अवन्ती खण्ड · अध्याय 291
अहल्येश्वर तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.291.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल चाहल्येश्वरमुत्तमम् । यत्र सिद्धा महाभागा त्वहल्या तापसी पुरा ।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla cāhalyeśvaram uttamam| yatra siddhā mahābhāgā tv ahalyā tāpasī purā||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात उत्तम अहल्येश्वर तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ महाभागा अहल्या पूर्वकाल में तपस्विनी होकर सिद्ध हुई थीं।
श्लोक 2 (skanda.5.291.2)
गौतमो ब्राह्मणस्त्वासीत्साक्षाद्ब्रह्मेव चापरः । सत्यधर्मसमायुक्तो वानप्रस्थाश्रमे रतः ।
gautamo brāhmaṇas tv āsīt sākṣād brahmeva cāparaḥ| satyadharmasamāyukto vānaprasthāśrame rataḥ||
गौतम नामक ब्राह्मण थे, जो मानो साक्षात् दूसरे ब्रह्मा के समान थे, सत्य-धर्म से युक्त और वानप्रस्थ आश्रम में रत थे।
श्लोक 3 (skanda.5.291.3)
तस्य पत्नी महाभागा ह्यहल्या नाम विश्रुता । रूपयौवनसम्पन्ना त्रिषु लोकेषु विश्रुता ।
tasya patnī mahābhāgā hy ahalyā nāma viśrutā| rūpayauvanasampannā triṣu lokeṣu viśrutā||
उनकी पत्नी महाभागा अहल्या नाम से विख्यात थीं, जो रूप-यौवन से सम्पन्न होकर तीनों लोकों में प्रसिद्ध थीं।
श्लोक 4 (skanda.5.291.4)
अस्या अप्यतिरूपेण देवराजः शतक्रतुः । मोहितो लोभयामास ह्यहल्यां बलसूदनः ।
asyā apy atirūpeṇa devarājaḥ śatakratuḥ| mohito lobhayāmāsa hy ahalyāṁ balasūdanaḥ||
उसके अत्यंत रूप से मोहित होकर बलासुर के संहारक देवराज शतक्रतु (इन्द्र) ने अहल्या को लुभाने का प्रयत्न किया।
श्लोक 5 (skanda.5.291.5)
मां भजस्व वरारोहे देवराजमनिन्दिते । क्रीडयस्व मया सार्द्धं त्रिषु लोकेषु पूजिता ।
māṁ bhajasva varārohe devarājam anindite| krīḍayasva mayā sārddhaṁ triṣu lokeṣu pūjitā||
'हे वरारोहे! हे अनिन्दिते! मुझ देवराज को स्वीकार करो; मेरे साथ क्रीड़ा करो, तुम तीनों लोकों में पूजित हो जाओगी।'
श्लोक 6 (skanda.5.291.6)
किं करिष्यसि विप्रेण शौचाचारकृशेन तु । तपःस्वाध्यायशीलेन क्लिश्यन्तीव सुलोचने ।
kiṁ kariṣyasi vipreṇa śaucācārakṛśena tu| tapaḥsvādhyāyaśīlena kliśyantīva sulocane||
'हे सुलोचने! शौचाचार से कृश, तपस्या-स्वाध्याय में लीन, मानो सदा क्लेश उठाते इस विप्र से तुम्हें क्या प्राप्त होगा?'
