अवन्ती खण्ड · अध्याय 297
रुक्मिणी तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.297.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महाराज रुक्मिणीतीर्थमुत्तमम् । यत्रैव स्नानमात्रेण रूपवान्सुभगो भवेत् ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahārāja rukmiṇītīrthamuttamam | yatraiva snānamātreṇa rūpavānsubhago bhavet ||
श्रीमार्कण्डेय बोले — हे महाराज! उसके बाद उस सर्वोत्तम रुक्मिणी तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ केवल स्नानमात्र से मनुष्य रूपवान और सुभग हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.5.297.2)
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तृतीयायां विशेषतः । स्नानं समाचरेत्तत्र न चेह जायते पुनः ॥
aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ tṛtīyāyāṁ viśeṣataḥ | snānaṁ samācarettatra na ceha jāyate punaḥ ||
विशेष रूप से अष्टमी, चतुर्दशी और तृतीया को वहाँ स्नान करना चाहिए; ऐसा करने वाला फिर इस लोक में जन्म नहीं लेता।
श्लोक 3 (skanda.5.297.3)
यः स्नात्वा रुक्मिणीतीर्थे दानं दद्यात्तु कांचनम् । तत्तीर्थस्य प्रभावेन शोकं नाप्नोति मानवः ॥
yaḥ snātvā rukmiṇītīrthe dānaṁ dadyāttu kāṁcanam | tattīrthasya prabhāvena śokaṁ nāpnoti mānavaḥ ||
जो रुक्मिणी तीर्थ में स्नान करके स्वर्ण का दान करता है, उस तीर्थ के प्रभाव से वह मनुष्य फिर शोक को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 4 (skanda.5.297.4)
युधिष्ठिर उवाच। तीर्थस्यास्य कथं जातो महिमेदृङ्मुनीश्वर । रूपसौभाग्यदं येन तीर्थमेतद्ब्रवीहि मे ॥
yudhiṣṭhira uvāca| tīrthasyāsya kathaṁ jāto mahimedṛṅmunīśvara | rūpasaubhāgyadaṁ yena tīrthametadbravīhi me ||
युधिष्ठिर बोले — हे मुनीश्वर! इस तीर्थ की ऐसी महिमा कैसे उत्पन्न हुई, जिससे यह तीर्थ रूप और सौभाग्य देने वाला बना? मुझे यह बताइए।
श्लोक 5 (skanda.5.297.5)
मार्कण्डेय उवाच। कथयामि यथावृत्तमितिहासं पुरातनम् । कथितं पूर्वतो वृद्धैः पारम्पर्येण भारत ॥
mārkaṇḍeya uvāca| kathayāmi yathāvṛttamitihāsaṁ purātanam | kathitaṁ pūrvato vṛddhaiḥ pāramparyeṇa bhārata ||
मार्कण्डेय बोले — हे भारत! मैं वह प्राचीन इतिहास ज्यों का त्यों कहता हूँ, जो पूर्व में वृद्धजनों ने परम्परा से सुनाया था।
श्लोक 6 (skanda.5.297.6)
तं तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः । नगरं कुण्डिनं नाम भीष्मकः परिपाति हि ॥
taṁ te'haṁ sampravakṣyāmi śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ | nagaraṁ kuṇḍinaṁ nāma bhīṣmakaḥ paripāti hi ||
मैं तुम्हें वह भलीभाँति कहता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। कुण्डिन नाम का एक नगर था, जिसका पालन भीष्मक करता था।
श्लोक 7 (skanda.5.297.7)
हस्त्यश्वरथसम्पन्नो धनाढ्योऽति प्रतापवान् । स्त्रीसहस्रस्य मध्यस्थः कुरुते राज्यमुत्तमम् ॥
hastyaśvarathasampanno dhanāḍhyo'ti pratāpavān | strīsahasrasya madhyasthaḥ kurute rājyamuttamam ||
वह हाथी, घोड़े और रथों से सम्पन्न, अत्यन्त धनाढ्य और प्रतापी था। हज़ारों स्त्रियों के बीच रहकर वह श्रेष्ठ राज्य करता था।
श्लोक 8 (skanda.5.297.8)
तस्य भार्या महादेवी प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । तस्यामुत्पादयामास पुत्रमेकं च रुक्मकम् ॥
tasya bhāryā mahādevī prāṇebhyo'pi garīyasī | tasyāmutpādayāmāsa putramekaṁ ca rukmakam ||
उसकी महादेवी (पटरानी) पत्नी उसे प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। उससे उसने एक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम रुक्मक (रुक्मी) था।
श्लोक 9 (skanda.5.297.9)
द्वितीया तनया जज्ञे रुक्मिणी नाम नामतः । तदाशरीरिणी वाचा राजानं तमुवाच ह ॥
dvitīyā tanayā jajñe rukmiṇī nāma nāmataḥ | tadāśarīriṇī vācā rājānaṁ tamuvāca ha ||
फिर दूसरी सन्तान के रूप में एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम रुक्मिणी रखा गया। तभी एक अशरीरी वाणी ने उस राजा से कहा —
श्लोक 10 (skanda.5.297.10)
चतुर्भुजाय दातव्या कन्येयं भुवि भीष्मक । एवं तद्वचनं श्रुत्वा जहर्ष प्रियया सह ॥
caturbhujāya dātavyā kanyeyaṁ bhuvi bhīṣmaka | evaṁ tadvacanaṁ śrutvā jaharṣa priyayā saha ||
"हे भीष्मक! यह कन्या पृथ्वी पर चतुर्भुज (विष्णु) को ही दी जानी चाहिए।" यह वचन सुनकर वह अपनी प्रिया के साथ हर्षित हुआ।
श्लोक 11 (skanda.5.297.11)
ब्राह्मणैः सह विद्वद्भिः प्रविष्टः सूतिकागृहम् । स्वस्तिकं वाचयित्वास्याश्चक्रे नामेति रुक्मिणी ॥
brāhmaṇaiḥ saha vidvadbhiḥ praviṣṭaḥ sūtikāgṛham | svastikaṁ vācayitvāsyāścakre nāmeti rukmiṇī ||
विद्वान् ब्राह्मणों के साथ वह सूतिकागृह में प्रविष्ट हुआ। स्वस्तिवाचन कराकर उसने उस कन्या का नाम "रुक्मिणी" रखा।
श्लोक 12 (skanda.5.297.12)
यतः सुवर्णतिलको जन्मना सह भारत । ततः सा रुक्मिणीनाम ब्राह्मणैः कीर्तिता तदा ॥
yataḥ suvarṇatilako janmanā saha bhārata | tataḥ sā rukmiṇīnāma brāhmaṇaiḥ kīrtitā tadā ||
हे भारत! चूँकि जन्म के साथ ही उसके मस्तक पर सुवर्ण का तिलक था, इसलिए ब्राह्मणों ने तभी उसका नाम "रुक्मिणी" घोषित किया।
श्लोक 13 (skanda.5.297.13)
ततः सा कालपर्यायादष्टवर्षा व्यजायत । पूर्वोक्तं चैव तद्वाक्यमशरीरिण्युदीरितम् ॥
tataḥ sā kālaparyāyādaṣṭavarṣā vyajāyata | pūrvoktaṁ caiva tadvākyamaśarīriṇyudīritam ||
फिर काल के क्रम से वह आठ वर्ष की हो गई। और वह पूर्वोक्त वचन, जो उस अशरीरी वाणी ने कहा था —
श्लोक 14 (skanda.5.297.14)
स्मृत्वा स्मृत्वाथ नृपतिश्चिन्तयामास भूपतिः । कस्मै देया मया बाला भविता कश्चतुर्भुजः ॥
smṛtvā smṛtvātha nṛpatiścintayāmāsa bhūpatiḥ | kasmai deyā mayā bālā bhavitā kaścaturbhujaḥ ||
उसे बार-बार स्मरण करके राजा चिन्तित हो गया — "मैं इस बालिका को किसे दूँ? कौन है वह चतुर्भुज?"
