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अवन्ती खण्ड · अध्याय 301

अस्माहक तीर्थ की महिमा

अध्याय 300अध्याय-सूचीअध्याय 302

श्लोक 1 (skanda.5.301.1)

मार्कण्डेय उवाच। अस्माहकं ततो गच्छेत्पितृतीर्थमनुत्तमम् । प्रेतत्वाद्यत्र मुच्यन्ते पिण्डेनैकेन पूर्वजाः ॥

mārkaṇḍeya uvāca| asmāhakaṁ tato gacchetpitṛtīrthamanuttamam | pretatvādyatra mucyante piṇḍenaikena pūrvajāḥ ||

मार्कण्डेय बोले — उसके बाद उस सर्वोत्तम पितृतीर्थ अस्माहक में जाना चाहिए, जहाँ एक ही पिण्ड देने से पूर्वज प्रेतत्व से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 2 (skanda.5.301.2)

युधिष्ठिर उवाच। अस्माहकस्य माहात्म्यं कथयस्व ममानघ । स्नानदानेन यत्पुण्यं तथा पिण्डोदकेन च ॥

yudhiṣṭhira uvāca| asmāhakasya māhātmyaṁ kathayasva mamānagha | snānadānena yatpuṇyaṁ tathā piṇḍodakena ca ||

युधिष्ठिर बोले — हे निष्पाप! मुझे अस्माहक की महिमा बताइए, तथा स्नान-दान से और पिण्ड-जल से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह भी बताइए।

श्लोक 3 (skanda.5.301.3)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। पुरा कल्पे नृपश्रेष्ठ ऋषिदेवसमागमे । प्रश्नः पृष्टो मया तात यथा त्वमनुपृच्छसि ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| purā kalpe nṛpaśreṣṭha ṛṣidevasamāgame | praśnaḥ pṛṣṭo mayā tāta yathā tvamanupṛcchasi ||

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे नृपश्रेष्ठ! पूर्वकल्प में ऋषियों और देवताओं की एक सभा में, हे तात, यही प्रश्न मेरे द्वारा भी पूछा गया था, जैसा तुम पूछ रहे हो।

श्लोक 4 (skanda.5.301.4)

एकत्र सागराः सप्त सप्रयागाः सपुष्कराः । नास्य साम्यं लभन्ते ते नात्र कार्या विचारणा ॥

ekatra sāgarāḥ sapta saprayāgāḥ sapuṣkarāḥ | nāsya sāmyaṁ labhante te nātra kāryā vicāraṇā ||

सातों समुद्र, प्रयाग और पुष्कर — ये सब एक साथ मिलकर भी इस (तीर्थ) की समानता नहीं पाते, इसमें सन्देह न करें।

श्लोक 5 (skanda.5.301.5)

सोमनाथं तु विख्यातं यत्सोमेन प्रतिष्ठितम् । तत्र सोमग्रहे पुण्यं तत्पुण्यं लभते नरः ॥

somanāthaṁ tu vikhyātaṁ yatsomena pratiṣṭhitam | tatra somagrahe puṇyaṁ tatpuṇyaṁ labhate naraḥ ||

सोम द्वारा स्थापित विख्यात सोमनाथ में सोम-ग्रहण के समय जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य यहाँ मनुष्य को प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (skanda.5.301.6)

मासान्ते पितरो नृणां वीक्षन्ते सन्ततिं स्वकाम् । कश्चिदस्मत्कुलेऽस्माकं पिण्डमत्र प्रदास्यति ॥

māsānte pitaro nṛṇāṁ vīkṣante santatiṁ svakām | kaścidasmatkule'smākaṁ piṇḍamatra pradāsyati ||

महीने के अन्त में मनुष्यों के पितर अपनी सन्तान की प्रतीक्षा करते हैं — (सोचते हैं) "क्या हमारे कुल में कोई हमें यहाँ पिण्ड देगा?"

श्लोक 7 (skanda.5.301.7)

प्रपितामहास्तथादित्याः श्रुतिरेषा सनातनी । एवं ब्रुवन्ति देवाश्च ऋषयः सतपोधनाः ॥

prapitāmahāstathādityāḥ śrutireṣā sanātanī | evaṁ bruvanti devāśca ṛṣayaḥ satapodhanāḥ ||

प्रपितामह आदित्यों के समान हैं — यह सनातन श्रुति है। इस प्रकार देवगण और तपोधन ऋषिगण भी कहते हैं।

श्लोक 8 (skanda.5.301.8)

सकृत्पिण्डोदकेनैव शृणु पार्थिव यत्फलम् । द्वादशाब्दानि राजेन्द्र योगं भुक्त्वा सुशोभनम् ॥

sakṛtpiṇḍodakenaiva śṛṇu pārthiva yatphalam | dvādaśābdāni rājendra yogaṁ bhuktvā suśobhanam ||

हे राजन्! एक बार पिण्ड-जल देने मात्र से जो फल मिलता है, उसे सुनो। हे राजेन्द्र! (पितर) बारह वर्षों तक सुशोभित योग का भोग करते हैं,

श्लोक 9 (skanda.5.301.9)

युगे युगे महाराज अस्माहके पितामहाः । सर्वदा ह्यवलोकन्त आगच्छन्तं स्वगोत्रजम् ॥

yuge yuge mahārāja asmāhake pitāmahāḥ | sarvadā hyavalokanta āgacchantaṁ svagotrajam ||

हे महाराज! युग-युग में पितामहगण अस्माहक में सदा अपने कुल में आने वाले वंशज की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

श्लोक 10 (skanda.5.301.10)

भविष्यति किमस्माकममावास्याप्यमाहके । स्नानं दानं च ये कुर्युः पितॄणां तिलतर्पणम् ॥

bhaviṣyati kimasmākamamāvāsyāpyamāhake | snānaṁ dānaṁ ca ye kuryuḥ pitṝṇāṁ tilatarpaṇam ||

"क्या अमावास्या को हमारे लिए अस्माहक में कोई स्नान, दान और पितरों का तिल-तर्पण करेगा?" — जो ऐसा करते हैं,

श्लोक 11 (skanda.5.301.11)

ते सर्वपापनिर्मुक्ताः सर्वान्कामांल्लभति वै । जलमध्येऽत्र भूपाल अग्नितीर्थं च तिष्ठति ॥

te sarvapāpanirmuktāḥ sarvānkāmāṁllabhati vai | jalamadhye'tra bhūpāla agnitīrthaṁ ca tiṣṭhati ||

वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और सब कामनाओं को प्राप्त करते हैं। हे भूपाल! यहाँ जल के मध्य में अग्नितीर्थ भी स्थित है।

श्लोक 12 (skanda.5.301.12)

दर्शनात्तस्य तीर्थस्य पापराशिर्विलीयते । स्नानमात्रेण राजेन्द्र ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥

darśanāttasya tīrthasya pāparāśirvilīyate | snānamātreṇa rājendra brahmahatyāṁ vyapohati ||

उस तीर्थ के दर्शन से पापों की राशि विलीन हो जाती है; हे राजेन्द्र! केवल स्नान मात्र से ही ब्रह्महत्या दूर हो जाती है।

श्लोक 13 (skanda.5.301.13)

शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः स जितेन्द्रियः । एककालं तु भुञ्जानो मासं तीर्थस्य सन्निधौ ॥

śuklāmbaradharo nityaṁ niyataḥ sa jitendriyaḥ | ekakālaṁ tu bhuñjāno māsaṁ tīrthasya sannidhau ||

नित्य श्वेत वस्त्र धारण करने वाला, संयमी, जितेन्द्रिय, दिन में एक बार भोजन करने वाला, एक महीने तक उस तीर्थ के समीप रहकर —

श्लोक 14 (skanda.5.301.14)

सुवर्णालंकृतानां तु कन्यानां शतदानजम् । फलमाप्नोति सम्पूर्णं पितृलोके महीयते ॥

suvarṇālaṁkṛtānāṁ tu kanyānāṁ śatadānajam | phalamāpnoti sampūrṇaṁ pitṛloke mahīyate ||

सुवर्ण-आभूषणों से अलंकृत सौ कन्याओं के दान का सम्पूर्ण फल पाता है, और पितृलोक में महिमान्वित होता है।

श्लोक 15 (skanda.5.301.15)

