अवन्ती खण्ड · अध्याय 345
चन्द्रहास्य तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.345.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। ततो गच्छेन्महीपाल सोमतीर्थमनुत्तमम्। चन्द्रहासेति विख्यातं सर्वदैवतपूजितम्
śrīmārkaṇḍeya uvāca| tato gacchenmahīpāla somatīrthamanuttamam| candrahāseti vikhyātaṁ sarvadaivatapūjitam
श्री मार्कण्डेय ने कहा — हे महीपाल! फिर सर्वदेव-पूजित, चन्द्रहास नाम से विख्यात, उस अनुपम सोमतीर्थ में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.5.345.2)
यत्र सिद्धिं परां प्राप्तः सोमो राजा सुरोत्तमः
yatra siddhiṁ parāṁ prāptaḥ somo rājā surottamaḥ
जहाँ राजा सोम, देवताओं में श्रेष्ठ, परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे।
श्लोक 3 (skanda.5.345.3)
युधिष्ठिर उवाच। कथं सिद्धिमनुप्राप्तः सोमो राजा जगत्पतिः। तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि कथयस्व ममानघ
yudhiṣṭhira uvāca| kathaṁ siddhimanuprāptaḥ somo rājā jagatpatiḥ| tatsarvaṁ śrotumicchāmi kathayasva mamānagha
युधिष्ठिर ने कहा — जगत्पति राजा सोम ने वह सिद्धि कैसे प्राप्त की? हे निष्पाप! वह सब मुझे सुनना है, कृपया मुझसे कहिए।
श्लोक 4 (skanda.5.345.4)
मार्कण्डेय उवाच। पुरा शप्तो मुनीन्द्रेण दक्षेण किल भारत। असेवनाद्धि दाराणां क्षयरोगी भविष्यसि
mārkaṇḍeya uvāca| purā śapto munīndreṇa dakṣeṇa kila bhārata| asevanāddhi dārāṇāṁ kṣayarogī bhaviṣyasi
मार्कण्डेय ने कहा — हे भारत! पूर्वकाल में मुनीन्द्र दक्ष द्वारा वे शापित हुए थे — पत्नियों की उपेक्षा करने के कारण तुम क्षयरोगी हो जाओगे।
श्लोक 5 (skanda.5.345.5)
उद्वाहितानां पत्नीनां ये न कुर्वन्ति सेवनम्। या निष्ठा जायते तेषां तां शृणुष्व नरोत्तम
udvāhitānāṁ patnīnāṁ ye na kurvanti sevanam| yā niṣṭhā jāyate teṣāṁ tāṁ śṛṇuṣva narottama
जो लोग विवाहित पत्नियों की सेवा नहीं करते, उनकी जो गति होती है, हे नरोत्तम! उसे सुनो।
श्लोक 6 (skanda.5.345.6)
ऋतुकाले तु नारीणां सेवनाज्जायते सुतः। सुतात्स्वर्गश्च मोक्षश्च हीत्येवं श्रुतिनोदना
ṛtukāle tu nārīṇāṁ sevanājjāyate sutaḥ| sutātsvargaśca mokṣaśca hītyevaṁ śrutinodanā
स्त्रियों की ऋतुकाल में सेवा से पुत्र उत्पन्न होता है, और पुत्र से ही स्वर्ग और मोक्ष मिलता है — ऐसा श्रुति का निर्देश है।
श्लोक 7 (skanda.5.345.7)
तत्कालोचितधर्मेण ये न सेवन्ति तां नराः। तेषां ब्रह्मघ्नजं पापं जायते नात्र संशयः
tatkālocitadharmeṇa ye na sevanti tāṁ narāḥ| teṣāṁ brahmaghnajaṁ pāpaṁ jāyate nātra saṁśayaḥ
जो पुरुष उस उचित समय के धर्मानुसार उसकी सेवा नहीं करते, उन्हें निःसंदेह ब्रह्महत्या के समान पाप लगता है।
श्लोक 8 (skanda.5.345.8)
तेन पापेन घोरेण वेष्टतो रौरवे पतेत्। तस्य तद्रुधिरं पापाः पिबन्ते कालमीप्सितम्
tena pāpena ghoreṇa veṣṭato raurave patet| tasya tadrudhiraṁ pāpāḥ pibante kālamīpsitam
उस घोर पाप से घिरा हुआ वह रौरव नरक में गिरता है; वहाँ पापी लोग उसके उसी रक्त को इच्छित काल तक पीते रहते हैं।
श्लोक 9 (skanda.5.345.9)
ततोऽवतीर्णकालेन यां यां योनिं प्रयास्यति। तस्यां तस्यां स दुष्टात्मा दुर्भगो जायते सदा