श्लोक 15 (skanda.5.297.15)
एतस्मिन्नन्तरे तावद्रैवतात्पर्वतोत्तमात् । मुख्यश्चेदिपतिस्तत्र दमघोषः समागतः ॥
etasminnantare tāvadraivatātparvatottamāt | mukhyaścedipatistatra damaghoṣaḥ samāgataḥ ||
इसी बीच रैवतक नामक उत्तम पर्वत से चेदि देश के प्रमुख राजा दमघोष वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 16 (skanda.5.297.16)
प्रविष्टो राजसदनं यत्र राजा स भीष्मकः । तं दृष्ट्वा चागतं गेहे पूजयामास भूपतिः ॥
praviṣṭo rājasadanaṁ yatra rājā sa bhīṣmakaḥ | taṁ dṛṣṭvā cāgataṁ gehe pūjayāmāsa bhūpatiḥ ||
वे राजभवन में प्रविष्ट हुए, जहाँ राजा भीष्मक था। उन्हें अपने घर आया देखकर राजा ने उनका सत्कार किया।
श्लोक 17 (skanda.5.297.17)
आसनं विपुलं दत्त्वा सभां गत्वा निवेशितः । कुशलं तव राजेन्द्र दमघोष श्रियायुत ॥
āsanaṁ vipulaṁ dattvā sabhāṁ gatvā niveśitaḥ | kuśalaṁ tava rājendra damaghoṣa śriyāyuta ||
विशाल आसन देकर उन्हें सभा में बैठाया गया — "हे राजेन्द्र! हे श्रीसम्पन्न दमघोष! आपका कुशल तो है?"
श्लोक 18 (skanda.5.297.18)
पुण्याहमद्य संजातमहं त्वद्दर्शनोत्सुकः । कन्या मदीया राजेन्द्र ह्यष्टवर्षा व्यजायत ॥
puṇyāhamadya saṁjātamahaṁ tvaddarśanotsukaḥ | kanyā madīyā rājendra hyaṣṭavarṣā vyajāyata ||
"आज का दिन पुण्य हो गया, मैं आपके दर्शन के लिए उत्सुक था। हे राजेन्द्र! मेरी कन्या आठ वर्ष की हो चुकी है।"
श्लोक 19 (skanda.5.297.19)
चतुर्भुजाय दातव्या वागुवाचाशरीरिणी । भीष्मकस्य वचः श्रुत्वा दमघोषोऽब्रवीदिदम् ॥
caturbhujāya dātavyā vāguvācāśarīriṇī | bhīṣmakasya vacaḥ śrutvā damaghoṣo'bravīdidam ||
"वह चतुर्भुज को ही दी जानी चाहिए — ऐसा अशरीरी वाणी ने कहा था।" भीष्मक का यह वचन सुनकर दमघोष ने यह कहा —
श्लोक 20 (skanda.5.297.20)
चतुर्भुजो मम सुतस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । तस्येयं दीयतां कन्या शिशुपालस्य भीष्मक ॥
caturbhujo mama sutastriṣu lokeṣu viśrutaḥ | tasyeyaṁ dīyatāṁ kanyā śiśupālasya bhīṣmaka ||
"हे भीष्मक! मेरा पुत्र शिशुपाल तीनों लोकों में चतुर्भुज नाम से प्रसिद्ध है; यह कन्या उसी को दी जाए।"
श्लोक 21 (skanda.5.297.21)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दमघोषस्य भूमिप । भीष्मकेन ततो दत्ता शिशुपालाय रुक्मिणी ॥
tasya tadvacanaṁ śrutvā damaghoṣasya bhūmipa | bhīṣmakena tato dattā śiśupālāya rukmiṇī ||
हे राजन्! दमघोष का वह वचन सुनकर भीष्मक ने रुक्मिणी को शिशुपाल के लिए देना निश्चय कर लिया।
श्लोक 22 (skanda.5.297.22)
प्रारब्धं मङ्गलं तत्र भीष्मकेण युधिष्ठिर । दिक्षु देशान्तरेष्वेव ये वसन्ति स्वगोत्रजाः ॥
prārabdhaṁ maṅgalaṁ tatra bhīṣmakeṇa yudhiṣṭhira | dikṣu deśāntareṣveva ye vasanti svagotrajāḥ ||
हे युधिष्ठिर! तब भीष्मक ने मंगल-कार्य आरम्भ किया। जो अपने कुल के बन्धु-बान्धव विभिन्न दिशाओं और देशों में रहते थे,
श्लोक 23 (skanda.5.297.23)
निमन्त्रितास्तु ते सर्वे समाजग्मुर्यथाक्रमम् । ततो यादववंशस्य तिलकौ बलकेशवौ ॥
nimantritāstu te sarve samājagmuryathākramam | tato yādavavaṁśasya tilakau balakeśavau ||
वे सभी आमन्त्रित होकर यथाक्रम वहाँ एकत्र हुए। फिर यादव वंश के तिलकस्वरूप बलराम और केशव भी —
श्लोक 24 (skanda.5.297.24)
निमन्त्रितौ समायातौ कुण्डिनं भीष्मकस्य तु । भीष्मकेण यथान्यायं पूजितौ तौ यदूत्तमौ ॥
nimantritau samāyātau kuṇḍinaṁ bhīṣmakasya tu | bhīṣmakeṇa yathānyāyaṁ pūjitau tau yadūttamau ||
आमन्त्रित होकर भीष्मक के कुण्डिन नगर में आ पहुँचे। भीष्मक ने उन दोनों यदुश्रेष्ठों का यथोचित सत्कार किया।
श्लोक 25 (skanda.5.297.25)
ततः प्रदोषसमये रुक्मिणी काममोहिनी । सखीभिः सहिता याता पूर्बहिश्चाम्बिकार्चने ॥
tataḥ pradoṣasamaye rukmiṇī kāmamohinī | sakhībhiḥ sahitā yātā pūrbahiścāmbikārcane ||
फिर सन्ध्या के समय, काम से मोहित हुई रुक्मिणी सखियों के साथ अम्बिका देवी की पूजा के लिए नगर के बाहर गई।
श्लोक 26 (skanda.5.297.26)
सापश्यत्तत्र देवेशं गोपवेषधरं हरिम् । तं दृष्ट्वा मोहमापन्ना कामेन कलुषीकृता ॥
sāpaśyattatra deveśaṁ gopaveṣadharaṁ harim | taṁ dṛṣṭvā mohamāpannā kāmena kaluṣīkṛtā ||
वहाँ उसने ग्वाल-वेषधारी देवेश हरि को देखा। उन्हें देखकर वह मोह को प्राप्त हुई और काम से विह्वल हो उठी।
श्लोक 27 (skanda.5.297.27)
केशवोऽपि च तां दृष्ट्वा संकर्षणमुवाच ह । स्त्रीरत्नप्रवरं तात हर्तव्यमिति मे मतिः ॥
keśavo'pi ca tāṁ dṛṣṭvā saṁkarṣaṇamuvāca ha | strīratnapravaraṁ tāta hartavyamiti me matiḥ ||
