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अवन्ती खण्ड · अध्याय 302

सिद्धेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 301अध्याय-सूचीअध्याय 303

श्लोक 1 (skanda.5.302.1)

मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल सिद्धेश्वरमनुत्तमम् । नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम् ॥

mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla siddheśvaramanuttamam | narmadādakṣiṇe kūle tīrthaṁ paramaśobhanam ||

मार्कण्डेय बोले — हे महीपाल! उसके बाद उस सर्वोत्तम सिद्धेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जो नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित परम सुन्दर तीर्थ है।

श्लोक 2 (skanda.5.302.2)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद्वृषभध्वजम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो गतिं यात्यश्वमेधिनाम् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayedvṛṣabhadhvajam | sarvapāpavinirmukto gatiṁ yātyaśvamedhinām ||

उस तीर्थ में स्नान करके जो वृषभध्वज (शिव) की पूजा करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर अश्वमेध यज्ञ करने वालों की गति को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.5.302.3)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा श्राद्धं कुर्यात्प्रयत्नतः । पितॄणां प्रीणनार्थाय सर्वं तेन कृतं भवेत् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā śrāddhaṁ kuryātprayatnataḥ | pitṝṇāṁ prīṇanārthāya sarvaṁ tena kṛtaṁ bhavet ||

उस तीर्थ में स्नान करके जो प्रयत्नपूर्वक पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध करता है, उसके द्वारा सब कुछ किया हुआ ही समझा जाता है।

श्लोक 4 (skanda.5.302.4)

तत्र तीर्थे मृतानां तु जन्तूनां नृपसत्तम । गर्भवासे मतिस्तेषां न जायेत कदाचन ॥

tatra tīrthe mṛtānāṁ tu jantūnāṁ nṛpasattama | garbhavāse matisteṣāṁ na jāyeta kadācana ||

हे नृपसत्तम! उस तीर्थ में जो जीव मरते हैं, उनकी बुद्धि पुनः गर्भवास में कभी नहीं जाती।

श्लोक 5 (skanda.5.302.5)

गर्भवासो हि दुःखाय न सुखाय कदाचन । तत्तीर्थवारिणा स्नातुर्न पुनर्भवसम्भवः ॥

garbhavāso hi duḥkhāya na sukhāya kadācana | tattīrthavāriṇā snāturna punarbhavasambhavaḥ ||

गर्भवास सदा दुःख के लिए है, कभी सुख के लिए नहीं। उस तीर्थ के जल से स्नान करने वाले का फिर पुनर्जन्म नहीं होता।

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