श्लोक 7 (skanda.5.291.7)
एवमुक्ता वरारोहा स्त्रीस्वभावात्सुचञ्चला । मनसाध्याय शक्रं सा कामेन कलुषीकृता ।
evam uktā varārohā strīsvabhāvāt sucañcalā| manasādhyāya śakraṁ sā kāmena kaluṣīkṛtā||
इस प्रकार कहे जाने पर स्त्रीस्वभाव से चंचल वह सुन्दरी मन में शक्र का ध्यान करती हुई काम से कलुषित हो गई।
श्लोक 8 (skanda.5.291.8)
तस्या विदित्वा तं भावं स देवः पाकशासनः । गौतमं वञ्चयामास दुष्टभावेन भावितः ।
tasyā viditvā taṁ bhāvaṁ sa devaḥ pākaśāsanaḥ| gautamaṁ vañcayāmāsa duṣṭabhāvena bhāvitaḥ||
उसका वह भाव जानकर पाकशासन देव (इन्द्र) दुष्ट भाव से युक्त होकर गौतम को छलने लगे।
श्लोक 9 (skanda.5.291.9)
विदित्वा चान्तरं तस्य गृहीत्वा वेषमुत्तमम् । अहल्यां रमयामास विश्वस्तां मन्दिरान्तिके ।
viditvā cāntaraṁ tasya gṛhītvā veṣam uttamam| ahalyāṁ ramayāmāsa viśvastāṁ mandirāntike||
उनका अवसर (अनुपस्थिति) जानकर और उनका ही रूप धारण करके इन्द्र ने विश्वस्त अहल्या के साथ मन्दिर के समीप रमण किया।
श्लोक 10 (skanda.5.291.10)
क्षणमात्रान्तरे तत्र देवराजस्य भारत । आजगाम मुनिश्रेष्ठो मन्दिरं त्वरयान्वितः ।
kṣaṇamātrāntare tatra devarājasya bhārata| ājagāma muniśreṣṭho mandiraṁ tvarayānvitaḥ||
हे भारत! देवराज के उस कृत्य के क्षणमात्र बाद ही मुनिश्रेष्ठ गौतम शीघ्रतापूर्वक मन्दिर में आ पहुँचे।
श्लोक 11 (skanda.5.291.11)
आगतं गौतमं दृष्ट्वा भीतभीतः पुरंदरः । निर्गतः स ततो दृष्ट्वा शक्रोऽयमिति चिन्तयन् ।
āgataṁ gautamaṁ dṛṣṭvā bhītabhītaḥ puraṁdaraḥ| nirgataḥ sa tato dṛṣṭvā śakro 'yam iti cintayan||
गौतम को आते देख अत्यंत भयभीत पुरंदर वहाँ से भाग निकले; उन्हें देखकर गौतम ने सोचा - 'यह तो शक्र है।'
श्लोक 12 (skanda.5.291.12)
ततः शशाप देवेन्द्रं गौतमः क्रोधमूर्छितः । अजितेन्द्रियोऽसि यस्मात्त्वं तस्माद्बहुभगो भव ।
tataḥ śaśāpa devendraṁ gautamaḥ krodhamūrchitaḥ| ajitendriyo 'si yasmāt tvaṁ tasmād bahubhago bhava||
तब क्रोध से मूर्च्छित गौतम ने देवेन्द्र को शाप दिया - 'चूँकि तुम अजितेन्द्रिय हो, अतः तुम बहुभग (सहस्र चिह्नों से युक्त) हो जाओ।'
श्लोक 13 (skanda.5.291.13)
एवमुक्तस्तु देवेन्द्रस्तत्क्षणादेव भारत । भगानां तु सहस्रेण तत्क्षणादेव वेष्टितः ।
evam uktas tu devendras tatkṣaṇād eva bhārata| bhagānāṁ tu sahasreṇa tatkṣaṇād eva veṣṭitaḥ||
हे भारत! इस प्रकार शापित होने पर देवेन्द्र उसी क्षण सहस्र चिह्नों से आच्छादित हो गए।
श्लोक 14 (skanda.5.291.14)
त्यक्त्वा राज्यं सुरैः सार्द्धं गतश्रीको जगाम ह । तपश्चचार विपुलं गौतमेन महीतले ।
tyaktvā rājyaṁ suraiḥ sārddhaṁ gataśrīko jagāma ha| tapaś cacāra vipulaṁ gautamena mahītale||
देवों सहित राज्य त्यागकर, श्रीहीन होकर वे चले गए और गौतम के दिए इस दण्ड से पृथ्वी पर विपुल तपस्या करने लगे।
श्लोक 15 (skanda.5.291.15)
अहल्यापि ततः शप्ता यस्मात्त्वं दुष्टचारिणी । प्रेक्ष्य मां रमसे शक्रं तस्मादश्ममयी भव ।
ahalyāpi tataḥ śaptā yasmāt tvaṁ duṣṭacāriṇī| prekṣya māṁ ramase śakraṁ tasmād aśmamayī bhava||
अहल्या को भी तब शाप दिया गया - 'चूँकि तुमने मुझे पहचानते हुए भी दुष्टतापूर्वक शक्र के साथ रमण किया, इसलिए तुम पाषाणमयी हो जाओ।'
श्लोक 16 (skanda.5.291.16)
गते वर्षसहस्रान्ते रामं दृष्ट्वा यशस्विनम् । तीर्थयात्राप्रसङ्गेन धौतपापा भविष्यसि ।
