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अवन्ती खण्ड · अध्याय 295

नन्दाह्रद तीर्थ की महिमा

अध्याय 294अध्याय-सूचीअध्याय 296

श्लोक 1 (skanda.5.295.1)

मार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महाराज नन्दाह्रदमनुत्तमम् । यत्र सिद्धा महाभागा नन्दा देवी वरप्रदा ॥

mārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahārāja nandāhradamanuttamam | yatra siddhā mahābhāgā nandā devī varapradā ||

मार्कण्डेय बोले — हे महाराज! उसके बाद उस सर्वोत्तम नन्दाह्रद में जाना चाहिए, जहाँ महाभाग्यशालिनी, वरदायिनी देवी नन्दा सिद्ध हुई थीं।

श्लोक 2 (skanda.5.295.2)

महिषासुरे महाकाये पुरा देवभयंकरे । शूलिन्या शूलभिन्नाङ्गे कृते दानवसत्तमे ॥

mahiṣāsure mahākāye purā devabhayaṁkare | śūlinyā śūlabhinnāṅge kṛte dānavasattame ||

पूर्वकाल में देवताओं को भयभीत करने वाले महाकाय महिषासुर के, त्रिशूलधारिणी देवी द्वारा त्रिशूल से अंग भिन्न किए जाने पर —

श्लोक 3 (skanda.5.295.3)

येनैकादशरुद्राश्च ह्यादित्याः समरुद्गणाः । वसवो वायुना सार्द्धं चन्द्रादित्यौ सुरेश्वर ॥

yenaikādaśarudrāśca hyādityāḥ samarudgaṇāḥ | vasavo vāyunā sārddhaṁ candrādityau sureśvara ||

हे सुरेश्वर! जिस (महिषासुर) ने ग्यारह रुद्रों को, आदित्यों को मरुद्गणों सहित, वायु के साथ वसुओं को, तथा चन्द्रमा और सूर्य को —

श्लोक 4 (skanda.5.295.4)

बलिना निर्जिता येन ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । सङ्ग्रामे सुमहाघोरे कृते देवभयंकरे ॥

balinā nirjitā yena brahmaviṣṇumaheśvarāḥ | saṅgrāme sumahāghore kṛte devabhayaṁkare ||

अत्यन्त घोर, देवताओं को भयभीत करने वाले संग्राम में उस बलवान् (महिषासुर) ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर तक को भी पराजित कर दिया था —

श्लोक 5 (skanda.5.295.5)

कृत्वा तत्कदनं घोरं नन्दा देवी सुरेश्वरी । यस्मात्स्नाता विशालाक्षी तेन नन्दाह्रदः स्मृतः ॥

kṛtvā tatkadanaṁ ghoraṁ nandā devī sureśvarī | yasmātsnātā viśālākṣī tena nandāhradaḥ smṛtaḥ ||

उसका वह घोर संहार करके देवताओं की स्वामिनी, विशाल नेत्रों वाली देवी नन्दा ने जहाँ स्नान किया, इसीलिए वह ह्रद "नन्दाह्रद" कहलाया।

श्लोक 6 (skanda.5.295.6)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा नन्दामुद्दिश्य भारत । ददाति दानं विप्रेभ्यः सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā nandāmuddiśya bhārata | dadāti dānaṁ viprebhyaḥ so'śvamedhaphalaṁ labhet ||

हे भारत! उस तीर्थ में स्नान करके जो नन्दा देवी के उद्देश्य से ब्राह्मणों को दान देता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (skanda.5.295.7)

भैरवं चैव केदारं तथा रुद्रं महालयम् । नन्दाह्रदश्चतुर्थः स्यात्पञ्चमं भुवि दुर्लभम् ॥

bhairavaṁ caiva kedāraṁ tathā rudraṁ mahālayam | nandāhradaścaturthaḥ syātpañcamaṁ bhuvi durlabham ||

भैरव, केदार तथा रुद्र महालय — ये तीन तीर्थ हैं; नन्दाह्रद इनमें चौथा है; पाँचवाँ ऐसा (तीर्थ) पृथ्वी पर दुर्लभ ही है।

श्लोक 8 (skanda.5.295.8)

बहवस्तं न जानन्ति कामरागसमन्विताः । नर्मदाया ह्रदं पुण्यं सर्वपातकनाशनम् ॥

bahavastaṁ na jānanti kāmarāgasamanvitāḥ | narmadāyā hradaṁ puṇyaṁ sarvapātakanāśanam ||

काम और राग से युक्त बहुत से लोग नर्मदा के इस पुण्य, सर्वपाप-विनाशक ह्रद को नहीं जानते।

श्लोक 9 (skanda.5.295.9)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा नन्दां देवीं प्रपूजयेत् । किं तस्य हिमवन्मध्यगमनेन प्रयोजनम् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā nandāṁ devīṁ prapūjayet | kiṁ tasya himavanmadhyagamanena prayojanam ||

उस तीर्थ में स्नान करके जो नन्दा देवी की पूजा करता है, उसे हिमालय के मध्य में जाने का क्या प्रयोजन रह जाता है?

श्लोक 10 (skanda.5.295.10)

परमार्थमविज्ञाय पर्यटन्ति तमोवृताः । तेषां समागमे पार्थ श्रम एव हि केवलम् ॥

paramārthamavijñāya paryaṭanti tamovṛtāḥ | teṣāṁ samāgame pārtha śrama eva hi kevalam ||

परमार्थ को न जानकर अज्ञान से आवृत लोग इधर-उधर भटकते फिरते हैं; हे पार्थ! उनके उस भटकने में केवल परिश्रम ही है, और कुछ नहीं।

श्लोक 11 (skanda.5.295.11)

पृथिव्यां सागरान्तायां स्नानदानेन यत्फलम् । तत्फलं समवाप्नोति स्नात्वा नन्दाह्रदे नृप ॥

pṛthivyāṁ sāgarāntāyāṁ snānadānena yatphalam | tatphalaṁ samavāpnoti snātvā nandāhrade nṛpa ||

हे राजन्! समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी पर स्नान और दान से जो फल प्राप्त होता है, नन्दाह्रद में स्नान करके वही फल प्राप्त हो जाता है।

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