अवन्ती खण्ड · अध्याय 285
देव तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.285.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। नर्मदादक्षिणे कूले देवतीर्थमनुत्तमम् । तत्र देवैः समागत्य तोषितः परमेश्वरः ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| narmadādakṣiṇe kūle devatīrtham anuttamam| tatra devaiḥ samāgatya toṣitaḥ parameśvaraḥ||
श्री मार्कण्डेय बोले - नर्मदा के दक्षिण तट पर अनुपम देवतीर्थ है, जहाँ देवताओं ने एकत्र होकर परमेश्वर को संतुष्ट किया था।
श्लोक 2 (skanda.5.285.2)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा कामक्रोधविवर्जितः । स लभेन्नात्र सन्देहो गोसहस्रफलं ध्रुवम् ।
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā kāmakrodhavivarjitaḥ| sa labhen nātra sandeho gosahasraphalaṁ dhruvam||
उस तीर्थ में स्नान कर जो काम-क्रोध से रहित होता है, वह निःसन्देह सहस्र गौओं के दान का फल निश्चित रूप से प्राप्त करता है।