केशव भी उसे देखकर संकर्षण (बलराम) से बोले — "हे भ्राता! मेरा विचार है कि इस श्रेष्ठ स्त्रीरत्न का हरण कर लिया जाए।"
श्लोक 28 (skanda.5.297.28)
केशवस्य वचः श्रुत्वा संकर्षण उवाच ह । गच्छ कृष्ण महाबाहो स्त्रीरत्नं चाशु गृह्यताम् ॥
keśavasya vacaḥ śrutvā saṁkarṣaṇa uvāca ha | gaccha kṛṣṇa mahābāho strīratnaṁ cāśu gṛhyatām ||
केशव का यह वचन सुनकर संकर्षण बोले — "हे महाबाहु कृष्ण! जाओ, इस स्त्रीरत्न को शीघ्र ग्रहण करो।"
श्लोक 29 (skanda.5.297.29)
अहं च तव मार्गेण ह्यागमिष्यामि पृष्ठतः । दानवानां च सर्वेषां कुर्वंश्च कदनं महत् ॥
ahaṁ ca tava mārgeṇa hyāgamiṣyāmi pṛṣṭhataḥ | dānavānāṁ ca sarveṣāṁ kurvaṁśca kadanaṁ mahat ||
"मैं भी तुम्हारे पीछे-पीछे, तुम्हारे मार्ग से आऊँगा, और सभी दानवों का महान संहार करूँगा।"
श्लोक 30 (skanda.5.297.30)
संकर्षणमतं प्राप्य केशवः केशिसूदनः । ययौ कन्यां गृहीत्वा तु रथमारोप्य सत्वरम् ॥
saṁkarṣaṇamataṁ prāpya keśavaḥ keśisūdanaḥ | yayau kanyāṁ gṛhītvā tu rathamāropya satvaram ||
संकर्षण की सम्मति पाकर केशिसूदन केशव उस कन्या को ग्रहण कर, उसे रथ पर आरूढ़ कराकर तुरन्त चल पड़े।
श्लोक 31 (skanda.5.297.31)
निर्गतः सहसा राजन्वेगेनैवानिलो यथा । हाहाकारस्तदा जातो भीष्मकस्य पुरे महान् ॥
nirgataḥ sahasā rājanvegenaivānilo yathā | hāhākārastadā jāto bhīṣmakasya pure mahān ||
हे राजन्! वे वायु के समान वेग से अकस्मात् निकल पड़े। तब भीष्मक के नगर में महान हाहाकार मच गया।
श्लोक 32 (skanda.5.297.32)
निर्गता दानवाः क्रुद्धा वेला इव महोदधेः । गर्जन्तः सायुधाः सर्वे धावन्तो रथवर्त्मनि ॥
nirgatā dānavāḥ kruddhā velā iva mahodadheḥ | garjantaḥ sāyudhāḥ sarve dhāvanto rathavartmani ||
क्रुद्ध दानव महासागर की लहरों के समान उमड़ पड़े; सभी शस्त्रधारी गरजते हुए रथ के मार्ग पर दौड़ पड़े।
श्लोक 33 (skanda.5.297.33)
बलदेवं ततः प्राप्ता रथमार्गानुगामिनम् । तेषां युद्धं बलस्यासीत्सर्वलोकक्षयंकरम् ॥
baladevaṁ tataḥ prāptā rathamārgānugāminam | teṣāṁ yuddhaṁ balasyāsītsarvalokakṣayaṁkaram ||
फिर वे रथ के मार्ग का अनुगमन करते हुए बलदेव तक जा पहुँचे। उनका बलराम के साथ जो युद्ध हुआ, वह समस्त लोकों का संहार करने वाला था।
श्लोक 34 (skanda.5.297.34)
यथा तारामये पूर्वं सङ्ग्रामे लोकविश्रुते । गदाहस्तो महाबाहुस्त्रैलोक्येऽप्रतिमो बलः ॥
yathā tārāmaye pūrvaṁ saṅgrāme lokaviśrute | gadāhasto mahābāhustrailokye'pratimo balaḥ ||
जैसे पूर्वकाल में तारकामय के लोक-विख्यात संग्राम में, वैसे ही यहाँ भी गदाधारी, महाबाहु, त्रैलोक्य में अनुपम बलशाली बलराम —
श्लोक 35 (skanda.5.297.35)
हलेनाकृष्य सहसा गदापातैरपातयत् । अशक्यो दानवैर्हन्तुं बलभद्रो महाबलः ॥
halenākṛṣya sahasā gadāpātairapātayat | aśakyo dānavairhantuṁ balabhadro mahābalaḥ ||
अपने हल से खींचकर, गदा के प्रहारों से उन्हें गिराने लगे। वह महाबली बलभद्र दानवों के लिए अवध्य था।
श्लोक 36 (skanda.5.297.36)
बभञ्ज दानवान्सर्वांस्तस्थौ गिरिरिवाचलः । तं दृष्ट्वा च बलं क्रुद्धं दुर्धर्षं त्रिदशैरपि ॥
babhañja dānavānsarvāṁstasthau giririvācalaḥ | taṁ dṛṣṭvā ca balaṁ kruddhaṁ durdharṣaṁ tridaśairapi ||
उन्होंने सभी दानवों को तितर-बितर कर दिया और पर्वत की भाँति अटल खड़े रहे। उस क्रुद्ध, देवताओं तक के लिए दुर्धर्ष बल को देखकर —
श्लोक 37 (skanda.5.297.37)
भीष्मपुत्रो महातेजा रुक्मीनां महयशाः । नराणामतिशूराणामक्षौहिण्या समन्वितः ॥
bhīṣmaputro mahātejā rukmīnāṁ mahayaśāḥ | narāṇāmatiśūrāṇāmakṣauhiṇyā samanvitaḥ ||
भीष्म-पुत्र, महातेजस्वी, महायशस्वी रुक्मी — अत्यन्त शूरवीर सैनिकों की एक अक्षौहिणी सेना के साथ —
श्लोक 38 (skanda.5.297.38)
बलभद्रमतिक्रम्य ततो युद्धे निराकरोत् । तद्युद्धं वञ्चयित्वा तु रथमार्गेण सत्वरम् ॥
balabhadramatikramya tato yuddhe nirākarot | tadyuddhaṁ vañcayitvā tu rathamārgeṇa satvaram ||
बलभद्र को लाँघकर युद्ध में उन्हें रोकने का प्रयत्न करने लगा। परन्तु उस युद्ध को टालकर वे शीघ्र ही रथ के मार्ग से आगे बढ़ गए।
श्लोक 39 (skanda.5.297.39)
केशवोऽपि तदा देवो रुक्मिण्या सहितो ययौ । विन्ध्यं तु लङ्घयित्वाग्रे त्रैलोक्यगुरुरव्ययः ॥
keśavo'pi tadā devo rukmiṇyā sahito yayau | vindhyaṁ tu laṅghayitvāgre trailokyagururavyayaḥ ||
तब त्रैलोक्य के गुरु, अविनाशी देव केशव भी रुक्मिणी के साथ, विन्ध्य पर्वत को लाँघते हुए आगे बढ़ गए।
श्लोक 40 (skanda.5.297.40)
नर्मदातटमापेदे यत्र सिद्धः पुरा पुनः । अजेयो येन संजातस्तीर्थस्यास्य प्रभावतः ॥
