अवन्ती खण्ड · अध्याय 304
लिंग-वाराह तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.304.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। तस्यैवानन्तरं तीर्थं लिङ्गेश्वरमिति श्रुतम् । दर्शनाद्देवदेवस्य यत्र पापं प्रणश्यति ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tasyaivānantaraṁ tīrthaṁ liṅgeśvaramiti śrutam | darśanāddevadevasya yatra pāpaṁ praṇaśyati ||
श्रीमार्कण्डेय बोले — उसी के बाद "लिंगेश्वर" नाम से प्रसिद्ध एक तीर्थ है, जहाँ देवदेव के दर्शनमात्र से पाप नष्ट हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.304.2)
कृत्वा तु कदनं घोरं दानवानां युधिष्ठिर । वाराहं रूपमास्थाय नर्मदायां व्यवस्थितः ॥
kṛtvā tu kadanaṁ ghoraṁ dānavānāṁ yudhiṣṭhira | vārāhaṁ rūpamāsthāya narmadāyāṁ vyavasthitaḥ ||
हे युधिष्ठिर! दानवों का घोर संहार करके, वाराह रूप धारण किए हुए भगवान् नर्मदा में स्थित हुए।
श्लोक 3 (skanda.5.304.3)
तत्र तीर्थे तु यः स्नानं कृत्वा देवं नमस्यति । स मुच्यते नृपश्रेष्ठ महापापैः पुराकृतैः ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snānaṁ kṛtvā devaṁ namasyati | sa mucyate nṛpaśreṣṭha mahāpāpaiḥ purākṛtaiḥ ||
हे नृपश्रेष्ठ! उस तीर्थ में स्नान करके जो देव को नमस्कार करता है, वह पूर्वकृत महापापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.5.304.4)
द्वादश्यां कृष्णपक्षस्य शुक्ले च समुपोषितः । गन्धमाल्यैर्जगन्नाथं पूजयेत्पाण्डुनन्दन ॥
dvādaśyāṁ kṛṣṇapakṣasya śukle ca samupoṣitaḥ | gandhamālyairjagannāthaṁ pūjayetpāṇḍunandana ||
हे पाण्डुनन्दन! कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष की द्वादशी को उपवासपूर्वक गन्ध और मालाओं से जगन्नाथ की पूजा करे।
श्लोक 5 (skanda.5.304.5)
ब्राह्मणांश्च महाभाग दानसंमानभोजनैः । पूजयेत्परया भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
brāhmaṇāṁśca mahābhāga dānasaṁmānabhojanaiḥ | pūjayetparayā bhaktyā tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu ||
हे महाभाग! ब्राह्मणों को दान, सम्मान और भोजन से परम भक्तिपूर्वक पूजे। उसका पुण्यफल सुनो।
श्लोक 6 (skanda.5.304.6)
सत्रयाजिफलं जन्तुर्लभते द्वादशाब्दकैः । ब्राह्मणान्भोजयंस्तत्र तदेव लभते फलम् ॥
satrayājiphalaṁ janturlabhate dvādaśābdakaiḥ | brāhmaṇānbhojayaṁstatra tadeva labhate phalam ||
प्राणी बारह वर्षों में सत्रयज्ञ करने का जो फल पाता है, उतना ही फल वहाँ ब्राह्मणों को भोजन कराने से प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (skanda.5.304.7)
तर्पयित्वा पितॄन् देवान् स्नात्वा तद्गतमानसः । जपेद्द्वादशनामानि देवस्य पुरतः स्थितः ॥
tarpayitvā pitṝn devān snātvā tadgatamānasaḥ | japeddvādaśanāmāni devasya purataḥ sthitaḥ ||
पितरों और देवताओं का तर्पण करके, स्नान करके, तन्मय मन से देव के समक्ष खड़े होकर उसके द्वादश नामों का जप करे।
श्लोक 8 (skanda.5.304.8)
मासि मासि निराहारो द्वादश्यां कुरुनन्दन । केशवं पूजयेन्नित्यं मासि मार्गशिरे बुधः ॥
māsi māsi nirāhāro dvādaśyāṁ kurunandana | keśavaṁ pūjayennityaṁ māsi mārgaśire budhaḥ ||
