)

आदित्यत्वं कथं प्राप्तः कथं भास्कर उच्यते । सर्वमेतत्समासेन कथयस्व ममानघ ।

ādityatvaṁ kathaṁ prāptaḥ kathaṁ bhāskara ucyate| sarvam etat samāsena kathayasva mamānagha||

उसने आदित्यत्व कैसे प्राप्त किया? वह भास्कर क्यों कहलाता है? हे निष्पाप! यह सब संक्षेप में मुझे बताइए।

श्लोक 5 (skanda.5.280.5)

मार्कण्डेय उवाच। महाप्रश्नो महाराज यस्त्वया परिपृच्छितः । तत्सर्वं सम्प्रवक्ष्यामि नमस्कृत्य स्वयम्भुवम् ।

mārkaṇḍeya uvāca| mahāpraśno mahārāja yas tvayā paripṛcchitaḥ| tat sarvaṁ sampravakṣyāmi namaskṛtya svayambhuvam||

मार्कण्डेय बोले - हे महाराज! तुमने बड़ा प्रश्न पूछा है, मैं स्वयंभू को नमस्कार करके उसका सम्पूर्ण उत्तर दूँगा।

श्लोक 6 (skanda.5.280.6)

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ।

āsīd idaṁ tamobhūtam aprajñātam alakṣaṇam| apratarkyam avijñeyaṁ prasuptam iva sarvataḥ||

यह सब पहले अंधकारमय, अज्ञात, अलक्षण, तर्क से परे, अविज्ञेय और सब ओर से मानो सुप्त-सा था।

श्लोक 7 (skanda.5.280.7)

ततस्तेजश्च दिव्यं च तप्तपिण्डमनुत्तमम् । आकाशात्तु यथैवोल्का सृष्टिहेतोरधोमुखी ।

tatas tejaś ca divyaṁ ca taptapiṇḍam anuttamam| ākāśāt tu yathaivolkā sṛṣṭihetor adhomukhī||

तब सृष्टि के हेतु एक दिव्य, अनुपम तप्त तेजःपिण्ड आकाश से उल्का के समान नीचे की ओर उतरा।

श्लोक 8 (skanda.5.280.8)

तत्तेजसोऽन्तः पुरुषः संजातः सर्वभूषितः । स शिवोऽपाणिपादश्च येन सर्वमिदं ततम् ।

tattejaso 'ntaḥ puruṣaḥ saṁjātaḥ sarvabhūṣitaḥ| sa śivo 'pāṇipādaś ca yena sarvam idaṁ tatam||

उस तेज के भीतर सर्वभूषित पुरुष उत्पन्न हुआ - वह अपाणिपाद शिव, जिनसे यह सब कुछ व्याप्त है।

श्लोक 9 (skanda.5.280.9)

तस्योत्पन्नस्य भूतस्य तेजो रूपस्य भारत । पश्चात्प्रजापतिर्भूयः कालः कालान्तरेण वै ।

tasyotpannasya bhūtasya tejo rūpasya bhārata| paścāt prajāpatir bhūyaḥ kālaḥ kālāntareṇa vai||

हे भारत! उस उत्पन्न हुए तेजोमय भूत से पुनः प्रजापति उत्पन्न हुआ, और फिर काल के अन्तराल से आगे काल चला।

श्लोक 10 (skanda.5.280.10)

अग्निर्जातः स भूतानां मनुष्यासुररक्षसाम् । सर्वदेवाधिदेवश्च आदित्यस्तेन चोच्यते ।

agnir jātaḥ sa bhūtānāṁ manuṣyāsurarakṣasām| sarvadevādhidevaś ca ādityas tena cocyate||

अग्नि उत्पन्न हुआ, जो भूतों, मनुष्यों, असुरों और राक्षसों का है; वह सर्वदेवों का अधिदेव है, इसीलिए वह आदित्य कहलाता है।

श्लोक 11 (skanda.5.280.11)

आदौ तस्य नमस्कारोऽन्येषां च तदनन्तरम् । क्रियते दैवतैः सर्वैस्तेन सर्वैर्महर्षिभिः ।

ādau tasya namaskāro 'nyeṣāṁ ca tadanantaram| kriyate daivataiḥ sarvais tena sarvair maharṣibhiḥ||