narmadātaṭamāpede yatra siddhaḥ purā punaḥ | ajeyo yena saṁjātastīrthasyāsya prabhāvataḥ ||
वे नर्मदा के तट पर पहुँचे, जहाँ पूर्वकाल में उन्होंने सिद्धि प्राप्त की थी, और इसी तीर्थ के प्रभाव से वे अजेय हो गए थे।
श्लोक 41 (skanda.5.297.41)
एतस्मात्कारणात्तात योधनीपुरमुच्यते । रुक्मोऽपि दानवेन्द्रोऽसौ प्राप्तः ।
etasmātkāraṇāttāta yodhanīpuramucyate | rukmo'pi dānavendro'sau prāptaḥ |
हे तात! इसी कारण यह स्थान योधनीपुर कहलाता है। इतने में वह दानवेन्द्र रुक्मी भी वहाँ जा पहुँचा,
श्लोक 42 (skanda.5.297.42)
प्रत्युवाचाच्युतं क्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति मा व्रज । अद्य त्वां निशितैर्बाणैर्नेष्यामि यमसादनम् ॥
pratyuvācācyutaṁ kruddhastiṣṭha tiṣṭheti mā vraja | adya tvāṁ niśitairbāṇairneṣyāmi yamasādanam ||
और क्रुद्ध होकर अच्युत को ललकारा — "ठहरो, ठहरो, मत जाओ; आज मैं तुम्हें तीखे बाणों से यमलोक भेज दूँगा।"
श्लोक 43 (skanda.5.297.43)
एवं परस्परं वीरौ जगर्जतुरुभावपि । तयोर्युद्धमभूद्घोरं तारकाग्निजसन्निभम् ॥
evaṁ parasparaṁ vīrau jagarjaturubhāvapi | tayoryuddhamabhūdghoraṁ tārakāgnijasannibham ||
इस प्रकार दोनों वीर आपस में गरजने लगे। उन दोनों का वह घोर युद्ध तारक-संग्राम की अग्नि के समान भीषण हो उठा।
श्लोक 44 (skanda.5.297.44)
चिक्षेप शरजालानि केशवं प्रति दानवः । नानुचिन्त्य शरांस्तस्य केशवः केशिसूदनः ॥
cikṣepa śarajālāni keśavaṁ prati dānavaḥ | nānucintya śarāṁstasya keśavaḥ keśisūdanaḥ ||
उस दानव ने केशव पर बाणों के जाल छोड़े; परन्तु केशिसूदन केशव ने उसके बाणों की कोई परवाह न की।
श्लोक 45 (skanda.5.297.45)
ततो विष्णुः स्वयं क्रुद्धश्चक्रं गृह्य सुदर्शनम् । सम्प्रहरत्यमुं यावद्रुक्मिण्यात्र निवारितः ॥
tato viṣṇuḥ svayaṁ kruddhaścakraṁ gṛhya sudarśanam | sampraharatyamuṁ yāvadrukmiṇyātra nivāritaḥ ||
तब स्वयं विष्णु क्रुद्ध होकर सुदर्शन चक्र उठाकर उस पर प्रहार करने ही वाले थे कि रुक्मिणी ने उन्हें वहीं रोक लिया।
श्लोक 46 (skanda.5.297.46)
त्वां न जानाति देवेशं चतुर्बाहुं जनार्दनम् । दर्शयस्व स्वकं रूपं दयां कृत्वा ममोपरि ॥
tvāṁ na jānāti deveśaṁ caturbāhuṁ janārdanam | darśayasva svakaṁ rūpaṁ dayāṁ kṛtvā mamopari ||
"यह आपको चतुर्भुज देवेश जनार्दन के रूप में नहीं जानता। मुझ पर दया करके अपना वास्तविक स्वरूप इसे दिखा दीजिए।"
श्लोक 47 (skanda.5.297.47)
एवमुक्तस्तु रुक्मिण्या दर्शयामास भारत । देवा दृष्ट्वापि तद्रूपं स्तुवन्त्याकाशसंस्थिताः । दिव्यं चक्षुस्तदा देवो ददौ रुक्मस्य भारत ॥
evamuktastu rukmiṇyā darśayāmāsa bhārata | devā dṛṣṭvāpi tadrūpaṁ stuvantyākāśasaṁsthitāḥ | divyaṁ cakṣustadā devo dadau rukmasya bhārata ||
हे भारत! रुक्मिणी के ऐसा कहने पर उन्होंने अपना (विराट) रूप दिखाया। उस रूप को देखकर आकाश में स्थित देवगण भी उसकी स्तुति करने लगे; और तब देव (कृष्ण) ने रुक्मी को दिव्य दृष्टि भी प्रदान की।
श्लोक 48 (skanda.5.297.48)
रुक्म उवाच। यन्मया पापनिष्ठेन मन्दभाग्येन केशव । सायकैराहतं वक्षस्तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि ॥
rukma uvāca| yanmayā pāpaniṣṭhena mandabhāgyena keśava | sāyakairāhataṁ vakṣastatsarvaṁ kṣantumarhasi ||
रुक्मी बोला — हे केशव! मुझ पापनिष्ठ, अभागे ने आपके वक्षस्थल पर जो बाण चलाए, उस सबको आप क्षमा करने योग्य हैं।
श्लोक 49 (skanda.5.297.49)
पूर्वं दत्ता स्वयं देव जानकी जनकेन वै । मया प्रदत्ता देवेश रुक्मिणी तव केशव ॥
pūrvaṁ dattā svayaṁ deva jānakī janakena vai | mayā pradattā deveśa rukmiṇī tava keśava ||
हे देव! जैसे पहले जनक ने स्वयं जानकी को (आपको) दिया था, हे देवेश केशव! वैसे ही अब मैं रुक्मिणी को आपको प्रदान करता हूँ।
श्लोक 50 (skanda.5.297.50)
उद्वाहय यथान्यायं विधिदृष्टेन कर्मणा । रुक्मस्य वचनं श्रुत्वा ततस्तुष्टो जगद्गुरुः ॥
udvāhaya yathānyāyaṁ vidhidṛṣṭena karmaṇā | rukmasya vacanaṁ śrutvā tatastuṣṭo jagadguruḥ ||
"विधिपूर्वक शास्त्रोक्त कर्म से इसका विवाह कीजिए।" रुक्मी का यह वचन सुनकर जगद्गुरु प्रसन्न हुए।
श्लोक 51 (skanda.5.297.51)
बभाषे देवदेवेशो रुक्मिणं भीष्मकात्मजम् । गच्छ स्वकं पुरं मा भैः कुरु राज्यमकण्टकम् ॥
babhāṣe devadeveśo rukmiṇaṁ bhīṣmakātmajam | gaccha svakaṁ puraṁ mā bhaiḥ kuru rājyamakaṇṭakam ||
देवदेवेश ने भीष्मकपुत्र रुक्मी से कहा — "अपने नगर को जाओ, भयभीत मत हो, निष्कण्टक राज्य करो।"
श्लोक 52 (skanda.5.297.52)
