अवन्ती खण्ड · अध्याय 298
योजनेश्वर तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.298.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महाराज योजनेश्वरमुत्तमम् । यत्र सिद्धौ पुरा कल्पे नरनारायणावृषी ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahārāja yojaneśvaramuttamam | yatra siddhau purā kalpe naranārāyaṇāvṛṣī ||
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे महाराज! उसके बाद उस सर्वोत्तम योजनेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ पूर्वकल्प में नर-नारायण दोनों ऋषि सिद्ध हुए थे।
श्लोक 2 (skanda.5.298.2)
तत्र तीर्थे तपस्तप्त्वा सङ्ग्रामे देवदानवैः । जयं प्राप्तौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ ॥
tatra tīrthe tapastaptvā saṅgrāme devadānavaiḥ | jayaṁ prāptau mahātmānau naranārāyaṇāvubhau ||
उस तीर्थ में तप करके, देवों और दानवों के संग्राम में उन दोनों महात्मा नर-नारायण ने विजय प्राप्त की।
श्लोक 3 (skanda.5.298.3)
पुनस्त्रेतायुगे प्राप्ते तौ देवौ रामलक्ष्मणौ । तत्र तीर्थे पुनः स्नात्वा रावणो दुर्जयो हतः ॥
punastretāyuge prāpte tau devau rāmalakṣmaṇau | tatra tīrthe punaḥ snātvā rāvaṇo durjayo hataḥ ||
फिर त्रेतायुग आने पर वे ही दोनों देव राम-लक्ष्मण के रूप में हुए; उस तीर्थ में पुनः स्नान करके दुर्जय रावण का वध किया गया।
श्लोक 4 (skanda.5.298.4)
पुनः पार्थ कलौ प्राप्ते तौ देवौ बलकेशवौ । वसुदेवकुले जातौ दुष्करं कर्म चक्रतुः ॥
punaḥ pārtha kalau prāpte tau devau balakeśavau | vasudevakule jātau duṣkaraṁ karma cakratuḥ ||
हे पार्थ! फिर कलियुग आने पर वे ही दोनों देव बल और केशव के रूप में वसुदेव के कुल में जन्मे, और उन्होंने दुष्कर कार्य किया।
श्लोक 5 (skanda.5.298.5)
नरकं कालनेमिं च कंसं चाणूरमुष्टिकौ । शिशुपालं जरासंधं जघ्नतुर्बलकेशवौ ॥
narakaṁ kālanemiṁ ca kaṁsaṁ cāṇūramuṣṭikau | śiśupālaṁ jarāsaṁdhaṁ jaghnaturbalakeśavau ||
बल और केशव ने नरकासुर, कालनेमि, कंस, चाणूर, मुष्टिक, शिशुपाल तथा जरासन्ध का वध किया।
श्लोक 6 (skanda.5.298.6)
ततस्तत्र रिपून्संख्ये भीष्मद्रोणपुरःसरान् । कर्णदुर्योधनादींश्च निहनिष्यति स प्रभुः ॥
tatastatra ripūnsaṁkhye bhīṣmadroṇapuraḥsarān | karṇaduryodhanādīṁśca nihaniṣyati sa prabhuḥ ||
फिर वहाँ युद्ध में भीष्म, द्रोण आदि तथा कर्ण, दुर्योधन आदि शत्रुओं का वह प्रभु (कृष्ण) संहार करेगा।
श्लोक 7 (skanda.5.298.7)
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे तत्र युध्यन्ति ते क्षणम् । भीमार्जुननिमित्तेन शिष्यौ कृत्वा परस्परम् ॥
dharmakṣetre kurukṣetre tatra yudhyanti te kṣaṇam | bhīmārjunanimittena śiṣyau kṛtvā parasparam ||
धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में वे भीम और अर्जुन के निमित्त क्षणभर युद्ध करेंगे, और परस्पर एक-दूसरे को शिष्य बना लेंगे (अर्थात् गुरु-शिष्य सम्बन्ध स्थापित होगा)।
श्लोक 8 (skanda.5.298.8)
तत्र तीर्थे पुनर्गत्वा तपः कृत्वा सुदुष्करम् । पूजयित्वा द्विजान्भक्त्या यास्येते द्वारकां पुनः ॥
tatra tīrthe punargatvā tapaḥ kṛtvā suduṣkaram | pūjayitvā dvijānbhaktyā yāsyete dvārakāṁ punaḥ ||
फिर उस तीर्थ में जाकर अत्यन्त दुष्कर तप करके और ब्राह्मणों की भक्तिपूर्वक पूजा करके वे दोनों पुनः द्वारका को जाएँगे।
श्लोक 9 (skanda.5.298.9)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद्बलकेशवौ । तेन देवो जगद्धाता पूजितस्त्रिगुणात्मवान् ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayedbalakeśavau | tena devo jagaddhātā pūjitastriguṇātmavān ||
