अवन्ती खण्ड · अध्याय 308
रवि तीर्थ (आदित्येश्वर) की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.308.1)
मार्कण्डेय उवाच। तस्यैवानन्तरं चान्यद्रवितीर्थमनुत्तमम् । यस्य संदर्शनादेव मुच्यन्ते पातकैर्नराः ॥
mārkaṇḍeya uvāca| tasyaivānantaraṁ cānyadravitīrthamanuttamam | yasya saṁdarśanādeva mucyante pātakairnarāḥ ||
मार्कण्डेय बोले — उसी के बाद एक अन्य सर्वोत्तम रवितीर्थ है, जिसके दर्शनमात्र से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 2 (skanda.5.308.2)
रवितीर्थे तु यः स्नात्वा नरः पश्यति भास्करम् । तस्य यत्फलमुद्दिष्टं स्वयं देवेन तच्छृणु ॥
ravitīrthe tu yaḥ snātvā naraḥ paśyati bhāskaram | tasya yatphalamuddiṣṭaṁ svayaṁ devena tacchṛṇu ||
रवितीर्थ में स्नान करके जो मनुष्य भास्कर का दर्शन करता है, उसका जो फल स्वयं देव ने बताया है, उसे सुनो।
श्लोक 3 (skanda.5.308.3)
नान्धो न मूको बधिरः कुले भवति कश्चन । कुरूपः कुनखी वापि तस्य जन्मानि षोडश ॥
nāndho na mūko badhiraḥ kule bhavati kaścana | kurūpaḥ kunakhī vāpi tasya janmāni ṣoḍaśa ||
उसके सोलह जन्मों तक उसके कुल में न कोई अन्धा, न गूँगा, न बहरा, न कुरूप और न ही टेढ़े नाखूनों वाला उत्पन्न होता है।
श्लोक 4 (skanda.5.308.4)
दद्रुचित्रककुष्ठानि मण्डलानि विचर्चिका । नश्यन्ति देवभक्तस्य षण्मासान्नात्र संशयः ॥
dadrucitrakakuṣṭhāni maṇḍalāni vicarcikā | naśyanti devabhaktasya ṣaṇmāsānnātra saṁśayaḥ ||
दाद, श्वेतकुष्ठ, कुष्ठ, चकत्ते तथा खुजली — इन सबका उस देव-भक्त के छह महीनों में ही नाश हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है।
श्लोक 5 (skanda.5.308.5)
चरितं तस्य देवस्य पुराणे यच्छ्रुतं मया । न तत्कथयितुं शक्यं संक्षेपेण नृपोत्तम ॥
caritaṁ tasya devasya purāṇe yacchrutaṁ mayā | na tatkathayituṁ śakyaṁ saṁkṣepeṇa nṛpottama ||
हे नृपोत्तम! उस देव का जो चरित्र मैंने पुराण में सुना है, उसे संक्षेप में कह पाना सम्भव नहीं है।
श्लोक 6 (skanda.5.308.6)
तत्र तीर्थे तु यद्दानं रविमुद्दिश्य दीयते । विधिना पात्रविप्राय तस्यान्तो नास्ति कर्हिचित् ॥
tatra tīrthe tu yaddānaṁ ravimuddiśya dīyate | vidhinā pātraviprāya tasyānto nāsti karhicit ||
उस तीर्थ में सूर्य के उद्देश्य से विधिपूर्वक योग्य ब्राह्मण को जो दान दिया जाता है, उसका अन्त कभी नहीं होता।
श्लोक 7 (skanda.5.308.7)
अयने विषुवे चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा । रवितीर्थे प्रदत्तानां दानानां फलमुत्तमम् ॥