tato'vatīrṇakālena yāṁ yāṁ yoniṁ prayāsyati| tasyāṁ tasyāṁ sa duṣṭātmā durbhago jāyate sadā
फिर उस काल के बीत जाने पर वह जिस-जिस योनि में जाता है, उस-उस योनि में वह दुष्टात्मा सदा दुर्भाग्यशाली ही जन्म लेता है।
श्लोक 10 (skanda.5.345.10)
नारीणां तु सदा कामो ह्यधिकः परिवर्तते। विशेषेण ऋतोः काले भिद्यते कामसायकैः
nārīṇāṁ tu sadā kāmo hyadhikaḥ parivartate| viśeṣeṇa ṛtoḥ kāle bhidyate kāmasāyakaiḥ
स्त्रियों में सदा कामेच्छा पुरुषों से अधिक रहती है; विशेषतः ऋतुकाल में वे कामबाणों से विशेष रूप से विदीर्ण होती हैं।
श्लोक 11 (skanda.5.345.11)
परिभूता हि सा भर्त्रा ध्यायतेऽन्यं पतिं ततः। तस्याः पुत्रः समुत्पन्नो ह्यटते कुलमुत्तमम्
paribhūtā hi sā bhartrā dhyāyate'nyaṁ patiṁ tataḥ| tasyāḥ putraḥ samutpanno hyaṭate kulamuttamam
पति द्वारा उपेक्षित होकर वह किसी अन्य पुरुष का ध्यान करने लगती है; तब उससे उत्पन्न पुत्र उत्तम कुल को भी कलंकित करता है।
श्लोक 12 (skanda.5.345.12)
स्वर्गस्थास्तेन पितरः पूर्वं जाता महीपते। पतन्ति जातमात्रेण कुलटस्तेन चोच्यते
svargasthāstena pitaraḥ pūrvaṁ jātā mahīpate| patanti jātamātreṇa kulaṭastena cocyate
हे महीपते! उसके कारण स्वर्गस्थ हुए पूर्वज पितर भी उसके जन्म लेते ही पतित हो जाते हैं, और वह कुलटा (कुलनाशक) कहलाता है।
श्लोक 13 (skanda.5.345.13)
तेन कर्मविपाकेन क्षयरोगी शशी ह्यभूत्। त्यक्त्वा लोकं सुरेन्द्राणां मर्त्यलोकमुपागतः
tena karmavipākena kṣayarogī śaśī hyabhūt| tyaktvā lokaṁ surendrāṇāṁ martyalokamupāgataḥ
उसी कर्म के फलस्वरूप शशी अर्थात् चन्द्रमा क्षयरोगी हो गए, और देवराजों के लोक को त्यागकर मृत्युलोक में आ गए।
श्लोक 14 (skanda.5.345.14)
तत्र तीर्थान्यनेकानि पुण्यान्यायतनानि च। भ्रमित्वा नर्मदां प्राप्तः सर्वपापप्रणाशिनीम्
tatra tīrthānyanekāni puṇyānyāyatanāni ca| bhramitvā narmadāṁ prāptaḥ sarvapāpapraṇāśinīm
वहाँ अनेक तीर्थों और पुण्य स्थानों में भटकने के बाद वे समस्त पापों का नाश करने वाली नर्मदा को प्राप्त हुए।
श्लोक 15 (skanda.5.345.15)
उपवासस्तु दानानि व्रतानि नियमाश्च ये। चचार द्वादशाब्दानि ततो मुक्तः स किल्बिषैः
upavāsastu dānāni vratāni niyamāśca ye| cacāra dvādaśābdāni tato muktaḥ sa kilbiṣaiḥ
फिर उपवास, दान, व्रत तथा नियम आदि का बारह वर्षों तक पालन किया, जिससे वे पापों से मुक्त हो गए।
श्लोक 16 (skanda.5.345.16)
स्थापयित्वा महादेवं सर्वपातकनाशनम्। जगाम प्रभया पूर्णः सोमलोकमनुत्तमम्
sthāpayitvā mahādevaṁ sarvapātakanāśanam| jagāma prabhayā pūrṇaḥ somalokamanuttamam
समस्त पापों का नाश करने वाले महादेव को वहाँ स्थापित कर, वे प्रभा से परिपूर्ण होकर अनुपम सोमलोक को चले गए।
श्लोक 17 (skanda.5.345.17)
येनैव स्थापितो देवः पूज्यते वर्षसंख्यया। तावद्युगसहस्राणि तस्य लोकं समश्नुते
yenaiva sthāpito devaḥ pūjyate varṣasaṁkhyayā| tāvadyugasahasrāṇi tasya lokaṁ samaśnute
जिसके द्वारा स्थापित देव जितने वर्षों तक पूजे जाते हैं, वह उतने ही हजार युगों तक उनके लोक का भोग करता है।
श्लोक 18 (skanda.5.345.18)
तेन देवान् विधानोक्तान् स्थापयन्ति नरा भुवि। अक्षयं चाव्ययं यस्मात्फलं भवति नान्यथा