हे कुरुनन्दन! प्रत्येक मास की द्वादशी को उपवास करते हुए, मार्गशीर्ष मास में बुद्धिमान् पुरुष नित्य केशव की पूजा करे,
श्लोक 9 (skanda.5.304.9)
पौषे नारायणं देवं माघमासे तु माधवम् । गोविन्दं फाल्गुने मासि विष्णुं चैत्रे समर्चयेत् ॥
pauṣe nārāyaṇaṁ devaṁ māghamāse tu mādhavam | govindaṁ phālgune māsi viṣṇuṁ caitre samarcayet ||
पौष में देव नारायण का, माघ मास में माधव का, फाल्गुन मास में गोविन्द का, तथा चैत्र में विष्णु का पूजन करे।
श्लोक 10 (skanda.5.304.10)
वैशाखे मधुहन्तारं ज्येष्ठे देवं त्रिविक्रमम् । वामनं तु तथाषाढे श्रावणे श्रीधरं स्मरेत् ॥
vaiśākhe madhuhantāraṁ jyeṣṭhe devaṁ trivikramam | vāmanaṁ tu tathāṣāḍhe śrāvaṇe śrīdharaṁ smaret ||
वैशाख में मधुहन्ता का, ज्येष्ठ में देव त्रिविक्रम का, आषाढ़ में वामन का, तथा श्रावण में श्रीधर का स्मरण करे।
श्लोक 11 (skanda.5.304.11)
हृषीकेशं भाद्रपदे पद्मनाभं तथाश्विने । दामोदरं कार्त्तिके तु कीर्तयन्नावसीदति ॥
hṛṣīkeśaṁ bhādrapade padmanābhaṁ tathāśvine | dāmodaraṁ kārttike tu kīrtayannāvasīdati ||
भाद्रपद में हृषीकेश का, आश्विन में पद्मनाभ का, तथा कार्तिक में दामोदर का कीर्तन करने वाला दुःखी नहीं होता।
श्लोक 12 (skanda.5.304.12)
वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुरा कृतम् । तन्नश्यति न सन्देहो मासनामानुकीर्तनात् ॥
vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karmajaṁ yatpurā kṛtam | tannaśyati na sandeho māsanāmānukīrtanāt ||
वाणी, मन और कर्म से पूर्व में किए गए जो भी पाप हों, मासों के इन नामों के कीर्तन से वे सब नष्ट हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।
श्लोक 13 (skanda.5.304.13)
स्वयं विनुद्धः सततमुन्मिषन्निमिषंस्तथा । शीघ्रं प्रपश्य भुञ्जानो मन्त्रहीनं समुद्गिरेत् ॥
svayaṁ vinuddhaḥ satatamunmiṣannimiṣaṁstathā | śīghraṁ prapaśya bhuñjāno mantrahīnaṁ samudgiret ||
निरन्तर आँख खोलते और मूँदते हुए, स्वयं शुद्ध होकर, शीघ्रता से देखते-भोजन करते हुए भी, यदि मन्त्र भूल जाए तो उसे उगल दे (त्रुटि को सुधार ले)।
श्लोक 14 (skanda.5.304.14)
परमापद्गतस्यापि जन्तोरेषा प्रतिक्रिया । यन्मासाधिपतेर्विष्णोर्मासनामानुकीर्तनम् ॥
paramāpadgatasyāpi jantoreṣā pratikriyā | yanmāsādhipaterviṣṇormāsanāmānukīrtanam ||
परम आपत्ति में पड़े हुए प्राणी के लिए भी यही उपाय है, कि वह मासाधिपति विष्णु के मासिक नामों का कीर्तन करे।
श्लोक 15 (skanda.5.304.15)
ता निशास्ते च दिवसास्ते मासास्ते च वत्सराः । नराणां सफला येषु चिन्तितो भगवान्हरिः ॥
tā niśāste ca divasāste māsāste ca vatsarāḥ | narāṇāṁ saphalā yeṣu cintito bhagavānhariḥ ||
मनुष्यों की वे ही रातें, वे ही दिन, वे ही मास और वे ही वर्ष सफल हैं, जिनमें भगवान् हरि का चिन्तन किया गया हो।
श्लोक 16 (skanda.5.304.16)
परमापद्गतस्यापि यस्य देवो जनार्दनः । नावसर्पति हृत्पद्मात्स योगी नात्र संशयः ॥
paramāpadgatasyāpi yasya devo janārdanaḥ | nāvasarpati hṛtpadmātsa yogī nātra saṁśayaḥ ||
जिसके हृदय-कमल से परम आपत्ति में पड़ने पर भी देव जनार्दन नहीं हटते, वही योगी है, इसमें सन्देह नहीं है।
श्लोक 17 (skanda.5.304.17)
