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अवन्ती खण्ड · अध्याय 284

ब्रह्म तीर्थ की महिमा

अध्याय 283अध्याय-सूचीअध्याय 285

श्लोक 1 (skanda.5.284.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम् । अन्येषां चैव तीर्थानां परात्परतरं महत् ।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla brahmatīrtham anuttamam| anyeṣāṁ caiva tīrthānāṁ parāt parataraṁ mahat||

श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात अनुपम ब्रह्मतीर्थ में जाना चाहिए, जो अन्य सभी तीर्थों में परम से भी परम महान है।

श्लोक 2 (skanda.5.284.2)

तत्र तीर्थे सुरश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकपितामहः । चतुर्णामपि वर्णानां नर्मदातटमाश्रितः ।

tatra tīrthe suraśreṣṭho brahmā lokapitāmahaḥ| caturṇām api varṇānāṁ narmadātaṭam āśritaḥ||

उस तीर्थ में सुरश्रेष्ठ लोकपितामह ब्रह्मा, समस्त चारों वर्णों के लिए समान रूप से, नर्मदा तट का आश्रय लिए हुए विराजते हैं।

श्लोक 3 (skanda.5.284.3)

वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुराकृतम् । तत्क्षालयति देवेशो दर्शनादेव पातकम् ।

vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karmajaṁ yat purākṛtam| tat kṣālayati deveśo darśanād eva pātakam||

वाणी, मन और कर्म से उत्पन्न जो भी पूर्वकृत पाप हो, देवेश उस पाप को दर्शनमात्र से धो देते हैं।

श्लोक 4 (skanda.5.284.4)

श्रुतिस्मृत्युदितान्येव तत्र स्नात्वा द्विजर्षभाः । प्रायश्चित्तानि कुर्वन्ति तेषां वासस्त्रिविष्टपे ।

śrutismṛtyuditāny eva tatra snātvā dvijarṣabhāḥ| prāyaścittāni kurvanti teṣāṁ vāsas triviṣṭape||

श्रुति-स्मृति में कहे गए प्रायश्चित्तों को वहाँ स्नान करके करने वाले द्विजश्रेष्ठों का निवास स्वर्ग में होता है।

श्लोक 5 (skanda.5.284.5)

ये पुनः शास्त्रमुत्सृज्य कामलोभप्रपीडिताः । प्रायश्चित्तं वदिष्यन्ति ते वै निरयगामिनः ।

ye punaḥ śāstram utsṛjya kāmalobhaprapīḍitāḥ| prāyaścittaṁ vadiṣyanti te vai nirayagāminaḥ||

किन्तु जो शास्त्र का त्यागकर काम और लोभ से पीड़ित होकर मनमाना प्रायश्चित्त बताएँगे, वे नरकगामी होते हैं।

श्लोक 6 (skanda.5.284.6)

स्नात्वादौ पातकी ब्रह्मन्नत्वा तु कीर्तयेदघम् । तस्य तन्नश्यते क्षिप्रं तमः सूर्योदये यथा ।

snātvādau pātakī brahmann atvā tu kīrtayed agham| tasya tan naśyate kṣipraṁ tamaḥ sūryodaye yathā||

हे ब्राह्मण! पहले स्नान करके और नमन करके पापी अपने पाप को स्वीकार करे; उसका वह पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है, जैसे सूर्योदय पर अंधकार।

श्लोक 7 (skanda.5.284.7)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्पितृदेवताः । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य स लभेत्फलमुत्तमम् ।

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet pitṛdevatāḥ| agniṣṭomasya yajñasya sa labhet phalam uttamam||

उस तीर्थ में स्नान कर जो पितरों और देवताओं की पूजा करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त करता है।

श्लोक 8 (skanda.5.284.8)

तत्र तीर्थे तु यद्दानं ब्रह्मोद्दिश्य प्रयच्छति । तदक्षयफलं सर्वमित्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ।

tatra tīrthe tu yad dānaṁ brahmoddiśya prayacchati| tad akṣayaphalaṁ sarvam ity evaṁ śaṅkaro 'bravīt||