केशवस्य वचः श्रुत्वा रुक्मो दानवपुंगवः । तं प्रणम्य जगन्नाथं जगाम भवनं पितुः ॥
keśavasya vacaḥ śrutvā rukmo dānavapuṁgavaḥ | taṁ praṇamya jagannāthaṁ jagāma bhavanaṁ pituḥ ||
केशव का यह वचन सुनकर दानवश्रेष्ठ रुक्मी उन जगन्नाथ को प्रणाम करके अपने पिता के भवन को चला गया।
श्लोक 53 (skanda.5.297.53)
गते रुक्मे तदा कृष्णः समामन्त्र्य द्विजोत्तमान् । मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् ॥
gate rukme tadā kṛṣṇaḥ samāmantrya dvijottamān | marīcimatryaṅgirasaṁ pulastyaṁ pulahaṁ kratum ||
रुक्मी के चले जाने पर कृष्ण ने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाया — मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु को,
श्लोक 54 (skanda.5.297.54)
वसिष्ठं च महाभागमित्येते सप्त मानसाः । इत्येते ब्राह्मणाः सप्त पुराणे निश्चयं गताः ॥
vasiṣṭhaṁ ca mahābhāgamityete sapta mānasāḥ | ityete brāhmaṇāḥ sapta purāṇe niścayaṁ gatāḥ ||
और महाभाग वसिष्ठ को — ये सात ब्रह्मा के मानस-पुत्र हैं; इन्हीं सात ब्राह्मणों को पुराण में निश्चित रूप से (सप्तर्षि) माना गया है।
श्लोक 55 (skanda.5.297.55)
क्षमावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिरलंकृताः । इत्येवं ब्रह्मपुत्राश्च सत्यवन्तो महामते ॥
kṣamāvantaḥ prajāvanto maharṣibhiralaṁkṛtāḥ | ityevaṁ brahmaputrāśca satyavanto mahāmate ||
हे महामते! वे क्षमावान्, प्रजावान्, महर्षियों से सुशोभित तथा सत्यवादी ब्रह्मपुत्र हैं।
श्लोक 56 (skanda.5.297.56)
नर्मदातटमाश्रित्य निवसन्ति जितेन्द्रियाः । तपःस्वाध्यायनिरता जपहोमपरायणाः ॥
narmadātaṭamāśritya nivasanti jitendriyāḥ | tapaḥsvādhyāyaniratā japahomaparāyaṇāḥ ||
वे जितेन्द्रिय होकर नर्मदा के तट का आश्रय लेकर निवास करते हैं, तप और स्वाध्याय में लीन तथा जप-हवन में तत्पर रहते हुए।
श्लोक 57 (skanda.5.297.57)
निमन्त्रितास्तु राजेन्द्र केशवेन महात्मना । श्राद्धं कृत्वा यथान्यायं ब्रह्मोक्तविधिना ततः ॥
nimantritāstu rājendra keśavena mahātmanā | śrāddhaṁ kṛtvā yathānyāyaṁ brahmoktavidhinā tataḥ ||
हे राजेन्द्र! महात्मा केशव ने उन्हें आमन्त्रित किया, और फिर ब्रह्मा द्वारा कहे गए विधान से यथोचित श्राद्ध किया।
श्लोक 58 (skanda.5.297.58)
हरिस्तान्पूजयामास सप्तब्रह्मर्षिपुंगवान् । प्रददौ द्वादश ग्रामांस्तेभ्यस्तत्र जनार्दनः ॥
haristānpūjayāmāsa saptabrahmarṣipuṁgavān | pradadau dvādaśa grāmāṁstebhyastatra janārdanaḥ ||
हरि ने उन सातों श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियों की पूजा की, और जनार्दन ने उन्हें वहाँ बारह ग्राम भेंट किए।
श्लोक 59 (skanda.5.297.59)
यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी । तावद्दानं मया दत्तं परिपन्थी न कश्चन ॥
yāvaccandraśca sūryaśca yāvattiṣṭhati medinī | tāvaddānaṁ mayā dattaṁ paripanthī na kaścana ||
"जब तक चन्द्रमा और सूर्य रहेंगे, जब तक पृथ्वी रहेगी, तब तक यह मेरा दिया हुआ दान अटल रहेगा; कोई इसे बाधित न करे।"
श्लोक 60 (skanda.5.297.60)
मद्दत्तं पालयिष्यन्ते ये नृपा गतकल्मषाः । तेभ्यः स्वस्ति करिष्यामि दास्यामि परमां गतिम् ॥
maddattaṁ pālayiṣyante ye nṛpā gatakalmaṣāḥ | tebhyaḥ svasti kariṣyāmi dāsyāmi paramāṁ gatim ||
"जो निष्पाप राजा मेरे दिए हुए इस दान की रक्षा करेंगे, उनका मैं कल्याण करूँगा और उन्हें परम गति दूँगा।"
श्लोक 61 (skanda.5.297.61)
यावद्धि यान्ति लोकेषु महाभूतानि पञ्च च । तावत्ते दिवि मोदन्ते मद्दत्तपरिपालकाः ॥
yāvaddhi yānti lokeṣu mahābhūtāni pañca ca | tāvatte divi modante maddattaparipālakāḥ ||
"जब तक पाँचों महाभूत लोकों में व्याप्त रहते हैं, तब तक मेरे दिए दान की रक्षा करने वाले लोग स्वर्ग में आनन्द भोगते रहेंगे।"
श्लोक 62 (skanda.5.297.62)
यस्तु लोपयते मूढो दत्तं वः पृथिवीतले । नरके तस्य वासः स्याद्यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
yastu lopayate mūḍho dattaṁ vaḥ pṛthivītale | narake tasya vāsaḥ syādyāvadābhūtasamplavam ||
"किन्तु जो मूढ़ पृथ्वीतल पर तुम्हें दिए गए इस दान का लोप करेगा, वह प्रलय-काल तक नरक में वास करेगा।"
श्लोक 63 (skanda.5.297.63)
स्वदत्ता परदत्ता वा पालनीया वसुंधरा । यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलम् ॥
svadattā paradattā vā pālanīyā vasuṁdharā | yasya yasya yadā bhūmistasya tasya tadā phalam ||
