अवन्ती खण्ड · अध्याय 300
शिवतीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.300.1)
मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेद्धरापाल शीवतीर्थमनुत्तमम् । दर्शनाद्यस्य देवस्य मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥
mārkaṇḍeya uvāca| tato gaccheddharāpāla śīvatīrthamanuttamam | darśanādyasya devasya mucyate sarvakilbiṣaiḥ ||
मार्कण्डेय बोले — हे धरापाल! उसके बाद उस सर्वोत्तम शिवतीर्थ में जाना चाहिए, जिस देव के दर्शनमात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.300.2)
शिवतीर्थे तु यः स्नात्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः । पूजयेत महादेवं सोऽग्निष्टोमफलं लभेत् ॥
śivatīrthe tu yaḥ snātvā jitakrodho jitendriyaḥ | pūjayeta mahādevaṁ so'gniṣṭomaphalaṁ labhet ||
शिवतीर्थ में स्नान करके जो क्रोध और इन्द्रियों को जीतकर महादेव की पूजा करता है, वह अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 3 (skanda.5.300.3)
तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या सोपवासोऽर्चयेच्छिवम् । अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम् ॥
tatra tīrthe tu yo bhaktyā sopavāso'rcayecchivam | anivartikā gatistasya rudralokādasaṁśayam ||
उस तीर्थ में जो उपवासपूर्वक भक्तिभाव से शिव की अर्चना करता है, उसकी रुद्रलोक से फिर न लौटने वाली गति निश्चित होती है।