अवन्ती खण्ड · अध्याय 361
दशकन्या तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.361.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। गच्छेत्ततः क्षोणिनाथ तीर्थं परमशोभनम्। सर्वपापहरं पुण्यं दशकन्येति विश्रुतम्। महादेवकृतं पुण्यं सर्वकामफलप्रदम्।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| gacchettataḥ kṣoṇinātha tīrthaṁ paramaśobhanam| sarvapāpaharaṁ puṇyaṁ daśakanyeti viśrutam| mahādevakṛtaṁ puṇyaṁ sarvakāmaphalapradam||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे राजन्! इसके पश्चात परम शोभन तीर्थ में जाना चाहिए, जो समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यमय और दशकन्या नाम से विख्यात है। यह महादेव द्वारा किया गया पुण्य तीर्थ समस्त कामनाओं का फल देने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.5.361.2)
तत्र तीर्थे महादेवो दशकन्या गुणान्विताः। ब्रह्मणो वरयामास ह्युद्वाहेन युयोज ह।
tatra tīrthe mahādevo daśakanyā guṇānvitāḥ| brahmaṇo varayāmāsa hyudvāhena yuyoja ha||
उस तीर्थ में महादेव ने गुणवती दस कन्याओं को ब्रह्मा के लिए वरण किया और विवाह द्वारा उन्हें संयुक्त किया।
श्लोक 3 (skanda.5.361.3)
तदाप्रभृति तत्तीर्थं दशकन्येति विश्रुतम्। सर्वपापहरं पुण्यमक्षयं कीर्तितं फलम्।
tadāprabhṛti tattīrthaṁ daśakanyeti viśrutam| sarvapāpaharaṁ puṇyamakṣayaṁ kīrtitaṁ phalam||
तभी से वह तीर्थ दशकन्या नाम से विख्यात हुआ, जो समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यमय है, और जिसका फल अक्षय कहा गया है।
श्लोक 4 (skanda.5.361.4)
तत्र तीर्थे तु यः कन्यां ददाति समलंकृताम्। प्राप्नोति पुरुषो दत्त्वा यथाशक्त्या स्वलंकृताम्।
tatra tīrthe tu yaḥ kanyāṁ dadāti samalaṅkṛtām| prāpnoti puruṣo dattvā yathāśaktyā svalaṅkṛtām||
उस तीर्थ में जो पुरुष यथाशक्ति सुसज्जित कन्या का दान करता है, वह उस दान से फल प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.5.361.5)
तेन दानोत्थपुण्येन पूतात्मानो नराधिप। वसन्ति रोमसंख्यानि वर्षाणि शिवसन्निधौ।
tena dānotthapuṇyena pūtātmāno narādhipa| vasanti romasaṅkhyāni varṣāṇi śivasannidhau||
हे नराधिप! उस दान से उत्पन्न पुण्य के कारण पवित्र आत्मा वाले पुरुष शरीर के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक शिव के सान्निध्य में निवास करते हैं।
श्लोक 6 (skanda.5.361.6)
ततः कालेन महता त्विह लोके नरेश्वर। मानुष्यं प्राप्य दुष्प्राप्यं धनकोटीपतिर्भवेत्।
tataḥ kālena mahatā tviha loke nareśvara| mānuṣyaṁ prāpya duṣprāpyaṁ dhanakoṭīpatirbhavet||
हे नरेश्वर! तत्पश्चात दीर्घ काल के बाद इस लोक में दुर्लभ मनुष्य जन्म प्राप्त कर वह करोड़ों धन का स्वामी होता है।
श्लोक 7 (skanda.5.361.7)
तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या स्नात्वा विप्राय काञ्चनम्। सम्प्रयच्छति शान्ताय सोऽत्यन्तं सुखमश्नुते।
tatra tīrthe tu yo bhaktyā snātvā viprāya kāñcanam| samprayacchati śāntāya so'tyantaṁ sukhamaśnute||
उस तीर्थ में जो भक्तिपूर्वक स्नान करके शांत ब्राह्मण को स्वर्ण अर्पित करता है, वह अत्यंत सुख को प्राप्त करता है।
श्लोक 8 (skanda.5.361.8)
वाचिकं मानसं वापि कर्मजं यत्पुरा कृतम्। तत्सर्वं विलयं याति स्वर्णदानेन भारत।
vācikaṁ mānasaṁ vāpi karmajaṁ yatpurā kṛtam| tatsarvaṁ vilayaṁ yāti svarṇadānena bhārata||
हे भारत! वाणी, मन अथवा कर्म से पूर्वकाल में किया गया जो भी पाप है, वह सब स्वर्ण-दान से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 9 (skanda.5.361.9)
नरो दत्त्वा सुवर्णं चापि वालाग्रमात्रकम्। तत्र तीर्थे दिवं याति मृतो नास्त्यत्र संशयः।
naro dattvā suvarṇaṁ cāpi vālāgramātrakam| tatra tīrthe divaṁ yāti mṛto nāstyatra saṁśayaḥ||
उस तीर्थ में मनुष्य केवल बाल के अग्रभाग के बराबर सुवर्ण देकर भी, मरने पर स्वर्ग को जाता है - इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 10 (skanda.5.361.10)
तत्र विद्याधरैः सिद्धैर्विमानवरमास्थितः। पूज्यमानो वसेत्तावद्यावदाभूतसम्प्लवम्।
tatra vidyādharaiḥ siddhairvimānavaramāsthitaḥ| pūjyamāno vasettāvadyāvadābhūtasamplavam||
वहां विद्याधरों और सिद्धों द्वारा पूजित होकर, श्रेष्ठ विमान पर आरूढ़ होकर वह तब तक निवास करता है, जब तक प्रलयकाल नहीं आता।