पृथिव्यामासमुद्रायां महाभोगपतिर्भवेत् । धनधान्यसमायुक्तो दाता भवति धार्मिकः ॥

pṛthivyāmāsamudrāyāṁ mahābhogapatirbhavet | dhanadhānyasamāyukto dātā bhavati dhārmikaḥ ||

वह समुद्रपर्यन्त पृथ्वी का महान् भोगपति बनता है, धन-धान्य से सम्पन्न, दानशील और धार्मिक होता है।

श्लोक 16 (skanda.5.301.16)

उपवासी शुचिर्भूत्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । अस्माहकं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत् ॥

upavāsī śucirbhūtvā brahmalokamavāpnuyāt | asmāhakaṁ samāsādya yastu prāṇān parityajet ||

उपवास करके, पवित्र होकर, जो अस्माहक में पहुँचकर अपने प्राणों का त्याग करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 17 (skanda.5.301.17)

कोटिवर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते । ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः ॥

koṭivarṣasahasrāṇi rudraloke mahīyate | tataḥ svargātparibhraṣṭaḥ kṣīṇakarmā divaścyutaḥ ||

वह करोड़ों-हज़ारों वर्षों तक रुद्रलोक में महिमान्वित रहता है; फिर पुण्य-कर्म क्षीण होने पर स्वर्ग से च्युत होकर —

श्लोक 18 (skanda.5.301.18)

सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये कुले जायेत रूपवान् । कृत्वाभिषेकविधिना हयमेधफलं लभेत् ॥

suvarṇamaṇimuktāḍhye kule jāyeta rūpavān | kṛtvābhiṣekavidhinā hayamedhaphalaṁ labhet ||

स्वर्ण, मणि और मुक्ताओं से सम्पन्न कुल में रूपवान् होकर जन्म लेता है। विधिपूर्वक अभिषेक करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 19 (skanda.5.301.19)

धनाढ्यो रूपवान्दक्षो दाता भवति धार्मिकः । चतुर्वेदेषु यत्पुण्यं सत्यवादिषु यत्फलम् ॥

dhanāḍhyo rūpavāndakṣo dātā bhavati dhārmikaḥ | caturvedeṣu yatpuṇyaṁ satyavādiṣu yatphalam ||

वह धनाढ्य, रूपवान्, कुशल, दानशील और धार्मिक होता है। चारों वेदों के पाठ से जो पुण्य और सत्यवादियों को जो फल मिलता है,

श्लोक 20 (skanda.5.301.20)

तत्फलं लभते नूनं तत्र तीर्थेऽभिषेचनात् । तीर्थानां परमं तीर्थं निर्मितं शम्भुना पुरा ॥

tatphalaṁ labhate nūnaṁ tatra tīrthe'bhiṣecanāt | tīrthānāṁ paramaṁ tīrthaṁ nirmitaṁ śambhunā purā ||

वह फल निश्चय ही उस तीर्थ में स्नान करने से प्राप्त हो जाता है। यह तीर्थों में परम तीर्थ है, जिसे पूर्वकाल में शम्भु ने निर्मित किया था।

श्लोक 21 (skanda.5.301.21)

हृदयेशः स्वयं विष्णुर्जपेद्देवं महेश्वरम् । गन्धर्वाप्सरसश्चैव मरुतो मारुतास्तथा ॥

hṛdayeśaḥ svayaṁ viṣṇurjapeddevaṁ maheśvaram | gandharvāpsarasaścaiva maruto mārutāstathā ||

हृदयेश्वर विष्णु स्वयं यहाँ महेश्वर देव का जप करते हैं। गन्धर्व, अप्सराएँ, तथा मरुद्गण वायुदेवता के साथ,

श्लोक 22 (skanda.5.301.22)

विश्वेदेवाश्च पितरः सचन्द्राः सदिवाकराः । मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ॥

viśvedevāśca pitaraḥ sacandrāḥ sadivākarāḥ | marīciratryaṅgirasau pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ ||

विश्वेदेव, पितर, चन्द्रमा और सूर्य सहित, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु —

श्लोक 23 (skanda.5.301.23)

प्रचेताश्च वसिष्ठश्च भृगुर्नारद एव च । च्यवनो गालवश्चैव वामदेवो महामुनिः ॥

pracetāśca vasiṣṭhaśca bhṛgurnārada eva ca | cyavano gālavaścaiva vāmadevo mahāmuniḥ ||

प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु, नारद, च्यवन, गालव और महामुनि वामदेव —

श्लोक 24 (skanda.5.301.24)

वालखिल्याश्च गन्धारास्तृणबिन्दुश्च जाजलिः । उद्दालकश्चर्ष्यशृङ्गो वसिष्ठश्च सनन्दनः ॥

vālakhilyāśca gandhārāstṛṇabinduśca jājaliḥ | uddālakaścarṣyaśṛṅgo vasiṣṭhaśca sanandanaḥ ||

वालखिल्यगण, गन्धार, तृणबिन्दु, जाजलि, उद्दालक, ऋष्यशृंग, वसिष्ठ तथा सनन्दन —

श्लोक 25 (skanda.5.301.25)

शुक्रश्चैव भरद्वाजो वात्स्यो वात्स्यायनस्तथा । अगस्तिर्मित्रावरुणौ विश्वामित्रो मुनीश्वरः ॥

śukraścaiva bharadvājo vātsyo vātsyāyanastathā | agastirmitrāvaruṇau viśvāmitro munīśvaraḥ ||

शुक्र, भरद्वाज, वात्स्य, वात्स्यायन, अगस्त्य, मित्रावरुण के पुत्र (वसिष्ठ) तथा मुनीश्वर विश्वामित्र —

श्लोक 26 (skanda.5.301.26)

गौतमश्च पुलस्त्यश्च पौलस्त्यः पुलहः क्रतुः । सनातनस्तु कपिलो वाह्निः पञ्चशिखस्तथा ॥

gautamaśca pulastyaśca paulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ | sanātanastu kapilo vāhniḥ pañcaśikhastathā ||

गौतम, पुलस्त्य, पौलस्त्य, पुलह, क्रतु, सनातन कपिल, वाह्नि (आग्नेय) तथा पञ्चशिख —

श्लोक 27 (skanda.5.301.27)

अन्येऽपि बहवस्तत्र मुनयः शंसितव्रताः । क्रीडन्ति देवताः सर्व ऋषयः सतपोधनाः ॥

anye'pi bahavastatra munayaḥ śaṁsitavratāḥ | krīḍanti devatāḥ sarva ṛṣayaḥ satapodhanāḥ ||

और भी अनेक व्रतशील मुनिगण वहाँ हैं। समस्त देवगण और तपोधन ऋषिगण वहाँ क्रीड़ा करते हैं।

श्लोक 28 (skanda.5.301.28)

मनुष्याश्चैव योगीन्द्राः पितरः सपितामहाः । अस्माहकेऽत्र तिष्ठन्ति सर्व एव न संशयः ॥

manuṣyāścaiva yogīndrāḥ pitaraḥ sapitāmahāḥ | asmāhake'tra tiṣṭhanti sarva eva na saṁśayaḥ ||

मनुष्य, योगीन्द्रगण, पितर तथा पितामह — ये सब निःसन्देह इसी अस्माहक में निवास करते हैं।

श्लोक 29 (skanda.5.301.29)

पितरः पितामहाश्चैव तथैव प्रपितामहाः । येषां दत्तमुपस्थायि सुकृतं वापि दुष्कृतम् ॥

pitaraḥ pitāmahāścaiva tathaiva prapitāmahāḥ | yeṣāṁ dattamupasthāyi sukṛtaṁ vāpi duṣkṛtam ||

पिता, पितामह और प्रपितामह — इन सबके लिए जो कुछ दिया जाता है, चाहे वह सुकृत हो या दुष्कृत, वह उन तक पहुँचता है,

श्लोक 30 (skanda.5.301.30)

अक्षयं तत्र तत्सर्वं यत्कृतं योधनीपुरे । मातरं पितरं त्यक्त्वा सर्वबन्धुसुहृज्जनान् ॥

akṣayaṁ tatra tatsarvaṁ yatkṛtaṁ yodhanīpure | mātaraṁ pitaraṁ tyaktvā sarvabandhusuhṛjjanān ||

और योधनीपुर में जो कुछ किया जाता है, वह सब अक्षय होता है। माता, पिता तथा समस्त बन्धु-मित्रजनों को त्यागकर —

