अवन्ती खण्ड · अध्याय 286
नागेश्वर तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.286.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। नर्मदादक्षिणे कूले नागतीर्थमनुत्तमम् । यत्र सिद्धा महानागा भये जाते ततो नृप ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| narmadādakṣiṇe kūle nāgatīrtham anuttamam| yatra siddhā mahānāgā bhaye jāte tato nṛpa||
श्री मार्कण्डेय बोले - नर्मदा के दक्षिण तट पर अनुपम नागतीर्थ है, हे राजन्! जहाँ महान भय उत्पन्न होने पर महानाग सिद्ध हुए थे।
श्लोक 2 (skanda.5.286.2)
युधिष्ठिर उवाच। महाभयानां लोकस्य नागानां द्विजसत्तम । कथं जातं भयं तीव्रं येन ते तपसि स्थिताः ।
yudhiṣṭhira uvāca| mahābhayānāṁ lokasya nāgānāṁ dvijasattama| kathaṁ jātaṁ bhayaṁ tīvraṁ yena te tapasi sthitāḥ||
युधिष्ठिर बोले - हे द्विजसत्तम! संसार के लिए महाभयंकर नागों को वह तीव्र भय कैसे उत्पन्न हुआ, जिससे वे तपस्या में स्थित हुए?
श्लोक 3 (skanda.5.286.3)
भूतं भव्यं भविष्यच्च यत्सुरासुरमानवे । तात ते विदितं सर्वं तेन मे कौतुकं महत् ।
bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyac ca yat surāsuramānave| tāta te viditaṁ sarvaṁ tena me kautukaṁ mahat||
हे तात! सुर, असुर और मनुष्यों में जो कुछ हुआ, हो रहा है और होगा - वह सब आपको ज्ञात है, इसीलिए मुझे बड़ा कौतूहल है।
श्लोक 4 (skanda.5.286.4)
मम संतापजं दुःखं दुर्योधनसमुद्भवम् । तव वक्त्राम्बुजौघेन प्लावितं निर्वृतिं गतम् ।
mama saṁtāpajaṁ duḥkhaṁ duryodhanasamudbhavam| tava vaktrāmbujaughena plāvitaṁ nirvṛtiṁ gatam||
दुर्योधन से उत्पन्न मेरा संतापजन्य दुःख आपके मुखकमल की वाणी-धारा से बह गया और शान्ति को प्राप्त हो गया।
श्लोक 5 (skanda.5.286.5)
श्रुत्वा तव मुखोद्गीतां कथां पापप्रणाशनीम् । भूयो भूयः स्मृतिर्जाता श्रवणे मम सुव्रत ।
śrutvā tava mukhodgītāṁ kathāṁ pāpapraṇāśinīm| bhūyo bhūyaḥ smṛtir jātā śravaṇe mama suvrata||
हे सुव्रत! आपके मुख से गाई गई इस पापनाशिनी कथा को सुनकर मुझे बार-बार सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई है।
श्लोक 6 (skanda.5.286.6)
न क्लेशत्वं द्विजे युक्तं न चान्यो जानते फलम् । विद्यादानस्य महतः श्रावितस्य सुतस्य च ।
na kleśatvaṁ dvije yuktaṁ na cānyo jānate phalam| vidyādānasya mahataḥ śrāvitasya sutasya ca||
द्विज के लिए इसे क्लेश मानना उचित नहीं है, और महान विद्यादान, श्रवण कराने तथा सुयोग्य पुत्र का फल अन्य कोई नहीं जानता।
श्लोक 7 (skanda.5.286.7)
एवं ज्ञात्वा यथान्यायं यः प्रश्नः पृच्छितो मया । कथा तु कथ्यतां विप्र दयां कृत्वा ममोपरि ।
evaṁ jñātvā yathānyāyaṁ yaḥ praśnaḥ pṛcchito mayā| kathā tu kathyatāṁ vipra dayāṁ kṛtvā mamopari||
