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अवन्ती खण्ड · अध्याय 370

शृंगी तीर्थ की महिमा

अध्याय 369अध्याय-सूचीअध्याय 371

श्लोक 1 (skanda.5.370.1)

श्रीमार्कण्डेय उवाच। शृङ्गितीर्थं ततो गच्छेन्मोक्षदं सर्वदेहिनाम्। मृतानां तत्र राजेन्द्र मोक्षप्राप्तिर्न संशयः।

śrīmārkaṇḍeya uvāca| śṛṅgitīrthaṁ tato gacchenmokṣadaṁ sarvadehinām| mṛtānāṁ tatra rājendra mokṣaprāptirna saṁśayaḥ|||

श्री मार्कण्डेय बोले - तत्पश्चात शृंगी तीर्थ में जाना चाहिए, जो समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाला है। हे राजेन्द्र! वहां मरने वालों को निःसंदेह मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्लोक 2 (skanda.5.370.2)

तत्रैव पिण्डदानेन पितॄणामनृणो भवेत्। तेन पुण्येन पूतात्मा लभेद्गाणेश्वरीं गतिम्।

tatraiva piṇḍadānena pitṝṇāmanṛṇo bhavet| tena puṇyena pūtātmā labhedgāṇeśvarīṁ gatim|||

वहीं पिण्ड-दान करने से मनुष्य पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है। उस पुण्य से पवित्र आत्मा वाला वह गणेश्वरी गति को प्राप्त करता है।

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