ayane viṣuve caiva candrasūryagrahe tathā | ravitīrthe pradattānāṁ dānānāṁ phalamuttamam ||
अयन के समय, विषुव के समय, तथा चन्द्र-सूर्य ग्रहण के समय रवितीर्थ में दिए गए दानों का फल सर्वोत्तम होता है।
श्लोक 8 (skanda.5.308.8)
संक्रान्तौ यानि दानानि हव्यकव्यानि भारत । अपामिव समुद्रस्य तेषामन्तो न लभ्यते ॥
saṁkrāntau yāni dānāni havyakavyāni bhārata | apāmiva samudrasya teṣāmanto na labhyate ||
हे भारत! संक्रान्ति के समय दिए गए हव्य और कव्य दानों का अन्त, समुद्र के जल की भाँति, कभी नहीं मिलता।
श्लोक 9 (skanda.5.308.9)
येन येन यदा दत्तं येन येन यदा हुतम् । तस्य तस्य तदा काले सविता प्रतिदायकः ॥
yena yena yadā dattaṁ yena yena yadā hutam | tasya tasya tadā kāle savitā pratidāyakaḥ ||
जिस-जिस ने जो कुछ जिस समय दान किया या हवन किया, उस-उस समय सविता (सूर्य) उसे उसका प्रतिदान करने वाला होता है।
श्लोक 10 (skanda.5.308.10)
सप्त जन्मानि तान्येव ददात्यर्कः पुनः पुनः । शतमिन्दुक्षये दानं सहस्रं तु दिनक्षये ॥
sapta janmāni tānyeva dadātyarkaḥ punaḥ punaḥ | śatamindukṣaye dānaṁ sahasraṁ tu dinakṣaye ||
अर्क (सूर्य) सात जन्मों तक बार-बार वही फल देता है। अमावास्या को दिया गया दान सौ गुना, तथा दिनक्षय (सूर्यास्त-काल) में दिया गया दान सहस्र गुना होता है।
श्लोक 11 (skanda.5.308.11)
संक्रान्तौ शतसाहस्रं व्यतीपाते त्वनन्तकम् ॥
saṁkrāntau śatasāhasraṁ vyatīpāte tvanantakam ||
संक्रान्ति के समय (दिया गया दान) एक लाख गुना, और व्यतीपात के समय अनन्त गुना होता है।
श्लोक 12 (skanda.5.308.12)
युधिष्ठिर उवाच। रवितीर्थं कथं तात पुण्यात्पुण्यतरं स्मृतम् । विस्तरेण ममाख्याहि श्रवणौ मम लम्पटौ ॥
yudhiṣṭhira uvāca| ravitīrthaṁ kathaṁ tāta puṇyātpuṇyataraṁ smṛtam | vistareṇa mamākhyāhi śravaṇau mama lampaṭau ||
युधिष्ठिर बोले — हे तात! रवितीर्थ किस प्रकार पुण्य से भी अधिक पुण्यकारी माना गया है? मुझे विस्तार से बताइए; मेरे कान (उसे सुनने के लिए) लालायित हैं।
श्लोक 13 (skanda.5.308.13)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। शृणुष्वावहितो भूत्वा ह्यादित्येश्वरमुत्तमम् । उत्तरे नर्मदाकूले सर्वव्याधिविनाशनम् ॥
śrīmārkaṇḍeya uvāca| śṛṇuṣvāvahito bhūtvā hyādityeśvaramuttamam | uttare narmadākūle sarvavyādhivināśanam ||
श्रीमार्कण्डेय बोले — सावधान होकर सुनो — नर्मदा के उत्तर तट पर स्थित, सब व्याधियों का नाश करने वाले, उस सर्वोत्तम आदित्येश्वर की कथा।
श्लोक 14 (skanda.5.308.14)
