Skip to main content

अवन्ती खण्ड · अध्याय 283

भृकुटेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 282अध्याय-सूचीअध्याय 284

श्लोक 1 (skanda.5.283.1)

मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र भृकुटेश्वरमुत्तमम् । यत्र सिद्धो महाभागो भृगुः परमकोपनः ।

mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchet tu rājendra bhṛkuṭeśvaram uttamam| yatra siddho mahābhāgo bhṛguḥ paramakopanaḥ||

मार्कण्डेय बोले - हे राजेन्द्र! इसके पश्चात उत्तम भृकुटेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ परम क्रोधी महाभाग भृगु ने सिद्धि प्राप्त की थी।

श्लोक 2 (skanda.5.283.2)

तेन वर्षशतं साग्रं तपश्चीर्णं पुरानघ । पुत्रार्थं वरयामास पुत्रं पुत्रवतां वरः ।

tena varṣaśataṁ sāgraṁ tapaś cīrṇaṁ purānagha| putrārthaṁ varayāmāsa putraṁ putravatāṁ varaḥ||

हे निष्पाप! उसने पूर्वकाल में सौ से अधिक वर्षों तक तपस्या की; पुत्रवानों में श्रेष्ठ उसने पुत्र-प्राप्ति के लिए वर माँगा।

श्लोक 3 (skanda.5.283.3)

वरो दत्तो महाभाग देवेनान्धकघातिना । तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् ।

varo datto mahābhāga devenāndhakaghātinā| tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram||

हे महाभाग! अन्धकासुर के वधकर्ता देव (शिव) ने वह वर दिया। जो उस तीर्थ में स्नान कर परमेश्वर की पूजा करता है...

श्लोक 4 (skanda.5.283.4)

अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमष्टगुणं लभेत् । भृकुटेशं तु यः कश्चिद्घृतेन मधुना सह ।

agniṣṭomasya yajñasya phalam aṣṭaguṇaṁ labhet| bhṛkuṭeśaṁ tu yaḥ kaścid ghṛtena madhunā saha||

...अग्निष्टोम यज्ञ का आठ गुना फल प्राप्त करता है। जो कोई भृकुटेश को घृत और मधु से...

श्लोक 5 (skanda.5.283.5)

पुत्रार्थी स्नापयेद्भक्त्या स लभेत्पुत्रमीप्सितम् । तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा दद्याद्विप्राय काञ्चनम् ।

putrārthī snāpayed bhaktyā sa labhet putram īpsitam| tatra tīrthe tu yaḥ snātvā dadyād viprāya kāñcanam||

...भक्तिपूर्वक स्नान कराता है, वह इच्छित पुत्र प्राप्त करता है। उस तीर्थ में स्नान कर जो विप्र को सुवर्ण दान देता है...

श्लोक 6 (skanda.5.283.6)

गोदानं वा महीं वापि तस्य पुण्यफलं शृणु ।

godānaṁ vā mahīṁ vāpi tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu||

...अथवा गोदान या भूदान करता है, उसका पुण्यफल सुनो।

श्लोक 7 (skanda.5.283.7)

ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना । दत्ता पृथ्वी न सन्देहस्तेन सर्वा नृपोत्तम ।

sasamudraguhā tena saśailavanakānanā| dattā pṛthvī na sandehas tena sarvā nṛpottama||

हे नृपोत्तम! उसके द्वारा समुद्र, गुफाओं, पर्वतों और वन-कानन सहित सम्पूर्ण पृथ्वी का दान हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 8 (skanda.5.283.8)

तेन दानेन स स्वर्गे क्रीडयित्वा यथासुखम् । मर्त्ये भवति राजेन्द्रो ब्राह्मणो वा सुपूजितः ।

tena dānena sa svarge krīḍayitvā yathāsukham| martye bhavati rājendro brāhmaṇo vā supūjitaḥ||

उस दान से वह स्वर्ग में यथासुख क्रीड़ा करके मर्त्यलोक में राजेन्द्र अथवा सुपूजित ब्राह्मण होता है।

अध्याय 282अध्याय-सूचीअध्याय 284