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अवन्ती खण्ड · अध्याय 290

सिद्धेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 289अध्याय-सूचीअध्याय 291

श्लोक 1 (skanda.5.290.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। तस्यैवानन्तरं चान्यत्सिद्धेश्वरमनुत्तमम् । तीर्थं सर्वगुणोपेतं सर्वलोकेषु पूजितम् ।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tasyaivānantaraṁ cānyat siddheśvaram anuttamam| tīrthaṁ sarvaguṇopetaṁ sarvalokeṣu pūjitam||

श्री मार्कण्डेय बोले - उसके ठीक निकट एक अन्य अनुपम तीर्थ है - सिद्धेश्वर, जो समस्त गुणों से युक्त और समस्त लोकों में पूजित है।

श्लोक 2 (skanda.5.290.2)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा ह्युमारुद्रं प्रपूजयेत् । वाजपेयस्य यज्ञस्य स लभेत्फलमुत्तमम् ।

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā hy umārudraṁ prapūjayet| vājapeyasya yajñasya sa labhet phalam uttamam||

उस तीर्थ में स्नान कर जो उमा-रुद्र की पूजा करता है, वह वाजपेय यज्ञ का उत्तम फल प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.5.290.3)

तेन पुण्येन महता मृतः स्वर्गमवाप्नुयात् । अप्सरोगणसंवीतो जयशब्दादिमङ्गलैः ।

tena puṇyena mahatā mṛtaḥ svargam avāpnuyāt| apsarogaṇasaṁvīto jayaśabdādimaṅgalaiḥ||

उस महान पुण्य से मृत्यु के पश्चात वह अप्सराओं के समूह से घिरा हुआ, जयजयकार आदि मंगल ध्वनियों के साथ स्वर्ग को प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (skanda.5.290.4)

सहस्रवत्सरांस्तत्र क्रीडयित्वा यथासुखम् । धनधान्यसमोपेते कुले महति जायते ।

sahasravatsarāṁs tatra krīḍayitvā yathāsukham| dhanadhānyasamopete kule mahati jāyate||

वहाँ सहस्र वर्षों तक यथासुख क्रीड़ा करके वह धन-धान्य से सम्पन्न महान कुल में जन्म लेता है।

श्लोक 5 (skanda.5.290.5)

पूज्यमानो नरश्रेष्ठ वेदवेदाङ्गपारगः । व्याधिशोकविनिर्मुक्तो जीवेच्च शरदां शतम् ।

pūjyamāno naraśreṣṭha vedavedāṅgapāragaḥ| vyādhiśokavinirmukto jīvec ca śaradāṁ śatam||

हे नरश्रेष्ठ! पूजित होकर, वेद-वेदांगपारंगत होकर, रोग-शोक से मुक्त होकर वह सौ वर्षों तक जीवित रहता है।

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