ते भाग्यहीना मनुजाः सुशोच्यास्ते भूमिभाराय कृतावताराः । अचेतनास्ते पशुभिः समाना ये भक्तिहीना भगवत्यनन्ते ॥
te bhāgyahīnā manujāḥ suśocyāste bhūmibhārāya kṛtāvatārāḥ | acetanāste paśubhiḥ samānā ye bhaktihīnā bhagavatyanante ||
जो मनुष्य अनन्त भगवान् में भक्तिरहित हैं, वे भाग्यहीन हैं, अत्यन्त शोचनीय हैं, मानो पृथ्वी का भार बढ़ाने के लिए ही जन्मे हों, अचेतन तथा पशुओं के समान हैं।
श्लोक 18 (skanda.5.304.18)
ते पूर्णकार्याः पुरुषाः पृथिव्यां ते स्वाङ्गपाताद्भुवनं पुनन्ति । विचक्षणा विश्वविभूषणास्ते ये भक्तियुक्ता भगवत्यनन्ते ॥
te pūrṇakāryāḥ puruṣāḥ pṛthivyāṁ te svāṅgapātādbhuvanaṁ punanti | vicakṣaṇā viśvavibhūṣaṇāste ye bhaktiyuktā bhagavatyanante ||
जो अनन्त भगवान् में भक्तियुक्त हैं, वे ही पृथ्वी पर पूर्णकाम पुरुष हैं; अपने शरीर के गिरने (मरने) मात्र से भी वे भुवन को पवित्र करते हैं; वे ही विचक्षण हैं, वे ही विश्व के आभूषण हैं।
श्लोक 19 (skanda.5.304.19)
स एव सुकृती तेन लब्धं जन्मतरोः फलम् । चित्ते वचसि काये च यस्य देवो जनार्दनः ॥
sa eva sukṛtī tena labdhaṁ janmataroḥ phalam | citte vacasi kāye ca yasya devo janārdanaḥ ||
वही पुण्यात्मा है, उसी के द्वारा जन्म-वृक्ष का फल प्राप्त किया गया है, जिसके चित्त, वाणी और शरीर में देव जनार्दन विराजमान हैं।
श्लोक 20 (skanda.5.304.20)
एतत्तीर्थवरं पुण्यं लिङ्गो यत्र जनार्दनः । वञ्चयित्वा रिपून्संख्ये क्रोधो भूत्वा सनातनः ॥
etattīrthavaraṁ puṇyaṁ liṅgo yatra janārdanaḥ | vañcayitvā ripūnsaṁkhye krodho bhūtvā sanātanaḥ ||
यह श्रेष्ठ, पुण्य तीर्थ है, जहाँ जनार्दन लिंग-रूप में विद्यमान हैं — जहाँ युद्ध में शत्रुओं को छकाकर वे सनातन क्रोधरूप हो गए थे।
श्लोक 21 (skanda.5.304.21)
उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च यो ह्यष्टकानामयनद्वये च । पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं दद्यात्पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः ॥
upaplave candramaso raveśca yo hyaṣṭakānāmayanadvaye ca | pānīyamapyatra tilairvimiśraṁ dadyātpitṛbhyaḥ prayato manuṣyaḥ ||
चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहण के समय, अष्टका के दिनों में, तथा दोनों अयनों में, जो संयमी मनुष्य यहाँ तिल-मिश्रित जल भी पितरों को अर्पित करता है (उसका फल महान् होता है)।
श्लोक 22 (skanda.5.304.22)
घोणोन्मीलितमेरुरन्ध्रनिवहो दुःखाब्धिमज्जत्प्लवः प्रादुर्भूतरसातलोदरबृहत्पङ्कार्धमग्नक्षुरः । फूत्कारोत्करनुन्नवातविदलद्दिग्दन्तिनादश्रुतिन्यस्तस्तब्धवपुः श्रुतिर्भवतु वः क्रोडो हरिः शान्तये ॥
ghoṇonmīlitamerurandhranivaho duḥkhābdhimajjatplavaḥ prādurbhūtarasātalodarabṛhatpaṅkārdhamagnakṣuraḥ | phūtkārotkaranunnavātavidaladdigdantinādaśrutinyastastabdhavapuḥ śrutirbhavatu vaḥ kroḍo hariḥ śāntaye ||
जिसके थूथन ने मेरु पर्वत के छिद्रों को खोल दिया, जो दुःख-सागर में डूबते हुओं के लिए नौका के समान है, जिसके खुर रसातल के भीतर से उठे हुए विशाल कीचड़ में आधे धँसे हुए हैं, जिसके फुँकारों से उठे वायु-वेग से दिग्गजों की चिंघाड़ें विदीर्ण हो जाती हैं, ऐसा वह वराहरूपी हरि, जिनका शरीर श्रुति (वेद) में ही स्थित है, तुम्हारी शान्ति के लिए हो।