चाहे स्वयं दिया गया भूदान हो या दूसरे का दिया हुआ, भूमि की रक्षा करनी ही चाहिए; जिस-जिस के अधीन जब-जब भूमि रहती है, तब-तब उसी का फल भी उसे प्राप्त होता है।
श्लोक 64 (skanda.5.297.64)
स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुंधराम् । स विष्ठायां कृमिर्भूत्वा पितृभिः सह मज्जति ॥
svadattāṁ paradattāṁ vā yo hareta vasuṁdharām | sa viṣṭhāyāṁ kṛmirbhūtvā pitṛbhiḥ saha majjati ||
जो कोई अपने या दूसरे द्वारा दी गई भूमि को हड़प लेता है, वह विष्ठा में कीड़ा बनकर अपने पितरों के साथ डूब जाता है।
श्लोक 65 (skanda.5.297.65)
अन्यायेन हृता भूमिरन्यायेन च हारिता । हर्ता हारयिता चैव विष्ठायां जायते कृमिः ॥
anyāyena hṛtā bhūmiranyāyena ca hāritā | hartā hārayitā caiva viṣṭhāyāṁ jāyate kṛmiḥ ||
जो भूमि अन्याय से हड़पी गई या अन्याय से हड़पने के लिए कहलवाई गई — दोनों ही, हड़पने वाला और हड़पवाने वाला, विष्ठा में कीड़ा बनकर जन्म लेते हैं।
श्लोक 66 (skanda.5.297.66)
षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति भूमिदः । आच्छेत्ता चानुमन्ता च तान्येव नरके वसेत् ॥
ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi svarge tiṣṭhati bhūmidaḥ | ācchettā cānumantā ca tānyeva narake vaset ||
भूमि देने वाला साठ हज़ार वर्षों तक स्वर्ग में रहता है; परन्तु उसे छीनने वाला और उसका समर्थन करने वाला उतने ही वर्षों तक नरक में निवास करता है।
श्लोक 67 (skanda.5.297.67)
यानीह दत्तानि पुरा नरेन्द्रैर्दानानि धर्मार्थयशस्कराणि । निर्माल्यरूपप्रतिमानि तानि को नाम साधुः पुनराददाति ॥
yānīha dattāni purā narendrairdānāni dharmārthayaśaskarāṇi | nirmālyarūpapratimāni tāni ko nāma sādhuḥ punarādadāti ||
जो दान पहले राजाओं द्वारा धर्म, अर्थ और यश देने वाले रूप में दिए गए हैं, वे निर्माल्य के समान हैं; ऐसे किसी साधु पुरुष का नाम भला कौन है जो उन्हें फिर वापस ले ले?
श्लोक 68 (skanda.5.297.68)
एवं तान्पूजयित्वा तु सम्यङ्न्यायेन पाण्डव । रुक्मिण्या विधिवत्पाणिं जग्राह मधुसूदनः ॥
evaṁ tānpūjayitvā tu samyaṅnyāyena pāṇḍava | rukmiṇyā vidhivatpāṇiṁ jagrāha madhusūdanaḥ ||
हे पाण्डव! इस प्रकार उन्हें भलीभाँति विधिपूर्वक पूजकर मधुसूदन ने रुक्मिणी का पाणिग्रहण विधिपूर्वक किया।
श्लोक 69 (skanda.5.297.69)
मुशली च ततः सर्वाञ्जित्वा दानवपुंगवान् । स्वस्थानमगमत्तत्र कृत्वा कार्यं सुशोभनम् ॥
muśalī ca tataḥ sarvāñjitvā dānavapuṁgavān | svasthānamagamattatra kṛtvā kāryaṁ suśobhanam ||
फिर मुशली (बलराम) भी सभी श्रेष्ठ दानवों को जीतकर, वहाँ अपना शुभ कार्य पूरा करके अपने स्थान को चले गए।
श्लोक 70 (skanda.5.297.70)
प्रयातौ द्वारवत्यां तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ । गच्छमानं तु तं दृष्ट्वा केशवं क्लेशनाशनम् ॥
prayātau dvāravatyāṁ tau kṛṣṇasaṁkarṣaṇāvubhau | gacchamānaṁ tu taṁ dṛṣṭvā keśavaṁ kleśanāśanam ||
कृष्ण और संकर्षण दोनों द्वारका की ओर चल पड़े। मार्ग में क्लेशनाशक केशव को जाते हुए देखकर —
श्लोक 71 (skanda.5.297.71)
ब्राह्मणाः सत्यवन्तश्च निर्गताः शंसितव्रताः । आगच्छमानांस्तौ वीक्ष्य रथमार्गेण ब्राह्मणान् ॥
brāhmaṇāḥ satyavantaśca nirgatāḥ śaṁsitavratāḥ | āgacchamānāṁstau vīkṣya rathamārgeṇa brāhmaṇān ||
व्रतशील, सत्यवादी ब्राह्मण वहाँ से निकल आए। उन दोनों (कृष्ण-बलराम) ने भी रथ के मार्ग पर आते हुए उन ब्राह्मणों को देखा।
श्लोक 72 (skanda.5.297.72)
मुहूर्तं तत्र विश्रम्य केशवो वाक्यमब्रवीत् । किमागमनकार्यं वो ब्रूत सर्वं द्विजोत्तमाः ॥
muhūrtaṁ tatra viśramya keśavo vākyamabravīt | kimāgamanakāryaṁ vo brūta sarvaṁ dvijottamāḥ ||
वहाँ क्षणभर विश्राम करके केशव ने कहा — "हे द्विजोत्तमो! आपके आगमन का क्या प्रयोजन है? आप सब कहिए।"
श्लोक 73 (skanda.5.297.73)
कुर्वाणाः स्वीयकर्माणि मम कृत्यं तु तिष्ठते । देवस्य वचनं श्रुत्वा मुनयो वाक्यमब्रुवन् ॥
kurvāṇāḥ svīyakarmāṇi mama kṛtyaṁ tu tiṣṭhate | devasya vacanaṁ śrutvā munayo vākyamabruvan ||
"मैं अपने कर्तव्य-कर्मों में लगा हूँ, फिर भी मेरा एक कार्य शेष रह गया है (सो बताइए)।" देव का यह वचन सुनकर मुनियों ने कहा —
श्लोक 74 (skanda.5.297.74)
कल्पकोटिसहस्रेण सत्यभावात्तु वन्दितः । दुष्प्राप्योऽसि मनुष्याणां प्राप्तः किं त्यजसे हि नः ॥
kalpakoṭisahasreṇa satyabhāvāttu vanditaḥ | duṣprāpyo'si manuṣyāṇāṁ prāptaḥ kiṁ tyajase hi naḥ ||
"करोड़ों-हज़ारों कल्पों तक सत्यभाव से जिसकी वन्दना की जाती है, वह आप मनुष्यों के लिए दुष्प्राप्य हैं; अब हमें प्राप्त होकर आप हमें त्याग क्यों रहे हैं?"