यह उचित रूप से जानकर, हे विप्र! मुझ पर दया करके, मेरे द्वारा पूछे गए प्रश्न की कथा कहिए।
श्लोक 8 (skanda.5.286.8)
मार्कण्डेय उवाच। यथा यथा त्वं नृप भाषसे च तथा तथा मे सुखमेति भारती । शैथिल्यभावाज्जरयान्वितस्य त्वत्सौहृदं नश्यति नैव तात ।
mārkaṇḍeya uvāca| yathā yathā tvaṁ nṛpa bhāṣase ca tathā tathā me sukham eti bhāratī| śaithilyabhāvāj jarayānvitasya tvatsauhṛdaṁ naśyati naiva tāta||
मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! तुम जैसे-जैसे बोलते हो, वैसे-वैसे मेरी वाणी को सुख मिलता है। हे तात! वृद्धावस्था के कारण शिथिलता होने पर भी तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह कभी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 9 (skanda.5.286.9)
कथयामि यथावृत्तमितिहासं पुरातनम् । कथितं पूर्वतो वृद्धैः पारम्पर्येण भारत ।
kathayāmi yathāvṛttam itihāsaṁ purātanam| kathitaṁ pūrvato vṛddhaiḥ pāramparyeṇa bhārata||
हे भारत! मैं प्राचीन इतिहास को यथावत् कहता हूँ, जो पहले वृद्धजनों द्वारा परम्परा से कहा गया था।
श्लोक 10 (skanda.5.286.10)
द्वे भार्ये कश्यपस्यास्तां सर्वलोकेष्वनुत्तमे । गरुत्मतो वै विनता सर्पाणां कद्रुरेव च ।
dve bhārye kaśyapasyāstāṁ sarvalokeṣv anuttame| garutmato vai vinatā sarpāṇāṁ kadrur eva ca||
कश्यप की दो पत्नियाँ थीं, जो समस्त लोकों में अनुपम थीं - गरुत्मान की माता विनता और सर्पों की माता कद्रू।
श्लोक 11 (skanda.5.286.11)
अश्वसंदर्शनात्ताभ्यां कलिरूपं व्यवस्थितम् । प्रभातकाले राजेन्द्र भास्कराकारवर्चसम् ।
aśvasaṁdarśanāt tābhyāṁ kalirūpaṁ vyavasthitam| prabhātakāle rājendra bhāskarākāravarcasam||
हे राजेन्द्र! प्रातःकाल सूर्य के समान तेजस्वी घोड़े को देखने से उन दोनों में कलह उत्पन्न हो गया।
श्लोक 12 (skanda.5.286.12)
तं दृष्ट्वा विनता रूपमश्वं सर्वत्र पाण्डुरम् । अथ तां कद्रूमवोचत्सा पश्य पश्य वरानने ।
taṁ dṛṣṭvā vinatā rūpam aśvaṁ sarvatra pāṇḍuram| atha tāṁ kadrūm avocat sā paśya paśya varānane||
उस सर्वथा श्वेत वर्ण के घोड़े को देखकर विनता ने कद्रू से कहा - 'देखो, देखो, हे वरानने!'
श्लोक 13 (skanda.5.286.13)
उच्चैःश्रवसः सादृश्यं पश्य सर्वत्र पाण्डुरम् । धावमानमविश्रान्तं जवेन पवनोपमम् ।
uccaiḥśravasaḥ sādṛśyaṁ paśya sarvatra pāṇḍuram| dhāvamānam aviśrāntaṁ javena pavanopamam||
'उच्चैःश्रवा के समान सर्वथा श्वेत, बिना विश्राम के दौड़ते हुए, वायु के समान वेगवान् को देखो।'
श्लोक 14 (skanda.5.286.14)
तं दृष्ट्वा सहसा यान्तमीर्ष्याभावेन मोहिता । कृष्णं मत्वा तथाजल्पत्तया सह नृपोत्तम ।
taṁ dṛṣṭvā sahasā yāntam īrṣyābhāvena mohitā| kṛṣṇaṁ matvā tathājalpat tayā saha nṛpottama||