सबसे पहले उसे नमस्कार किया जाता है, और उसके पश्चात ही अन्यों को - यह समस्त देवताओं और महर्षियों द्वारा किया जाता है।

श्लोक 12 (skanda.5.280.12)

तिस्रः सन्ध्यास्त्रयो देवाः सांनिध्याः सूर्यमण्डले । नमस्कृतेन सूर्येण सर्वे देवा नमस्कृताः ।

tisraḥ sandhyās trayo devāḥ sānnidhyāḥ sūryamaṇḍale| namaskṛtena sūryeṇa sarve devā namaskṛtāḥ||

तीनों सन्ध्याएँ और तीनों देवता सूर्यमण्डल में सांनिध्य रखते हैं; सूर्य को नमस्कार करने से समस्त देवताओं को नमस्कार हो जाता है।

श्लोक 13 (skanda.5.280.13)

न दिवा न भवेद्रात्रिः षण्मासा दक्षिणायनम् । अयनं चोत्तरं चापि भास्करेण विना नृप ।

na divā na bhaved rātriḥ ṣaṇmāsā dakṣiṇāyanam| ayanaṁ cottaraṁ cāpi bhāskareṇa vinā nṛpa||

हे राजन्! भास्कर के बिना न दिन होगा, न रात्रि, न छह मास का दक्षिणायन और न उत्तरायण।

श्लोक 14 (skanda.5.280.14)

स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम् । न वर्तते विना सूर्यं तेन पूज्यतमो रविः ।

snānaṁ dānaṁ japo homaḥ svādhyāyo devatārcanam| na vartate vinā sūryaṁ tena pūjyatamo raviḥ||

स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवपूजा - ये सब सूर्य के बिना सम्भव नहीं; इसलिए रवि सबसे अधिक पूज्य हैं।

श्लोक 15 (skanda.5.280.15)

शब्दगाः श्रुतिमुख्याश्च ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । प्रत्यक्षो भगवान्देवो दृश्यते लोकपावनः ।

śabdagāḥ śrutimukhyāś ca brahmaviṣṇumaheśvarāḥ| pratyakṣo bhagavān devo dṛśyate lokapāvanaḥ||

ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर शब्दगम्य हैं, श्रुतियों में मुख्य रूप से वर्णित हैं; किन्तु यह भगवान् देव (सूर्य) लोकपावन होकर प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं।

श्लोक 16 (skanda.5.280.16)

उत्पत्तिः प्रलयस्थानं निधानं बीजमव्ययम् । हेतुरेको जगन्नाथो नान्यो विद्येत भास्करात् ।

utpattiḥ pralayasthānaṁ nidhānaṁ bījam avyayam| hetur eko jagannātho nānyo vidyeta bhāskarāt||

उत्पत्ति, प्रलय का स्थान, निधान, अव्यय बीज, एकमात्र कारण और जगन्नाथ - भास्कर के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है।

श्लोक 17 (skanda.5.280.17)

एवमात्मभवं कृत्वा जगत्स्थावरजङ्गमम् । लोकानां तु हितार्थाय स्थापयेद्धर्मपद्धतिम् ।

evam ātmabhavaṁ kṛtvā jagat sthāvarajaṅgamam| lokānāṁ tu hitārthāya sthāpayed dharmapaddhatim||

इस प्रकार अपने से स्थावर-जंगम जगत् को उत्पन्न करके, लोकों के हित के लिए उन्होंने धर्म की मर्यादा स्थापित की।

श्लोक 18 (skanda.5.280.18)

नर्मदातटमाश्रित्य स्थापयित्वात्मनस्तनुम् । सहस्रांशुं निधिं धाम्नां जगामाकाशमव्ययम् ।

narmadātaṭam āśritya sthāpayitvātmanas tanum| sahasrāṁśuṁ nidhiṁ dhāmnāṁ jagāmākāśam avyayam||

नर्मदा के तट का आश्रय लेकर वहाँ अपनी मूर्ति स्थापित करके वे सहस्रांशु, तेजों के निधि, अव्यय आकाश को चले गए।

श्लोक 19 (skanda.5.280.19)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् । सहस्रकिरणं देवं नाममन्त्रविधानतः ।

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram| sahasrakiraṇaṁ devaṁ nāmamantravidhānataḥ||