श्लोक 75 (skanda.5.297.75)
ब्राह्मणानां वचः श्रुत्वा भगवानिदमब्रवीत् । मथुरायां द्वारवत्यां योधनीपुर एव च ॥
brāhmaṇānāṁ vacaḥ śrutvā bhagavānidamabravīt | mathurāyāṁ dvāravatyāṁ yodhanīpura eva ca ||
ब्राह्मणों का यह वचन सुनकर भगवान् ने यह कहा — "मथुरा में, द्वारका में और इसी योधनीपुर में —"
श्लोक 76 (skanda.5.297.76)
त्रिकालमागमिष्यामि सत्यं सत्यं पुनः पुनः । एवं ते ब्राह्मणाः श्रुत्वा योधनीपुरमागताः ॥
trikālamāgamiṣyāmi satyaṁ satyaṁ punaḥ punaḥ | evaṁ te brāhmaṇāḥ śrutvā yodhanīpuramāgatāḥ ||
"मैं तीनों कालों में बार-बार आऊँगा — यह सत्य है, सत्य है।" यह सुनकर वे ब्राह्मण योधनीपुर लौट आए।
श्लोक 77 (skanda.5.297.77)
अवतीर्णस्त्रिभागेन प्रादुर्भावे तु माथुरे । एतत्ते कथितं सर्वं तीर्थस्योत्पत्तिकारणम् ॥
avatīrṇastribhāgena prādurbhāve tu māthure | etatte kathitaṁ sarvaṁ tīrthasyotpattikāraṇam ||
मथुरा में प्रादुर्भाव के समय वे तीन भागों में अवतीर्ण हुए। इस प्रकार मैंने तुम्हें इस तीर्थ की उत्पत्ति का सम्पूर्ण कारण बता दिया।
श्लोक 78 (skanda.5.297.78)
भूतं भव्यं भविष्यच्च वर्तमानं तथापरम् । यं श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥
bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyacca vartamānaṁ tathāparam | yaṁ śrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ ||
इसमें भूत, भव्य, भविष्य और वर्तमान — सब समाहित है। इसे सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है।
श्लोक 79 (skanda.5.297.79)
तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद्बलकेशवौ । तेन देवो जगद्धाता पूजितस्त्रिगुणात्मवान् ॥
tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayedbalakeśavau | tena devo jagaddhātā pūjitastriguṇātmavān ||
उस तीर्थ में स्नान करके जो बल और केशव की पूजा करता है, उसके द्वारा त्रिगुणात्मा जगद्धाता देव पूजित हो जाता है।
श्लोक 80 (skanda.5.297.80)
उपवासी नरो भूत्वा यस्तु कुर्यात्प्रदक्षिणम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा ॥
upavāsī naro bhūtvā yastu kuryātpradakṣiṇam | mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā ||
उपवासी होकर जो मनुष्य प्रदक्षिणा करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई विचार-वितर्क नहीं करना चाहिए।
श्लोक 81 (skanda.5.297.81)
तत्र तीर्थे तु ये वृक्षास्तान्पश्यन्त्यपि ये नराः । तेऽपि पापैः प्रमुच्यन्ते भ्रूणहत्यासमैरपि ॥
tatra tīrthe tu ye vṛkṣāstānpaśyantyapi ye narāḥ | te'pi pāpaiḥ pramucyante bhrūṇahatyāsamairapi ||
उस तीर्थ में जो वृक्ष हैं, उन्हें भी जो मनुष्य केवल देख लेते हैं, वे भी भ्रूणहत्या के समान पापों से भी मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 82 (skanda.5.297.82)
प्रातरुत्थाय ये केचित्पश्यन्ति बलकेशवौ । तेन ते सदृशाः स्युर्वै देवदेवेन चक्रिणा ॥
prātarutthāya ye kecitpaśyanti balakeśavau | tena te sadṛśāḥ syurvai devadevena cakriṇā ||
प्रातःकाल उठकर जो कोई बल और केशव का दर्शन करता है, वह उस चक्रधारी देवदेव के समान ही हो जाता है।
श्लोक 83 (skanda.5.297.83)
ते पूज्यास्ते नमस्कार्यास्तेषां जन्म सुजीवितम् । ये नमन्ति जगन्नाथं देवं नारायणं हरिम् ॥
te pūjyāste namaskāryāsteṣāṁ janma sujīvitam | ye namanti jagannāthaṁ devaṁ nārāyaṇaṁ harim ||
जो लोग जगन्नाथ, देव नारायण हरि को नमन करते हैं, वे पूजनीय हैं, वे वन्दनीय हैं, और उनका जन्म सुजीवन है।
श्लोक 84 (skanda.5.297.84)
तत्र तीर्थे तु यद्दानं स्नानं देवार्चनं नृप । तत्सर्वमक्षयं तस्य इत्येवं शङ्करोऽब्रवीत् ॥
tatra tīrthe tu yaddānaṁ snānaṁ devārcanaṁ nṛpa | tatsarvamakṣayaṁ tasya ityevaṁ śaṅkaro'bravīt ||
हे राजन्! उस तीर्थ में जो दान, स्नान और देव-पूजा की जाती है, वह सब उसके लिए अक्षय हो जाती है — ऐसा स्वयं शंकर ने कहा है।
श्लोक 85 (skanda.5.297.85)
प्रविश्याग्नौ मृतानां च यत्फलं समुदाहृतम् । तच्छृणुष्व नृपश्रेष्ठ प्रोच्यमानमशेषतः ॥
praviśyāgnau mṛtānāṁ ca yatphalaṁ samudāhṛtam | tacchṛṇuṣva nṛpaśreṣṭha procyamānamaśeṣataḥ ||
अग्नि में प्रवेश करके मरने वालों का जो फल कहा गया है, हे नृपश्रेष्ठ! उसे मैं सम्पूर्ण रूप से कह रहा हूँ, सुनिए।
श्लोक 86 (skanda.5.297.86)
विमानेनार्कवर्णेन किंकिणीजालमालिना । आग्नेये भवते तत्र मोदते कालमीप्सितम् ॥
vimānenārkavarṇena kiṁkiṇījālamālinā | āgneye bhavate tatra modate kālamīpsitam ||
सूर्य के समान कान्तिवाले, घण्टियों की मालाओं से सुसज्जित विमान से (वह) अग्नि-लोक में जाकर वांछित काल तक आनन्द भोगता है।
श्लोक 87 (skanda.5.297.87)
जले चैवा मृतानां तु योधनीपुरमध्यतः । वसन्ति वारुणे लोके यावदाभूतसम्प्लवम् ॥
jale caivā mṛtānāṁ tu yodhanīpuramadhyataḥ | vasanti vāruṇe loke yāvadābhūtasamplavam ||
और योधनीपुर के मध्य में जल में मरने वालों का निवास वरुणलोक में प्रलयकाल तक होता है।
श्लोक 88 (skanda.5.297.88)
अनाशके मृतानां तु तत्र तीर्थे नराधिप । अनिवर्तिका गतिर्नृणां नात्र कार्या विचारणा ॥
anāśake mṛtānāṁ tu tatra tīrthe narādhipa | anivartikā gatirnṛṇāṁ nātra kāryā vicāraṇā ||
हे नराधिप! उस तीर्थ में अनशन (उपवास) से मरने वालों की गति फिर लौटने वाली नहीं होती, इसमें सन्देह न करें।
श्लोक 89 (skanda.5.297.89)
तत्र तीर्थे तु यो दद्यात्कपिलादानमुत्तमम् । विधानेन तु संयुक्तं शृणु तस्यापि यत्फलम् ॥