उस तीर्थ में स्नान करके जो बल और केशव की पूजा करता है, उसके द्वारा त्रिगुणात्मा जगद्धाता देव पूजित हो जाता है।
श्लोक 10 (skanda.5.298.10)
उपवासी नरो भूत्वा यस्तु कुर्यात्प्रजागरम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो गायंस्तस्य शुभां कथाम् ॥
upavāsī naro bhūtvā yastu kuryātprajāgaram | mucyate sarvapāpebhyo gāyaṁstasya śubhāṁ kathām ||
उपवासी होकर जो मनुष्य जागरण करता है और उसकी (भगवान् की) शुभ कथा गाता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.5.298.11)
यावतस्तत्र तीर्थे तु वृक्षान् पश्यन्ति मानवाः । ब्रह्महत्यादिकं पापं तावदेषां प्रणश्यति ॥
yāvatastatra tīrthe tu vṛkṣān paśyanti mānavāḥ | brahmahatyādikaṁ pāpaṁ tāvadeṣāṁ praṇaśyati ||
उस तीर्थ में मनुष्य जितने वृक्षों को देख लेते हैं, उनका ब्रह्महत्या-जैसा पाप भी उतना ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.5.298.12)
प्रातरुत्थाय ये केचित्पश्यन्ति बलकेशवौ । तेनैव सदृशाः सर्वे देवदेवेन चक्रिणा ॥
prātarutthāya ye kecitpaśyanti balakeśavau | tenaiva sadṛśāḥ sarve devadevena cakriṇā ||
प्रातःकाल उठकर जो कोई बल और केशव का दर्शन करते हैं, वे सब उसी चक्रधारी देवदेव के समान हो जाते हैं।
श्लोक 13 (skanda.5.298.13)
ते पूज्यास्ते नमस्कार्यास्तेषां जन्म सुजीवितम् । ये नमन्ति जगत्पूज्यं देवं नारायणं हरिम् ॥
te pūjyāste namaskāryāsteṣāṁ janma sujīvitam | ye namanti jagatpūjyaṁ devaṁ nārāyaṇaṁ harim ||
जो जगत्पूज्य देव नारायण हरि को नमन करते हैं, वे पूजनीय हैं, वे वन्दनीय हैं, और उनका जन्म सुजीवन है।
श्लोक 14 (skanda.5.298.14)
तत्र तीर्थे तु यद्दानं स्नानं देवार्चनं नृप । क्रियते तत्फलं सर्वमक्षयायोपकल्पते ॥
tatra tīrthe tu yaddānaṁ snānaṁ devārcanaṁ nṛpa | kriyate tatphalaṁ sarvamakṣayāyopakalpate ||
हे राजन्! उस तीर्थ में जो भी दान, स्नान और देव-पूजा की जाती है, वह सब अक्षय फल के लिए होती है।
श्लोक 15 (skanda.5.298.15)
अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः । लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता यः काञ्चनं गां च भुवं च दद्यात् ॥
agnerapatyaṁ prathamaṁ suvarṇaṁ bhūrvaiṣṇavī sūryasutāśca gāvaḥ | lokāstrayastena bhavanti dattā yaḥ kāñcanaṁ gāṁ ca bhuvaṁ ca dadyāt ||
सुवर्ण अग्नि की प्रथम सन्तान है, पृथ्वी वैष्णवी है, और गौएँ सूर्य की पुत्रियाँ हैं; जो सोना, गाय और भूमि का दान करता है, उसके द्वारा मानो तीनों लोक ही दान कर दिए गए समझे जाते हैं।
श्लोक 16 (skanda.5.298.16)
एतत्ते कथितं सर्वं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् । अतीतं च भविष्यच्च वर्तमानं महाबलम् ॥
etatte kathitaṁ sarvaṁ tīrthamāhātmyamuttamam | atītaṁ ca bhaviṣyacca vartamānaṁ mahābalam ||
इस प्रकार मैंने तुम्हें इस तीर्थ की सम्पूर्ण उत्तम महिमा बता दी — भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों काल के महान् बल सहित।
श्लोक 17 (skanda.5.298.17)
श्रुत्वा वापि पठित्वेदं श्रावयिपत्वाथ धार्मिकान् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा ॥
śrutvā vāpi paṭhitvedaṁ śrāvayipatvātha dhārmikān | mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā ||
इसे सुनकर, पढ़कर, अथवा धार्मिक जनों को सुनाकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।