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अवन्ती खण्ड · अध्याय 296

तापेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 295अध्याय-सूचीअध्याय 297

श्लोक 1 (skanda.5.296.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल तापेश्वरमनुत्तमम् । यत्र सा हरिणी सिद्धा व्याधभीता नरेश्वर ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla tāpeśvaramanuttamam | yatra sā hariṇī siddhā vyādhabhītā nareśvara ||

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे महीपाल! उसके बाद उस सर्वोत्तम तापेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए। हे नरेश्वर! जहाँ व्याध से भयभीत वह हरिणी सिद्ध हुई थी।

श्लोक 2 (skanda.5.296.2)

जले प्रक्षिप्य गात्राणि ह्यन्तरिक्षं गता तु सा । व्याधो विस्मितचित्तस्तु तां मृगीमवलोक्य च ॥

jale prakṣipya gātrāṇi hyantarikṣaṁ gatā tu sā | vyādho vismitacittastu tāṁ mṛgīmavalokya ca ||

अपने अंगों को जल में डालकर वह हरिणी आकाश को चली गई; उस मृगी को देखकर व्याध का चित्त विस्मय से भर गया।

श्लोक 3 (skanda.5.296.3)

विमुच्य सशरं चापं प्रारेभे तप उत्तमम् । दिव्यं वर्षसहस्रं तु व्याधेनाचरितं तपः ॥

vimucya saśaraṁ cāpaṁ prārebhe tapa uttamam | divyaṁ varṣasahasraṁ tu vyādhenācaritaṁ tapaḥ ||

अपने बाण-सहित धनुष को त्याग कर उसने उत्तम तप प्रारम्भ कर दिया; उस व्याध ने एक दिव्य सहस्र वर्ष तक तप का आचरण किया।

श्लोक 4 (skanda.5.296.4)

अतीते तु ततः काले परितुष्टो महेश्वरः । वरं ब्रूहि महाव्याध यत्ते मनसि रोचते ॥

atīte tu tataḥ kāle parituṣṭo maheśvaraḥ | varaṁ brūhi mahāvyādha yatte manasi rocate ||

उतना समय बीत जाने पर महेश्वर प्रसन्न हुए (और बोले) — "हे महाव्याध! जो तुम्हारे मन को भाए, वह वर माँगो।"

श्लोक 5 (skanda.5.296.5)

व्याध उवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम । तव पार्श्वे महादेव वासो मे प्रतिदीयताम् ॥

vyādha uvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa yadi deyo varo mama | tava pārśve mahādeva vāso me pratidīyatām ||

व्याध बोला — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना ही है, तो हे महादेव! मुझे अपने पास निवास प्रदान कीजिए।

श्लोक 6 (skanda.5.296.6)

ईश्वर उवाच। एवं भवतु ते व्याध यस्त्वया काङ्क्षितो वरः । दैवदेवो महादेव इत्युक्त्वान्तरधीयत । गते चादर्शनं देवे स्थापयित्वा महेश्वरम् ॥

īśvara uvāca| evaṁ bhavatu te vyādha yastvayā kāṅkṣito varaḥ | daivadevo mahādeva ityuktvāntaradhīyata | gate cādarśanaṁ deve sthāpayitvā maheśvaram ||

ईश्वर बोले — "हे व्याध! तुमने जो वर चाहा है, वैसा ही हो।" यह कहकर देवों के देव महादेव अन्तर्ध्यान हो गए। देव के अदृश्य हो जाने पर उसने (व्याध ने) महेश्वर की मूर्ति वहाँ स्थापित की।

श्लोक 7 (skanda.5.296.7)

पूजयित्वा विधानेन गतो व्याधस्ततो दिवम् । तदाप्रभृति तत्तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥

pūjayitvā vidhānena gato vyādhastato divam | tadāprabhṛti tattīrthaṁ triṣu lokeṣu viśrutam ||

विधिपूर्वक उसकी पूजा करके व्याध फिर स्वर्ग को चला गया; तभी से वह तीर्थ तीनों लोकों में विख्यात हो गया।

श्लोक 8 (skanda.5.296.8)

व्याधानुतापसंजातं तापेश्वरमिति श्रुतम् । तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा सम्पूजयति शङ्करम् ॥

vyādhānutāpasaṁjātaṁ tāpeśvaramiti śrutam | tatra tīrthe tu yaḥ snātvā sampūjayati śaṅkaram ||

व्याध के अनुताप (तप) से उत्पन्न होने के कारण वह "तापेश्वर" नाम से प्रसिद्ध हुआ। उस तीर्थ में स्नान करके जो शंकर की भलीभाँति पूजा करता है,

श्लोक 9 (skanda.5.296.9)

शिवलोकमवाप्नोति मामुवाच महेश्वरः । ये स्नाता नर्मदातोये तीर्थे तापेश्वरे नराः ॥

śivalokamavāpnoti māmuvāca maheśvaraḥ | ye snātā narmadātoye tīrthe tāpeśvare narāḥ ||

वह शिवलोक को प्राप्त होता है — ऐसा स्वयं महेश्वर ने मुझसे कहा है। जो मनुष्य तापेश्वर तीर्थ में नर्मदा के जल में स्नान करते हैं,

श्लोक 10 (skanda.5.296.10)

तापत्रयविमुक्तास्ते नात्र कार्या विचारणा । अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तृतीयायां विशेषतः ॥

tāpatrayavimuktāste nātra kāryā vicāraṇā | aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ tṛtīyāyāṁ viśeṣataḥ ||

वे त्रिविध तापों से मुक्त हो जाते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं है। विशेष रूप से अष्टमी, चतुर्दशी तथा तृतीया के दिन —

श्लोक 11 (skanda.5.296.11)

स्नानं समाचरेन्नित्यं सर्वपातकशान्तये ॥

snānaṁ samācarennityaṁ sarvapātakaśāntaye ||

सब पापों की शान्ति के लिए नित्य स्नान करना चाहिए।

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