हे नृपोत्तम! उसे इस प्रकार वेग से जाते देखकर ईर्ष्याभाव से मोहित होकर कद्रू ने उसे काला बताते हुए विनता से ऐसा कहा।
श्लोक 15 (skanda.5.286.15)
विनते त्वं मृषा लोके नृशंसे कुलपांसनि । कृष्णं चैनं वद श्वेतं नरकं यास्यसे परम् ।
vinate tvaṁ mṛṣā loke nṛśaṁse kulapāṁsani| kṛṣṇaṁ cainaṁ vada śvetaṁ narakaṁ yāsyase param||
'हे विनते! तुम इस संसार में झूठ बोल रही हो, हे नृशंसे, कुलकलंकिनी! यदि तुम इस काले को श्वेत कहोगी तो घोर नरक को जाओगी।'
श्लोक 16 (skanda.5.286.16)
विनतोवाच। सत्यानृते तु वचने पणोऽयं ते ममैव तु । सहस्रं वत्सरान्दासी भवेयं तव वेश्मनि ।
vinatovāca| satyānṛte tu vacane paṇo 'yaṁ te mamaiva tu| sahasraṁ vatsarān dāsī bhaveyaṁ tava veśmani||
विनता ने कहा - 'सत्य और असत्य वचन पर यह हमारी शर्त है - यदि मैं गलत हुई तो सहस्र वर्षों तक तुम्हारे घर में दासी बनूँगी।'
श्लोक 17 (skanda.5.286.17)
तथेति ते प्रतिज्ञाय रात्रौ गत्वा स्वकं गृहम् । परित्यज्य उभे ते तु क्रोधमूर्छितमूर्छिते ।
tatheti te pratijñāya rātrau gatvā svakaṁ gṛham| parityajya ubhe te tu krodhamūrchitamūrchite||
'ऐसा ही हो' कहकर प्रतिज्ञा करके, क्रोध से मूर्च्छित हुई वे दोनों रात्रि में अपने-अपने घर चली गईं।
श्लोक 18 (skanda.5.286.18)
बन्धुगर्वस्य गत्वा तु कथयामास तं पणम् । कद्रूर्विनतया सार्द्धं यद्वृत्तं प्रमदालये ।
bandhugarvasya gatvā tu kathayāmāsa taṁ paṇam| kadrūr vinatayā sārddhaṁ yad vṛttaṁ pramadālaye||
कद्रू अपने अभिमानी बन्धुओं के पास जाकर उस शर्त का वर्णन करने लगी, जो विनता के साथ उसके निवास में घटित हुई थी।
श्लोक 19 (skanda.5.286.19)
तच्छ्रुत्वा बान्धवाः सर्वे कद्रूपुत्रास्तथैव च । न मन्यन्ते हितं कार्यं कृतं मात्रा विगर्हितम् ।
tac chrutvā bāndhavāḥ sarve kadrūputrās tathaiva ca| na manyante hitaṁ kāryaṁ kṛtaṁ mātrā vigarhitam||
यह सुनकर सभी बान्धव और कद्रू के पुत्र, माता के द्वारा किए गए इस निन्दनीय कार्य को हितकर नहीं मानते थे।
श्लोक 20 (skanda.5.286.20)
अकृष्णः कृष्णतामम्ब कथं गच्छेद्धयोत्तमः । दासत्वं प्राप्स्यसे त्वं हि पणेनानेन सुव्रते ।
akṛṣṇaḥ kṛṣṇatām amba kathaṁ gacched dhayottamaḥ| dāsatvaṁ prāpsyase tvaṁ hi paṇenānena suvrate||
'हे माता! जो घोड़ा काला नहीं है, वह अश्वश्रेष्ठ काला कैसे हो सकता है? हे सुव्रते! तुम स्वयं इस शर्त के कारण दासत्व को प्राप्त होगी।'
श्लोक 21 (skanda.5.286.21)
कद्रूरुवाच। भवेयं न यथादासी तत्कुरुध्वं हि सत्वरम् । विशध्वं रोमकूपेषु तस्याश्वस्य मतिर्मम ।
kadrūr uvāca| bhaveyaṁ na yathā dāsī tat kurudhvaṁ hi satvaram| viśadhvaṁ romakūpeṣu tasyāśvasya matir mama||