श्लोक 31 (skanda.5.301.31)

धनं धान्यं प्रियान्पुत्रांस्तथा देहं नृपोत्तम । गच्छते वायुभूतस्तु शुभाशुभसमन्वितः ॥

dhanaṁ dhānyaṁ priyānputrāṁstathā dehaṁ nṛpottama | gacchate vāyubhūtastu śubhāśubhasamanvitaḥ ||

हे नृपोत्तम! धन, धान्य, प्रिय पुत्रों तथा शरीर को भी त्यागकर, अपने शुभ-अशुभ कर्मों से युक्त हो जीव वायुरूप होकर आगे बढ़ता है।

श्लोक 32 (skanda.5.301.32)

अदृश्यः सर्वभूतानां परमात्मा महत्तरः । शुभाशुभगतिं प्राप्तः कर्मणा स्वेन पार्थिव ॥

adṛśyaḥ sarvabhūtānāṁ paramātmā mahattaraḥ | śubhāśubhagatiṁ prāptaḥ karmaṇā svena pārthiva ||

हे राजन्! वह सर्वभूतों के लिए अदृश्य, महत्तर परमात्मा अपने ही कर्म से शुभ या अशुभ गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 33 (skanda.5.301.33)

युधिष्ठिर उवाच। शुभाशुभं न बन्धूनां जायते केन हेतुना । एकः प्रसूयते जन्तुरेक एव प्रलीयते ॥

yudhiṣṭhira uvāca| śubhāśubhaṁ na bandhūnāṁ jāyate kena hetunā | ekaḥ prasūyate jantureka eva pralīyate ||

युधिष्ठिर बोले — किस कारण से बन्धुओं के शुभ-अशुभ कर्म का प्रभाव (एक-दूसरे पर) नहीं होता? प्राणी अकेला ही जन्म लेता है और अकेला ही लीन होता है —

श्लोक 34 (skanda.5.301.34)

एको हि भुङ्क्ते सुकृतमेक एव हि दुष्कृतम् ॥

eko hi bhuṅkte sukṛtameka eva hi duṣkṛtam ||

अकेला ही वह अपने सुकृत का फल भोगता है, और अकेला ही अपने दुष्कृत का।

श्लोक 35 (skanda.5.301.35)

मार्कण्डेय उवाच। एष त्वयोक्तो नृपते महाप्रश्नः स्मृतो मया ॥

mārkaṇḍeya uvāca| eṣa tvayokto nṛpate mahāpraśnaḥ smṛto mayā ||

मार्कण्डेय बोले — हे राजन्! तुमने जो यह पूछा है, यह महान् प्रश्न है, जिसे मैं स्मरण करता हूँ (और उत्तर देता हूँ)।

श्लोक 36 (skanda.5.301.36)

पितामहमुखोद्गीतं श्रुतं ते कथयाम्यहम् । यन्मे पितामहात्पूर्वं विज्ञातमृषिसंसदि ॥

pitāmahamukhodgītaṁ śrutaṁ te kathayāmyaham | yanme pitāmahātpūrvaṁ vijñātamṛṣisaṁsadi ||

मैं तुम्हें वह बताता हूँ जो पितामह (ब्रह्मा) के मुख से गाया गया और मैंने सुना — जिसे मैंने पहले पितामह से ऋषियों की सभा में जाना था।

श्लोक 37 (skanda.5.301.37)

न माता न पिता बन्धुः कस्यचिन्न सुहृत्क्वचित् । कस्य न ज्ञायते रूपं वायुभूतस्य देहिनः ॥

na mātā na pitā bandhuḥ kasyacinna suhṛtkvacit | kasya na jñāyate rūpaṁ vāyubhūtasya dehinaḥ ||

न माता, न पिता, न कोई बन्धु, न कहीं कोई मित्र — किसी का भी वायुरूप हुए जीव का स्वरूप पहचाना नहीं जाता।

श्लोक 38 (skanda.5.301.38)

यद्येवं न भवेत्तात लोकस्य तु नरेश्वर । अमर्यादं भवेन्नूनं विनश्यति चराचरम् ॥

yadyevaṁ na bhavettāta lokasya tu nareśvara | amaryādaṁ bhavennūnaṁ vinaśyati carācaram ||

हे तात, हे नरेश्वर! यदि ऐसा न होता, तो संसार निश्चय ही मर्यादाहीन हो जाता, और चराचर जगत नष्ट हो जाता।

श्लोक 39 (skanda.5.301.39)

एवं ज्ञात्वा पूरा राजन्समस्तैर्लोककर्तृभिः । मर्यादा स्थापिता लोके यथा धर्मो न नश्यति ॥

evaṁ jñātvā pūrā rājansamastairlokakartṛbhiḥ | maryādā sthāpitā loke yathā dharmo na naśyati ||

हे राजन्! यह जानकर पूर्वकाल में समस्त लोक-निर्माताओं ने संसार में मर्यादा स्थापित की, जिससे धर्म नष्ट न हो।

श्लोक 40 (skanda.5.301.40)

धर्मे नष्टे मनुष्याणामधर्मोऽभिभवेत्पुनः । ततः स्वधर्मचलनान्नरके गमनं ध्रुवम् ॥

dharme naṣṭe manuṣyāṇāmadharmo'bhibhavetpunaḥ | tataḥ svadharmacalanānnarake gamanaṁ dhruvam ||

धर्म के नष्ट होने पर मनुष्यों में फिर अधर्म का प्रभुत्व हो जाता है; फिर अपने धर्म से डिगने के कारण निश्चय ही नरक-गमन होता है।

श्लोक 41 (skanda.5.301.41)

लोको निरङ्कुशः सर्वो मर्यादालङ्घने रतः । मर्यादा स्थापिता तेन शास्त्रं वीक्ष्य महर्षिभिः ॥

loko niraṅkuśaḥ sarvo maryādālaṅghane rataḥ | maryādā sthāpitā tena śāstraṁ vīkṣya maharṣibhiḥ ||

सारा संसार निरंकुश होकर मर्यादा-उल्लंघन में लगा रहता है, इसीलिए महर्षियों ने शास्त्र का अवलोकन कर मर्यादा स्थापित की।

श्लोक 42 (skanda.5.301.42)

स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम् । पिण्डोदकप्रदानं च तथैवातिथिपूजनम् ॥

snānaṁ dānaṁ japo homaḥ svādhyāyo devatārcanam | piṇḍodakapradānaṁ ca tathaivātithipūjanam ||

स्नान, दान, जप, हवन, स्वाध्याय, देवता की पूजा, पिण्ड-जल का प्रदान, और उसी प्रकार अतिथि-पूजन —

श्लोक 43 (skanda.5.301.43)

पितरः पितामहाश्चैव तथैव प्रपितामहाः । त्रयो देवाः स्मृतास्तात ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥

pitaraḥ pitāmahāścaiva tathaiva prapitāmahāḥ | trayo devāḥ smṛtāstāta brahmaviṣṇumaheśvarāḥ ||

पिता, पितामह और उसी प्रकार प्रपितामह — हे तात! ये तीनों (क्रमशः) ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर, तीन देवों के समान स्मरण किए गए हैं।

श्लोक 44 (skanda.5.301.44)

पूजितैः पूजिताः सर्वे तथा मातामहास्त्रयः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्रुतिस्मृत्यर्थनोदितान् ॥

pūjitaiḥ pūjitāḥ sarve tathā mātāmahāstrayaḥ | tasmātsarvaprayatnena śrutismṛtyarthanoditān ||

इनके पूजित होने पर वे तीनों देव भी पूजित होते हैं, और इसी प्रकार तीनों मातामह भी। अतः श्रुति और स्मृति द्वारा कहे गए (कर्तव्यों) को पूर्ण प्रयत्न से,

श्लोक 45 (skanda.5.301.45)

धर्मं समाचरन्नित्यं पापांशेन न लिप्यते । श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं मनसापि न लङ्घयेत् ॥

dharmaṁ samācarannityaṁ pāpāṁśena na lipyate | śrutismṛtyuditaṁ dharmaṁ manasāpi na laṅghayet ||

नित्य आचरण करने वाला मनुष्य पाप के अंश से लिप्त नहीं होता। श्रुति-स्मृति में कहे गए धर्म का मन से भी उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.5.301.46)