उस तीर्थ में स्नान कर जो सहस्रकिरण परमेश्वर देव की नाम-मन्त्र के विधान से पूजा करता है -

श्लोक 20 (skanda.5.280.20)

तेन तप्तं हुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् । तेन सम्यग्विधानेन सम्प्राप्तं परमं पदम् ।

tena taptaṁ hutaṁ tena tena sarvam anuṣṭhitam| tena samyagvidhānena samprāptaṁ paramaṁ padam||

उसके द्वारा तप किया गया, हवन किया गया, सब कुछ सम्पन्न किया गया माना जाता है; उस सम्यक् विधि से वह परम पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.5.280.21)

ते धन्यास्ते महात्मानस्तेषां जन्म सुजीवितम् । स्नात्वा ये नर्मदातोये देवं पश्यन्ति भास्करम् ।

te dhanyās te mahātmānas teṣāṁ janma sujīvitam| snātvā ye narmadātoye devaṁ paśyanti bhāskaram||

वे धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उनका जन्म सफल है, जो नर्मदा के जल में स्नान कर भास्कर देव के दर्शन करते हैं।

श्लोक 22 (skanda.5.280.22)

तथा देवस्य राजेन्द्र ये कुर्वन्ति प्रदक्षिणम् । अनन्यभक्त्या सततं त्रिरक्षरसमन्विताः ।

tathā devasya rājendra ye kurvanti pradakṣiṇam| ananyabhaktyā satataṁ trirakṣarasamanvitāḥ||

हे राजेन्द्र! उसी प्रकार जो अनन्य भक्ति से सतत त्र्यक्षर मन्त्र से युक्त होकर देव की प्रदक्षिणा करते हैं -

श्लोक 23 (skanda.5.280.23)

तेन पूतशरीरास्ते मन्त्रेण गतपातकाः । यत्पुण्यं च भवेत्तेषां तदिहैकमनाः शृणु ।

tena pūtaśarīrās te mantreṇa gatapātakāḥ| yat puṇyaṁ ca bhavet teṣāṁ tad ihaikamanāḥ śṛṇu||

उस मन्त्र से उनका शरीर पवित्र हो जाता है और पाप दूर हो जाते हैं; उनको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 24 (skanda.5.280.24)

ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना । प्रदक्षिणीकृता सर्वा पृथिवी नात्र संशयः ।

sasamudraguhā tena saśailavanakānanā| pradakṣiṇīkṛtā sarvā pṛthivī nātra saṁśayaḥ||

उससे समुद्र, गुफाओं, पर्वतों और वन-कानन सहित सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा हो जाती है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 25 (skanda.5.280.25)

मन्त्रमूलमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । तेन मन्त्रविहीनं तु कार्यं लोके न सिध्यति ।

mantramūlam idaṁ sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram| tena mantravihīnaṁ tu kāryaṁ loke na sidhyati||

यह सम्पूर्ण चराचर त्रैलोक्य मन्त्र-मूलक है; इसलिए संसार में मन्त्रविहीन कार्य सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 26 (skanda.5.280.26)

यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः । कार्यार्थं नैव सिध्येत तथा कर्म ह्यमन्त्रकम् ।

yathā kāṣṭhamayo hastī yathā carmamayo mṛgaḥ| kāryārthaṁ naiva sidhyeta tathā karma hy amantrakam||

जैसे काष्ठ का हाथी और चर्म का मृग किसी कार्य को सिद्ध नहीं करते, वैसे ही बिना मन्त्र का कर्म निष्फल होता है।

श्लोक 27 (skanda.5.280.27)

भस्महुतं पार्थ यथा तोयविवर्जितम् । निष्फलं जायते दानं तथा मन्त्रविवर्जितम् ।

bhasmahutaṁ pārtha yathā toyavivarjitam| niṣphalaṁ jāyate dānaṁ tathā mantravivarjitam||

हे पार्थ! जैसे भस्म में डाली गई आहुति जलरहित होने के कारण निष्फल होती है, वैसे ही मन्त्ररहित दान निष्फल हो जाता है।

श्लोक 28 (skanda.5.280.28)

