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अवन्ती खण्ड · अध्याय 293

शक्रतीर्थ की महिमा

अध्याय 292अध्याय-सूचीअध्याय 294

श्लोक 1 (skanda.5.293.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेत्पाण्डुपुत्र शक्रतीर्थमनुत्तमम् । यत्र सिद्धो महाभागो देवराजः शतक्रतुः ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchetpāṇḍuputra śakratīrthamanuttamam | yatra siddho mahābhāgo devarājaḥ śatakratuḥ ||

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे पाण्डुपुत्र! उसके बाद उस सर्वोत्तम शक्रतीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ महाभाग्यशाली देवराज शतक्रतु (इन्द्र) सिद्ध हुए थे।

श्लोक 2 (skanda.5.293.2)

गौतमेन पुरा शप्तं ज्ञात्वा देवाः सुरेश्वरम् । ब्रह्माद्या देवताः सर्व ऋषयश्च तपोधनाः ॥

gautamena purā śaptaṁ jñātvā devāḥ sureśvaram | brahmādyā devatāḥ sarva ṛṣayaśca tapodhanāḥ ||

पूर्वकाल में गौतम ऋषि द्वारा देवराज (इन्द्र) को शापित हुआ जानकर ब्रह्मा आदि सभी देवता और तपोधन ऋषिगण —

श्लोक 3 (skanda.5.293.3)

गौतमं प्रार्थयामासुर्वाक्यैः सानुनयैः शुभैः । गतराज्यं गतश्रीकं शक्रं प्रति मुनीश्वर ॥

gautamaṁ prārthayāmāsurvākyaiḥ sānunayaiḥ śubhaiḥ | gatarājyaṁ gataśrīkaṁ śakraṁ prati munīśvara ||

हे मुनीश्वर! उन्होंने शुभ एवं विनययुक्त वचनों से गौतम से प्रार्थना की, क्योंकि शक्र (इन्द्र) उस समय राज्य और श्री दोनों से वंचित हो गया था।

श्लोक 4 (skanda.5.293.4)

इन्द्रेन रहितं राज्यं न कश्चित्कामयेद्द्विज । देवो वा मानवो वापि एतत्ते विदितं प्रभो ॥

indrena rahitaṁ rājyaṁ na kaścitkāmayeddvija | devo vā mānavo vāpi etatte viditaṁ prabho ||

हे द्विज! इन्द्र से रहित राज्य की कामना न कोई देव करता है और न कोई मनुष्य; हे प्रभो! यह बात आप स्वयं जानते हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.293.5)

तस्य त्वं भगयुक्तस्य दयां कुरु द्विजोत्तम । गतश्चादर्शनं शक्रो दूषितः स्वेन पाप्मना ॥

tasya tvaṁ bhagayuktasya dayāṁ kuru dvijottama | gataścādarśanaṁ śakro dūṣitaḥ svena pāpmanā ||

हे द्विजोत्तम! अपने ही पाप से दूषित होकर शक्र अदृश्य हो गया है; अतः उस भगयुक्त इन्द्र पर आप दया कीजिए।

श्लोक 6 (skanda.5.293.6)

देवानां वचनं श्रुत्वा गौतमो वेदवित्तमः । तथेति कृत्वा शक्रस्य वरं दातुं प्रचक्रमे ॥

devānāṁ vacanaṁ śrutvā gautamo vedavittamaḥ | tatheti kṛtvā śakrasya varaṁ dātuṁ pracakrame ||

देवताओं का यह वचन सुनकर वेदज्ञों में श्रेष्ठ गौतम ने "ऐसा ही हो" कहकर शक्र को वर देना आरम्भ किया।

श्लोक 7 (skanda.5.293.7)

एतद्भगसहस्रं तु पुरा जातं शतक्रतो । तल्लोचनसहस्रं तु मत्प्रसादाद्भविष्यति ॥

etadbhagasahasraṁ tu purā jātaṁ śatakrato | tallocanasahasraṁ tu matprasādādbhaviṣyati ||

"हे शतक्रतु! पहले तुम्हारे शरीर पर उत्पन्न हुए ये हज़ार भग-चिह्न मेरी कृपा से अब हज़ार नेत्रों में बदल जाएँगे।"

श्लोक 8 (skanda.5.293.8)

एवमुक्तः सहस्राक्षः प्रणम्य मुनिसत्तमम् । ब्राह्मणांस्तान्महाभागान्नर्मदां प्रत्यगात्ततः ॥

evamuktaḥ sahasrākṣaḥ praṇamya munisattamam | brāhmaṇāṁstānmahābhāgānnarmadāṁ pratyagāttataḥ ||

ऐसा कहे जाने पर सहस्राक्ष (इन्द्र) उस श्रेष्ठ मुनि तथा उन महाभाग्यशाली ब्राह्मणों को प्रणाम करके नर्मदा की ओर चल पड़ा।

श्लोक 9 (skanda.5.293.9)

स्नात्वा स विमले तोये संस्थाप्य त्रिपुरान्तकम् । जगाम त्रिदशावासं पूज्यमानोऽप्सरोगणैः ॥

snātvā sa vimale toye saṁsthāpya tripurāntakam | jagāma tridaśāvāsaṁ pūjyamāno'psarogaṇaiḥ ||

उस निर्मल जल में स्नान करके और त्रिपुरान्तक शिव को स्थापित कर वह अप्सराओं के समूहों से पूजित होता हुआ देवलोक को गया।

श्लोक 10 (skanda.5.293.10)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् । परदाराभिगमनान्मुच्यते पातकान्नरः ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetparameśvaram | paradārābhigamanānmucyate pātakānnaraḥ ||

उस तीर्थ में स्नान करके जो परमेश्वर की पूजा करता है, वह मनुष्य परायी स्त्री के गमन जैसे पाप से भी मुक्त हो जाता है।

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