इह लोके परे चैव यदीच्छेच्छ्रेय आत्मनः । पितापुत्रौ सदाप्येकौ बिम्बाद्बिम्बमिवोद्धृतौ ॥

iha loke pare caiva yadīcchecchreya ātmanaḥ | pitāputrau sadāpyekau bimbādbimbamivoddhṛtau ||

इस लोक में और परलोक में यदि अपना कल्याण चाहता हो — पिता और पुत्र सदा एक ही हैं, जैसे एक बिम्ब से दूसरा बिम्ब निकाला गया हो।

श्लोक 47 (skanda.5.301.47)

विभक्तौ वाविभक्तौ वा श्रुतिस्मृत्यर्थतस्तथा । उद्धरेदात्मनात्मानमात्मानमवसादयेत् ॥

vibhaktau vāvibhaktau vā śrutismṛtyarthatastathā | uddharedātmanātmānamātmānamavasādayet ||

चाहे वे विभक्त हों या अविभक्त, श्रुति-स्मृति के अनुसार उन्हें अपने ही आत्मा से उद्धार करना चाहिए; अन्यथा वह स्वयं को ही अधोगति में डालता है।

श्लोक 48 (skanda.5.301.48)

पिण्डोदकप्रदानाभ्यामृते पार्थ न संशयः । एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन पिण्डोदकप्रदो भवेत् ॥

piṇḍodakapradānābhyāmṛte pārtha na saṁśayaḥ | evaṁ jñātvā prayatnena piṇḍodakaprado bhavet ||

हे पार्थ! पिण्ड-जल प्रदान के बिना (यह उद्धार सम्भव नहीं) — इसमें सन्देह नहीं। यह जानकर प्रयत्नपूर्वक पिण्ड-जल देने वाला बनना चाहिए।

श्लोक 49 (skanda.5.301.49)

आयुर्धर्मो यशस्तेजः सन्ततिश्चैव वर्धते । पृथिव्यां सागरान्तायां पितृक्षेत्राणि यानि च ॥

āyurdharmo yaśastejaḥ santatiścaiva vardhate | pṛthivyāṁ sāgarāntāyāṁ pitṛkṣetrāṇi yāni ca ||

इससे आयु, धर्म, यश, तेज तथा सन्तति की वृद्धि होती है। समुद्रपर्यन्त पृथ्वी पर जो पितृ-तीर्थ हैं,

श्लोक 50 (skanda.5.301.50)

तानि ते सम्प्रवक्ष्यामि येषु दत्तं महाफलम् । गयायां पुष्करे ज्येष्ठे प्रयागे नैमिषे तथा ॥

tāni te sampravakṣyāmi yeṣu dattaṁ mahāphalam | gayāyāṁ puṣkare jyeṣṭhe prayāge naimiṣe tathā ||

वे सब मैं तुम्हें बताता हूँ, जिनमें दिया गया दान महान् फल देता है — गया में, ज्येष्ठ पुष्कर में, प्रयाग में तथा नैमिष में,

श्लोक 51 (skanda.5.301.51)

संनिहत्यां कुरुक्षेत्रे प्रभासे कुरुनन्दन । पिण्डोदकप्रदानेन यत्फलं कथितं बुधैः ॥

saṁnihatyāṁ kurukṣetre prabhāse kurunandana | piṇḍodakapradānena yatphalaṁ kathitaṁ budhaiḥ ||

हे कुरुनन्दन! सन्निहत्या में, कुरुक्षेत्र में तथा प्रभास में पिण्ड-जल के प्रदान से जो फल विद्वानों ने कहा है,

श्लोक 52 (skanda.5.301.52)

अस्माहके तदाप्नोति नर्मदायां न संशयः । तत्र ब्रह्मा मुरारिश्च रुद्रश्च उमया सह ॥

asmāhake tadāpnoti narmadāyāṁ na saṁśayaḥ | tatra brahmā murāriśca rudraśca umayā saha ||

वह सब यहाँ अस्माहक में, नर्मदा में प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है। वहाँ ब्रह्मा, मुरारि (विष्णु) तथा उमा-सहित रुद्र भी —

श्लोक 53 (skanda.5.301.53)

इन्द्राद्या देवताः सर्वे पितरो मुनयस्तथा । सागराः सरितश्चैव पर्वताश्च बलाहकाः ॥

indrādyā devatāḥ sarve pitaro munayastathā | sāgarāḥ saritaścaiva parvatāśca balāhakāḥ ||

इन्द्र आदि समस्त देवता, पितर, मुनिगण, सागर, नदियाँ, पर्वत तथा बादल —

श्लोक 54 (skanda.5.301.54)

तिष्ठन्ति पितरः सर्वे सर्वतीर्थाधिकं ततः । स्थिता ब्रह्मशिला तत्र गजकुम्भनिभा नृप ॥

tiṣṭhanti pitaraḥ sarve sarvatīrthādhikaṁ tataḥ | sthitā brahmaśilā tatra gajakumbhanibhā nṛpa ||

ये सब समस्त पितरों के साथ वहाँ निवास करते हैं, जिससे यह सब तीर्थों से बढ़कर है। हे राजन्! वहाँ हाथी के कुम्भस्थल के समान एक ब्रह्मशिला भी स्थित है।

श्लोक 55 (skanda.5.301.55)

कलौ न दृश्या भवति प्रधानं यद्गयाशिरः । वैशाखे मासि सम्प्राप्तेऽमावास्यां नृपोत्तम ॥

kalau na dṛśyā bhavati pradhānaṁ yadgayāśiraḥ | vaiśākhe māsi samprāpte'māvāsyāṁ nṛpottama ||

कलियुग में वह दिखाई नहीं देती, जो गया-शिरा के समान प्रधान है। हे नृपोत्तम! वैशाख मास की अमावस्या आने पर —

श्लोक 56 (skanda.5.301.56)

व्याप्य सा तिष्ठते तीर्थं गजकुम्भनिभा शिला । तच्च गव्यूतिमात्रं हि तीर्थं ततः प्रवक्षते ॥

vyāpya sā tiṣṭhate tīrthaṁ gajakumbhanibhā śilā | tacca gavyūtimātraṁ hi tīrthaṁ tataḥ pravakṣate ||

वह हाथी-कुम्भ के समान शिला उस तीर्थ को व्याप्त करके स्थित हो जाती है; और वह तीर्थ एक गव्यूति (दो मील) के विस्तार में फैला हुआ कहा जाता है।

श्लोक 57 (skanda.5.301.57)

तस्मिन्दिने तत्र गत्वा यस्तु श्राद्धप्रदो भवेत् । पितॄणामक्षया तृप्तिर्जायते शतवार्षिकी ॥

tasmindine tatra gatvā yastu śrāddhaprado bhavet | pitṝṇāmakṣayā tṛptirjāyate śatavārṣikī ||

उस दिन वहाँ जाकर जो श्राद्ध करता है, उसके पितरों की सौ वर्षों तक चलने वाली अक्षय तृप्ति होती है।

श्लोक 58 (skanda.5.301.58)

अन्यस्यामप्यमावास्यां यः स्नात्वा विजितेन्द्रियः । करोति मनुजः श्राद्धं विधिवन्मन्त्रसंयुतम् ॥

anyasyāmapyamāvāsyāṁ yaḥ snātvā vijitendriyaḥ | karoti manujaḥ śrāddhaṁ vidhivanmantrasaṁyutam ||

किसी अन्य अमावस्या को भी, इन्द्रियों को जीतकर स्नान करके जो मनुष्य विधिपूर्वक मन्त्रयुक्त श्राद्ध करता है,

श्लोक 59 (skanda.5.301.59)

तस्य पुण्यफलं यत्स्यात्तच्छृणुष्व नराधिप । अग्निष्टोमाश्वमेधाभ्यां वाजपेयस्य यत्फलम् ॥

tasya puṇyaphalaṁ yatsyāttacchṛṇuṣva narādhipa | agniṣṭomāśvamedhābhyāṁ vājapeyasya yatphalam ||

हे नराधिप! उसका जो पुण्यफल होता है, उसे सुनिए। अग्निष्टोम, अश्वमेध तथा वाजपेय यज्ञ का जो फल होता है,

श्लोक 60 (skanda.5.301.60)