tatra tīrthe tu yo dadyātkapilādānamuttamam | vidhānena tu saṁyuktaṁ śṛṇu tasyāpi yatphalam ||
उस तीर्थ में जो विधिपूर्वक उत्तम कपिला गौ का दान करता है, उसका फल भी सुनिए।
श्लोक 90 (skanda.5.297.90)
यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतेश्च भारत । तावन्ति दिवि मोदन्ते सर्वकामैः सुपूजिताः ॥
yāvanti tasyā romāṇi tatprasūteśca bhārata | tāvanti divi modante sarvakāmaiḥ supūjitāḥ ||
हे भारत! उस गाय के तथा उसकी सन्तति के जितने रोम होते हैं, उतने ही वर्षों तक वह स्वर्ग में सब कामनाओं से सम्मानित होकर आनन्द भोगता है।
श्लोक 91 (skanda.5.297.91)
यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वास्तावन्ति वर्षाणि महीयते सः । स्वर्गाच्च्युतश्चापि ततस्त्रिलोक्यां कुले समुत्पत्स्यति गोमतां सः ॥
yāvanti romāṇi bhavanti dhenvāstāvanti varṣāṇi mahīyate saḥ | svargāccyutaścāpi tatastrilokyāṁ kule samutpatsyati gomatāṁ saḥ ||
गाय के जितने रोम होते हैं, उतने ही वर्षों तक वह महिमामय होकर रहता है। स्वर्ग से च्युत होने पर भी वह इस त्रिलोक में गोधन-सम्पन्न कुल में जन्म लेता है।
श्लोक 92 (skanda.5.297.92)
तत्र तीर्थे तु यो दद्याद्रूप्यं काञ्चनमेव वा । काञ्चनेन विमानेन विष्णुलोके महीयते ॥
tatra tīrthe tu yo dadyādrūpyaṁ kāñcanameva vā | kāñcanena vimānena viṣṇuloke mahīyate ||
उस तीर्थ में जो चाँदी या सोना दान करता है, वह स्वर्णिम विमान से विष्णुलोक में महिमान्वित होता है।
श्लोक 93 (skanda.5.297.93)
तस्मिंस्तीर्थे तु यो दद्यात्पादुके वस्त्रमेव च । दानस्यास्य प्रभावेन लभते स्वर्गमीप्सितम् ॥
tasmiṁstīrthe tu yo dadyātpāduke vastrameva ca | dānasyāsya prabhāvena labhate svargamīpsitam ||
उस तीर्थ में जो खड़ाऊँ और वस्त्र का दान करता है, उस दान के प्रभाव से वह अभीष्ट स्वर्ग को प्राप्त करता है।
श्लोक 94 (skanda.5.297.94)
ऋग्यजुःसामवेदानां पठनाद्यत्फलं भवेत् । तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र गायत्र्या तत्फलं लभेत् ॥
ṛgyajuḥsāmavedānāṁ paṭhanādyatphalaṁ bhavet | tatra tīrthe tu rājendra gāyatryā tatphalaṁ labhet ||
हे राजेन्द्र! ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के पठन से जो फल प्राप्त होता है, उस तीर्थ में केवल गायत्री जप से वही फल प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 95 (skanda.5.297.95)
प्रयागे यद्भवेत्पुण्यं गयायां च त्रिपुष्करे । कुरुक्षेत्रे तु राजेन्द्र राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥
prayāge yadbhavetpuṇyaṁ gayāyāṁ ca tripuṣkare | kurukṣetre tu rājendra rāhugraste divākare ||
हे राजेन्द्र! प्रयाग में, गया में, त्रिपुष्कर में तथा राहु द्वारा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में जो पुण्य प्राप्त होता है —
श्लोक 96 (skanda.5.297.96)
सोमेश्वरे च यत्पुण्यं सोमस्य ग्रहणे तथा । तत्फलं लभते तत्र स्नानमात्रान्न संशयः ॥
someśvare ca yatpuṇyaṁ somasya grahaṇe tathā | tatphalaṁ labhate tatra snānamātrānna saṁśayaḥ ||
और सोमेश्वर में चन्द्रग्रहण के समय जो पुण्य प्राप्त होता है, वही फल यहाँ केवल स्नान करने मात्र से मिल जाता है, इसमें सन्देह नहीं है।
श्लोक 97 (skanda.5.297.97)
द्वादश्यां तु नरः स्नात्वा नमस्कृत्य जनार्दनम् । उद्धृताः पितरस्तेन अवाप्तं जन्मनः फलम् ॥
dvādaśyāṁ tu naraḥ snātvā namaskṛtya janārdanam | uddhṛtāḥ pitarastena avāptaṁ janmanaḥ phalam ||
द्वादशी को स्नान करके और जनार्दन को नमस्कार करके, मनुष्य द्वारा उसके पितर उद्धृत हो जाते हैं और उसे जन्म का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 98 (skanda.5.297.98)
संक्रान्तौ च व्यतीपाते द्वादश्यां च विशेषतः । ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता ॥
saṁkrāntau ca vyatīpāte dvādaśyāṁ ca viśeṣataḥ | brāhmaṇaṁ bhojayedekaṁ koṭirbhavati bhojitā ||
संक्रान्ति में, व्यतीपात में और विशेष रूप से द्वादशी को यदि एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाए, तो मानो करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराया गया समझा जाता है।
श्लोक 99 (skanda.5.297.99)
पृथिव्यां यानि तीर्थानि ह्यासमुद्राणि पाण्डव । तानि सर्वाणि तत्रैव द्वादश्यां पाण्डुनन्दन ॥
pṛthivyāṁ yāni tīrthāni hyāsamudrāṇi pāṇḍava | tāni sarvāṇi tatraiva dvādaśyāṁ pāṇḍunandana ||
हे पाण्डव! हे पाण्डुनन्दन! पृथ्वी पर समुद्रपर्यन्त जितने भी तीर्थ हैं, वे सब द्वादशी के दिन वहीं (इस तीर्थ में) विद्यमान हो जाते हैं।
श्लोक 100 (skanda.5.297.100)
क्षयं यान्ति च दानानि यज्ञहोमबलिक्रियाः । न क्षीयते महाराज तत्र तीर्थे तु यत्कृतम् ॥
kṣayaṁ yānti ca dānāni yajñahomabalikriyāḥ | na kṣīyate mahārāja tatra tīrthe tu yatkṛtam ||
(अन्यत्र किए गए) दान, यज्ञ, हवन और बलि-कर्म भी क्षीण हो जाते हैं, परन्तु हे महाराज! उस तीर्थ में जो कुछ किया जाता है, वह कभी क्षीण नहीं होता।
श्लोक 101 (skanda.5.297.101)
यद्भूतं यद्भविष्यच्च तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् । कथितं ते मया सर्वं पृथग्भावेन भारत ॥
yadbhūtaṁ yadbhaviṣyacca tīrthamāhātmyamuttamam | kathitaṁ te mayā sarvaṁ pṛthagbhāvena bhārata ||
हे भारत! इस तीर्थ की जो भी महिमा भूतकाल में हुई और भविष्य में होगी, वह सब मैंने तुम्हें पृथक्-पृथक् रूप से बता दिया है।