अवन्ती खण्ड · अध्याय 299
द्वादशी तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.299.1)
मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महाराज द्वादशीतीर्थमुत्तमम् । क्षरन्ति सर्वदानानि जपहोमबलिक्रियाः ॥
mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahārāja dvādaśītīrthamuttamam | kṣaranti sarvadānāni japahomabalikriyāḥ ||
मार्कण्डेय बोले — हे महाराज! उसके बाद उस सर्वोत्तम द्वादशी तीर्थ में जाना चाहिए। (अन्यत्र किए गए) सभी दान, जप, हवन और बलि-कर्म क्षीण हो जाते हैं,
श्लोक 2 (skanda.5.299.2)
न क्षीयते तु राजेन्द्र चक्रतीर्थे तु यत्कृतम् । यद्भूतं यद्भविष्यच्च तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ॥
na kṣīyate tu rājendra cakratīrthe tu yatkṛtam | yadbhūtaṁ yadbhaviṣyacca tīrthamāhātmyamuttamam ||
परन्तु हे राजेन्द्र! चक्रतीर्थ में जो कुछ किया जाता है, वह क्षीण नहीं होता। इस तीर्थ की जो उत्तम महिमा भूतकाल में रही और भविष्य में रहेगी,
श्लोक 3 (skanda.5.299.3)
कथितं तन्मया सर्वं पृथग्भावेन भारत ॥
kathitaṁ tanmayā sarvaṁ pṛthagbhāvena bhārata ||
हे भारत! वह सब मैंने तुम्हें पृथक्-पृथक् रूप से बता दिया है।