तत्फलं समवाप्नोति यथा मे शङ्करोऽब्रवीत् । रौरवादिषु सर्वेषु नरकेषु व्यवस्थिताः ॥

tatphalaṁ samavāpnoti yathā me śaṅkaro'bravīt | rauravādiṣu sarveṣu narakeṣu vyavasthitāḥ ||

वह फल वह पूर्णतः पाता है, जैसा मुझसे शंकर ने कहा है। रौरव आदि सभी नरकों में स्थित —

श्लोक 61 (skanda.5.301.61)

पिता पितामहाद्याश्च पितृके मातृके तथा । पिण्डोदकेन चैकेन तर्पणेन विशेषतः ॥

pitā pitāmahādyāśca pitṛke mātṛke tathā | piṇḍodakena caikena tarpaṇena viśeṣataḥ ||

पिता, पितामह आदि, पितृ-पक्ष और मातृ-पक्ष दोनों ही, एक पिण्ड-जल के तर्पण से विशेष रूप से —

श्लोक 62 (skanda.5.301.62)

क्रीडन्ति पितृलोकस्था यावदाभूतसम्प्लवम् । ये कर्मस्था विकर्मस्था ये जाताः प्रेतकल्मषाः ॥

krīḍanti pitṛlokasthā yāvadābhūtasamplavam | ye karmasthā vikarmasthā ye jātāḥ pretakalmaṣāḥ ||

पितृलोक में स्थित होकर प्रलयकाल तक क्रीड़ा करते हैं। जो सत्कर्मरत हैं, जो विकर्मरत हैं, और जो प्रेत-दोष से युक्त उत्पन्न हुए हैं —

श्लोक 63 (skanda.5.301.63)

पिण्डेनैकेन मुच्यन्ते तेऽपि तत्र न संशयः । अस्माहके शिला दिव्या तिष्ठते गजसन्निभा ॥

piṇḍenaikena mucyante te'pi tatra na saṁśayaḥ | asmāhake śilā divyā tiṣṭhate gajasannibhā ||

वे सब भी वहाँ एक ही पिण्ड से मुक्त हो जाते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। अस्माहक में हाथी के समान दिव्य शिला स्थित है,

श्लोक 64 (skanda.5.301.64)

ब्रह्मणा निर्मिता पूर्वं सर्वपापक्षयंकरी । उपर्यस्या यथान्यायं पितॄनुद्दिश्य भारत ॥

brahmaṇā nirmitā pūrvaṁ sarvapāpakṣayaṁkarī | uparyasyā yathānyāyaṁ pitṝnuddiśya bhārata ||

जो ब्रह्मा द्वारा पहले बनाई गई, सब पापों का नाश करने वाली है। हे भारत! इसके ऊपर पितरों के उद्देश्य से यथोचित रीति से,

श्लोक 65 (skanda.5.301.65)

दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु दद्यात्पिण्डान्विचक्षणः । भूमौ चान्नेन सिद्धेन श्राद्धं कृत्वा यथाविधि ॥

dakṣiṇāgreṣu darbheṣu dadyātpiṇḍānvicakṣaṇaḥ | bhūmau cānnena siddhena śrāddhaṁ kṛtvā yathāvidhi ||

दक्षिणाग्र कुशों पर बुद्धिमान् पुरुष को पिण्ड देना चाहिए, और भूमि पर पके हुए अन्न से विधिपूर्वक श्राद्ध करके —

श्लोक 66 (skanda.5.301.66)

श्राद्धिभ्यो वस्त्रयुग्मानि छत्रोपानत्कमण्डलु । दक्षिणा विविधा देया पितॄनुद्दिश्य भारत ॥

śrāddhibhyo vastrayugmāni chatropānatkamaṇḍalu | dakṣiṇā vividhā deyā pitṝnuddiśya bhārata ||

श्राद्ध में भाग लेने वाले ब्राह्मणों को वस्त्र-युग्म, छत्र, जूते तथा कमण्डलु दिए जाएँ; हे भारत! पितरों के उद्देश्य से विविध दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 67 (skanda.5.301.67)

यो ददाति द्विजश्रेष्ठ तस्य पुण्यफलं शृणु । तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्तिं यान्ति न संशयः ॥

yo dadāti dvijaśreṣṭha tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu | tasya te dvādaśābdāni tṛptiṁ yānti na saṁśayaḥ ||

हे द्विजश्रेष्ठ! जो ऐसा दान करता है, उसका पुण्यफल सुनो — उसके पितर बारह वर्षों तक तृप्ति को प्राप्त रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।

श्लोक 68 (skanda.5.301.68)

अस्माहके महाराज पितरश्च पितामहाः । वायुभूता निरीक्षन्ते आगच्छन्तं स्वगोत्रजम् ॥

asmāhake mahārāja pitaraśca pitāmahāḥ | vāyubhūtā nirīkṣante āgacchantaṁ svagotrajam ||

हे महाराज! अस्माहक में पिता और पितामह, वायुरूप होकर, अपने कुल में आने वाले वंशज की प्रतीक्षा करते रहते हैं।

श्लोक 69 (skanda.5.301.69)

अत्र तीर्थे सुतोऽभ्येत्य स्नात्वा तोयं प्रदास्यति । श्राद्धं वा पिण्डदानं वा तेन यास्याम सद्गतिम् ॥

atra tīrthe suto'bhyetya snātvā toyaṁ pradāsyati | śrāddhaṁ vā piṇḍadānaṁ vā tena yāsyāma sadgatim ||

"क्या मेरा पुत्र इस तीर्थ में आकर स्नान करके जल देगा, या श्राद्ध या पिण्डदान करेगा, जिससे हमें सद्गति प्राप्त हो?"

श्लोक 70 (skanda.5.301.70)

स्नाने कृते तु ये केचिज्जायन्ते वस्त्रविप्लुषः । प्रीणयेन्नरकस्थांस्तु तैः पितॄन्नात्र संशयः ॥

snāne kṛte tu ye kecijjāyante vastravipluṣaḥ | prīṇayennarakasthāṁstu taiḥ pitṝnnātra saṁśayaḥ ||

स्नान करने पर वस्त्र से जो जल-बिन्दु (छींटे) गिरते हैं, वे भी नरकस्थ पितरों को तृप्त कर देते हैं, इसमें सन्देह नहीं है।

श्लोक 71 (skanda.5.301.71)

केशोदबिन्दवस्तस्य ये चान्ये लेपभाजिनः । तृप्यन्त्यनग्निनसंस्कारा यं मृताः स्युः स्वगोत्रजाः ॥

keśodabindavastasya ye cānye lepabhājinaḥ | tṛpyantyanagninasaṁskārā yaṁ mṛtāḥ syuḥ svagotrajāḥ ||

उसके बालों से गिरने वाली जल-बिन्दुएँ, तथा शरीर पर लगे अन्य जल-कण भी, अग्नि-संस्कार से वंचित मरे हुए स्वगोत्रीय पितरों को तृप्त करते हैं।

श्लोक 72 (skanda.5.301.72)

तत्र तीर्थे तु ये केचिच्छ्राद्धं कृत्वा विधानतः । नरकादुद्धरन्त्याशु जपन्तः पितृसंहिताम् ॥

tatra tīrthe tu ye kecicchrāddhaṁ kṛtvā vidhānataḥ | narakāduddharantyāśu japantaḥ pitṛsaṁhitām ||

उस तीर्थ में जो कोई विधिपूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे पितृ-संहिता का जप करते हुए अपने पितरों को शीघ्र नरक से उद्धार कर देते हैं।

श्लोक 73 (skanda.5.301.73)

वनस्पतिगते सोमे यदा सोमदिनं भवेत् । अक्षयाल्लभते लोकान्पिण्डेनैकेन मानवः ॥

vanaspatigate some yadā somadinaṁ bhavet | akṣayāllabhate lokānpiṇḍenaikena mānavaḥ ||

जब चन्द्रमा सोमवार को वनस्पति (कृत्तिका) नक्षत्र में स्थित हो, तब मनुष्य एक ही पिण्ड से अक्षय लोकों को प्राप्त करता है।

श्लोक 74 (skanda.5.301.74)

अक्षयं तत्र वै सर्वं जायते नात्र संशयः । नरकादुद्धरन्त्याशु जपन्ते पितृसंहिताम् ॥

akṣayaṁ tatra vai sarvaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ | narakāduddharantyāśu japante pitṛsaṁhitām ||

