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अवन्ती खण्ड · अध्याय 282

अग्नि तीर्थ की महिमा

अध्याय 281अध्याय-सूचीअध्याय 283

श्लोक 1 (skanda.5.282.1)

मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र अग्नितीर्थमनुत्तमम् । तत्र स्नात्वा तु पक्षादौ मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ।

mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchet tu rājendra agnitīrtham anuttamam| tatra snātvā tu pakṣādau mucyate sarvakilbiṣaiḥ||

मार्कण्डेय बोले - हे राजेन्द्र! इसके पश्चात अनुपम अग्नितीर्थ में जाना चाहिए। वहाँ पक्ष के आरम्भ में स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.5.282.2)

तत्र तीर्थे तु यः कन्यां दद्यात्स्वयमलंकृताम् । तस्य यत्फलमुद्दिष्टं तच्छृणुष्व नरोत्तम ।

tatra tīrthe tu yaḥ kanyāṁ dadyāt svayam alaṅkṛtām| tasya yat phalam uddiṣṭaṁ tac chṛṇuṣva narottama||

हे नरोत्तम! उस तीर्थ में जो व्यक्ति स्वयं अलंकृत कन्या का कन्यादान करता है, उसका जो फल बताया गया है, वह सुनो।

श्लोक 3 (skanda.5.282.3)

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां शतं शतगुणीकृतम् । प्राप्नोति पुरुषो दत्त्वा यथाशक्त्या ह्यलंकृताम् ।

agniṣṭomātirātrābhyāṁ śataṁ śataguṇīkṛtam| prāpnoti puruṣo dattvā yathāśaktyā hy alaṅkṛtām||

यथाशक्ति अलंकृत कन्या का दान करने वाला पुरुष अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञों के फल का सौ-सौ गुना फल प्राप्त करता है।

श्लोक 4 (skanda.5.282.4)

तस्याः पुत्रप्रपौत्राणां या भवेद्रोमसंगतिः । स याति तेन मानेन शिवलोके परां गतिम् ।

tasyāḥ putraprapautrāṇāṁ yā bhaved romasaṅgatiḥ| sa yāti tena mānena śivaloke parāṁ gatim||

उस कन्या के पुत्र-प्रपौत्रों के शरीर पर जितने रोम हों, उतने ही मान से वह शिवलोक में परम गति को प्राप्त होता है।

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