काष्ठपाषाणलोष्टेषु मृन्मयेषु विशेषतः । मन्त्रेण लोके पूजां तु कुर्वन्ति न ह्यमन्त्रतः ।

kāṣṭhapāṣāṇaloṣṭeṣu mṛnmayeṣu viśeṣataḥ| mantreṇa loke pūjāṁ tu kurvanti na hy amantrataḥ||

काष्ठ, पाषाण, मिट्टी के ढेले तथा विशेषतः मृण्मय प्रतिमाओं में भी लोग मन्त्र से ही पूजा करते हैं, मन्त्र के बिना नहीं।

श्लोक 29 (skanda.5.280.29)

द्वादशाब्दान्नमस्काराद्भक्त्या यल्लभते फलम् । मन्त्रयुक्तनमस्कारात्सकृत्तल्लभते फलम् ।

dvādaśābdān namaskārād bhaktyā yal labhate phalam| mantrayuktanamaskārāt sakṛt tal labhate phalam||

बारह वर्षों तक भक्तिपूर्वक नमस्कार करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल मन्त्रयुक्त एक ही नमस्कार से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.5.280.30)

संक्रान्तौ च व्यतीपाते अयने विषुवे तथा । नर्मदाया जले स्नात्वा यस्तु पूजयते रविम् ।

saṅkrāntau ca vyatīpāte ayane viṣuve tathā| narmadāyā jale snātvā yas tu pūjayate ravim||

संक्रान्ति, व्यतीपात, अयन और विषुव के समय नर्मदा के जल में स्नान कर जो रवि की पूजा करता है -

श्लोक 31 (skanda.5.280.31)

द्वादशाब्देन यत्पापमज्ञानज्ञानसंचितम् । तत्क्षणान्नश्यते सर्वं वह्निना तु तुषं यथा ।

dvādaśābdena yat pāpam ajñānajñānasañcitam| tatkṣaṇān naśyate sarvaṁ vahninā tu tuṣaṁ yathā||

उसके अज्ञान अथवा ज्ञानपूर्वक बारह वर्षों में संचित पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि से भूसा नष्ट हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.5.280.32)

चन्द्रसूर्यग्रहे स्नात्वा सोपवासो जितेन्द्रियः । तत्रादित्यमुखं दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।

candrasūryagrahe snātvā sopavāso jitendriyaḥ| tatrādityamukhaṁ dṛṣṭvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ||

चन्द्र या सूर्य ग्रहण के समय स्नान करके, उपवास सहित जितेन्द्रिय होकर, वहाँ आदित्य के मुख के दर्शन करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 33 (skanda.5.280.33)

माघमासे तु सम्प्राप्ते सप्तम्यां नृपसत्तम । सोपवासो जितक्रोध उषित्वा सूर्यमन्दिरे ।

māghamāse tu samprāpte saptamyāṁ nṛpasattama| sopavāso jitakrodha uṣitvā sūryamandire||

हे नृपसत्तम! माघ मास की सप्तमी को उपवास करके, क्रोध को जीतकर, सूर्य मन्दिर में रात्रि निवास करके -

श्लोक 34 (skanda.5.280.34)

प्रातः स्नात्वा विधानेन ददात्यर्घं दिवाकरे । विधिना मन्त्रयुक्तेन स लभेत्पुण्यमुत्तमम् ।

prātaḥ snātvā vidhānena dadāty arghaṁ divākare| vidhinā mantrayuktena sa labhet puṇyam uttamam||

प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान कर दिवाकर को अर्घ्य देता है; मन्त्रयुक्त विधि से वह उत्तम पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 35 (skanda.5.280.35)

पितृदेवमनुष्याणां कृत्वा ह्युदकतर्पणम् । मन्दिरे देवदेवस्य ततः पूजां समाचरेत् ।

pitṛdevamanuṣyāṇāṁ kṛtvā hy udakatarpaṇam| mandire devadevasya tataḥ pūjāṁ samācaret||

पितरों, देवताओं और मनुष्यों का उदक-तर्पण करके तत्पश्चात देवदेव के मन्दिर में पूजा सम्पन्न करे।

श्लोक 36 (skanda.5.280.36)

गन्धैः पुष्पैस्तथा धूपैर्दीपनैवेद्यशोभनैः । पूजयित्वा जगन्नाथं ततो मन्त्रमुदीरयेत् ।

gandhaiḥ puṣpais tathā dhūpair dīpanaivedyaśobhanaiḥ| pūjayitvā jagannāthaṁ tato mantram udīrayet||

गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और सुन्दर नैवेद्य से जगन्नाथ की पूजा करके फिर मन्त्रोच्चारण करे।

श्लोक 37 (skanda.5.280.37)

विष्णुः शक्रो यमो धाता मित्रोऽथ वरुणस्तथा । विवस्वान्सविता पूषा चण्डांशुर्भर्ग एव च ।

viṣṇuḥ śakro yamo dhātā mitro 'tha varuṇas tathā| vivasvān savitā pūṣā caṇḍāṁśur bharga eva ca||

विष्णु, शक्र, यम, धाता, मित्र, वरुण, विवस्वान्, सविता, पूषा, चण्डांशु और भर्ग -

श्लोक 38 (skanda.5.280.38)

इति द्वादशनामानि जपन्कृत्वा प्रदक्षिणाम् । यत्फलं लभते पार्थ तदिहैकमनाः शृणु ।

iti dvādaśanāmāni japan kṛtvā pradakṣiṇām| yat phalaṁ labhate pārtha tad ihaikamanāḥ śṛṇu||

इन बारह नामों का जप करते हुए प्रदक्षिणा करने से, हे पार्थ! जो फल प्राप्त होता है, वह एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 39 (skanda.5.280.39)

दरिद्रो व्याधितो मूको बधिरो जड एव च । न भवेत्सप्त जन्मानि इत्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ।

daridro vyādhito mūko badhiro jaḍa eva ca| na bhavet sapta janmāni ity evaṁ śaṅkaro 'bravīt||

वह सात जन्मों तक दरिद्र, रोगी, मूक, बधिर अथवा जड़ नहीं होता - ऐसा शंकर ने कहा।

श्लोक 40 (skanda.5.280.40)

एवं ज्ञात्वा विधानेन जपन्मन्त्रं विचक्षणः । आराधयेद्रविं भक्त्या य इच्छेत्पुण्यमुत्तमम् ।

evaṁ jñātvā vidhānena japan mantraṁ vicakṣaṇaḥ| ārādhayed raviṁ bhaktyā ya icchet puṇyam uttamam||

यह जानकर जो व्यक्ति उत्तम पुण्य चाहता है, वह विधिपूर्वक मन्त्र जपते हुए भक्तिपूर्वक रवि की आराधना करे।

श्लोक 41 (skanda.5.280.41)

मन्त्रहीनां तु यः कुर्याद्भक्तिं देवस्य भारत । स विडम्बति चात्मानं पशुकीटपतङ्गवत् ।

mantrahīnāṁ tu yaḥ kuryād bhaktiṁ devasya bhārata| sa viḍambati cātmānaṁ paśukīṭapataṅgavat||

हे भारत! जो मन्त्ररहित होकर देव की भक्ति करता है, वह पशु, कीट और पतंगे के समान स्वयं को ही व्यर्थ करता है।

श्लोक 42 (skanda.5.280.42)

तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्त्यजते देहमुत्तमम् । स गतस्तत्र देवैस्तु पूज्यमानो महर्षिभिः ।

tatra tīrthe tu yaḥ kaścit tyajate deham uttamam| sa gatas tatra devais tu pūjyamāno maharṣibhiḥ||

उस तीर्थ में जो कोई अपना उत्तम शरीर त्यागता है, वह वहाँ जाकर देवों और महर्षियों द्वारा पूजित होता है।

श्लोक 43 (skanda.5.280.43)

स्वेच्छया सुचिरं कालमिह लोके नृपो भवेत् ।

svecchayā suciraṁ kālam iha loke nṛpo bhavet||

अपनी इच्छा से वह इस लोक में दीर्घकाल तक राजा होता है।

श्लोक 44 (skanda.5.280.44)

पुत्रपौत्रसमायुक्तो हस्त्यश्वरथसङ्कुलः । दासीदासशतोपेतो जायते विपुले कुले ।

putrapautrasamāyukto hastyaśvarathasaṅkulaḥ| dāsīdāsaśatopeto jāyate vipule kule||

पुत्र-पौत्रों से युक्त, हाथी-घोड़े-रथों से भरपूर, सैकड़ों दासी-दासों से सम्पन्न होकर वह विशाल कुल में जन्म लेता है।

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