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अवन्ती खण्ड · अध्याय 292

कर्कटेश्वर तीर्थ की महिमा

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श्लोक 1 (skanda.5.292.1)

मार्कण्डेय उवाच। धर्मपुत्र ततो गच्छेत्कर्कटेश्वरमुत्तमम् । उत्तरे नर्मदाकूले सर्वपापक्षयंकरम् ॥

mārkaṇḍeya uvāca| dharmaputra tato gacchetkarkaṭeśvaramuttamam | uttare narmadākūle sarvapāpakṣayaṁkaram ||

मार्कण्डेय बोले — हे धर्मपुत्र! उसके बाद नर्मदा के उत्तर तट पर स्थित, सब पापों का नाश करने वाले, परम उत्तम कर्कटेश्वर तीर्थ में जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.5.292.2)

तत्र स्नात्वा विधानेन यस्तु पूजयते शिवम् । अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम् ॥

tatra snātvā vidhānena yastu pūjayate śivam | anivartikā gatistasya rudralokādasaṁśayam ||

वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके जो शिव की पूजा करता है, निःसन्देह उसे रुद्रलोक से फिर लौटना नहीं पड़ता।

श्लोक 3 (skanda.5.292.3)

तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं पुराणे यच्छ्रुतं मया । न तद्वर्णयितुं शक्यं संक्षेपेण वदाम्यतः ॥

tasya tīrthasya māhātmyaṁ purāṇe yacchrutaṁ mayā | na tadvarṇayituṁ śakyaṁ saṁkṣepeṇa vadāmyataḥ ||

उस तीर्थ की जो महिमा मैंने पुराण में सुनी है, उसका पूरा वर्णन करना सम्भव नहीं है; इसलिए मैं उसे संक्षेप में कहता हूँ।

श्लोक 4 (skanda.5.292.4)

तत्र तीर्थे तु यः कुर्यात्किंचित्कर्म शुभाशुभम् । हर्षान्मदान्महाराज तत्सर्वं जायतेऽक्षयम् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ kuryātkiṁcitkarma śubhāśubham | harṣānmadānmahārāja tatsarvaṁ jāyate'kṣayam ||

हे महाराज! उस तीर्थ में हर्ष अथवा मद (उन्मत्तता) से भी जो कुछ शुभ या अशुभ कर्म किया जाता है, वह सब अक्षय फल देने वाला हो जाता है।

श्लोक 5 (skanda.5.292.5)

तत्र तीर्थे तपस्तप्त्वा वालखिल्या मरीचयः । रमन्तेऽद्यापि लोकेषु स्वेच्छया कुरुनन्दन ॥

tatra tīrthe tapastaptvā vālakhilyā marīcayaḥ | ramante'dyāpi lokeṣu svecchayā kurunandana ||

हे कुरुनन्दन! उस तीर्थ में तपस्या करके वालखिल्य ऋषिगण और मरीचि आज भी स्वेच्छा से लोकों में विचरण करते हैं।

श्लोक 6 (skanda.5.292.6)

तत्रस्थास्तन्न जानन्ति नराज्ञानबहिष्कृताः । शरीरस्थमिवात्मानमक्षयं ज्योतिरव्ययम् ॥

tatrasthāstanna jānanti narājñānabahiṣkṛtāḥ | śarīrasthamivātmānamakṣayaṁ jyotiravyayam ||

जो मनुष्य अज्ञान के कारण वहाँ से बहिष्कृत हैं, वे उस अक्षय, अव्यय ज्योति को उसी प्रकार नहीं पहचान पाते जैसे शरीर में स्थित आत्मा को नहीं पहचाना जाता।

श्लोक 7 (skanda.5.292.7)

तत्र तीर्थे नृपश्रेष्ठ देवी नारायणी पुरा । अद्यापि तपते घोरं तपो यावत्किलार्बुदम् ॥

tatra tīrthe nṛpaśreṣṭha devī nārāyaṇī purā | adyāpi tapate ghoraṁ tapo yāvatkilārbudam ||

हे नृपश्रेष्ठ! उस तीर्थ में पूर्वकाल में देवी नारायणी ने घोर तप किया था, और कहते हैं कि वह तप आज भी अर्बुद पर्वत तक व्याप्त होकर चल रहा है।

श्लोक 8 (skanda.5.292.8)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत्पितृदेवताः । तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्तिं यान्ति पितामहाः ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā tarpayetpitṛdevatāḥ | tasya te dvādaśābdāni tṛptiṁ yānti pitāmahāḥ ||

उस तीर्थ में स्नान करके जो पितरों और देवताओं का तर्पण करता है, उसके पितामह बारह वर्षों तक तृप्ति को प्राप्त रहते हैं।

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