अवन्ती खण्ड · अध्याय 303
मंगलेश्वर (अंगारक) तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.303.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल तीर्थमङ्गारकं शिवम् । उत्तरे नर्मदाकूले सर्वपापक्षयंकरम् ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla tīrthamaṅgārakaṁ śivam | uttare narmadākūle sarvapāpakṣayaṁkaram ||
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे महीपाल! उसके बाद नर्मदा के उत्तर तट पर स्थित, सब पापों का नाश करने वाले, कल्याणकारी अंगारक तीर्थ में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.5.303.2)
चतुर्थ्यङ्गारकदिने संकल्प्य कृतनिश्चयः । स्नायादस्तं गते सूर्ये सन्ध्योपासनतत्परः ॥
caturthyaṅgārakadine saṁkalpya kṛtaniścayaḥ | snāyādastaṁ gate sūrye sandhyopāsanatatparaḥ ||
चतुर्थी और मंगलवार के दिन संकल्प करके दृढ़ निश्चय के साथ, सूर्य के अस्त हो जाने पर सन्ध्या-उपासना में तत्पर होकर स्नान करे।
श्लोक 3 (skanda.5.303.3)
पूजयेल्लोहितं भक्त्या गन्धमाल्यविभूषणैः । संस्थाप्यस्थण्डिले देवं रक्तचन्दनचर्चितम् ॥
pūjayellohitaṁ bhaktyā gandhamālyavibhūṣaṇaiḥ | saṁsthāpyasthaṇḍile devaṁ raktacandanacarcitam ||
गन्ध, माला और आभूषणों से भक्तिपूर्वक लोहित (मंगल) देवता की पूजा करे, उस देव को वेदी पर स्थापित करके रक्त चन्दन से चर्चित करे।
श्लोक 4 (skanda.5.303.4)
अङ्गारकायेति नमः कर्णिकायां प्रपूजयेत् । कुजाय भूमिपुत्राय रक्ताङ्गाय सुवाससे ॥
aṅgārakāyeti namaḥ karṇikāyāṁ prapūjayet | kujāya bhūmiputrāya raktāṅgāya suvāsase ||
"अंगारकाय नमः" कहकर (कमल की) कर्णिका में पूजा करे — "कुज को, भूमिपुत्र को, रक्ताङ्ग को, सुवस्त्रधारी को (नमस्कार हो)"
श्लोक 5 (skanda.5.303.5)
हरकोपोद्भवायेति स्वेदजायातिबाहवे । सर्वकामप्रदायेति पूर्वादिषु दलेषु च ॥
harakopodbhavāyeti svedajāyātibāhave | sarvakāmapradāyeti pūrvādiṣu daleṣu ca ||
"हरकोप से उत्पन्न को, स्वेदज को, अतिबाहु को, सब कामनाएँ देने वाले को (नमस्कार हो)" — इस प्रकार पूर्व आदि दिशाओं की पंखुड़ियों में (पूजा करे)।
श्लोक 6 (skanda.5.303.6)
एवं सम्पूज्य विधिवद्दद्यादर्घ्यं विधानतः । भूमिपुत्र महावीर्य स्वेदोद्भव पिनाकिनः ॥
evaṁ sampūjya vidhivaddadyādarghyaṁ vidhānataḥ | bhūmiputra mahāvīrya svedodbhava pinākinaḥ ||
इस प्रकार विधिपूर्वक पूजा करके विधानानुसार अर्घ्य दे — "हे भूमिपुत्र! हे महावीर्य! हे पिनाकी (शिव) के स्वेद से उत्पन्न!