वहाँ सब कुछ निश्चय ही अक्षय हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं। पितृ-संहिता का जप करने वाले शीघ्र ही (अपने पितरों को) नरक से उद्धार कर देते हैं।

श्लोक 75 (skanda.5.301.75)

तस्मिंस्तीर्थे त्वमावास्यां पितॄनुद्दिश्य भारत । नीलं सर्वाङ्गसम्पूर्णं योऽभिषिच्य समुत्सृजेत् ॥

tasmiṁstīrthe tvamāvāsyāṁ pitṝnuddiśya bhārata | nīlaṁ sarvāṅgasampūrṇaṁ yo'bhiṣicya samutsṛjet ||

हे भारत! उस तीर्थ में अमावास्या को, पितरों के उद्देश्य से, जो सर्वांग से परिपूर्ण नील (काले) बैल का अभिषेक करके उसे मुक्त कर देता है,

श्लोक 76 (skanda.5.301.76)

तस्य पुण्यफलं वक्तुं न तु वाचस्पतिः क्षमः । अस्माहके वृषोत्सर्गाद्यत्पुण्यं समवाप्यते ॥

tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ na tu vācaspatiḥ kṣamaḥ | asmāhake vṛṣotsargādyatpuṇyaṁ samavāpyate ||

उसके पुण्यफल को कहने में स्वयं वाचस्पति (बृहस्पति) भी समर्थ नहीं हैं। अस्माहक में वृषोत्सर्ग से जो पुण्य प्राप्त होता है,

श्लोक 77 (skanda.5.301.77)

तव शुश्रूषणात्सर्वं तत्प्रवक्ष्यामि भारत । रौरवादिषु ये किंचित्पच्यन्ते तस्य पूर्वजाः ॥

tava śuśrūṣaṇātsarvaṁ tatpravakṣyāmi bhārata | rauravādiṣu ye kiṁcitpacyante tasya pūrvajāḥ ||

हे भारत! तुम्हारी सेवा-भावना के कारण मैं वह सब कहता हूँ। रौरव आदि नरकों में जो उसके पूर्वज किंचित् भी पक रहे हों,

श्लोक 78 (skanda.5.301.78)

वृषोत्सर्गेण तान्सर्वांस्तारयेदेकविंशतिम् । लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डुरः ॥

vṛṣotsargeṇa tānsarvāṁstārayedekaviṁśatim | lohito yastu varṇena mukhe pucche ca pāṇḍuraḥ ||

वृषोत्सर्ग से वह उन सबको, इक्कीस पीढ़ियों तक, तार देता है। जो वृष रंग में लाल हो, मुख और पूँछ में श्वेत हो,

श्लोक 79 (skanda.5.301.79)

पिङ्गः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते । यस्तु सर्वाङ्गपिङ्गश्च श्वेतः पुच्छखुरेषु च ॥

piṅgaḥ khuraviṣāṇābhyāṁ sa nīlo vṛṣa ucyate | yastu sarvāṅgapiṅgaśca śvetaḥ pucchakhureṣu ca ||

तथा खुरों और सींगों में पीतवर्ण हो — वह "नील वृष" कहलाता है। जो सर्वांग में पीतवर्ण हो, तथा पूँछ और खुरों में श्वेत हो —

श्लोक 80 (skanda.5.301.80)

स पिङ्गो वृष इत्याहुः पितॄणां प्रीतिवर्धनः । पारावतसवर्णश्च ललाटे तिलको भवेत् ॥

sa piṅgo vṛṣa ityāhuḥ pitṝṇāṁ prītivardhanaḥ | pārāvatasavarṇaśca lalāṭe tilako bhavet ||

वह "पिंग वृष" कहलाता है, जो पितरों की प्रीति बढ़ाने वाला है। जो कबूतर के रंग जैसा हो और जिसके ललाट पर तिलक हो —

श्लोक 81 (skanda.5.301.81)

तं वृषं बभ्रुमित्याहुः पूर्णं सर्वाङ्गशोभनम् । सर्वाङ्गेष्वेकवर्णो यः पिङ्गः पुच्छखुरेषु च ॥

taṁ vṛṣaṁ babhrumityāhuḥ pūrṇaṁ sarvāṅgaśobhanam | sarvāṅgeṣvekavarṇo yaḥ piṅgaḥ pucchakhureṣu ca ||

वह वृष "बभ्रु" कहलाता है, जो सम्पूर्ण अंगों से सुशोभित है। जो सारे अंगों में एक ही रंग का हो, तथा पूँछ और खुरों में पीतवर्ण हो,

श्लोक 82 (skanda.5.301.82)

खुरपिङ्गं तमित्याहुः पितॄणां सद्गतिप्रदम् । नीलं सर्वशरीरेण स्वारक्तनयनं दृढम् ॥

khurapiṅgaṁ tamityāhuḥ pitṝṇāṁ sadgatipradam | nīlaṁ sarvaśarīreṇa svāraktanayanaṁ dṛḍham ||

वह "खुर-पिंग" कहलाता है, जो पितरों को सद्गति देने वाला है। जो सारे शरीर में नील (काला) हो, जिसके नेत्र लाल हों, और जो सुदृढ़ हो —

श्लोक 83 (skanda.5.301.83)

तमेव नीलमित्याहुर्नीलः पञ्चविधः स्मृतः । यस्तु वैश्यगृहे जातः स वै नीलो विशिष्यते ॥

tameva nīlamityāhurnīlaḥ pañcavidhaḥ smṛtaḥ | yastu vaiśyagṛhe jātaḥ sa vai nīlo viśiṣyate ||

वही "नील" कहलाता है; इस प्रकार नील पाँच प्रकार का माना गया है। जो वैश्य के घर में जन्मा हो, वह नील (बैल) विशेष माना जाता है।

श्लोक 84 (skanda.5.301.84)

न वाहयेद्गृहे जातं वत्सकं तु कदाचन । तेनैव च वृषोत्सर्गे पितॄणामनृणो भवेत् ॥

na vāhayedgṛhe jātaṁ vatsakaṁ tu kadācana | tenaiva ca vṛṣotsarge pitṝṇāmanṛṇo bhavet ||

अपने घर में जन्मे बछड़े से कभी बोझ नहीं ढुलवाना चाहिए। उसी से वृषोत्सर्ग करने पर मनुष्य पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 85 (skanda.5.301.85)

जातं तु स्वगृहे वत्सं द्विजन्मा यस्तु वाहयेत् । पतन्ति पितरस्तस्य ब्रह्मकोकगता अपि ॥

jātaṁ tu svagṛhe vatsaṁ dvijanmā yastu vāhayet | patanti pitarastasya brahmakokagatā api ||

अपने घर में जन्मे बछड़े को जो द्विज बोझ से जोतता है, उसके पितर ब्रह्मलोक में स्थित होकर भी वहाँ से गिर जाते हैं।

श्लोक 86 (skanda.5.301.86)

यथायथा हि पिबति पीत्वा धूनाति मस्तकम् । पिबन्पितॄन् प्रीणयति नरकादुद्धरेद्धुनन् ॥

yathāyathā hi pibati pītvā dhūnāti mastakam | pibanpitṝn prīṇayati narakāduddhareddhunan ||

ज्यों-ज्यों वह (बैल) पानी पीता है और पीकर अपना सिर हिलाता है, त्यों-त्यों पीते हुए वह पितरों को तृप्त करता है, और सिर हिलाते हुए उन्हें नरक से उबार लेता है।

श्लोक 87 (skanda.5.301.87)

यथा पुच्छाभिघातेन स्कन्धं गच्छन्ति बिन्दवः । नरकादुद्धरन्त्याशु पतितान् गोत्रिणस्तथा ॥

yathā pucchābhighātena skandhaṁ gacchanti bindavaḥ | narakāduddharantyāśu patitān gotriṇastathā ||

जैसे पूँछ की चोट से (जल की) बूँदें पीठ पर जा गिरती हैं, वैसे ही वे शीघ्र ही नरक में गिरे हुए अपने गोत्रजनों का उद्धार करती हैं।

श्लोक 88 (skanda.5.301.88)

गर्जन्प्रावृषि काले तु विषाणाभ्यां भुवं लिखन् । खुरेभ्यो या मृदुद्भूता तया संप्रीणयेदृषीन् ॥

garjanprāvṛṣi kāle tu viṣāṇābhyāṁ bhuvaṁ likhan | khurebhyo yā mṛdudbhūtā tayā saṁprīṇayedṛṣīn ||

