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अवन्ती खण्ड · अध्याय 281

अयोनिप्रभव तीर्थ की महिमा

अध्याय 280अध्याय-सूचीअध्याय 282

श्लोक 1 (skanda.5.281.1)

मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र परं तीर्थमयोनिजम् । स्नातमात्रो नरस्तत्र न पश्येद्योनिसङ्कटम् ।

mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchet tu rājendra paraṁ tīrtham ayonijam| snātamātro naras tatra na paśyed yonisaṅkaṭam||

मार्कण्डेय बोले - हे राजेन्द्र! इसके पश्चात परम अयोनिज तीर्थ में जाना चाहिए। वहाँ केवल स्नान मात्र करने वाला मनुष्य योनि-संकट (पुनर्जन्म का कष्ट) नहीं देखता।

श्लोक 2 (skanda.5.281.2)

तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयेद्देवमीश्वरम् । अयोनिजो महादेव यथा त्वं परमेश्वर ।

tatra tīrthe naraḥ snātvā pūjayed devam īśvaram| ayonijo mahādeva yathā tvaṁ parameśvara||

उस तीर्थ में स्नान कर मनुष्य ईश्वर देव की पूजा करे - 'हे महादेव! हे परमेश्वर! जैसे आप अयोनिज हैं...'

श्लोक 3 (skanda.5.281.3)

तथा मोचय मां देव सम्भवाद्योनिसङ्कटात् । गन्धपुष्पादिधूपैश्च स मुच्येत्सर्वपातकैः ।

tathā mocaya māṁ deva sambhavād yonisaṅkaṭāt| gandhapuṣpādidhūpaiś ca sa mucyet sarvapātakaiḥ||

'...वैसे ही हे देव! मुझे योनि-संकट से उत्पन्न होने से मुक्त कीजिए।' गन्ध, पुष्प, धूप आदि से पूजा करने पर वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.5.281.4)

तस्य देवस्य यो भक्त्या कुरुते लिङ्गपूरणम् । स वसेद्देवदेवस्य यावत्सिक्थस्य संख्यया ।

tasya devasya yo bhaktyā kurute liṅgapūraṇam| sa vased devadevasya yāvat sikthasya saṅkhyayā||

जो भक्तिपूर्वक उस देव के लिंग का पूरण (अभिषेक-श्रृंगार) करता है, वह उतने ही वर्षों तक देवदेव के साथ निवास करता है जितने उस सामग्री में कण हों।

श्लोक 5 (skanda.5.281.5)

अयोनिजे महादेवं स्नापयेद्गन्धवारिणा । मधुक्षीरेण दध्ना वा स लभेद्विपुलां श्रियम् ।

ayonije mahādevaṁ snāpayed gandhavāriṇā| madhukṣīreṇa dadhnā vā sa labhed vipulāṁ śriyam||

अयोनिज तीर्थ में जो महादेव को सुगन्धित जल से, अथवा मधु, दूध या दही से स्नान कराता है, वह विपुल श्री (सम्पत्ति) प्राप्त करता है।

श्लोक 6 (skanda.5.281.6)

अष्टभ्यां च सिते पक्षे असितां वा चतुर्दशीम् । पूजयित्वा महादेवं प्रीणयेद्गीतवाद्यकैः ।

aṣṭabhyāṁ ca site pakṣe asitāṁ vā caturdaśīm| pūjayitvā mahādevaṁ prīṇayed gītavādyakaiḥ||

शुक्ल पक्ष की अष्टमी को अथवा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महादेव की पूजा करके गीत-वाद्य से उन्हें प्रसन्न करे।

श्लोक 7 (skanda.5.281.7)

वसेत्स च शिवे लोके ये कुर्वन्ति मनोहरम् । ते वसन्ति शिवे लोके यावदाभूतसम्प्लवम् ।

vaset sa ca śive loke ye kurvanti manoharam| te vasanti śive loke yāvad ābhūtasamplavam||

वह शिवलोक में निवास करता है; जो लोग ऐसा मनोहर कृत्य करते हैं, वे प्रलयकाल तक शिवलोक में निवास करते हैं।

श्लोक 8 (skanda.5.281.8)

तस्य देवस्य भक्त्या तु यः करोति प्रदक्षिणाम् । विज्ञापयंश्च सततं मन्त्रेणानेन भारत ।

tasya devasya bhaktyā tu yaḥ karoti pradakṣiṇām| vijñāpayaṁś ca satataṁ mantreṇānena bhārata||