tena devān vidhānoktān sthāpayanti narā bhuvi| akṣayaṁ cāvyayaṁ yasmātphalaṁ bhavati nānyathā
इसीलिए मनुष्य विधानोक्त देवताओं को पृथ्वी पर स्थापित करते हैं, क्योंकि इससे अक्षय और अव्यय फल प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।
श्लोक 19 (skanda.5.345.19)
सोमतीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद्देवमीश्वरम्। जायते स नरो भूत्वा सोमवित्प्रियदर्शनः
somatīrthe tu yaḥ snātvā pūjayeddevamīśvaram| jāyate sa naro bhūtvā somavitpriyadarśanaḥ
जो सोमतीर्थ में स्नान कर देव ईश्वर की पूजा करता है, वह मनुष्य के रूप में जन्म लेकर चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन होता है।
श्लोक 20 (skanda.5.345.20)
चन्द्रप्रभासे यो गत्वा स्नानं विधिवदाचरेत्। व्याधिना नाभिभूतः स्यात्क्षयरोगेण वा युतः
candraprabhāse yo gatvā snānaṁ vidhivadācaret| vyādhinā nābhibhūtaḥ syātkṣayarogeṇa vā yutaḥ
जो चन्द्रप्रभास तीर्थ में जाकर विधिपूर्वक स्नान करता है, वह किसी व्याधि से पीड़ित नहीं होता, न ही क्षयरोग से युक्त होता है।
श्लोक 21 (skanda.5.345.21)
चन्द्रहास्ये नरः स्नात्वा द्वादश्यां तु नरेश्वर। चतुर्दश्यामुपोष्यैव क्षीरस्य जुहुयाच्चरुम्
candrahāsye naraḥ snātvā dvādaśyāṁ tu nareśvara| caturdaśyāmupoṣyaiva kṣīrasya juhuyāccarum
हे नरेश्वर! मनुष्य द्वादशी को चन्द्रहास्य तीर्थ में स्नान करके, चतुर्दशी को उपवास कर, क्षीर से बने चरु की आहुति दे।
श्लोक 22 (skanda.5.345.22)
मन्त्रैः पञ्चभिरीशानं पुरुषस्त्र्यम्बकं यजेत्। हविःशेषं स्वयं प्राश्य चन्द्रहास्येशमीक्षयेत्
mantraiḥ pañcabhirīśānaṁ puruṣastryambakaṁ yajet| haviḥśeṣaṁ svayaṁ prāśya candrahāsyeśamīkṣayet
पाँच मंत्रों से त्र्यम्बक ईशान की पूजा करे, और शेष हवि को स्वयं ग्रहण कर चन्द्रहास्येश्वर का दर्शन करे।
श्लोक 23 (skanda.5.345.23)
अनेन विधिना राजंस्तुष्टो देवो महेश्वरः। विधिना तीर्थयोगेन क्षयरोगाद्विमुच्यते
anena vidhinā rājaṁstuṣṭo devo maheśvaraḥ| vidhinā tīrthayogena kṣayarogādvimucyate
हे राजन्! इस विधि से महेश्वर देव प्रसन्न होते हैं, और इस तीर्थ-संयोग की विधि से व्यक्ति क्षयरोग से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.5.345.24)
सप्तभिः सोमवारैर्यः स्नानं तत्र समाचरेत्। स वै कर्णकृताद्रोगान्मुच्यते पूजयञ्छिवम्
saptabhiḥ somavāraiḥ yaḥ snānaṁ tatra samācaret| sa vai karṇakṛtādrogānmucyate pūjayañchivam
जो व्यक्ति वहाँ सात सोमवारों तक स्नान करता है, वह शिव की पूजा करते हुए कान से संबंधित रोगों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 25 (skanda.5.345.25)
अक्षिरोगस्तथा राजंश्चन्द्रहास्ये विनश्यति। चन्द्रहास्ये तु यो गत्वा ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः। स्नानं समाचरेद्भक्त्या मुच्यते सर्वपातकैः
akṣirogastathā rājaṁścandrahāsye vinaśyati| candrahāsye tu yo gatvā grahaṇe candrasūryayoḥ| snānaṁ samācaredbhaktyā mucyate sarvapātakaiḥ
हे राजन्! इसी प्रकार चन्द्रहास्य तीर्थ में नेत्र-रोग भी नष्ट हो जाता है। जो चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण के समय चन्द्रहास्य में जाकर भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.5.345.26)