पुरा कृतयुगस्यादौ जाबालिर्ब्राह्मणोऽभवत् । वसिष्ठान्वयसम्भूतो वेदशास्त्रार्थपारगः ॥
purā kṛtayugasyādau jābālirbrāhmaṇo'bhavat | vasiṣṭhānvayasambhūto vedaśāstrārthapāragaḥ ||
पूर्वकाल में कृतयुग के आरम्भ में जाबालि नामक एक ब्राह्मण था, जो वसिष्ठ के वंश में उत्पन्न हुआ था और वेद-शास्त्रों के अर्थ में पारंगत था।
श्लोक 15 (skanda.5.308.15)
पतिव्रता साधुशीला तस्य भार्या मनस्विनी । ऋतुकाले तु सा गत्वा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥
pativratā sādhuśīlā tasya bhāryā manasvinī | ṛtukāle tu sā gatvā bhartāramidamabravīt ||
उसकी पत्नी पतिव्रता, सुशील तथा उदार-हृदया थी। ऋतुकाल में वह अपने पति के पास जाकर यह बोली —
श्लोक 16 (skanda.5.308.16)
वर्तते ऋतुकालो मे भर्तारं त्वामुपस्थिता । भज मां प्रीतिसंयुक्तः पुत्रकामां तु कामिनीम् ॥
vartate ṛtukālo me bhartāraṁ tvāmupasthitā | bhaja māṁ prītisaṁyuktaḥ putrakāmāṁ tu kāminīm ||
"मेरा ऋतुकाल चल रहा है; मैं आप, अपने पति, के पास आई हूँ। पुत्र की कामना रखने वाली मुझ कामिनी से प्रेमपूर्वक मिलिए।"
श्लोक 17 (skanda.5.308.17)
एवमुक्तो द्विजः प्राह प्रियेऽद्याहं व्रतान्वितः । गच्छेदानीं वरारोहे दास्य ऋत्वन्तरे पुनः ॥
evamukto dvijaḥ prāha priye'dyāhaṁ vratānvitaḥ | gacchedānīṁ varārohe dāsya ṛtvantare punaḥ ||
ऐसा कहे जाने पर द्विज बोला — "हे प्रिये! आज मैं व्रत में हूँ। हे वरारोहे! अभी जाओ, मैं फिर अगले ऋतुकाल में तुम्हारा साथ दूँगा।"
श्लोक 18 (skanda.5.308.18)
पुनर्द्वितीये सम्प्राप्ते ऋतुकालेऽप्युपस्थिता । पुनः सा छन्दिता तेन व्रतस्थोऽद्येति भारत ॥
punardvitīye samprāpte ṛtukāle'pyupasthitā | punaḥ sā chanditā tena vratastho'dyeti bhārata ||
हे भारत! फिर दूसरा ऋतुकाल आने पर वह पुनः उसके पास आई, और उसने फिर उसे यह कहकर टाल दिया कि "आज मैं व्रत में हूँ।"
श्लोक 19 (skanda.5.308.19)
इत्थं वा बहुशस्तेन छन्दिता च पुनः पुनः । निराशा चाभवत्तत्र भर्तारं प्रति भामिनी ॥
itthaṁ vā bahuśastena chanditā ca punaḥ punaḥ | nirāśā cābhavattatra bhartāraṁ prati bhāminī ||
इस प्रकार बार-बार उसके द्वारा टाल दी जाने पर वह भामिनी अपने पति के प्रति निराश हो गई।
श्लोक 20 (skanda.5.308.20)
दुःखेन महताविष्टा विधायानशनं मृता । तेन भ्रूणहतेनैव पापेन सहसा द्विजः ॥
duḥkhena mahatāviṣṭā vidhāyānaśanaṁ mṛtā | tena bhrūṇahatenaiva pāpena sahasā dvijaḥ ||
वह अत्यन्त दुःख से आविष्ट होकर अनशन करके मर गई। उसी भ्रूण-हत्या के समान पाप से वह द्विज अचानक —