श्लोक 7 (skanda.5.303.7)
अङ्गारक महातेजा लोहिताङ्ग नमोऽस्तु ते । करकं वारिसंयुक्तं शालितंदुलपूरितम् ॥
aṅgāraka mahātejā lohitāṅga namo'stu te | karakaṁ vārisaṁyuktaṁ śālitaṁdulapūritam ||
हे अंगारक! हे महातेजस्वी! हे लोहिताङ्ग! तुम्हें नमस्कार हो।" फिर जल से युक्त, शालि-तण्डुल से भरा हुआ एक घड़ा,
श्लोक 8 (skanda.5.303.8)
सहिरण्यं सवस्त्रं च मोदकोपरि संस्थितम् । ब्राह्मणाय निवेद्यं तत्कुजो मे प्रीयतामिति ॥
sahiraṇyaṁ savastraṁ ca modakopari saṁsthitam | brāhmaṇāya nivedyaṁ tatkujo me prīyatāmiti ||
स्वर्ण, वस्त्र तथा उसके ऊपर रखे हुए मोदक सहित, ब्राह्मण को यह कहकर अर्पित करे — "इससे कुज मुझ पर प्रसन्न हों।"
श्लोक 9 (skanda.5.303.9)
अर्घं दत्त्वा विधानेन रक्तचन्दनवारिणा । रक्तपुष्पसमाकीर्णं तिलतंदुलमिश्रितम् ॥
arghaṁ dattvā vidhānena raktacandanavāriṇā | raktapuṣpasamākīrṇaṁ tilataṁdulamiśritam ||
विधिपूर्वक रक्त चन्दन-मिश्रित जल से अर्घ्य देकर, लाल पुष्पों से भरे हुए, तिल-तंदुल से मिश्रित (चावल को) —
श्लोक 10 (skanda.5.303.10)
कृत्वा ताम्रमये पात्रे मण्डले वर्तुले शुभे । कृत्वा शिरसि तत्पात्रं जानुभ्यां धरणीं गतः ॥
kṛtvā tāmramaye pātre maṇḍale vartule śubhe | kṛtvā śirasi tatpātraṁ jānubhyāṁ dharaṇīṁ gataḥ ||
ताँबे के पात्र में, एक शुभ गोल मण्डल में रखकर, उस पात्र को सिर पर रखकर, घुटनों के बल भूमि पर बैठकर —
श्लोक 11 (skanda.5.303.11)
मन्त्रपूतं महाभाग दद्यादर्घ्यं विचक्षणः । ततो भुञ्जीत मौनेन क्षारतिलाम्लवर्जितम् ॥
mantrapūtaṁ mahābhāga dadyādarghyaṁ vicakṣaṇaḥ | tato bhuñjīta maunena kṣāratilāmlavarjitam ||
हे महाभाग! बुद्धिमान् पुरुष मन्त्र से पवित्र किया हुआ अर्घ्य दे। फिर मौन रहते हुए, क्षार, तिल और खटाई से रहित भोजन करे,
श्लोक 12 (skanda.5.303.12)
स्निग्धं मृदुसमधुरमात्मनः श्रेय इच्छता । एवं चतुर्थे सम्प्राप्ते चतुर्थ्यङ्गारके नृप ॥
snigdhaṁ mṛdusamadhuramātmanaḥ śreya icchatā | evaṁ caturthe samprāpte caturthyaṅgārake nṛpa ||
अपने कल्याण की इच्छा रखने वाला, स्निग्ध, मृदु और मधुर भोजन ले। हे राजन्! इस प्रकार चौथे मंगलवार-चतुर्थी के प्राप्त होने पर —
श्लोक 13 (skanda.5.303.13)
सौवर्णं कारयेद्देवं यथाशक्ति सुरूपिणम् । स्थापयेत्ताम्रके पात्रे गुडपीठसमन्विते ॥
sauvarṇaṁ kārayeddevaṁ yathāśakti surūpiṇam | sthāpayettāmrake pātre guḍapīṭhasamanvite ||