gate varṣasahasrānte rāmaṁ dṛṣṭvā yaśasvinam| tīrthayātrāprasaṅgena dhautapāpā bhaviṣyasi||
'सहस्र वर्ष बीत जाने पर यशस्वी राम के दर्शन से, तीर्थयात्रा के प्रसंग में, तुम्हारा पाप धुल जाएगा।'
श्लोक 17 (skanda.5.291.17)
एवं गते ततः काले दृष्टा रामेण धीमता । विश्वामित्रसहायेन त्यक्त्वा साश्ममयीं तनुम् ।
evaṁ gate tataḥ kāle dṛṣṭā rāmeṇa dhīmatā| viśvāmitrasahāyena tyaktvā sāśmamayīṁ tanum||
इस प्रकार वह काल बीत जाने पर विश्वामित्र के साथ आए बुद्धिमान राम द्वारा दृष्ट होकर उसने अपना पाषाण शरीर त्याग दिया।
श्लोक 18 (skanda.5.291.18)
पूजयित्वा यथान्यायं गतपापा विमत्सरा । आगता नर्मदातीरे तीर्थे स्नात्वा यथाविधि ।
pūjayitvā yathānyāyaṁ gatapāpā vimatsarā| āgatā narmadātīre tīrthe snātvā yathāvidhi||
यथोचित पूजा करके, पापरहित और मत्सर-रहित होकर वह नर्मदा तट पर आई और विधिपूर्वक तीर्थ में स्नान किया।
श्लोक 19 (skanda.5.291.19)
कृतं चान्द्रायणं मासं कृच्छ्रं चान्यं ततः परम् । ततस्तुष्टो महादेवो दत्त्वा वरमनुत्तमम् ।
kṛtaṁ cāndrāyaṇaṁ māsaṁ kṛcchraṁ cānyaṁ tataḥ param| tatas tuṣṭo mahādevo dattvā varam anuttamam||
उसने एक मास तक चान्द्रायण व्रत और तत्पश्चात अन्य कृच्छ्र व्रत भी किए; तब महादेव संतुष्ट होकर अनुपम वर देने लगे।
श्लोक 20 (skanda.5.291.20)
जगामादर्शनं भूयो रेमे चोमापतिश्चिरम् । अहल्या तु गते देवे स्थापयित्वा जगद्गुरुम् ।
jagāmādarśanaṁ bhūyo reme comāpatiś ciram| ahalyā tu gate deve sthāpayitvā jagadgurum||
उमापति पुनः दीर्घकाल तक कृपा करके अन्तर्धान हो गए। देव के चले जाने पर अहल्या ने जगद्गुरु की स्थापना की।
श्लोक 21 (skanda.5.291.21)
अहल्येश्वरनामानं स्वगृहे चागमत्पुनः । तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् ।
ahalyeśvaranāmānaṁ svagṛhe cāgamat punaḥ| tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram||
अहल्येश्वर नाम से शिवलिंग की स्थापना करके वह पुनः अपने घर लौट गई। उस तीर्थ में जो स्नान कर परमेश्वर की पूजा करता है -
श्लोक 22 (skanda.5.291.22)
स मृतः स्वर्गमाप्नोति यत्र देवो महेश्वरः । क्रीडयित्वा यथाकामं तत्र लोके महातपाः ।
sa mṛtaḥ svargam āpnoti yatra devo maheśvaraḥ| krīḍayitvā yathākāmaṁ tatra loke mahātapāḥ||
-मृत्यु के पश्चात उस स्वर्ग को प्राप्त होता है जहाँ महेश्वर देव विराजते हैं; वह महातपस्वी वहाँ यथेच्छ क्रीड़ा करता है।
श्लोक 23 (skanda.5.291.23)
गते वर्षसहस्रान्ते मानुष्यं लभते पुनः । धनधान्यचयोपेतः पुत्रपौत्रसमन्वितः ।
gate varṣasahasrānte mānuṣyaṁ labhate punaḥ| dhanadhānyacayopetaḥ putrapautrasamanvitaḥ||
सहस्र वर्ष बीत जाने पर वह पुनः मनुष्य जन्म प्राप्त करता है, धन-धान्य के संचय से युक्त और पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न होकर।
श्लोक 24 (skanda.5.291.24)
वेदविद्याश्रयो धीमाञ्जायते विमले कुले । रूपसौभाग्यसम्पन्नः सर्वव्याधिविवर्जितः । जीवेद्वर्षशतं साग्रमहल्यातीर्थसेवनात् ।
vedavidyāśrayo dhīmāñ jāyate vimale kule| rūpasaubhāgyasampannaḥ sarvavyādhivivarjitaḥ| jīved varṣaśataṁ sāgram ahalyātīrthasevanāt||
वेदविद्या का आश्रय लेने वाला बुद्धिमान वह निर्मल कुल में जन्म लेता है, रूप-सौभाग्य से सम्पन्न, समस्त रोगों से रहित होकर अहल्या तीर्थ की सेवा से सौ से अधिक वर्षों तक जीवित रहता है।