श्लोक 21 (skanda.5.308.21)
शीर्णघ्राणाङ्घ्रिरभवत्तपः सर्वं ननाश च । दृष्ट्वात्मानं स कुष्ठेन व्याप्तं ब्राह्मणसत्तमः ॥
śīrṇaghrāṇāṅghrirabhavattapaḥ sarvaṁ nanāśa ca | dṛṣṭvātmānaṁ sa kuṣṭhena vyāptaṁ brāhmaṇasattamaḥ ||
उसकी नाक और पैर गल गए, और उसकी सारी तपस्या नष्ट हो गई। अपने आपको कुष्ठ से व्याप्त देखकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण —
श्लोक 22 (skanda.5.308.22)
विषादं परमं गत्वा नर्मदातटमाश्रितः । अपृच्छद्भास्करं तीर्थं द्विजेभ्यो द्विजसत्तमः ॥
viṣādaṁ paramaṁ gatvā narmadātaṭamāśritaḥ | apṛcchadbhāskaraṁ tīrthaṁ dvijebhyo dvijasattamaḥ ||
अत्यन्त विषाद को प्राप्त होकर नर्मदा के तट का आश्रय लिया, और उस श्रेष्ठ द्विज ने अन्य द्विजों से भास्कर-तीर्थ के विषय में पूछा।
श्लोक 23 (skanda.5.308.23)
आरोग्यं भास्करादिच्छेदिति संचिन्त्य चेतसि । कुतस्तद्भास्करं तीर्थं भो द्विजाः कथ्यतां मम ॥
ārogyaṁ bhāskarādicchediti saṁcintya cetasi | kutastadbhāskaraṁ tīrthaṁ bho dvijāḥ kathyatāṁ mama ||
मन में यह सोचकर कि "मुझे भास्कर से आरोग्य चाहिए" — "हे द्विजो! वह भास्कर-तीर्थ कहाँ है, मुझे बताइए।"
श्लोक 24 (skanda.5.308.24)
तपस्तप्याम्यहं गत्वा तस्मिंस्तीर्थे सुभावितः ॥
tapastapyāmyahaṁ gatvā tasmiṁstīrthe subhāvitaḥ ||
"मैं वहाँ जाकर, उस तीर्थ में भलीभाँति भावपूर्ण होकर तप करूँगा।"
श्लोक 25 (skanda.5.308.25)
द्विजा ऊचुः। रेवाया उत्तरे कूले आदित्येश्वरनामतः । विद्यते भास्करं तीर्थं सर्वव्याधिविनाशनम् ॥
dvijā ūcuḥ| revāyā uttare kūle ādityeśvaranāmataḥ | vidyate bhāskaraṁ tīrthaṁ sarvavyādhivināśanam ||
द्विज बोले — रेवा (नर्मदा) के उत्तर तट पर "आदित्येश्वर" नाम से वह भास्कर-तीर्थ विद्यमान है, जो सब व्याधियों का नाश करने वाला है।
श्लोक 26 (skanda.5.308.26)
तत्र याह्यविचारेण गन्तुं चेच्छक्यते त्वया । एवमुक्तो द्विजैर्विप्रो गन्तुं तत्र प्रचक्रमे ॥
tatra yāhyavicāreṇa gantuṁ cecchakyate tvayā | evamukto dvijairvipro gantuṁ tatra pracakrame ||
यदि तुम जा सकते हो तो बिना किसी विचार के वहाँ जाओ। द्विजों द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह विप्र वहाँ जाने के लिए प्रवृत्त हुआ।
श्लोक 27 (skanda.5.308.27)
व्याधिना परिभूतस्तु घोरेण प्राणहारिणा । यदा गन्तुं न शक्नोति तदा तेन विचिन्तितम् ॥
vyādhinā paribhūtastu ghoreṇa prāṇahāriṇā | yadā gantuṁ na śaknoti tadā tena vicintitam ||