यथाशक्ति एक सुन्दर सुवर्ण-मूर्ति बनवाए और उसे गुड़ की पीठिका सहित ताँबे के पात्र में स्थापित करे।
श्लोक 14 (skanda.5.303.14)
गन्धपुष्पादिभिर्देवं पूजयेद्गुडसंस्थितम् । ईशान्यां स्थापयेद्देवं गुडतोयसमन्वितम् ॥
gandhapuṣpādibhirdevaṁ pūjayedguḍasaṁsthitam | īśānyāṁ sthāpayeddevaṁ guḍatoyasamanvitam ||
गन्ध-पुष्प आदि से गुड़ पर स्थापित उस देव की पूजा करे। ईशान दिशा में गुड़-मिश्रित जल के साथ देव को स्थापित करे।
श्लोक 15 (skanda.5.303.15)
कासारेण तथाग्नेय्यां स्थापयेत्करकं परम् । रक्ततन्दुलसंमिश्रं नैरृत्यां वायुगोचरे ॥
kāsāreṇa tathāgneyyāṁ sthāpayetkarakaṁ param | raktatandulasaṁmiśraṁ nairṛtyāṁ vāyugocare ||
अग्नि दिशा में एक अन्य जल-भरा घड़ा स्थापित करे; नैरृत्य दिशा में लाल चावल से मिश्रित (घड़ा), और वायव्य दिशा में —
श्लोक 16 (skanda.5.303.16)
स्थापयेन्मोदकैः सार्धं चतुर्थं करकं बुधः । सूत्रेण वेष्टितग्रीवं गन्धमाल्यैरलंकृतम् ॥
sthāpayenmodakaiḥ sārdhaṁ caturthaṁ karakaṁ budhaḥ | sūtreṇa veṣṭitagrīvaṁ gandhamālyairalaṁkṛtam ||
बुद्धिमान् पुरुष मोदकों सहित चौथा घड़ा स्थापित करे, जिसकी गर्दन सूत्र से लिपटी हो, और जो गन्ध-मालाओं से अलंकृत हो।
श्लोक 17 (skanda.5.303.17)
शङ्खतूर्यनिनादेन जयशब्दादिमङ्गलैः । रक्ताम्बरधरं विप्रं रक्तमाल्यानुलेपनम् ॥
śaṅkhatūryaninādena jayaśabdādimaṅgalaiḥ | raktāmbaradharaṁ vipraṁ raktamālyānulepanam ||
शंख और तुरही की ध्वनि से, जय-जयकार आदि मंगल शब्दों के साथ, लाल वस्त्र, लाल माला और लाल अनुलेपन धारण करने वाले ब्राह्मण को —
श्लोक 18 (skanda.5.303.18)
वेदिमध्यगतं वापि महदासनसंस्थितम् । सुरूपं सुभगं शान्तं सर्वभूतहिते रतम् ॥
vedimadhyagataṁ vāpi mahadāsanasaṁsthitam | surūpaṁ subhagaṁ śāntaṁ sarvabhūtahite ratam ||
वेदी के मध्य में अथवा विशाल आसन पर बैठे हुए, सुरूप, सुभग, शान्त, तथा सर्वभूतहितरत,
श्लोक 19 (skanda.5.303.19)
वेदविद्याव्रतस्नातं सर्वशास्त्रविशारदम् । पूजयित्वा यथान्यायं वाचयेत्पाण्डुनन्दन ॥
vedavidyāvratasnātaṁ sarvaśāstraviśāradam | pūjayitvā yathānyāyaṁ vācayetpāṇḍunandana ||
वेद-विद्या के व्रत में स्नातक, सब शास्त्रों में निपुण, ऐसे ब्राह्मण को यथोचित पूजकर, हे पाण्डुनन्दन! उससे स्वस्तिवाचन कराए।
श्लोक 20 (skanda.5.303.20)
रक्तां गां च ततो दद्याद्रक्तेनानडुहा सह । प्रीयतां भूमिजो देवः सर्वदैवतपूजितः ॥
