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अवन्ती खण्ड · अध्याय 307

भार्गलेश्वर तीर्थ की महिमा

अध्याय 306अध्याय-सूचीअध्याय 308

श्लोक 1 (skanda.5.307.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेद्धरापाल भार्गलेश्वरमुत्तमम् । शङ्करं जगतः प्राणं स्मृतमात्राघनाशनम् ॥

śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gaccheddharāpāla bhārgaleśvaramuttamam | śaṅkaraṁ jagataḥ prāṇaṁ smṛtamātrāghanāśanam ||

श्रीमार्कण्डेय बोले — हे धरापाल! उसके बाद जगत् के प्राणस्वरूप, स्मरणमात्र से पाप का नाश करने वाले, सर्वोत्तम भार्गलेश्वर शंकर के तीर्थ में जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.5.307.2)

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayetparameśvaram | aśvamedhasya yajñasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ ||

उस तीर्थ में स्नान करके जो परमेश्वर की पूजा करता है, वह मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.5.307.3)

तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्प्राणत्यागं करिष्यति । अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम् ॥

tatra tīrthe tu yaḥ kaścitprāṇatyāgaṁ kariṣyati | anivartikā gatistasya rudralokādasaṁśayam ||

उस तीर्थ में जो कोई भी प्राणत्याग करता है, उसकी रुद्रलोक से फिर न लौटने वाली गति निश्चित होती है।

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