हे भारत! जो भक्तिपूर्वक उस देव की प्रदक्षिणा करता है और सतत इस मन्त्र से विज्ञापन (प्रार्थना) करता है -

श्लोक 9 (skanda.5.281.9)

तस्य यत्फलमुद्दिष्टं पारम्पर्येण मानवैः । सकाशाद्देवदेवस्य तच्छृणुष्व समाधिना ।

tasya yat phalam uddiṣṭaṁ pāramparyeṇa mānavaiḥ| sakāśād devadevasya tac chṛṇuṣva samādhinā||

उसके लिए जो फल मनुष्यों में परम्परा से देवदेव के समीप से कहा गया है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 10 (skanda.5.281.10)

अयोनिजो महादेव यथा त्वं परमेश्वर । तथा मोचय मां शर्व सम्भवाद्योनिसङ्कटात् ।

ayonijo mahādeva yathā tvaṁ parameśvara| tathā mocaya māṁ śarva sambhavād yonisaṅkaṭāt||

'हे महादेव! हे परमेश्वर! जैसे आप अयोनिज हैं, वैसे ही हे शर्व! मुझे योनि-संकट से उत्पन्न होने से मुक्त कीजिए।'

श्लोक 11 (skanda.5.281.11)

किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः कंठशोषणतत्परैः । येनौंनमः शिवायेति प्रोक्तं देवस्य संनिधौ ।

kiṁ tasya bahubhir mantraiḥ kaṇṭhaśoṣaṇatatparaiḥ| yenauṁ namaḥ śivāyeti proktaṁ devasya saṁnidhau||

जिसने देव के समीप 'ॐ नमः शिवाय' का उच्चारण कर लिया, उसे कंठ सुखाने वाले अनेक मन्त्रों से क्या प्रयोजन?

श्लोक 12 (skanda.5.281.12)

तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम् । येनौंनमः शिवायेति मन्त्राभ्यासः स्थिरीकृतः ।

tenādhītaṁ śrutaṁ tena tena sarvam anuṣṭhitam| yenauṁ namaḥ śivāyeti mantrābhyāsaḥ sthirīkṛtaḥ||

जिसने 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्र के अभ्यास को स्थिर कर लिया है, उसने ही अध्ययन कर लिया, श्रवण कर लिया और सब कुछ सम्पन्न कर लिया।

श्लोक 13 (skanda.5.281.13)

न तत्फलमवाप्नोति सर्वदेवेषु वै द्विजः । यत्फलं समवाप्नोति षडक्षर उदीरणात् ।

na tat phalam avāpnoti sarvadeveṣu vai dvijaḥ| yat phalaṁ samavāpnoti ṣaḍakṣara udīraṇāt||

समस्त देवताओं की उपासना से द्विज को वह फल प्राप्त नहीं होता, जो फल षडक्षर मन्त्र के उच्चारण से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.5.281.14)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेच्छिवयोगिनम् । द्विजानामयुतं साग्रं स लभेत्फलमुत्तमम् ।

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayec chivayoginam| dvijānām ayutaṁ sāgraṁ sa labhet phalam uttamam||

जो उस तीर्थ में स्नान कर शिवयोगी की पूजा करता है, वह दस सहस्र से अधिक द्विजों को भोजन कराने के समान उत्तम फल पाता है।

श्लोक 15 (skanda.5.281.15)

अथवा भक्तियुक्तस्तु तेषां दान्ते जितेन्द्रिये । संस्कृत्य ददते भिक्षां फलं तस्य ततोऽधिकम् ।

athavā bhaktiyuktas tu teṣāṁ dānte jitendriye| saṁskṛtya dadate bhikṣāṁ phalaṁ tasya tato 'dhikam||

अथवा भक्तियुक्त होकर जो संयमी और जितेन्द्रिय साधुओं को संस्कारपूर्वक भिक्षा देता है, उसका फल इससे भी अधिक होता है।

श्लोक 16 (skanda.5.281.16)

यतिहस्ते जलं दद्याद्भिक्षां दत्त्वा पुनर्जलम् । सा भिक्षा मेरुणा तुल्या तज्जलं सागरोपमम् ।

yatihaste jalaṁ dadyād bhikṣāṁ dattvā punar jalam| sā bhikṣā meruṇā tulyā taj jalaṁ sāgaropamam||

यति के हाथ में जल दे, भिक्षा देकर पुनः जल दे; वह भिक्षा मेरु पर्वत के समान और वह जल समुद्र के समान फलदायी होता है।

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