raktāṁ gāṁ ca tato dadyādraktenānaḍuhā saha | prīyatāṁ bhūmijo devaḥ sarvadaivatapūjitaḥ ||
फिर लाल रंग की गाय, लाल बैल सहित, दान में दे — "सब देवताओं द्वारा पूजित भूमिपुत्र देव मुझ पर प्रसन्न हों।"
श्लोक 21 (skanda.5.303.21)
विप्रं प्रदक्षिणीकृत्य पत्नीपुत्रसमन्वितः । पितृमातृसुहृत्सार्द्धं क्षमाप्य च विसर्जयेत् ॥
vipraṁ pradakṣiṇīkṛtya patnīputrasamanvitaḥ | pitṛmātṛsuhṛtsārddhaṁ kṣamāpya ca visarjayet ||
पत्नी-पुत्र सहित उस ब्राह्मण की प्रदक्षिणा करके, माता-पिता और मित्रों सहित क्षमा माँगकर उसे विदा करे।
श्लोक 22 (skanda.5.303.22)
एवं कृतस्य तस्याथ तस्मिंस्तीर्थे विशेषतः । यत्पुण्यं फलमुद्दिष्टं तत्ते सर्वं वदाम्यहम् ॥
evaṁ kṛtasya tasyātha tasmiṁstīrthe viśeṣataḥ | yatpuṇyaṁ phalamuddiṣṭaṁ tatte sarvaṁ vadāmyaham ||
इस प्रकार वहाँ, उस तीर्थ में, विशेष रूप से यह कृत्य करने वाले का जो पुण्यफल कहा गया है, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 23 (skanda.5.303.23)
सप्त जन्मानि राजेन्द्र सुरूपः सुभगो भवेत् । तीर्थस्यास्य प्रभावेन नात्र कार्या विचारणा ॥
sapta janmāni rājendra surūpaḥ subhago bhavet | tīrthasyāsya prabhāvena nātra kāryā vicāraṇā ||
हे राजेन्द्र! इस तीर्थ के प्रभाव से वह सात जन्मों तक सुरूप और सुभग होता है, इसमें विचार-वितर्क की आवश्यकता नहीं है।
श्लोक 24 (skanda.5.303.24)
अकामो वा सकामो वा तत्र तीर्थे मृतो नरः । अङ्गारकपुरं याति देवगन्धर्वपूजितः ॥
akāmo vā sakāmo vā tatra tīrthe mṛto naraḥ | aṅgārakapuraṁ yāti devagandharvapūjitaḥ ||
चाहे कामनारहित हो या कामनासहित, जो मनुष्य उस तीर्थ में मृत्यु प्राप्त करता है, वह देवताओं और गन्धर्वों द्वारा पूजित होकर अंगारक-पुर को जाता है।
श्लोक 25 (skanda.5.303.25)
उपभुज्य यथान्यायं दिव्यान्भोगाननुत्तमान् । इह मानुष्यलोके वै राजा भवति धार्मिकः ॥
upabhujya yathānyāyaṁ divyānbhogānanuttamān | iha mānuṣyaloke vai rājā bhavati dhārmikaḥ ||
वहाँ यथोचित दिव्य और सर्वोत्तम भोगों का भोग करके, इस मनुष्यलोक में फिर धार्मिक राजा होता है।
श्लोक 26 (skanda.5.303.26)
सुरूपः सुभगश्चैव सर्वव्याधिविवर्जितः । जीवेद्वर्षशतं साग्रं सर्वलोकनमस्कृतः ॥
surūpaḥ subhagaścaiva sarvavyādhivivarjitaḥ | jīvedvarṣaśataṁ sāgraṁ sarvalokanamaskṛtaḥ ||
वह सुरूप, सुभग तथा सब व्याधियों से रहित होकर, समस्त लोगों द्वारा वन्दित होकर, सौ वर्षों से अधिक जीवित रहता है।