उस तीर्थ में ब्रह्मा को उद्दिष्ट करके जो भी दान दिया जाता है, वह सब अक्षय फल देने वाला होता है - ऐसा शंकर ने कहा।

श्लोक 9 (skanda.5.284.9)

गायत्रीसारमात्रोऽपि तत्र यः क्रियते जपः । ऋग्यजुःसामसहितः स भवेन्नात्र संशयः ।

gāyatrīsāramātro 'pi tatra yaḥ kriyate japaḥ| ṛgyajuḥsāmasahitaḥ sa bhaven nātra saṁśayaḥ||

वहाँ केवल गायत्री-सार मात्र का जप भी ऋक्, यजुः और साम सहित जप के समान हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 10 (skanda.5.284.10)

तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या त्यजेद्देहं सुदुस्त्यजम् । अनिवर्तिका गतिस्तस्य ब्रह्मलोकान्न संशयः ।

tatra tīrthe tu yo bhaktyā tyajed dehaṁ sudustyajam| anivartikā gatis tasya brahmalokān na saṁśayaḥ||

उस तीर्थ में जो भक्तिपूर्वक अत्यंत त्यागने में कठिन देह का त्याग करता है, उसकी गति निःसन्देह अनिवर्तक ब्रह्मलोक की होती है।

श्लोक 11 (skanda.5.284.11)

यावदस्थीनि तिष्ठन्ति ब्रह्मतीर्थे च देहिनाम् । तावद्वर्षसहस्राणि देवलोके महीयते ।

yāvad asthīni tiṣṭhanti brahmatīrthe ca dehinām| tāvad varṣasahasrāṇi devaloke mahīyate||

जब तक प्राणियों की अस्थियाँ ब्रह्मतीर्थ में स्थित रहती हैं, तब तक वह उतने ही सहस्र वर्षों तक देवलोक में पूजित होता है।

श्लोक 12 (skanda.5.284.12)

अवतीर्णस्ततो लोके ब्रह्मज्ञो जायते कुले । उत्तमः सर्ववर्णानां देवानामिव देवता ।

avatīrṇas tato loke brahmajño jāyate kule| uttamaḥ sarvavarṇānāṁ devānām iva devatā||

तत्पश्चात इस लोक में अवतीर्ण होकर वह ब्रह्मज्ञ कुल में जन्म लेता है, वह समस्त वर्णों में श्रेष्ठ, देवताओं में देवता के समान होता है।

श्लोक 13 (skanda.5.284.13)

विद्यास्थानानि सर्वाणि वेत्ति वेदाङ्गपारगः । जायते पूजितो लोके राजभिः स न संशयः ।

vidyāsthānāni sarvāṇi vetti vedāṅgapāragaḥ| jāyate pūjito loke rājabhiḥ sa na saṁśayaḥ||

वह समस्त विद्यास्थानों को जानने वाला, वेदांगपारंगत होता है; वह निःसन्देह लोक में और राजाओं द्वारा पूजित होकर जन्म लेता है।

श्लोक 14 (skanda.5.284.14)

पुत्रपौत्रसमोपेतः सर्वव्याधिविवर्जितः । जीवेद्वर्षशतं साग्रं ब्रह्मतीर्थप्रभावतः ।

putrapautrasamopetaḥ sarvavyādhivivarjitaḥ| jīved varṣaśataṁ sāgraṁ brahmatīrthaprabhāvataḥ||

पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न, समस्त रोगों से रहित होकर वह ब्रह्मतीर्थ के प्रभाव से सौ से अधिक वर्षों तक जीवित रहता है।

श्लोक 15 (skanda.5.284.15)

एतत्पुण्यं पापहरं तीर्थं ज्ञानवतां वरम् । ये पश्यन्ति महात्मानो ह्यमृतत्वं प्रयान्ति ते ।

etat puṇyaṁ pāpaharaṁ tīrthaṁ jñānavatāṁ varam| ye paśyanti mahātmāno hy amṛtatvaṁ prayānti te||

यह पुण्यदायी, पापहारी तीर्थ ज्ञानवानों के लिए श्रेष्ठ है; जो महात्मा इसका दर्शन करते हैं, वे अमरत्व को प्राप्त होते हैं।

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