कद्रू ने कहा - 'जिससे मैं दासी न बनूँ, वह शीघ्र करो - मेरी सम्मति है कि तुम उस घोड़े के रोमकूपों में प्रवेश कर जाओ।'
श्लोक 22 (skanda.5.286.22)
क्षणमात्रं कृते कार्ये सा दासी च भवेन्मम । ततः स्वस्थोरगाः सर्वे भविष्यथ यथासुखम् ।
kṣaṇamātraṁ kṛte kārye sā dāsī ca bhaven mama| tataḥ svasthoragāḥ sarve bhaviṣyatha yathāsukham||
'यह कार्य क्षणमात्र में हो जाने पर वह मेरी दासी हो जाएगी; तब तुम सभी नाग स्वस्थ और सुखी रहोगे।'
श्लोक 23 (skanda.5.286.23)
सर्पा ऊचुः। यथा त्वं जननी देवि पन्नगानां मता भुवि । तथापि सा विशेषेण वञ्चितव्या न कर्हिचित् ।
sarpā ūcuḥ| yathā tvaṁ jananī devi pannagānāṁ matā bhuvi| tathāpi sā viśeṣeṇa vañcitavyā na karhicit||
सर्पों ने कहा - 'हे देवि! यद्यपि आप भूतल पर नागों की माता मानी जाती हैं, तथापि उन्हें इस प्रकार छल से कभी वंचित नहीं करना चाहिए।'
श्लोक 24 (skanda.5.286.24)
कद्रूरुवाच। मम वाक्यमकुर्वाणा ये केचिद्भुवि पन्नगाः । हव्यवाहमुखं सर्वे ते यास्यन्त्यविचारिताः ।
kadrūr uvāca| mama vākyam akurvāṇā ye kecid bhuvi pannagāḥ| havyavāhamukhaṁ sarve te yāsyanty avicāritāḥ||
कद्रू ने कहा - 'भूतल पर जो भी सर्प मेरी आज्ञा का पालन नहीं करेंगे, वे सभी बिना विचार किए अग्निमुख में जाएँगे।'
श्लोक 25 (skanda.5.286.25)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं घोरं मातृमुखोद्भवम् । केचित्प्रविष्टा रोमाणि तथान्ये गिरिसंस्थिताः ।
etac chrutvā tu vacanaṁ ghoraṁ mātṛmukhodbhavam| kecit praviṣṭā romāṇi tathānye girisaṁsthitāḥ||
माता के मुख से निकले इस भयंकर वचन को सुनकर कुछ सर्प तो रोमों में प्रविष्ट हो गए, तथा अन्य पर्वतों पर जा बसे।
श्लोक 26 (skanda.5.286.26)
केचित्प्रविष्टा जाह्नव्यामन्ये च तपसि स्थिताः ।
kecit praviṣṭā jāhnavyām anye ca tapasi sthitāḥ||
कुछ गंगा में प्रविष्ट हो गए और अन्य तपस्या में लीन हो गए।
श्लोक 27 (skanda.5.286.27)
ततो वर्षसहस्रान्ते तुतोष परमेश्वरः । महादेवो जगद्धाता ह्युवाच परया गिरा ।
tato varṣasahasrānte tutoṣa parameśvaraḥ| mahādevo jagaddhātā hy uvāca parayā girā||
फिर सहस्र वर्षों के अन्त में परमेश्वर महादेव, जगत् के धारक, संतुष्ट हुए और परम वाणी में बोले।
श्लोक 28 (skanda.5.286.28)
भो भोः सर्पा निवर्तध्वं तपसोऽस्य महत्फलम् । यमिच्छथ ददाम्यद्य नात्र कार्या विचारणा ।
bho bhoḥ sarpā nivartadhvaṁ tapaso 'sya mahat phalam| yam icchatha dadāmy adya nātra kāryā vicāraṇā||
'हे सर्पों! अब निवृत्त हो जाओ, मैं आज इस तपस्या का महान फल दूँगा - जो चाहो वह; इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं है।'
श्लोक 29 (skanda.5.286.29)
सर्पा ऊचुः। कद्रूशापभयाद्भीता देवदेव महेश्वर । तव पार्श्वे वसिष्यामो यावदाभूतसम्प्लवम् ।