परन्तु प्राणहारी घोर रोग से पराभूत होकर जब वह वहाँ जाने में असमर्थ हो गया, तब उसने यह विचार किया —
श्लोक 28 (skanda.5.308.28)
सामर्थ्यं ब्राह्मणानां हि विद्यते भुवनत्रये । लिङ्गपातः कृतो विप्रैर्देवदेवस्य शूलिनः ॥
sāmarthyaṁ brāhmaṇānāṁ hi vidyate bhuvanatraye | liṅgapātaḥ kṛto viprairdevadevasya śūlinaḥ ||
"ब्राह्मणों का सामर्थ्य तीनों लोकों में विद्यमान है। ब्राह्मणों ने तो त्रिशूलधारी देवदेव के लिंग का पातन भी कर दिया था।
श्लोक 29 (skanda.5.308.29)
समुद्रः शोषितो विप्रैर्विन्ध्यश्चापि निवारितः । अहमप्यत्र संस्थस्तु ह्यानयिष्यामि भास्करम् ॥
samudraḥ śoṣito viprairvindhyaścāpi nivāritaḥ | ahamapyatra saṁsthastu hyānayiṣyāmi bhāskaram ||
ब्राह्मणों ने समुद्र को सुखा दिया था, और विन्ध्य पर्वत को भी रोक दिया था। मैं भी यहीं रहकर भास्कर को यहीं बुला लूँगा —
श्लोक 30 (skanda.5.308.30)
तपोबलेन महता ह्यादित्येश्वरसंज्ञितम् । इति निश्चित्य मनसा ह्युग्रे तपसि संस्थितः ॥
tapobalena mahatā hyādityeśvarasaṁjñitam | iti niścitya manasā hyugre tapasi saṁsthitaḥ ||
अपने महान् तपोबल से, उस आदित्येश्वर नाम वाले को।" ऐसा मन में निश्चय करके वह उग्र तप में स्थित हो गया।
श्लोक 31 (skanda.5.308.31)
वायुभक्षो निराहारो ग्रीष्मे पञ्चाग्निमध्यगः । शिशिरे तोयमध्यस्थो वर्षास्वप्रावृताकृतिः ॥
vāyubhakṣo nirāhāro grīṣme pañcāgnimadhyagaḥ | śiśire toyamadhyastho varṣāsvaprāvṛtākṛtiḥ ||
वह केवल वायु का भक्षण करता, निराहार रहता, ग्रीष्म में पंचाग्नि के मध्य खड़ा रहता, शिशिर में जल के मध्य स्थित रहता, तथा वर्षा में बिना किसी आवरण के खड़ा रहता।
श्लोक 32 (skanda.5.308.32)
साग्रे वर्षशते पूर्णे रविस्तुष्टोऽब्रवीदिदम् ॥
sāgre varṣaśate pūrṇe ravistuṣṭo'bravīdidam ||
सौ वर्षों से भी अधिक पूर्ण हो जाने पर सूर्य प्रसन्न होकर यह बोले —
श्लोक 33 (skanda.5.308.33)
सूर्य उवाच। वरं वरय भद्रं ते किं ते मनसि वाञ्छितम् । अदेयमपि दास्यामि ब्रूहि मां त्वं चिरं कृथाः ॥
sūrya uvāca| varaṁ varaya bhadraṁ te kiṁ te manasi vāñchitam | adeyamapi dāsyāmi brūhi māṁ tvaṁ ciraṁ kṛthāḥ ||
सूर्य बोले — "वर माँगो, तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारे मन में क्या इच्छा है? जो न देने योग्य भी हो, वह भी मैं दूँगा; मुझसे कहो, अधिक विलम्ब न करो।
श्लोक 34 (skanda.5.308.34)
किमसाध्यं हि ते विप्र इदानीं तपसि स्थितः ॥
kimasādhyaṁ hi te vipra idānīṁ tapasi sthitaḥ ||
हे विप्र! तुम्हारे लिए अब क्या असाध्य है, जबकि तुम इतने तप में स्थित रहे हो?"