वर्षा-ऋतु में गरजते हुए, सींगों से पृथ्वी को खोदते हुए, उसके खुरों से जो मिट्टी उठती है, उससे वह ऋषियों को भी तृप्त करता है।

श्लोक 89 (skanda.5.301.89)

पिबन्पितॄन् प्रीणयते खादनोल्लेखने सुरान् । गर्जन्नृषिमनुष्यांश्च धर्मरूपो हि धर्मज ॥

pibanpitṝn prīṇayate khādanollekhane surān | garjannṛṣimanuṣyāṁśca dharmarūpo hi dharmaja ||

हे धर्मपुत्र! पीने से वह पितरों को, खाने और (सींगों से) खोदने से देवताओं को, और गर्जना से ऋषियों और मनुष्यों को तृप्त करता है — क्योंकि वह साक्षात् धर्म का ही रूप है।

श्लोक 90 (skanda.5.301.90)

भूतैर्वापि पिशाचैर्वा चातुर्थिकज्वरेण वा । गृहीतोऽस्माहकं गच्छेत्सर्वेषामाधिनाशनम् ॥

bhūtairvāpi piśācairvā cāturthikajvareṇa vā | gṛhīto'smāhakaṁ gacchetsarveṣāmādhināśanam ||

भूतों से, पिशाचों से, अथवा चातुर्थिक (चौथिया) ज्वर से ग्रस्त मनुष्य को भी सबकी पीड़ा दूर करने वाले अस्माहक में जाना चाहिए।

श्लोक 91 (skanda.5.301.91)

स्नात्वा तु विमले तोये दर्भग्रन्थिं निबन्धयेत् । मस्तके बाहुमूले वा नाभ्यां वा गलकेऽपि वा ॥

snātvā tu vimale toye darbhagranthiṁ nibandhayet | mastake bāhumūle vā nābhyāṁ vā galake'pi vā ||

उसके निर्मल जल में स्नान करके सिर पर, बाँह की जड़ में, नाभि पर अथवा गले पर कुश की गाँठ बाँधनी चाहिए।

श्लोक 92 (skanda.5.301.92)

गत्वा देवसमीपं च प्रादक्षिण्येन केशवम् । ततः समुच्चरन्मन्त्रं गायत्र्या वाथ वैष्णवम् ॥

gatvā devasamīpaṁ ca prādakṣiṇyena keśavam | tataḥ samuccaranmantraṁ gāyatryā vātha vaiṣṇavam ||

फिर देव के समीप जाकर केशव की प्रदक्षिणा करके, गायत्री अथवा वैष्णव मन्त्र का उच्चारण करते हुए —

श्लोक 93 (skanda.5.301.93)

नारायणं शरण्येशं सर्वदेवनमस्कृतम् । नमो यज्ञाङ्गसम्भूत सर्वव्यापिन्नमोऽस्तु ते ॥

nārāyaṇaṁ śaraṇyeśaṁ sarvadevanamaskṛtam | namo yajñāṅgasambhūta sarvavyāpinnamo'stu te ||

"नारायण को, शरणागतवत्सल को, सभी देवों द्वारा नमस्कृत को — हे यज्ञांगसंभूत! हे सर्वव्यापी! आपको नमस्कार हो!

श्लोक 94 (skanda.5.301.94)

नमो नमस्ते देवेश पद्मगर्भ सनातन । दामोदर जयानन्त रक्ष मां शरणागतम् ॥

namo namaste deveśa padmagarbha sanātana | dāmodara jayānanta rakṣa māṁ śaraṇāgatam ||

हे देवेश! हे पद्मगर्भ! हे सनातन! बार-बार आपको नमस्कार हो। हे दामोदर! हे अनन्त! जय हो; शरणागत मेरी रक्षा कीजिए।

श्लोक 95 (skanda.5.301.95)

त्वं कर्ता त्वं च हर्ता च जगत्यस्मिंश्चराचरे । त्वं पालयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥

tvaṁ kartā tvaṁ ca hartā ca jagatyasmiṁścarācare | tvaṁ pālayasi bhūtāni bhuvanaṁ tvaṁ bibharṣi ca ||

इस चराचर जगत् में आप ही कर्ता हैं और आप ही संहारक हैं; आप ही समस्त प्राणियों का पालन करते हैं, और आप ही सम्पूर्ण भुवन को धारण करते हैं।

श्लोक 96 (skanda.5.301.96)

प्रसीद देवदेवेश सुप्तमङ्गं प्रबोधय । त्वद्ध्याननिरतो नित्यं त्वद्भक्तिपरमो हरे ॥

prasīda devadeveśa suptamaṅgaṁ prabodhaya | tvaddhyānanirato nityaṁ tvadbhaktiparamo hare ||

हे देवदेवेश! प्रसन्न होइए, मेरे सुप्त शरीर को जगाइए। हे हरे! मैं नित्य आपके ध्यान में लीन तथा आपकी भक्ति में परायण हूँ।

श्लोक 97 (skanda.5.301.97)

इति स्तुतो मया देव प्रसादं कुरु मेऽच्युत । मां रक्ष रक्ष पापेभ्यस्त्रायस्व शरणागतम् ॥

iti stuto mayā deva prasādaṁ kuru me'cyuta | māṁ rakṣa rakṣa pāpebhyastrāyasva śaraṇāgatam ||

हे देव! इस प्रकार मेरे द्वारा स्तुति किए गए आप, हे अच्युत! मुझ पर प्रसन्न होइए। मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए, पापों से मुझे बचाइए, शरणागत का त्राण कीजिए।"

श्लोक 98 (skanda.5.301.98)

एवं स्तुत्वा च देवेशं दानवान्तकरं हरिम् । पुनरुक्तेन वै स्नात्वा ततो विप्रांस्तु भोजयेत् ॥

evaṁ stutvā ca deveśaṁ dānavāntakaraṁ harim | punaruktena vai snātvā tato viprāṁstu bhojayet ||

इस प्रकार दानवों के अन्तक, देवेश हरि की स्तुति करके, इसी स्तुति को दुहराते हुए पुनः स्नान करके, फिर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 99 (skanda.5.301.99)

वेदोक्तेन विधानेन स्नानं कृत्वा यथाविधि । पिण्डनिर्वपणं कृत्वा वाचयेत्स्वस्तिकं ततः ॥

vedoktena vidhānena snānaṁ kṛtvā yathāvidhi | piṇḍanirvapaṇaṁ kṛtvā vācayetsvastikaṁ tataḥ ||

वेदोक्त विधान से यथाविधि स्नान करके, पिण्ड-अर्पण करके, फिर स्वस्तिवाचन कराना चाहिए।

श्लोक 100 (skanda.5.301.100)

एवं स्तुत्वा च देवेशं दानवान्तकरं हरिम् । पुनरुक्तेन वै स्नात्वा ततो विप्रांस्तु भोजयेत् ॥

evaṁ stutvā ca deveśaṁ dānavāntakaraṁ harim | punaruktena vai snātvā tato viprāṁstu bhojayet ||

इस प्रकार दानवों के अन्तक, देवेश हरि की पुनः स्तुति करके, इसी स्तुति को दुहराते हुए स्नान करके, फिर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 101 (skanda.5.301.101)

वेदोक्तेन विधानेन स्नानं कृत्वा यथाविधि । एवं तान्वाचयित्वा तु ततो विप्रान्विसर्जयेत् ॥

vedoktena vidhānena snānaṁ kṛtvā yathāvidhi | evaṁ tānvācayitvā tu tato viprānvisarjayet ||

वेदोक्त विधान से यथाविधि स्नान करके, इस प्रकार उनसे स्वस्तिवाचन कराकर, फिर ब्राह्मणों को विदा करना चाहिए।

श्लोक 102 (skanda.5.301.102)

यत्तत्रोच्चरितं किंचित्तद्विप्रेभ्यो निवेदयेत् । तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा नारी वा भक्तितत्परा । शक्तितो दक्षिणां दद्यात्कृत्वा श्राद्धं यथाविधि ॥

yattatroccaritaṁ kiṁcittadviprebhyo nivedayet | tatra tīrthe naraḥ snātvā nārī vā bhaktitatparā | śaktito dakṣiṇāṁ dadyātkṛtvā śrāddhaṁ yathāvidhi ||