sarpā ūcuḥ| kadrūśāpabhayād bhītā devadeva maheśvara| tava pārśve vasiṣyāmo yāvad ābhūtasamplavam||
सर्पों ने कहा - 'हे देवदेव महेश्वर! कद्रू के शाप के भय से भीत होकर हम प्रलयकाल तक आपके निकट निवास करेंगे।'
श्लोक 30 (skanda.5.286.30)
देवदेव उवाच। एकश्चायं महाबाहुर्वासुकिर्भुजगोत्तमः । मम पार्श्वे वसेन्नित्यं सर्वेषां भयरक्षकः ।
devadeva uvāca| ekaś cāyaṁ mahābāhur vāsukir bhujagottamaḥ| mama pārśve vasen nityaṁ sarveṣāṁ bhayarakṣakaḥ||
देवदेव ने कहा - 'यह महाबाहु भुजगश्रेष्ठ वासुकि अकेला ही सदा मेरे निकट निवास करे, जो सबके भय का रक्षक होगा।'
श्लोक 31 (skanda.5.286.31)
अन्येषां चैव सर्पाणां भयं नास्ति ममाज्ञया । आप्लुत्य नर्मदातोये भुजगास्ते च रक्षिताः ।
anyeṣāṁ caiva sarpāṇāṁ bhayaṁ nāsti mamājñayā| āplutya narmadātoye bhujagās te ca rakṣitāḥ||
'मेरी आज्ञा से अन्य सर्पों को भी कोई भय नहीं होगा; नर्मदा के जल में स्नान करके वे नाग रक्षित हो जाएँगे।'
श्लोक 32 (skanda.5.286.32)
नास्ति मृत्युभयं तेषां वसध्वं यत्र चेप्सितम् । कद्रूशापभयं नास्ति ह्येष मे विस्तरः परः ।
nāsti mṛtyubhayaṁ teṣāṁ vasadhvaṁ yatra cepsitam| kadrūśāpabhayaṁ nāsti hy eṣa me vistaraḥ paraḥ||
'उन्हें मृत्यु का भय नहीं होगा; जहाँ चाहो वहाँ निवास करो; कद्रू के शाप का भय नहीं रहेगा - यह मेरा विस्तृत वरदान है।'
श्लोक 33 (skanda.5.286.33)
एवं दत्त्वा वरं तेषां देवदेवो महेश्वरः । जगामाकाशमाविश्य कैलासं धरणीधरम् ।
evaṁ dattvā varaṁ teṣāṁ devadevo maheśvaraḥ| jagāmākāśam āviśya kailāsaṁ dharaṇīdharam||
इस प्रकार उन्हें वर देकर देवदेव महेश्वर आकाश में प्रविष्ट होकर धरणीधर कैलास पर्वत को चले गए।
श्लोक 34 (skanda.5.286.34)
गते चादर्शनं देवे वासुकिप्रमुखा नृप । स्थापयित्वा तथा जग्मुर्देवदेवं महेश्वरम् ।
gate cādarśanaṁ deve vāsukipramukhā nṛpa| sthāpayitvā tathā jagmur devadevaṁ maheśvaram||
हे राजन्! देव के अन्तर्धान हो जाने पर वासुकि आदि वहाँ देवदेव महेश्वर की स्थापना करके चले गए।
श्लोक 35 (skanda.5.286.35)
तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्पञ्चम्यामर्चयेच्छिवम् । तस्य नागकुलान्यष्टौ न हिंसन्ति कदाचन ।
tatra tīrthe tu yaḥ kaścit pañcamyām arcayec chivam| tasya nāgakulāny aṣṭau na hiṁsanti kadācana||
उस तीर्थ में जो कोई पञ्चमी को शिव की पूजा करता है, आठों नागकुल उसे कभी नहीं सताते।
श्लोक 36 (skanda.5.286.36)
मृतः कालेन महता तत्र तीर्थे नरेश्वर । शिवस्यानुचरो भूत्वा वसते कालमीप्सितम् ।
mṛtaḥ kālena mahatā tatra tīrthe nareśvara| śivasyānucaro bhūtvā vasate kālam īpsitam||
हे नरेश्वर! उस तीर्थ में दीर्घकाल पश्चात मृत्यु पाने वाला शिव का अनुचर बनकर इच्छित काल तक निवास करता है।