श्लोक 35 (skanda.5.308.35)
जाबालिरुवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश यदि देयो वरो मम । मम प्रतिज्ञा देवेश ह्यादित्येश्वरदर्शने ॥
jābāliruvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa yadi deyo varo mama | mama pratijñā deveśa hyādityeśvaradarśane ||
जाबालि बोला — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना ही है, तो हे देवेश! मेरी प्रतिज्ञा आदित्येश्वर के दर्शन में थी,
श्लोक 36 (skanda.5.308.36)
कृता तां पारितुं देव न शक्तो व्याधिना वृतः । शुक्लतीर्थेऽत्र तिष्ठ त्वमादित्येश्वरमूर्तिधृक् ॥
kṛtā tāṁ pārituṁ deva na śakto vyādhinā vṛtaḥ | śuklatīrthe'tra tiṣṭha tvamādityeśvaramūrtidhṛk ||
जिसे पूरा करने में मैं रोग से घिरा होने के कारण असमर्थ हूँ। हे देव! आप यहीं शुक्लतीर्थ में आदित्येश्वर-मूर्ति धारण कर विराजमान हो जाइए।
श्लोक 37 (skanda.5.308.37)
एवमुक्ते तु देवेशो बहुरूपो दिवाकरः । उत्तरे नर्मदाकूले क्षणादेव व्यदृश्यत ॥
evamukte tu deveśo bahurūpo divākaraḥ | uttare narmadākūle kṣaṇādeva vyadṛśyata ||
ऐसा कहे जाने पर बहुरूपधारी देवेश दिवाकर नर्मदा के उत्तर तट पर क्षणभर में ही प्रकट हो गए।
श्लोक 38 (skanda.5.308.38)
तदाप्रभृति भूपाल तद्धि तीर्थं प्रचक्षते । सर्वपापहरं प्रोक्तं सर्वदुःखविनाशनम् ॥
tadāprabhṛti bhūpāla taddhi tīrthaṁ pracakṣate | sarvapāpaharaṁ proktaṁ sarvaduḥkhavināśanam ||
हे भूपाल! तभी से वह तीर्थ (आदित्येश्वर के नाम से) कहा जाता है, जो सब पापों का हरण करने वाला और सब दुःखों का नाश करने वाला बताया गया है।
श्लोक 39 (skanda.5.308.39)
यस्तु संवत्सरं पूर्णं नित्यमादित्यवासरे । स्नात्वा प्रदक्षिणाः सप्त दत्त्वा पश्यति भास्करम् ॥
yastu saṁvatsaraṁ pūrṇaṁ nityamādityavāsare | snātvā pradakṣiṇāḥ sapta dattvā paśyati bhāskaram ||
जो पूरे एक वर्ष तक प्रतिदिन रविवार को स्नान करके सात प्रदक्षिणाएँ करके भास्कर का दर्शन करता है,
श्लोक 40 (skanda.5.308.40)
यत्फलं लभते तेन तच्छृणुष्व मयोदितम् । प्रसुप्तं मण्डलानीह दद्रुकुष्ठविचर्चिकाः ॥
yatphalaṁ labhate tena tacchṛṇuṣva mayoditam | prasuptaṁ maṇḍalānīha dadrukuṣṭhavicarcikāḥ ||
उसे जो फल प्राप्त होता है, वह मुझसे सुनो — जो चकत्ते सुप्त पड़े हों, दाद, कुष्ठ तथा खुजली —
श्लोक 41 (skanda.5.308.41)
नश्यन्ति सत्वरं राजंस्तूलराशिरिवानले । धनपुत्रकलत्राणां पूरयेद्वत्सरत्रयात् ॥
naśyanti satvaraṁ rājaṁstūlarāśirivānale | dhanaputrakalatrāṇāṁ pūrayedvatsaratrayāt ||
हे राजन्! वे शीघ्र ही उस प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे रूई का ढेर अग्नि में; और तीन वर्षों में धन, पुत्र तथा पत्नी की समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
श्लोक 42 (skanda.5.308.42)
यस्तु श्राद्धप्रदस्तत्र पितॄनुद्दिश्य संक्रमे । तृप्यन्ति पितरस्तस्य पितृदेवो हि भास्करः ॥
yastu śrāddhapradastatra pitḥnuddiśya saṁkrame | tṛpyanti pitarastasya pitṛdevo hi bhāskaraḥ ||
जो वहाँ संक्रान्ति के समय पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध देता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं, क्योंकि भास्कर स्वयं पितृ-देव हैं।
श्लोक 43 (skanda.5.308.43)
इति ते कथितं सर्वमादित्येश्वरमुत्तमम् । सर्वपापहरं दिव्यं सर्वरोगविनाशनम् ॥
iti te kathitaṁ sarvamādityeśvaramuttamam | sarvapāpaharaṁ divyaṁ sarvarogavināśanam ||
इस प्रकार मैंने तुम्हें यह सब उत्तम आदित्येश्वर तीर्थ का वृत्तान्त बताया, जो सब पापों का हरण करने वाला, दिव्य तथा सब रोगों का नाश करने वाला है।