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अवन्ती खण्ड · अध्याय 306

श्वेतवाराह तीर्थ की महिमा

अध्याय 305अध्याय-सूचीअध्याय 307

श्लोक 1 (skanda.5.306.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। उत्तरे नर्मदाकूले तीर्थं परमशोभनम् । जयवाराहमाहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| uttare narmadākūle tīrthaṁ paramaśobhanam | jayavārāhamāhātmyaṁ sarvapāpapraṇāśanam ||

श्रीमार्कण्डेय बोले — नर्मदा के उत्तर तट पर एक परम सुन्दर तीर्थ है, जिसकी "जयवाराह" महिमा सब पापों का नाश करने वाली है।

श्लोक 2 (skanda.5.306.2)

उद्धृता जगती येन सर्वदेवनमस्कृता । लोकानुग्रहबुद्ध्या च संस्थितो नर्मदातटे ॥

uddhṛtā jagatī yena sarvadevanamaskṛtā | lokānugrahabuddhyā ca saṁsthito narmadātaṭe ||

जिसने (वाराह रूप में) पृथ्वी का उद्धार किया, जो सब देवताओं द्वारा नमस्कृत है, वह लोकों पर अनुग्रह करने की बुद्धि से नर्मदा के तट पर स्थित हुआ।

श्लोक 3 (skanda.5.306.3)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा वीक्षते मधुसूदनम् । मुच्यते सर्वपापेभ्यो दशजन्मानुकीर्तनात् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā vīkṣate madhusūdanam | mucyate sarvapāpebhyo daśajanmānukīrtanāt ||

उस तीर्थ में स्नान करके जो मधुसूदन का दर्शन करता है, वह उनके दस जन्मों के कीर्तन से सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.5.306.4)

मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नरसिंहोऽथ वामनः । रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्किश्च ते दश ॥

matsyaḥ kūrmo varāhaśca narasiṁho'tha vāmanaḥ | rāmo rāmaśca kṛṣṇaśca buddhaḥ kalkiśca te daśa ||

मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, राम, राम (परशुराम), कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि — ये दस अवतार हैं।

श्लोक 5 (skanda.5.306.5)

युधिष्ठिर उवाच। मत्स्येन किं कृतं तात कूर्मेण मुनिसत्तम । वराहेण च किं कर्म नरसिंहेन किं कृतम् ॥

yudhiṣṭhira uvāca| matsyena kiṁ kṛtaṁ tāta kūrmeṇa munisattama | varāheṇa ca kiṁ karma narasiṁhena kiṁ kṛtam ||

युधिष्ठिर बोले — हे तात! हे मुनिसत्तम! मत्स्य ने क्या किया, कूर्म ने क्या किया? वराह ने कौन-सा कार्य किया, नरसिंह ने क्या किया?

श्लोक 6 (skanda.5.306.6)

वामनेन च रामेण राघवेण च किं कृतम् । बुद्धरूपेण किं वापि कल्किना किं कृतं वद ॥

vāmanena ca rāmeṇa rāghaveṇa ca kiṁ kṛtam | buddharūpeṇa kiṁ vāpi kalkinā kiṁ kṛtaṁ vada ||

वामन ने, राम (परशुराम) ने, राघव (राम) ने क्या किया? बुद्ध के रूप में क्या किया गया, और कल्कि क्या करेंगे — यह बताइए।

श्लोक 7 (skanda.5.306.7)

एवमुक्तस्तु विप्रेन्द्रो धर्मपुत्रेण धीमता । उवाच मधुरां वाणीं तदा धर्मसुतं प्रति ॥

evamuktastu viprendro dharmaputreṇa dhīmatā | uvāca madhurāṁ vāṇīṁ tadā dharmasutaṁ prati ||

बुद्धिमान् धर्मपुत्र (युधिष्ठिर) द्वारा ऐसा पूछे जाने पर उस विप्रेन्द्र ने तब धर्मसुत के प्रति मधुर वाणी में कहा —

