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अवन्ती खण्ड · अध्याय 294

सोमतीर्थ की महिमा

अध्याय 293अध्याय-सूचीअध्याय 295

श्लोक 1 (skanda.5.294.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महाराज सोमतीर्थमनुत्तमम् । यत्र सोमस्तपस्तप्त्वा नक्षत्रपथमास्थितः ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahārāja somatīrthamanuttamam | yatra somastapastaptvā nakṣatrapathamāsthitaḥ ||

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे महाराज! उसके बाद उस सर्वोत्तम सोमतीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ तप करके सोम (चन्द्रमा) नक्षत्र-पथ में प्रतिष्ठित हुआ था।

श्लोक 2 (skanda.5.294.2)

तत्र तीर्थे तु यः स्नायादाचम्य विधिपूर्वकम् । कृतजाप्यो रविं ध्यायेत्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snāyādācamya vidhipūrvakam | kṛtajāpyo raviṁ dhyāyettasya puṇyaphalaṁ śṛṇu ||

वहाँ जो विधिपूर्वक आचमन करके स्नान करे और जप करके सूर्य का ध्यान करे, उसके पुण्यफल को सुनो।

श्लोक 3 (skanda.5.294.3)

ऋग्वेदयजुर्वेदाभ्यां सामवेदेन भारत । जपतो यत्फलं प्रोक्तं गायत्र्या चात्र तत्फलम् ॥

ṛgvedayajurvedābhyāṁ sāmavedena bhārata | japato yatphalaṁ proktaṁ gāyatryā cātra tatphalam ||

हे भारत! ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के जप से जो फल कहा गया है, वही फल यहाँ केवल गायत्री के जप से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.5.294.4)

तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या ब्राह्मणान् भोजयेच्छुचिः । तेन सम्यग्विधानेन कोटिर्भवति भोजिता ॥

tatra tīrthe tu yo bhaktyā brāhmaṇān bhojayecchuciḥ | tena samyagvidhānena koṭirbhavati bhojitā ||

वहाँ जो पवित्र होकर भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसके द्वारा विधिपूर्वक किए गए उस कार्य से मानो करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराया गया समझा जाता है।

श्लोक 5 (skanda.5.294.5)

पादुकोपानहौ छत्रं वस्त्रकम्बलवाजिनः । यो दत्ते विप्रमुख्याय तस्य तत्कोटिसंमितम् ॥

pādukopānahau chatraṁ vastrakambalavājinaḥ | yo datte vipramukhyāya tasya tatkoṭisaṁmitam ||

जो व्यक्ति खड़ाऊँ, जूते, छत्र, वस्त्र, कम्बल अथवा घोड़ा किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को देता है, उसका वह दान करोड़ गुना फलदायी होता है।

श्लोक 6 (skanda.5.294.6)

सहस्रं तु सहस्राणामनृचां यस्तु भोजयेत् । एकस्य मन्त्रयुक्तस्य कलां नार्हति षोडशीम् ॥

sahasraṁ tu sahasrāṇāmanṛcāṁ yastu bhojayet | ekasya mantrayuktasya kalāṁ nārhati ṣoḍaśīm ||

जो व्यक्ति वेदमन्त्रों से रहित हज़ारों-हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराए, वह भी वेदमन्त्रयुक्त एक ब्राह्मण को भोजन कराने की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं होता।

श्लोक 7 (skanda.5.294.7)

एवं तु भोजयेत्तत्र बह्वृचं वेदपारगम् । शाखान्तर्गमथाध्वर्युं छन्दोगं वा समाप्तिगम् ॥

evaṁ tu bhojayettatra bahvṛcaṁ vedapāragam | śākhāntargamathādhvaryuṁ chandogaṁ vā samāptigam ||

इसी प्रकार वहाँ ऋग्वेद के पारगामी बह्वृच को, शाखा में पूर्ण अध्वर्यु को, अथवा वेद-समाप्ति को प्राप्त छन्दोग को भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 8 (skanda.5.294.8)

अग्निहोत्रसहस्रस्य यत्फलं प्राप्यते बुधैः । समं तद्वेदविदुषा तीर्थे सोमस्य तत्फलम् ॥

agnihotrasahasrasya yatphalaṁ prāpyate budhaiḥ | samaṁ tadvedaviduṣā tīrthe somasya tatphalam ||

विद्वानों द्वारा हज़ार अग्निहोत्रों से जो फल प्राप्त होता है, उतना ही फल सोमतीर्थ में वेदवेत्ता को भोजन कराने से प्राप्त होता है।

श्लोक 9 (skanda.5.294.9)

भोजयेद्यः शतं तेषां सहस्रं लभते नरः । एकस्य योगयुक्तस्य तत्फलं कवयो विदुः ॥

bhojayedyaḥ śataṁ teṣāṁ sahasraṁ labhate naraḥ | ekasya yogayuktasya tatphalaṁ kavayo viduḥ ||

जो सौ (वेदवेत्ताओं) को भोजन कराता है, वह मनुष्य सहस्र गुना फल पाता है; परन्तु एक योगयुक्त ब्राह्मण को भोजन कराने का फल तो कवि (ज्ञानीजन) ही जानते हैं।

श्लोक 10 (skanda.5.294.10)

संनिरुध्येन्द्रियग्रामं यत्रयत्र वसेन्मुनिः । तत्रतत्र कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च ॥

saṁnirudhyendriyagrāmaṁ yatrayatra vasenmuniḥ | tatratatra kurukṣetraṁ naimiṣaṁ puṣkarāṇi ca ||

इन्द्रियों के समूह को वश में करके मुनि जहाँ-जहाँ निवास करता है, वहीं-वहीं कुरुक्षेत्र, नैमिष और पुष्कर तीर्थ विद्यमान हो जाते हैं।

श्लोक 11 (skanda.5.294.11)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः । संक्रान्तौ च व्यतीपाते योगी भोज्यो विशेषतः ॥

tasmātsarvaprayatnena grahaṇe candrasūryayoḥ | saṁkrāntau ca vyatīpāte yogī bhojyo viśeṣataḥ ||

इसलिए चन्द्र-सूर्यग्रहण के समय, संक्रान्ति में और व्यतीपात के अवसर पर सम्पूर्ण प्रयत्न से किसी योगी को विशेष रूप से भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 12 (skanda.5.294.12)

संन्यासं कुरुते यस्तु तत्र तीर्थे युधिष्ठिर । विमानेन महाभागाः स याति त्रिदिवं नरः ॥

saṁnyāsaṁ kurute yastu tatra tīrthe yudhiṣṭhira | vimānena mahābhāgāḥ sa yāti tridivaṁ naraḥ ||

हे युधिष्ठिर! उस तीर्थ में जो संन्यास (देहत्याग) करता है, वह महाभाग्यशाली मनुष्य विमान द्वारा स्वर्ग को जाता है।

श्लोक 13 (skanda.5.294.13)

सोमस्यानुचरो भूत्वा तेनैव सह मोदते ॥

somasyānucaro bhūtvā tenaiva saha modate ||

और सोम का अनुचर बनकर वह उसी के साथ आनन्द का अनुभव करता है।

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