अवन्ती खण्ड · अध्याय 371
अषाढी तीर्थ की महिमा
श्लोक 1 (skanda.5.371.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। अषाढीतीर्थमागच्छेत्ततो भूपालनन्दन। कामिकं रूपमास्थाय स्थितो यत्र महेश्वरः।
śrīmārkaṇḍeya uvāca| aṣāḍhītīrthamāgacchettato bhūpālanandana| kāmikaṁ rūpamāsthāya sthito yatra maheśvaraḥ|||
श्री मार्कण्डेय बोले - हे भूपालनन्दन! तत्पश्चात अषाढी तीर्थ में आना चाहिए, जहां महेश्वर कामिक (मनोहर) रूप धारण करके स्थित हैं।
श्लोक 2 (skanda.5.371.2)
चातुर्युगमिदं तीर्थं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रस्यानुचरो भवेत्।
cāturyugamidaṁ tīrthaṁ sarvatīrtheṣvanuttamam| tatra snātvā naro rājan rudrasyānucaro bhavet|||
यह तीर्थ चारों युगों से (विद्यमान) है, और समस्त तीर्थों में अनुत्तम है। हे राजन्! वहां स्नान करके मनुष्य रुद्र का अनुचर बन जाता है।
श्लोक 3 (skanda.5.371.3)
तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्कुरुते प्राणमोक्षणम्। अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम्।
tatra tīrthe tu yaḥ kaścitkurute prāṇamokṣaṇam| anivartikā gatistasya rudralokādasaṁśayam|||
उस तीर्थ में जो कोई भी अपने प्राणों का त्याग करता है, उसकी गति निश्चय ही रुद्रलोक से अनिवर्तिनी होती है।