श्लोक 8 (skanda.5.306.8)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। मीनो भूत्वा पुरा कल्पे प्रीत्यर्थं ब्रह्मणो विभुः । समर्पयत्समुद्धृत्य वन्दान्मग्नान्महार्णवे ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| mīno bhūtvā purā kalpe prītyarthaṁ brahmaṇo vibhuḥ | samarpayatsamuddhṛtya vandānmagnānmahārṇave ||

श्रीमार्कण्डेय बोले — पूर्वकल्प में विभु ने ब्रह्मा की प्रसन्नता के लिए मत्स्य-रूप धारण किया, और महासागर में डूबे हुए वेदों को उद्धार करके अर्पित किया।

श्लोक 9 (skanda.5.306.9)

अमृतोत्पादने राजन्कूर्मो भूत्वा जगद्गुरुः । मन्दरं धारयामास तथा देवीं वसुंधराम् ॥

amṛtotpādane rājankūrmo bhūtvā jagadguruḥ | mandaraṁ dhārayāmāsa tathā devīṁ vasuṁdharām ||

हे राजन्! अमृत उत्पन्न करने के लिए जगद्गुरु ने कूर्म-रूप धारण करके मन्दराचल को धारण किया, तथा (वराह-रूप में) देवी पृथ्वी को भी धारण किया।

श्लोक 10 (skanda.5.306.10)

उज्जहार धरां मग्नां पातालतलवासिनीम् । वाराहं रूपमास्थाय देवदेवो जनार्दनः ॥

ujjahāra dharāṁ magnāṁ pātālatalavāsinīm | vārāhaṁ rūpamāsthāya devadevo janārdanaḥ ||

देवदेव जनार्दन ने वाराह रूप धारण करके पाताल में डूबी हुई, पाताल-तल-निवासिनी पृथ्वी को ऊपर उठाया।

श्लोक 11 (skanda.5.306.11)

नरस्यार्द्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्द्धतनुं तथा । हिरण्यकशिपोर्वक्षो विददार नखाङ्कुशैः ॥

narasyārddhatanuṁ kṛtvā siṁhasyārddhatanuṁ tathā | hiraṇyakaśiporvakṣo vidadāra nakhāṅkuśaiḥ ||

मनुष्य का आधा शरीर और सिंह का आधा शरीर धारण करके उन्होंने हिरण्यकशिपु के वक्षस्थल को अपने अंकुश-सदृश नखों से चीर डाला।

श्लोक 12 (skanda.5.306.12)

जटी वामनरूपेण स्तूयमानो द्विजोत्तमैः । तद्दिव्यं रूपमास्थाय क्रमित्वा मेदिनीं क्रमैः ॥

jaṭī vāmanarūpeṇa stūyamāno dvijottamaiḥ | taddivyaṁ rūpamāsthāya kramitvā medinīṁ kramaiḥ ||

जटाधारी वामन-रूप में श्रेष्ठ द्विजों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, उस दिव्य रूप को धारण कर उन्होंने अपने पगों से पृथ्वी को नाप लिया।

श्लोक 13 (skanda.5.306.13)

कृतवांश्च बलिं पश्चात्पातालतलवासिनम् । स्थापयित्वा सुरान् सर्वान् गतो विष्णुः स्वकं पुरम् ॥

kṛtavāṁśca baliṁ paścātpātālatalavāsinam | sthāpayitvā surān sarvān gato viṣṇuḥ svakaṁ puram ||

फिर उन्होंने बलि को पाताल-तल का निवासी बना दिया; सब देवताओं को (उनके पदों पर) स्थापित करके विष्णु अपने धाम को गए।

श्लोक 14 (skanda.5.306.14)

जमदग्निसुतो रामो भूत्वा शस्त्रभृतां वरः । क्षत्रियान् पृथिवीपालानवधीद्धैहयादिकान् ॥

jamadagnisuto rāmo bhūtvā śastrabhṛtāṁ varaḥ | kṣatriyān pṛthivīpālānavadhīddhaihayādikān ||