तत्र स्नानं च दानं च चन्द्रहास्ये शुभाशुभम्। कृतं नृपवरश्रेष्ठ सर्वं भवति चाक्षयम्
tatra snānaṁ ca dānaṁ ca candrahāsye śubhāśubham| kṛtaṁ nṛpavaraśreṣṭha sarvaṁ bhavati cākṣayam
हे नृपश्रेष्ठ! वहाँ चन्द्रहास्य में किया गया स्नान और दान, चाहे शुभ हो या प्रायश्चित्त-स्वरूप, सब अक्षय फलदायी होता है।
श्लोक 27 (skanda.5.345.27)
ते धन्यास्ते महात्मानस्तेषां जन्म सुजीवितम्। चन्द्रहास्ये तु ये स्नात्वा पश्यन्ति ग्रहणं नराः
te dhanyāste mahātmānasteṣāṁ janma sujīvitam| candrahāsye tu ye snātvā paśyanti grahaṇaṁ narāḥ
वे मनुष्य धन्य हैं, वे महात्मा हैं, उनका जन्म और जीवन सफल है, जो चन्द्रहास्य में स्नान कर ग्रहण का दर्शन करते हैं।
श्लोक 28 (skanda.5.345.28)
वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुरा कृतम्। स्नानमात्रात्तु राजेन्द्र तत्र तीर्थे प्रणश्यति
vācikaṁ mānasaṁ pāpaṁ karmajaṁ yatpurā kṛtam| snānamātrāttu rājendra tatra tīrthe praṇaśyati
हे राजेन्द्र! वाणी, मन तथा कर्म से पूर्व में किया गया जो भी पाप हो, वह केवल उस तीर्थ में स्नान करने मात्र से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 29 (skanda.5.345.29)
बहवस्तन्न जानन्ति महामोहसमन्विताः। देहस्थ इव सर्वेषां परमात्मेव संस्थितम्
bahavastanna jānanti mahāmohasamanvitāḥ| dehastha iva sarveṣāṁ paramātmeva saṁsthitam
अत्यंत मोह से युक्त बहुत से लोग यह नहीं जानते कि वह देहस्थ की भाँति सबमें परमात्मा-रूप में ही स्थित है।
श्लोक 30 (skanda.5.345.30)
पश्चिमे सागरे गत्वा सोमतीर्थे तु यत्फलम्। तत्समग्रमवाप्नोति चन्द्रहास्ये न संशयः
paścime sāgare gatvā somatīrthe tu yatphalam| tatsamagramavāpnoti candrahāsye na saṁśayaḥ
पश्चिम सागर में जाकर सोमतीर्थ में जो फल प्राप्त होता है, वह सम्पूर्ण फल चन्द्रहास्य में ही प्राप्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 31 (skanda.5.345.31)
संक्रान्तौ च व्यतीपाते विषुवे चायने तथा। चन्द्रहास्ये नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते
saṁkrāntau ca vyatīpāte viṣuve cāyane tathā| candrahāsye naraḥ snātvā sarvapāpaiḥ pramucyate
संक्रांति, व्यतीपात योग, विषुव तथा अयन के समय चन्द्रहास्य में स्नान करने वाला मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 32 (skanda.5.345.32)
ते मूढास्ते दुराचारास्तेषां जन्म निरर्थकम्। चन्द्रहास्यं न जानन्ति नर्मदायां व्यवस्थितम्
te mūḍhāste durācārāsteṣāṁ janma nirarthakam| candrahāsyaṁ na jānanti narmadāyāṁ vyavasthitam
वे मूर्ख हैं, वे दुराचारी हैं, उनका जन्म व्यर्थ है, जो नर्मदा में स्थित इस चन्द्रहास्य तीर्थ को नहीं जानते।
श्लोक 33 (skanda.5.345.33)
चन्द्रहास्ये तु यः कश्चित्संन्यासं कुरुते नृप। अनिवर्तिका गतिस्तस्य सोमलोकात्कदाचन
candrahāsye tu yaḥ kaścitsaṁnyāsaṁ kurute nṛpa| anivartikā gatistasya somalokātkadācana
हे राजन्! जो कोई चन्द्रहास्य में संन्यास लेता है अर्थात् शरीर त्यागता है, उसकी गति सोमलोक से कभी वापस नहीं लौटती।