वहाँ जो कुछ भी उच्चारित किया गया हो, वह ब्राह्मणों को निवेदन करना चाहिए। उस तीर्थ में स्नान करके पुरुष या भक्तिपरायण स्त्री, यथाविधि श्राद्ध करके यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 103 (skanda.5.301.103)

तत्र तीर्थे नरो यावत्स्नापयेद्विधिपूर्वकम् । क्षीरेण मधुना वापि दध्ना वा शीतवारिणा ॥

tatra tīrthe naro yāvatsnāpayedvidhipūrvakam | kṣīreṇa madhunā vāpi dadhnā vā śītavāriṇā ||

उस तीर्थ में मनुष्य जितनी बार विधिपूर्वक दूध से, मधु से, दही से अथवा शीतल जल से (देवता का) अभिषेक कराता है,

श्लोक 104 (skanda.5.301.104)

तावत्पुष्करपात्रेषु पिबन्ति पितरो जलम् । अयने विषुवे चैव युगादौ सूर्यसंक्रमे ॥

tāvatpuṣkarapātreṣu pibanti pitaro jalam | ayane viṣuve caiva yugādau sūryasaṁkrame ||

उतनी ही बार पितर पुष्कर-पात्रों में जल पीते हैं। अयन के समय, विषुव के समय, युगादि पर, तथा सूर्य-संक्रान्ति पर,

श्लोक 105 (skanda.5.301.105)

पुष्पैः सम्पूज्य देवेशं नैवेद्यं यः प्रदापयेत् । सोऽश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति पुष्कलम् ॥

puṣpaiḥ sampūjya deveśaṁ naivedyaṁ yaḥ pradāpayet | so'śvamedhasya yajñasya phalaṁ prāpnoti puṣkalam ||

फूलों से देवेश की पूजा करके जो नैवेद्य अर्पित करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का प्रचुर फल प्राप्त करता है।

श्लोक 106 (skanda.5.301.106)

तत्र तीर्थे तु यो राजन् सूर्यग्रहणमाचरेत् । सूर्यतेजोनिभैर्यानैर्विष्णुलोके महीयते ॥

tatra tīrthe tu yo rājan sūryagrahaṇamācaret | sūryatejonibhairyānairviṣṇuloke mahīyate ||

हे राजन्! उस तीर्थ में जो सूर्यग्रहण के समय (स्नान-दान) करता है, वह सूर्य के तेज के समान वाहनों से विष्णुलोक में महिमान्वित होता है।

श्लोक 107 (skanda.5.301.107)

तत्र तीर्थे तु यः श्राद्धं पितृभ्यः सम्प्रयच्छति । सत्पुत्रेण च तेनैव सम्प्राप्तं जन्मनः फलम् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ śrāddhaṁ pitṛbhyaḥ samprayacchati | satputreṇa ca tenaiva samprāptaṁ janmanaḥ phalam ||

उस तीर्थ में जो पितरों को श्राद्ध अर्पित करता है, उसी सत्पुत्र द्वारा उसके जन्म का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 108 (skanda.5.301.108)

इति श्रुत्वा ततो देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च स्थापयांचक्रुरीश्वरम् ॥

iti śrutvā tato devāḥ sarve śakrapurogamāḥ | brahmaviṣṇumaheśāśca sthāpayāṁcakrurīśvaram ||

यह सुनकर, इन्द्र सहित समस्त देवगण, तथा ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने वहाँ ईश्वर की स्थापना की।

श्लोक 109 (skanda.5.301.109)

सर्वरोगोपशमनं सर्वपातकनाशनम् । यस्तु संवत्सरं पूर्णममावास्यां तु भावितः ॥

sarvarogopaśamanaṁ sarvapātakanāśanam | yastu saṁvatsaraṁ pūrṇamamāvāsyāṁ tu bhāvitaḥ ||

वह सब रोगों को शान्त करने वाला और सब पापों का नाश करने वाला है। जो पूरे एक वर्ष तक अमावस्या को भक्तिभाव से —

श्लोक 110 (skanda.5.301.110)

पितृभ्यः पिण्डदानं च कुर्यादस्माहके नृप । त्रिपुष्करे गयायां च प्रभासे नैमिषे तथा ॥

pitṛbhyaḥ piṇḍadānaṁ ca kuryādasmāhake nṛpa | tripuṣkare gayāyāṁ ca prabhāse naimiṣe tathā ||

हे राजन्! अस्माहक में पितरों को पिण्डदान करता है — त्रिपुष्कर में, गया में, प्रभास में तथा नैमिष में,

श्लोक 111 (skanda.5.301.111)

यत्पुण्यं श्राद्धकर्तॄणां तदिहैव भवेद्ध्रुवम् । तिलोदकं कुशैर्मिश्रं यो दद्याद्दक्षिणामुखः ॥

yatpuṇyaṁ śrāddhakartṝṇāṁ tadihaiva bhaveddhruvam | tilodakaṁ kuśairmiśraṁ yo dadyāddakṣiṇāmukhaḥ ||

वह पुण्य निश्चय ही यहीं प्राप्त हो जाता है। जो दक्षिणमुख होकर कुशों से मिश्रित तिल-जल देता है,

श्लोक 112 (skanda.5.301.112)

मन्वादौ च युगादौ च व्यतीपाते दिनक्षये । यो दद्यात्पितृमातृभ्यः सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥

manvādau ca yugādau ca vyatīpāte dinakṣaye | yo dadyātpitṛmātṛbhyaḥ so'śvamedhaphalaṁ labhet ||

मन्वन्तर के आरम्भ में, युगादि पर, व्यतीपात पर, अथवा दिनक्षय के समय जो पितृ-मातृ को यह देता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 113 (skanda.5.301.113)

अस्माहके नरो यस्तु स्नात्वा सम्पूजयेद्धरिम् । ब्रह्माणं शङ्करं भक्त्या कुर्याज्जागरणक्रियाम् ॥

asmāhake naro yastu snātvā sampūjayeddharim | brahmāṇaṁ śaṅkaraṁ bhaktyā kuryājjāgaraṇakriyām ||

जो मनुष्य अस्माहक में स्नान करके हरि, ब्रह्मा और शंकर की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, और रात्रि-जागरण करता है,

श्लोक 114 (skanda.5.301.114)

सर्वपापविनिर्मुक्तः शक्रातिथ्यमवाप्नुयात् । तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा यः पश्यति जनार्दनम् ॥

sarvapāpavinirmuktaḥ śakrātithyamavāpnuyāt | tatra tīrthe naraḥ snātvā yaḥ paśyati janārdanam ||

वह सब पापों से मुक्त होकर इन्द्र की अतिथिता को प्राप्त करता है। उस तीर्थ में स्नान करके जो मनुष्य जनार्दन का दर्शन करता है,

श्लोक 115 (skanda.5.301.115)

विशेषविधिनाभ्यर्च्य प्रणम्य च पुनःपुनः । सपुत्रेण च तेनैव पितॄणां विहिता गतिः ॥

viśeṣavidhinābhyarcya praṇamya ca punaḥpunaḥ | saputreṇa ca tenaiva pitṝṇāṁ vihitā gatiḥ ||

विशेष विधि से उसकी पूजा करके और बार-बार प्रणाम करके, उस पुत्रसहित मनुष्य द्वारा ही उसके पितरों की गति सम्पन्न हो जाती है।

श्लोक 116 (skanda.5.301.116)

एकमूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । सत्कार्यकारणोपेताः सुसूक्ष्माः सुमहाफलाः ॥

ekamūrtistrayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ | satkāryakāraṇopetāḥ susūkṣmāḥ sumahāphalāḥ ||

ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर — ये तीनों देव एक ही मूर्ति हैं, सत् कार्य-कारण से युक्त, अत्यन्त सूक्ष्म तथा महान् फल देने वाले हैं।

श्लोक 117 (skanda.5.301.117)

एतत्ते कथितं राजन्महापातकनाशनम् । अस्माहकस्य माहात्म्यं किमन्यत्परिपृच्छसि ॥

etatte kathitaṁ rājanmahāpātakanāśanam | asmāhakasya māhātmyaṁ kimanyatparipṛcchasi ||

हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें महापातकों का नाश करने वाली अस्माहक की महिमा बता दी है। अब और क्या पूछना चाहते हो?

अध्याय 300अध्याय-सूचीअध्याय 302