जमदग्नि के पुत्र, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम (परशुराम) बनकर उन्होंने हैहय आदि क्षत्रिय पृथ्वीपालों का वध किया।

श्लोक 15 (skanda.5.306.15)

कश्यपाय महीं दत्त्वा सपर्वतवनाकराम् । तपस्तपति देवेशो महेन्द्रेऽद्यापि भारत ॥

kaśyapāya mahīṁ dattvā saparvatavanākarām | tapastapati deveśo mahendre'dyāpi bhārata ||

पर्वतों, वनों और खदानों सहित पृथ्वी कश्यप को दान करके, हे भारत! वह देवेश आज भी महेन्द्र पर्वत पर तप कर रहा है।

श्लोक 16 (skanda.5.306.16)

ततो दाशरथी रामो रावणं देवकण्टकम् । सगणं समरे हत्वा राज्यं दत्त्वा विभीषणे ॥

tato dāśarathī rāmo rāvaṇaṁ devakaṇṭakam | sagaṇaṁ samare hatvā rājyaṁ dattvā vibhīṣaṇe ||

फिर दशरथ-पुत्र राम ने देवताओं के कण्टकरूप रावण को उसके परिवार सहित युद्ध में मारकर, विभीषण को राज्य देकर —

श्लोक 17 (skanda.5.306.17)

पालयित्वा नयाद्भूमिं मखैः संतर्प्य देवताः । स्वर्गं गतो महातेजा रामो राजीवलोचनः ॥

pālayitvā nayādbhūmiṁ makhaiḥ saṁtarpya devatāḥ | svargaṁ gato mahātejā rāmo rājīvalocanaḥ ||

नीतिपूर्वक पृथ्वी का पालन किया, यज्ञों से देवताओं को तृप्त किया, फिर महातेजस्वी, कमल-नयन राम स्वर्ग को गए।

श्लोक 18 (skanda.5.306.18)

वसुदेवगृहे भूयः संकर्षणसहायवान् । अवतीर्णो जगन्नाथो वासुदेवो युधिष्ठिर ॥

vasudevagṛhe bhūyaḥ saṁkarṣaṇasahāyavān | avatīrṇo jagannātho vāsudevo yudhiṣṭhira ||

हे युधिष्ठिर! फिर वसुदेव के घर में संकर्षण के सहयोग सहित जगन्नाथ वासुदेव (कृष्ण) के रूप में अवतीर्ण हुए।

श्लोक 19 (skanda.5.306.19)

सोऽवधीत्तव सामर्थ्याद्वधार्थं दुष्टभूभृताम् । चाणूरकंसकेशीनां जरासंधस्य भारत ॥

so'vadhīttava sāmarthyādvadhārthaṁ duṣṭabhūbhṛtām | cāṇūrakaṁsakeśīnāṁ jarāsaṁdhasya bhārata ||

हे भारत! उसने तुम्हारे सामर्थ्य से दुष्ट राजाओं के वध हेतु चाणूर, कंस, केशी तथा जरासन्ध का वध किया।

श्लोक 20 (skanda.5.306.20)

तेन त्वं सुसहायेन हत्वा शत्रून्नरेश्वर । भोक्ष्यसे पृथिवीं सर्वां भ्रातृभिः सह संभृताम् ॥

tena tvaṁ susahāyena hatvā śatrūnnareśvara | bhokṣyase pṛthivīṁ sarvāṁ bhrātṛbhiḥ saha saṁbhṛtām ||

हे नरेश्वर! उस उत्तम सहायक (कृष्ण) से शत्रुओं का वध करके तुम अपने भाइयों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी का भोग करोगे।

श्लोक 21 (skanda.5.306.21)

तथा बुद्धत्वमपरं नवमं प्राप्स्यतेऽच्युतः । शान्तिमान्देवदेवेशो मधुहन्ता मधुप्रियः ॥

tathā buddhatvamaparaṁ navamaṁ prāpsyate'cyutaḥ | śāntimāndevadeveśo madhuhantā madhupriyaḥ ||

इसी प्रकार अच्युत उस नौवें अवतार में बुद्ध-रूप को प्राप्त करेंगे — शान्तिमान्, देवदेवेश, मधु के हन्ता, मधुप्रिय।

श्लोक 22 (skanda.5.306.22)

तेन बुद्धस्वरूपेण देवेन परमेष्ठिना । भविष्यति जगत्सर्वं मोहितं सचराचरम् ॥

tena buddhasvarūpeṇa devena parameṣṭhinā | bhaviṣyati jagatsarvaṁ mohitaṁ sacarācaram ||

उस बुद्ध-स्वरूप परमेष्ठी देव के द्वारा चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् मोहित हो जाएगा।

श्लोक 23 (skanda.5.306.23)

न श्रोष्यन्ति पितुः पुत्रास्तदाप्रभृति भारत । न गुरोर्बान्धवाः शिष्या भविष्यत्यधरोत्तरम् ॥

na śroṣyanti pituḥ putrāstadāprabhṛti bhārata | na gurorbāndhavāḥ śiṣyā bhaviṣyatyadharottaram ||

हे भारत! तब से पुत्र पिता की बात नहीं सुनेंगे, न शिष्य गुरु की; बन्धुजनों में ऊँच-नीच का विवेक नहीं रह जाएगा।

श्लोक 24 (skanda.5.306.24)

जितो धर्मो ह्यधर्मेण चासत्येन ऋतं जितम् । जिताश्चौरैश्च राजानः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः ॥

jito dharmo hyadharmeṇa cāsatyena ṛtaṁ jitam | jitāścauraiśca rājānaḥ strībhiśca puruṣā jitāḥ ||

धर्म अधर्म से पराजित होगा, और सत्य असत्य से पराजित होगा; राजा चोरों से पराजित होंगे, और पुरुष स्त्रियों से पराजित होंगे।

श्लोक 25 (skanda.5.306.25)

सीदन्ति चाग्निहोत्राणि गुरौ पूजा प्रणश्यति । सीदन्ति मानवा धर्माः कलौ प्राप्ते युधिष्ठिर ॥

sīdanti cāgnihotrāṇi gurau pūjā praṇaśyati | sīdanti mānavā dharmāḥ kalau prāpte yudhiṣṭhira ||

अग्निहोत्र क्षीण हो जाएँगे, गुरु की पूजा नष्ट हो जाएगी; हे युधिष्ठिर! कलियुग के आने पर मनुष्यों के धर्म क्षीण हो जाएँगे।

श्लोक 26 (skanda.5.306.26)

द्वादशे दशमे वर्षे नारी गर्भवती भवेत् । कन्यास्तत्र प्रसूयन्ते ब्राह्मणो हरिपिङ्गलः ॥

dvādaśe daśame varṣe nārī garbhavatī bhavet | kanyāstatra prasūyante brāhmaṇo haripiṅgalaḥ ||

बारह या दस वर्ष की अवस्था में ही स्त्री गर्भवती हो जाएगी; और कन्याएँ (उस अवस्था में ही) प्रसव करने लगेंगी; ब्राह्मण हरिपिंगल (पीत-वर्ण) होंगे —

श्लोक 27 (skanda.5.306.27)

भविष्यति ततः कल्किर्दशमे जन्मनि प्रभुः ॥

bhaviṣyati tataḥ kalkirdaśame janmani prabhuḥ ||

तब उस समय दसवें जन्म में प्रभु कल्कि प्रकट होंगे।

श्लोक 28 (skanda.5.306.28)

एतत्ते कथितं राजन्देवस्य परमेष्ठिनः । कारणं दश जन्मनां सर्वपापक्षयंकरम् ॥

etatte kathitaṁ rājandevasya parameṣṭhinaḥ | kāraṇaṁ daśa janmanāṁ sarvapāpakṣayaṁkaram ||

हे राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हें परमेष्ठी देव के दस जन्मों का कारण बताया है, जो सब पापों का नाश करने वाला है।

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